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गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

रास्ते का खोना या खोना किसी का रास्ते में

किसी
जमाने में
रोज आते थे
और
बहुत आते थे

अब नहीं आते
और जरा सा
भी नहीं आते

रास्ते
इस शहर के
कुछ बोलते नहीं

जो
बोलते हैं कुछ
वो
कुछ बताते ही नहीं

उस जमाने में
किस लिये आये
किसी ने
पूछा ही नहीं

इस जमाने में
कैसे पूछे कोई
वो अब
मिलता ही नहीं

रास्ते वही
भीड़ वही
शोर वही

आने जाने
वालों में
कोई नया
दिख रहा हो
ऐसा जैसा
भी नहीं

सब
आ जा रहे हैं
उसी तरह से
उन्हीं रास्तों पर

बस
एक उसके
रास्ते का
किसी को
कुछ पता ही नहीं

क्या खोया
वो या
उसका रास्ता
किससे पूछे
कहाँ जा कर कोई

भरोसा
उठ गया
‘उलूक’
जमाने का

उससे भी
और
उसके
रास्तों से भी

पहली बार
सुना जब से
रास्ते को ही
साथ लेकर अपने
कहीं खो गया कोई ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

इसका और उसका रहने दे ना देश सुना है जलजले से दस फिट खिसका है

नाम से लिखने पर
बबाला हो जाता है
इस और उस से
काम चलाया जाये
तो क्या जाता है
अंधे देख रहे हैं
अपने अपनो
के कामों को
कुछ कहना हो तो
बहुत ही सोचना
पड़ जाता है
वैसे भी चम्मचें
फैली हुई हैं इंटरनेट
की दुनियाँ में
गरीब और उसकी सोच
पर बात करने वाला
सबसे बड़ा पागल
एक हो जाता है
टी वी पर बहस देखिये
इसका भी होता है
उसका भी होता है
देखने वाले पागलों
को क्या कहा जाता है
बूंद बूंद से भरता है घड़ा
यही बताया यही
समझाया भी जाता है
बूंद पाप की होती है
बहुत छोटी सी
उसको अंदेखा करना
अभिमन्यू की तरह
पेट के अंदर ही
सिखाया जाता है
नाम नहीं ले रहा हूँ उसका
घिन आती है
ओले पकड़ने के लिये
खेतों में क्यों नहीं जाता है
उसकी बात कही है मैंने
तेरी समझ में आ गया होगा
मेरी समझ में भी आता है
कुछ कहने की हिम्मत
नहीं है तुझ में
तेरे को क्या मतलब है
चमचे तुझे तो उसके लिये
देश को रौंदना
अच्छी तरह आता है ।


चित्र साभार: www.123rf.com

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

कैसे लिखते हो गीत नहीं बताओगे तो रोज इसी तरह से पकाया जायेगा

प्रश्न:
किस तरह
लिखा जाये कभी
बस ज्यादा नहीं
एक ही सही
गीत लय
सुर ताल में
तेरे गीतों की
तरह किसी से
शहनाईयाँ भी
खाँसना शुरु
हो जाती हो
जिसे देख
कर बस
यूँ ही ऐसे ही
बिना बात के
गुस्से से ?


उत्तर:
किसने कहा
जमाने को देख
अपने आस पास के
फिर मुँह का
जायका बिगाड़
समझ के नीम के
टुकड़े खा लिये हों
जैसे पड़ोसी
से ही अपने
वो भी उधार के
सौंदर्य देखना सीख
सौंदर्य समझना सीख
सौंदर्य के आस पास
रह कर चिपकना सीख
आँख कान मुँह अपने
बंद कर लोगों के
बीच में रहना सीख
पहले इसे सीख तो सही
फिर कहना कैसी कही
खुद बा खुद ही तू
एक गीत हो जायेगा
जहाँ जायेगा
जिधर निकलेगा
सुर ताल और लय में
अपने आप को
बंधा हुआ पायेगा
लिखने लिखाने की
सोचना ही छोड़ देगा
बिना लिखे पेड़ जमीन
और आकाश में
लिख दिया जायेगा
जितना मना करेगा
उतना छाप दिया जायेगा
हजार के नोट में
गाँधी जी की छुट्टी कर
तुझे ही चेप दिया जायेगा
इस सब में लपेटने की
अपनी आदत से
भी बाज आयेगा
गीत लिखेगा ही नहीं
फिल्मों में भी
गवाया जायेगा
शाख पर बैठे
गुलिस्ताँ उजाड़ने
के लिये बदनाम ‘उलूक’
गीतकार हो जायेगा ।


चित्र साभार: www.clipartpanda.com

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

बचपन का खिलौना भी कभी बड़ा और जवान होता है एक खिलाड़ी जानता है इस बात को उसे पता होता है

जब तक पहचान
नहीं पाता है
खिलौनों को
खेल लेता है किसी
के भी खिलौने से
किसी के भी साथ
कहीं भी किसी
भी समय
समय के साथ ही
आने शुरु होते हैं
समझ में खिलौने
और खेल भी
खेलना खेल को
खिलौने के साथ
होना शुरु होता है
तब आनंददायक
और भी
कौन चाहता है
खेलना वही खेल
उसी खिलौने से
पर किसी और के
ना खेल ही
चाहता है बदलना
ना खिलौना ही
ना ही नियम
खेल के
इमानदारी
के साथ ही
पर खेल
होना होता है
उसके ही
खिलौने से
खेलना होता
है खेल को
उसके साथ ही
तब खेल खेलने
में उसे कोई
एतराज नहीं
होता है
खेल होता
चला जाता है
उस समय तक
जब तक खेल में
खिलौना होता है
और उसी का होता है ।

चित्र साभार: johancaneel.blogspot.com

रविवार, 26 अप्रैल 2015

जलजलों से पनपते कारोबार

मिट्टी और
पत्थर के
व्यापार का
फल फूल
रहा है
कारोबार

रोटी कपड़े
और मकान
की ही बात
करना बस
अब हो
गया है बेकार

अपनी ही कब्र
खुदवा रहा है
किसी आदमी
से ही आदमी

जमा कर
मिट्टी और
पत्थर
अपने ही
आसपास
बना कर
कच्ची
और ऊँची
एक मीनार

आदमी सच
में हो गया है
बहुत ज्यादा
ही होशियार

हे तिनेत्र
धारी शिव
तेरे मन
में क्या है
तू ही
जानता है
खेल का
मैदान
जैसा ही है
तेरे लिये
ये संसार

पहले
केदारनाथ
अब
पशुपतिनाथ
तूने किया
या नहीं
किसे पता है
और
कौन जाने
कौन समझे
प्रकृति की मार

मंद बुद्धि
करे कोशिश
समझने
की कुछ

होता है
अनिष्ट
किस का
और क्यों
कब और
कहाँ
किस प्रकार

दिखती है
‘उलूक’ को
अपने
चारों तरफ
बहुत से
सफेदपोशों
की जायज
दिखा कर
जी ओ
पढ़ा कर
की जा रही
लूटमार

मरते नहीं
कोई कहीं
इस तरह
मर रहे हैं
जलजले में
तेरे इंसान
एक नहीं
बहुत से
ईमानदार

शुरु हो
चुका है खेल
आपदा
प्रबंधन का
सहायता
के कोष के
खुल चुके हैं
जगह जगह द्वार

हे शिव
हे त्रिनेत्र धारी
तू ही समझ
सकता है
तेरे अपने
खेलों के नियम
विकास
और विनाश
की परिभाषाऐं
मिट्टी और
पत्थर के
लुटेरों पर
बरसता
तेरा प्यार
उनका
ऊँचाइयों
को छूता
कारोबार
जलजले से
पनपते लोग
फलते फूलते
हर बार ।

चित्र साभार: www.clipartbest.co

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

जो खटकता है वही ला कर लिख पटकता है

दिमागी तरंग
दिखाती है रंग
बिना पिये भंग
जब भी कहीं
कुछ खटकता है
झटका जोर का
मगर धीरे से कहीं
किसी को लगता है
लिखा जाता है
कुछ अपने हिसाब
से अपना गणित
पढ़ने वाला अपने
हिसाब से उस
सवाल को हल
करने लगता है
बहुत से शब्दों के
पेटेंट हो चुके हैं
कौन किस पर
जा कर चिपकता है
पता कहाँ चलता है
झाड़ू है सफाई है
भारत है अभियान है
बेमौसम बारिश है
ओले हैं तूफान है
कहाँ पता चलता है
कौन कहाँ जा
लटकता है
लटकना डूबना
कूदना तो समझ
में आता भी है
बस हवा हवा में
कई बातों का
हवाई जहाज
दिमाग के ऊपर से
होकर पता नहीं
कहाँ जा उतरता है
उसके सिर में
इसका चमचा
इसके सिर में
उसका चमचा
कौन से लटकने
झटकने को ला
कर पटकता है
जगह जगह हो रही
लूट खसोट पर
आँख बंद कर
‘उलूक’ के कुछ
कह देते ही
मौका पाकर
उसे नोचने
खसोटने को
समझदार एक
तुरंत झपटता है ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

नासमझी के कारण ही किस्मत जाती फूट है

एक नहीं
कई कई हैं
बहुत से हैं
सबूत हैं
चलते फिरते
नजर आते हैं
असल में
ताबूत हैं
ख्वाबों में
कफन
बेचते हैं
जीवन बीमा
के दूत हैं
नाटक में
पात्र हैं
सुंदर से
देवदूत हैं
विज्ञापन में
इंसान हैं
इंसानों में
भूत हैं
बाहर से
सजने सवरने
की मन
चाही है
और खुली
छूट है
अंदर छुपी
कहीं पर
लम्बी एक
सूची है
पहली लिखी
इबारत
जिसमें
लूट सके
तो लूट है ।

चित्र साभार: pixshark.com

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

जय जय जय हनुमान मतलब एक स्पेशियल मेहमान

एक होता है बन्ना
एक होती है बन्नी
बन्ने की शादी
बन्ने से होनी है होती

कुछ को देने
होते ही हैं निमंत्रण
चाहिये ही होते हैं
थोड़े बहुत गवाह

अब्दुल्ला भी होता है
दीवाना भी होता है
शादी का माहौल
कुछ अलग सा
बनाना ही होता है

कुछ खुश होते हैं
कुछ दुखी होते हैं
कुछ की निकल
रही होती है आह

सबसे गजब
का होता है
एक खास मेहमान
बन्ने और बन्नी से
भी कहीं ऊपर जैसे
बहुत ऊपर
का भगवान

भगवानों में भी
कई प्रकार होते हैं
कुछ बिना कार होते हैं
कुछ अपने होते हैं
कुछ पराये होते हैं
कुछ बेकार होते हैं

एक सबसे
अलग होता है
जैसे ही जलसे
में पहुँचता है

एक जलजला होता है
बन्ने और बन्नी को
लोग भूल जाते हैं
मेहमान के चारों
ओर घेरा बनाते हैं

मेहमान जवान हो
जरूरी नहीं होता है
जब तक जलसे
में मौजूद होता है
बस और बस वही
एक बन्ना होता है

घेरने वालों के चेहरे
में रौनक होती है
भवसागर में तैराने
की जैसे उसके हाथ में
एक ऐनक होती है

शादी कुछ देर
रुक जैसा जाती है
बन्ना बन्नी को
जनता भूल जाती है

जो होता है बस वो
मेहमान होता है
निमंत्रण में आये हुऐ
लोगों के लिये
भगवान होता है

‘उलूक’
हमेशा की तरह
आकाश में कहीं
देख रहा होता है
चम्मच बिन जैसे
एक कटोरा होता है ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

काम हो जाना ही चाहिये कैसे होता है इससे क्या होता है

क्या बुराई है
सीखने में कुछ
कलाकारी
जब रहना ही
हो रहा हो
किसी का
कलाकारों के
जमघट में
अपने ही
घर में
बनाये गये
सरकस में
जानवर और
आदमी के
बीच फर्क को
पता करने को
वैसे तो कहीं
कोई लगा
भी होता है
आदमी को
पता भी होता है
ऐसा बहुत
जगह पर
लिखा भी
होता है
जानवर को
होता है
या नहीं
किसी को
पता भी
होता है
या नहीं
पता नहीं
होता है
आदमी को
आता है
गधे को बाप
बना ले जाना
अपना काम
निकालना
ही होता है
इसके लिये
वो बना देता है
किसी शेर को
पूंछ हिलाता
हुआ एक कुत्ता
चाटता हुआ
अपने कटे हुए
नाखूँनों को
निपोरता
हुआ खींसें
घिसे हुऐ तीखे
दातों के साथ
कुतरता हुआ घास
तो भी
क्या होता है
काम को होना
ही चाहिये
काम तो
होता है
आदमी आदमी
रहता है
या फिर एक
जानवर कभी
हो लेता है
‘उलूक’ को नींद
बहुत आती है
रात भर
जागता भी है
दिन दोपहर
ऊँघते ऊँघते
जमहाईयाँ भी
लेता है ।
चित्र साभार: www.englishcentral.com

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

अर्जुन और मछली की कहानी आज भी होती है

अर्जुन अब अपनी मछली
को साथ में रखता है
उसकी आँख पर अब भी
उसकी नजर होती है
अर्जुन का निशाना
आज भी नहीं चूकता है
बस जो बदल गया है वो
कि मछली भी
मछली नहीं होती है
मछली भी
अर्जुन ही होती है
दोनो मित्र होते हैं
दोनों साथ साथ रहते हैं
अर्जुन के आगे
बढ़ने के लिये
मछली भी
और उसकी आँख भी
जरूरी होती है
इधर के
अर्जुन के लिये
उधर का अर्जुन
मछली होता है
और उधर के
अर्जुन के लिये
इधर का अर्जुन
मछली होता है
दोनो को सब
पता होता है
दोनो मछलियाँ
अर्जुन अर्जुन खेलती हैं
दोनो का तीर निशाने
पर लगता है
दोनो के हाथ में
द्रोपदी होती है
चीर होता ही नहीं है कहीं
इसलिये हरण की बात
कहीं भी नहीं होती है
कृष्ण जी भी चैन से
बंसी बजाते है
‘उलूक’ की आदत
अब तक तो आप
समझ ही चुके होंगे
उसे हमेशा की तरह
इस सब में भी
खुजली ही होती है ।
चित्र साभार: www.123rf.com

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

कभी तो लिख यहाँ नहीं तो और कहीं दो शब्द प्यार पर भी झूठ ही सही

फर्माइश आई एक
इसी तरह की कुछ
लिखता हुआ देख कर
किसी को रोज
सीधे रास्ते पर
कुछ कुछ हमेशा
ही टेढ़ा मेढ़ा
प्यार पर दो शब्द
लिखने की चुनौती
या ललकार देकर
किसी ने पता नहीं
जाने अंजाने में
या सच ही में
जान बूझ कर
जैसे हो छेड़ा
प्यार पर तो
लिख रहा है
हर जगह हर तरफ
पूरा का पूरा संसार
पढ़ रहा है उस
प्यार को भी
आ आ कर कई बार
प्यार से सारा संसार
फैला हुआ हो जो
अथाह एक समुद्र जैसा
मन में सब के
इस पार से उस पार
उस पर कैसे लिखे
वो प्यार पर बस
दो शब्द केवल
जिसके दिमाग में
हर वक्त चलता
रहता हो कोई ना
कोई उतपाती कीड़ा
प्यार पर लिखते हैं
विशेषज्ञ प्यार में
माहिर प्रवीण या दक्ष
बिना देखे सुने कुछ भी
अपने आस पास
सोच कर महसूस कर
कुछ ऐसा ही खास
जिसमें होती भी है
और नहीं भी कोई पीड़ा
‘उलूक’ को लिखने की
आदत है रोज की
दिनचर्या रोज का
देखा सुना सच झूठ
अपना इसका या उसका
यहाँ उठाया है उसने
इस बात का ही जैसे बीड़ा
सबूत है भी और नहीं भी
इसका कि माना जाता है
पर कहता कोई
नहीं है उसको येड़ा
प्यार पर लिखने को
सोचे दो शब्द तेरे कहने
पर आज ही जैसे
देख ले क्या क्या
लिख दिया जैसे
होना शुरु हो गया
हो सोच की लेखनी
के मुँह आकार टेढ़ा।

चित्र साभार: www.clker.com

रविवार, 19 अप्रैल 2015

अपने घर की छोटी बातों में एक बड़ा देश नजर अंदाज हो रहा होता है

एक बार नहीं
कई बार होता है
अपना खुद का
घर होता है और
किसी और का
करोबार होता है
हर कोई जानता है
हर किसी को
उस के घर के
अंदर अंदर तक
गली के बाहर
निकलते ही
सबसे ज्यादा
अजनबी खुद का
यार होता है
खबर होती है
घर की एक एक
घर वालों को
बहुत अच्छी तरह
घर में रहता है
फिर भी घर की
बात में ही
समाचार होता है
लिखते लिखते
भरते जाते हैं
पन्ने एक एक
करके कई
लिखा दिखता है
बहुत सारा मगर
उसका मतलब
कुछ नहीं होता है
उनके आने के
निशान कई
दिखते हैं रोज
ही अपने
आसपास
शुक्रिया कहना
भी चाहे तो
कोई कैसे कहे
नाम होता तो है
पर एक शहर
का ही होता है
शहर तक ही नहीं
पहुँच पाता है
घर से निकल
कर ‘उलूक’
देश की बात
करने वाला
उससे बहुत ही
आगे कहीं होता है ।

चित्र साभार: imgarcade.com

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

उसपर या उसके काम पर कोई कुछ कहने की सोचने की सोचे उससे पहले ही किसी को खुजली हो रही थी

‘कभी तो खुल के बरस
अब्र इ मेहरबान की तरह’
जगजीत सिंह की
गजल से जुबाँ
पर थिरकन
सी हो रही थी
कैसे बरसना
करे शुरु कोई
उस जगह जहाँ
बादलों को भी
बैचेनी हो रही थी
खुद की आवाज
गुनगुनाने तक ही
रहे अच्छा है
आवाज जरा सा
उँची करने की
सोच कर भी
सिहरन हो रही थी
कहाँ बरसें खुल के
और किसलिये बरसें
थोड़ी सी बारिश
की जरूरत भी
किसे हो रही थी
टपकना बूँद का
देख कर बादल से
पूछ लिया है उसने
पहले भी कई बार
क्या छोटी सी चीज
खुद की सँभालनी
इतनी ही भारी
खुद को हो रही थी
किसे समझाये कोई
अपने खेत की
फसल का मिजाज
उसकी तबीयत तो
किसी को देख सुन
कर ही हरी हो रही थी
उसकी सोच में
किसी की सफेदपोशी
का कब्जा हो चुका है
कुछ नहीं किया
जा सकता है ‘उलूक’
‘मेरा बजूद है जलते
हुऐ मकाँ की तरह’
से यहाँ मगर
गजल फिर भी
पूरी हो रही थी ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

आइना कभी नहीं देखने वाला दिखाने के लिये रख गया

किसी ने
उलाहना दिया
सामने से एक
आइना रख दिया

जोर का झटका
थोड़ा धीरे से
मगर लग गया

ऐसा नहीं कि ऐसा
पहली बार हुआ

कई बार
होता आया है
आज भी हुआ

बेशर्म हो जाने के
कई दिनों के बाद
किसी दिन कभी
जैसे शर्म ने
थोड़ा सा हो छुआ

लगा जैसे
कुछ हुआ
थोड़ी देर के
लिये ही सही

नंगे जैसे होने का
कुछ अहसास हुआ

हड़बड़ी में अपने ही
हाथ ने अपने
ही शरीर पर
पड़े कपड़ों को छुआ

थोड़ी राहत सी हुई
अपने ही अंदर के
चोर ने खुद से ही कहा

अच्छा हुआ बच गया
सोच में पड़ गया
खुद के अंदर झाँकने
के लिये किसके कहने
पर आ कर गया

समझ में आना
जरूरी हो गया
‘उलूक’ उलाहना
क्यों दिया गया

अपने चेहरे को
खुद अपने आइने
में देखने के बदले

कोई अपना आइना
पानी से धोकर
धूप में सुखा कर
साफ कपड़े
से पोंछ कर
तेरे सामने से
क्यों खड़ा
कर गया

जोर का झटका
किसी और का
थोड़ा धीरे
से ही सही
किसी और को
लगना ही था
लग गया ।

चित्र साभार: acmaps.info.yorku.ca

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

‘उलूक’ उवाच पर काहे अपना सर खपाता है

किसी को कुछ
समझाने के लिये
कुछ नहीं
लिखा जाता है
हर कोई
समझदार होता है
जो आता है अपने
हिसाब से ही आता है
लिखे हुऐ पर अगर
बहुत थोड़ा सा ही
लिखा हुआ
नजर आता है
आने वाला
किसने कह दिया
कुछ लिखने लिखाने
के लिये ही आता है
इतनी बेशर्मी होना
भी तो अच्छी
बात नहीं होती है
नहीं लिखने पर
किसी के कुछ भी
नाराज नहीं
हुआ जाता है
तहजीब का देश है
पैरों के निशान
तो होते ही हैं
मिट्टी उठा कर
थोड़ी सी सर से
लगाया ही जाता है
कोयले का ही एक
प्रकार होता
है हीरा भी
कोयले से
कम से कम
नमस्कार तो
किया जाता है
‘उलूक’ मत
उठाया कर
ऐसे अजीब
से सवाल
जवाब देना
चाहे कोई
तो भी नहीं
दिया जाता है
ठेकेदारी करने
के भी
उसूल होते हैं
समझ लेना चहिये
लिखने लिखाने
के टेंडर
कहा होते हैं
कहाँ खोले
जाते हैं
हर बात
बताने वाला
एक मास्टर
ही हो ऐसा
जरूरी भी नहीं है
और माना
भी जाता है ।

चित्र साभार: www.mycutegraphics.com

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

एक दिमाग कम खर्च कर के दिमाग को दिमागों की बचत कराता है

बुद्धिजीवी की एक
खासियत ये होती है
वो अपने दिमाग को
कम काम में लाता है
जानता है बचाना खर्च
होने से दिमाग को
एक समूह में उनके
एक समय में एक ही
अपने दिमाग को चलाता है
पता होता है चल रहा है
दिमाग किसका किस समय
उस समय बाकी सब का
दिमाग बंद हो जाता है
पढ़ना लिखना जितना
ज्यादा किया होता है जिसने
उसका दिमाग उतना
अपने को बचाना
सीख जाता है
सबसे ज्यादा दिमाग
बचाने का तरीका
सबसे बड़े स्कूल के
मास्टर को ही आता है
एक छोड़ता है राकेट
एक किसी ऐसी बात का
जिसके छूटते ही उसके
नहीं होने का आभास
सबको हो ही जाता है
कोई कुछ नहीं कहता है
हर कोई बंद कर दिमाग
राकेट के मंगल पर कहीं
उतरने के ख्यालों
में खो जाता है
पढ़ने पढ़ाने वाले
सबसे बड़े स्कूल के
मास्टरों के इस खेल को
देखकर छोटे मोटे स्कूलों
के मास्टरों का वैसे ही
दम फूल जाता है
मास्टरों के बंद दिमाग
होते देखकर पढ़ने लिखने
वाला मौज में आ जाता है
जब पिता ही चुप हो जाये
किसी समाज में
बेटे बेटियों के बोलने के लिये
क्या कुछ कहाँ रह जाता है
वैज्ञानिक सोच का ही
एक कमाल है यह भी
एक दिमाग बुद्धिजीवी का
कितने दिमागों का
फ्यूज इस तरह उड़ाता है
दिमाग ही दिमागी खर्च
बचा बचा कर इस तरह
बिना दिमाग का एक
नया समाज बनाता है ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

हैरान क्यों होना है अगर शेर बकरियों के बीच मिमियाने लगा है

पत्थर होता होगा
कभी किसी जमाने में
इस जमाने में
भगवान कहलाने लगा है
कैसे हुआ होगा ये सब
धीरे धीरे कुछ कुछ अब
समझ में आने लगा है
एक साफ सफेद झूठ को
सच बनाने के लिये
जब से कोई भीड़ अपने
आस पास बनाने लगा है
झूठ के पर नहीं होते हैं
उसे उड़ना भी कौन सा है
किसी सच को
दबाने के लिये
झूठा जब से जोर से
चिल्लाने लगा है
शक होने लगा है
अपनी आँखों के
ठीक होने पर भी कभी
सामने से दिख रहे
खंडहर को हर कोई
ताजमहल बताने लगा है
रस्में बदल रही हैं
बहुत तेजी से
इस जमाने की
‘उलूक’ शर्म
को बेचकर
बेशर्म होने में
तुझे भी अब
बहुत मजा
आने लगा है
तेरा कसूर है
या नहीं
इस सब में
फैसला कौन करे
सच भी भीड़
के साथ
जब से आने
जाने लगा है ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

परीक्षा उत्तर पुस्तिका की आत्मा की कथा यानी उसके भूत की व्यथा

मास्टर होने
के कारण
कभी कभी
अपने हथियारों
पर नजर
चली ही
जाती है
पेन पेंसिल
किताब कापी
चौक ब्लैक बोर्ड
आदि में सबसे
महत्वपूर्ण
छात्र छात्राओं
की परीक्षा
उत्तर पुस्तिका
ही बस एक
नजर आती है
और जैसे ही
किसी दिन
अखबार या
दूरदर्शन में
कोई कापी
की खबर
सामने से
आ जाती है
अपनी ही
दुखती रग
जैसे
उधड़ कर
दुखना शुरु
हो जाती है
उत्तर पुस्तिका
तेरी कहानी
भी कोई
छोटी मोटी
नहीं होती है
तेरे छपने
के ठेके से
शुरु होती है
मुहर लग कर
सजा सँवर कर
लिखने वाले
तक पहुँचती है
लिखता भी है
लिखने वाला
पहरे में
डाकू जैसे
कक्ष निरीक्षकों
के सामने
दो से लेकर
तीन सौ
मिनट लगा कर
उसे कहाँ
पता होता है
किसी
मूल्याँकन केंद्र
नामक ठेके
पर जा कर
बड़ी संख्या में
बड़े पैसे में
बिकती है
किस्मत होती
है उसकी
अगर कोई
मास्टर उसे
जाँच पाता है
देखिये
जरा कुछ जैसे
आज का
एन डी टी वी
चपरासियों
और बाबुओं
से उनको
कहीं जाँचता
हुआ अपने
देश में ही
कहीं
दिखाता है
लोग बात
करते हैं
भ्रष्ठ होने
दिखने वाले
लोगों की
असली
सफेदपोश
इसी तरह के
शिक्षा के काले
व्यापार करने
वालों को
समाज लेकिन
भूल जाता है
जूते की माला
पहनने लायक
अपनी काली
करतूतों को
अपने मूल्यों
के भाषणों की
खिसियाहट में
छिपा ले जाता है
देखिये
इधर भी
कुछ जनाब
देश के
कर्णधार
हैं आप ही
करोंड़ों
अरबों के
इस काले धंधे
के व्यापार में
बिना सबूतों के
क्या क्या कर
दिया जाता है ।

चित्र साभार: examination paper : owl and pencil

रविवार, 12 अप्रैल 2015

जय हो जय हो कह कह कर कोई जय जय कार कर रहा था

पहले दिन की खबर
बकाया चित्र के साथ थी
पकड़ा गया था एक
सरकारी चिकित्सक
लेते हुऐ शुल्क मरीज से
मात्र साढ़े तीन सौ रुपिये
सतर्क सतर्कता विभाग के
सतर्क दल के द्वारा
सतर्कता अधिकारी था
मूँछों में ताव दे रहा था
पैसे कम थे पर खबर
एक बड़ी दे रहा था
दूसरे दिन वही
चिकित्सक था
लोगों की भी‌ड़ से
घिरा हुआ था
अखबार में चित्र
बदल चुका था
चिकित्सक था मगर
मालायें पहना हुआ था
न्यायधिकारी से
डाँठ खा कर
सतर्कता अधिकारी
खिसियानी हँसी कहीं
कोने में रो रहा था
ऐसा भी अखबार
ही कह रहा था
दो दिन की एक
ही खबर थी
लिखे लिखाये में
कुछ इधर का
उधर हो रहा था
कुछ उधर का
इधर हो रहा था
‘उलूक’ इस सब पर
अपनी कानी आँख से
रात के अंधेरे में
नजर रख रहा था
उसे गर्व हो रहा था
कौम में उसकी
जो भी जो कुछ
कर रहा था
बहुत सतर्क हो
कर कर रहा था
सतर्कता से
करने के कारण
साढ़े तीन सौ का
साढ़े तीन सौ गुना
इधर का उधर
कर रहा था
चित्र, अखबार,
उसके लोगों का
खबर के साथ
खबरची हमेशा
भर रहा था
सतर्क सतर्कता
विभाग के
सतर्क दल का
सतर्क अधिकारी
पढ़ाना लिखाना
सिखाने वालों के
पढ़ने पढ़ाने को
दुआ सलाम
कर रहा था
पढ़ने पढ़ाने के
कई फायदे में से
असली फायदे का
पता चल रहा था
कोई पाँव छू रहा था
कोई प्रणाम कर रहा था
ऊपर वाले का गुणगाँन
विदेश में जा जा कर
देश का प्रधान कर रहा था ।

चित्र साभार: www.clipartheaven.com

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

धोबी होने की कोशिश मत कर बाज आ गधा भी नहीं रह पायेगा समझ जा

चल
अपनी सारी
बातें मुझे बता

मेरी बातें
समझ में
तेरे नहीं
आ पायेंगी

ऐसी बातों
को सुनकर
करेगा भी क्या

बैठा रह
घास खा
जुगाली कर
पूँछ हिला

वैसे भी
धोबी और
गधे का
रिश्ता
होता है
एक बहुत
नाजुक रिश्ता

माल मिलेगा
मलाईदार
चिंता मत कर

जम कर
सामान उठा
इधर से
उधर ले जा
जो कहा जाये
कहने से पहले
समझ जा

धोबी क्या
करना
चाह रहा है
उस पर ध्यान
मत लगा

दिये गये
काम को
मन लगा कर
कम से कम
समय में निपटा

पूरा होते
ही खुद
अपनी रस्सी
का फंदा
अपने गले
में लटका

खूँटे से
बंध कर
नियत व्यास
का घेरा बना
चक्कर लगा
घनचक्कर हो जा

दिमाग
की बत्ती
जलाने
की बात
सोच में भी
मत ला

राबर्ट फ्रोस्ट
मत बन
मील के पत्थर
लम्बी दूरी
सोने से पहले
और
उठने के बाद
की लम्बी दौड़
को धोबी की
सोच में रहने दे

गोबर कर
दुल्लती झाड़
धूल उड़ा

धोबी की इच्छा
आकाँक्षाओं को
अपने सपने में
भूल कर भी
मत ला

याद रख
धोबी
होने की
कोशिश
करेगा
गधा भी
नहीं रहेगा
समझ जा ।

चित्र साभार: www.hindukids.org

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

आता माझी सटकली

आता माझी सटकली
सोचते सोचते
किसी दिन पूरा
ही सटक जायेगा
दो और दो पाँच 
करने वालों से
पंगा लेना छोड़ दे
उनका जैसा कभी
किसी को नहीं
पढ़ा पायेगा
पाँच चार से
हमेशा ही एक
ज्यादा रहेगा
आगे बहुत दूर
निकल जायेगा
चार पर ही
अटके रहने
वाले को
गिनती करने
के काम से भी
हटा दिया जायेगा
पाँच ही से
पंच परमेश्वर
बनता है
उसे ही मंदिर में
बैठाया जायेगा
चार करने वाले
अभी भी कुछ
नहीं गया है
पाँच सीख ले
नहीं तो दो से भी
हाथ गवाँयेगा
छोड़ दे देखना
वो सब तुझे
जानबूझ कर
तेरे सामने
लाकर दिखायेगा
फर्जी लोगों का
फर्जीवाड़ा
पंचों की राय
से ही कोई करायेगा
शातिर जानते हैं
चार पर अटका
हुआ ही जाकर
पाँच के कारनामे
जोर शोर से गायेगा
गाना खत्म होने
से पहले फर्जी
पर्चियों के साथ
गायब हो जायेगा
भजन होंगे
भगत होंगे
रामनामी दुपट्टा
बस रह जायेगा
दो और दो पाँच
ही सिद्ध होगा
चार चार करने वाला
बस गालियाँ खायेगा
पंचों के मंदिर बनेंगे
शिष्य भी श्रद्धा से
फूल चढ़ायेगा
दो और दो पाँच
सीखकर
दो और दो पाँच
पढ़ायेगा
‘उलूक’
'आता माझी सटकली'
सोचते सोचते
किसी दिन पूरा
ही सटक जायेगा ।
चित्र साभार: ingujarat.net

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

किसे मतलब है और होना भी क्यों है अगर एक बददिमाग का दिमाग शब्दों से हल्का हो रहा होता है

हाथी होने का
मतलब एक
बड़ी चीज होना
ही जरूरी
नहीं होता है
किसी चींटी
का नाम भी
कभी किसी ने
हाथी रखा
होता है
दुधारू गाय को
किसी की कोई
मरा हुआ हाथी
कभी कह देता है
परेशान होने की
जरूरत
नहीं होती है
अखबार में
जो होता है
उससे बड़ा सच
कहीं नहीं होता है
चिढ़ किसी
को लगती है
खुश होना चाहिये
चिढ़ाने वाले को
अजीब सी बात
लगती है जब
आग लगाने
वाला ही नाराज
हो रहा होता है
झूठ के साथ
एक भीड़ का
पता भी होता है
बस इसी सच
का पता
बेवकूफों को
नहीं होता है
भौंकते रहते हैं
भौंकने वाले
हमेशा ही
काम करने
वाला अपनी
लगन से ही
कर रहा होता है
लगे रहो लिखने
वाले अपने
हिसाब से कुछ
भी लिखने के लिये
जल्लाद का शेयर
हमेशा मौत से
ज्यादा चढ़
रहा होता है
शेरो शायरी में
दम नहीं होता है
‘उलूक’ तेरी
तू भी जानता है
तेरे सामने ही
तेरा अक्स ओढ़
कर भी सब कुछ
सरे आम
नंगा हो रहा
होता है ।
चित्र साभार: www.clipartof.com

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

सारे जोर लगायेंगे तो मरे हाथी को खड़ा कर ले जायेंग़े

चट्टान पर
बुद्धिमान ने
बनाया
अपना घर
और जोर की
वर्षा आई
बचपन में
सुबह की
स्कूल में की
जाने वाली
प्रार्थना का
एक गीत
याद आ पड़ा
उस समय
जब सामने
से ही अपने
कुछ दूरी पर
जोर के
धमाकों के साथ
फटते पठाकों
की लड़ियों
को घेर कर
उछलता हुआ
एक झुण्ड
दिखा खड़ा
इससे पहले
किसी से कुछ
पूछने की
जरूरत पड़ती
दिमाग के
अंदर का
फितूरी गधा
दौड़ पड़ा
याद आ पड़ी
सुबह सुबह
अखबार के
मुख्य पृष्ठ पर
छपी हुई
ताजी एक खबर
जनता जनार्दन
एक कददू
और कुछ तीर
साथ में अपने
गधे का जनाजा
और उसकी
खुद की ही
अपने लिये
खोदी गई
साफ सुथरी
कबर
सारी खुदाई
एक तरफ
अपना भाई
एक तरफ
जब जब
अपनी सोच
के सोच होने
का वहम
कभी हुआ है
अपना
यही गधा
सीना तान
कर अपनी
सोच के साथ
खड़ा हुआ है
‘उलूक’
इतना कम
नहीं है क्या ?
बनाने दे
दुनियाँ को
रेत के
ताजमहल
पकड़ अपनी
सोच के गधे
की लगाम
और निकल
ले कहीं
तमाशा देखने
के चक्कर में
गधा भी लग
लिया लाईन में
तो कहीं का
नहीं रह जायेगा
अकेला हो
गया तो
चना भी नहीं
फोड़ पायेगा ।
चित्र साभार: imgarcade.com

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

पुराने एक मकान की टूटी दीवारों के अच्छे दिन आने के लिये उसकी कब्र को दुबारा से खोदा जा रहा था

सड़कों पर सन्नाटा
और सहमी हुई सड़के
आदमी कम और
वर्दियों के ढेर
बिल्कुल साफ
नजर आ रहा था
पहुँचने वाला है
जल्दी ही मेरे शहर में
कोई ओढ़ कर एक शेर
शहर के शेर भी
अपने बालों को
उठाये नजर आ रहे थे
मेरे घर के शेर भी
कुछ नये अंदाज में
अपने नाखूनों को
घिसते नजर आ रहे थे
घोषणा बहुत पहले ही
की जा चुकी थी
एक पुराने खंडहर
की दीवारें बाँटी
जा चुकी थी
अलग अलग
दीवार से
अलग अलग
घर उगाने का
आह्वान किया
जा रहा था
एक हड्डी थी बेचारी
और बहुत सारे बेचारे
कुत्तों के बीच नोचा
घसीटा जा रहा था
बुद्धिजीवी दूरदृष्टा
योजना सुना रहा था
हर कुत्ते के लिये
एक हड्डी नोचने
का इंतजाम
किया जा रहा था
बहुत साल पहले
मकान धोने सुखाने
का काम शुरु
किया गया था
अब चूँकि खंडहर
हो चुका था
टेंडर को दुबारा
फ्लोट किया
जा रहा था
हर टूटी फूटी
दीवार के लिये
एक अलग
ठेकेदार बन सके
इसके जुगाड़
करने पर
विमर्श किया
जा रहा था
दलगत राजनीति
को हर कोई
ठुकरा रहा था
इधर का
भी था शेर
और उधर का
भी था शेर
अपनी अपनी
खालों के अंदर
मलाई के सपने
देख देख कर
मुस्कुरा रहा था
‘उलूक’ नोच रहा था
अपने सिर के बाल
उसके हाथ में
बाल भी नहीं
आ रहा था
बुद्धिजीवी शहर के
बुद्धिजीवी शेरों की
बुद्धिजीवी सोच का
जलजला जो
आ रहा था ।


चित्र साभार: imgkid.com

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

‘उलूक’ क्या है? नहीं पढ़ने वाला भी अब जानने चला है

एक
ने नहीं
बहुतों ने
पूछना
शुरु कर
दिया है

बाकी सब
ठीक है

बहुत
सारे लोग
लिखते हैं
लिख रहे हैं
कुछ सार्थक
कुछ निर्रथक

तुम्हारे
बारे में
भी हो
रही है
चर्चा कई
जगहों पर

हमें भी
पता चला है

तुम्हारे
लिखने
लिखाने से
हमें कोई
मतलब नहीं है

कुछ ऐसा
वैसा ही
लिख रहे हो

आस पास
के किसी भी
जाने माने
स्थापित लेखकों
कवियों चर्चाकारों
की सूची में
तुम्हारा नाम
ढूँढ कर भी
नहीं मिला है

अच्छे
खासे तो थे
कुछ दिन पहले

कहीं
चुपचाप से
खड़े भी मिले थे

इधर ही
कुछ दिनों में
कौन सा
ऐसा आया
तूफानी
जलजला है

कुछ भी
कहीं नहीं
कहने वाला
कहीं भी
जा कर
कुछ भी
लिखने
लिखाने
को चला है

चलो
होता है
उम्र का
तकाजा भी है

कुछों को
छोड़ कर
सर और
दाड़ी का
लगभग
हर बाल भी
अब सफेद
हो चला है

वैसे
हमें कहना
कुछ नहीं है

बस
एक शंका
दूर करनी है

जानकारी
रहनी
भी चाहिये
अपने
परायों की
कितना
हौसला है

बस इतना
बता दो
तुम्हारे
लिखने
लिखाने
के साथ

हर जगह
जुड़ा ये
‘उलूक’
कौन सी
और
क्या बला है ?

चित्रसाभार: www.clipartpal.com

रविवार, 5 अप्रैल 2015

शेर के लिये तो एक शेर से ही काम चल जाता है

पता चल जाता है
और अच्छा भी है
वो आता जाता है
पर पढ़ने के लिये नहीं
बस ये देखने के लिये
कि आखिर रोज रोज
यहाँ पर ऐसा क्या
कुछ लिखा जाता है
अब ऐसा भी नहीं
लिखता है कोई
पढ़ते ही चल जाये
पता कि लिखा
क्या जाता है
लिखा जाता है
उसके लिये ही
जो भी जैसा भी
जहाँ भी जितना
भी लिखा जाता है
जानता है वो भी
अच्छी तरह से ये
किसलिये कहाँ और
क्या लिखा जाता है
परेशानी होती है
केवल उसको ये देखकर
बस एक और केवल
एक ही शेर जैसा
कुछ लिखा जाता है
शेर भी लिखा जाता है
उसके शेर होने पर
लिखा जाता है
खुश होता है या नहीं
ये बस पता नहीं
किसी को चल पाता है
‘उलूक’ शेर तो
शेर होता है
कुछ करे या ना करे
दहाड़ने से ही एक बार
एक दिन में बहुत
कुछ हो ही जाता है
बस बात ये समझना
दिमाग से कुछ बाहर
को चला जाता है
शेर पर लिखे गये
शेर को पढ़ पढ़ कर
एक चूहा अपनी
झुँझुलाहट दिखा कर
नाराजगी व्यक्त
आँखिर क्यों
कर के जाता है ?

चित्र साभार: martanime.deviantart.com

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

सपने बदलने से शायद मौसम बदल जायेगा

किसी दिन
नहीं दिखें
शायद
सपनों में
शहर के कुत्ते
लड़ते हुऐ
नोचते हुऐ
एक दूसरे को
बकरी के नुचे
माँस के एक
टुकड़े के लिये

ना ही दिखें
कुछ बिल्लियाँ
झपटती हुई
एक दूसरे पर
ना नजर आये
साथ में दूर
पड़ी हुई
नुची हुई
एक रोटी
जमीन पर

ना डरायें
बंदर खीसें
निपोरते हुऐ
हाथ में लिये
किसी
दुकान से
झपटे हुऐ
केलों की
खीँचातानी
करते हुऐ
कर्कश
आवाजों
के साथ

पर अगर
ये सब
नहीं दिखेगा
तो दिखेंगे
आदमी
आस पास के
शराफत
के साथ
और
अंदाज
लूटने
झपटने का
भी नहीं
आयेगा
ना आयेगी
कोई
डरावनी
आवाज ही
कहीं से

बस काम
होने का
समाचार
कहीं से
आ जायेगा

सुबह टूटते
ही नींद
उठेगा डर
अंदर का
बैठा हुआ
और
फैलना शुरु
हो जायेगा
दिन भर
रहेगा
दूसरे दिन
की रात
को फिर
से डरायेगा

इससे
अच्छा है
जानवर
ही आयें
सपने में रोज
की तरह ही

झगड़ा कुत्ते
बिल्ली बंदरों
का
रात में ही
निपट जायेगा
जो भी होगा
उसमें वही होगा
जो सामने से
दिख रहा होगा

 खून भी होगा
गिरा कहीं
खून ही होगा
मरने वाला
भी दिखेगा
मारने वाला भी
नजर आयेगा

‘उलूक’
जानवर
और आदमी
दोनो की
ईमानदारी
और सच्चाई
का फर्क तेरी
समझ में
ना जाने
कब आयेगा

जानवर
लड़ेगा
मरेगा
मारेगा
मिट जायेगा

आदमी
ईमानदारी
और
सच्चाई को
अपने लिये ही
एक छूत
की बीमारी
बस बना
ले जायेगा

कब
घेरा गया
कब
बहिष्कृत
हुआ
कब
मार
दिया गया

घाघों के
समाज में
तेरे
सपनों के
बदल जाने
पर भी
तुझे पता
कुछ भी
नहीं चल
पायेगा ।


चित्र साभार: http://www.clker.com/

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

कोई समझे कोई ना समझे कह देना जरूरी होता है

जो भी हो रहा होता है
सब अच्छे के लिये
ही हो रहा होता है
फैशन बन चुका है
अब ऐसा ही कुछ
बस कह देना होता है
अगर कोई रो रहा होता है
बस आदतन रो रहा होता है
जो दिखता है तुझे सामने से
उसकी बात कोई भी कहीं
नहीं कर रहा होता है
इसका मतलब होता है
और बहुत ही साफ होता है
वहम हो रहा होता है
और बस तुझे ही
हो रहा होता है
सब ही जा रहे होते हैं
उस तरफ कहीं
किसी ओर खुशी से
बस तेरा ही मुँह
उतरा हुआ और
रास्ता किसी
दूसरी तरफ होता है
नये जमाने के नये
घर के बारे में सोचना
अच्छा नहीं होता है
पुराने खंडहर को
झाड़ पोछ कर चूना
लगाते रहने से ही
बस फायदा होता है
और बहुत हो रहा होता है
दो चार लोग
कर लेते हैं फैसला
कब्र खोदने की
पैदा होने वाले
किसी सवाल की
दफन करने के बाद
जिस पर मिट्टी डालने
का न्योता सभी के
पास दिख रहा होता है
समझने वाले सब
समझते हैं देखकर
वो सब जो उनके
आस पास हो रहा होता है
होता रहे कुछ भी
उल्टा पुल्टा गली में
किसी के भी सामने से
हर कोई होता है देशप्रेमी
आँखें बंद कर अपनी
पूरे देश के बारे में ही
सोच रहा होता है
सभी को देखनी होती है
भूख अपनी पेट अपना
अपने लिये ही ‘उलूक’
गया वो जमाना कभी का
किसी जमाने में
कहीं कुछ होता देख कर
कह देने वाला कोई
बेवकूफ ही होता है ।

चित्र साभार: www.ihomedesign.info

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

दो अप्रैल का मजाक

लिखे हुऐ के पीछे
का देखने की और
उस पीछे का
पीछे पीछे ही
अर्थ निकालने
की आदत पता नहीं
कब छूटेगी
इस चक्कर में
सामने से लिखी
हुई इबारत ही
धुँधली हो जाती है
लेकिन मजबूरी है
आदत बदली ही
कहाँ जाती है
हो सकता है
सुबह नींद से
उठते उठते
संकल्प लेने
से कोई कविता
नहीं लिखी जा
सकती हो
पर प्रयास करने
में कोई बुराई
भी नहीं है
कुछ भी नहीं
करने वाले लोग
जब कुछ भी
कह सकते हैं
और उनके इस
कहने के अंदाज का
अंदाज लगाकर
कौऐ भी किसी
भी जगह के
उसी अंदाज में
जब काँव काँव
कर लेते है
और जो कौऐ
नहीं होकर भी
सारी बात को
समझ कर
ताली बजा लेते हैं
तो हिम्मत कर
‘उलूक’ कुछ
लगा रह
क्या पता
किसी दिन
इसी तरह
करते करते
खुल जाये
तेरी भी लाटरी
किसी दिन
और तेरा लिखा
हुआ कुछ भी
कहीं भी
दिखने लगे
किसी को भी
एक कविता
हा हा हा ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

आओ मूर्खो मूर्ख दिवस मनायें

अपने
खास दिन 
मूर्ख दिवस
पर

क्षमा करेंगे
आप के
लिये नहीं

 केवल
अपने जैसों
के लिये

ढेर सारी
शुभकामनाऐं

ज्यादा
नहीं भी हैं
इसका
गम नहीं है

बहुत थोड़े
से ही हैं
थोड़ा होना
काफी है
कुछ कम
नहीं है

इतने में
संतोष करें
पाखँडी
कहलाने
से अच्छा
महामूर्ख
कहलायें

झूठे सपनों
की झूठी
बातों के
झूठों की
बीमारी
ना फैलायें

सच को
देख सामने
अपने
आँख कान
बंद रखने
से बाज आयें

मुँह खोले
और
कुछ बोलें

चाहे
बहुसंख्यक
द्वारा महामूर्ख
कहलवाये जायें

मूर्ख दिवस पर
दीवारों पर लगे
अपने पोस्टर
गिन गिन
कर आयें

मुखौटे पहने
चोरों की
दुनियाँ में 
आओ
महामूर्ख
कहलायें

अपना दिन
अपने जैसे ही
लोगों के
साथ मनायें ।

चित्र साभार:
imgkid.com

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