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सोमवार, 30 जनवरी 2017

दो मिनट का मौन सायरन का तीस जनवरी के ग्यारह बजे

रोज के नौ
और
पाँच बजे के
सायरन
के अलावा

आज ग्यारह
और
ग्यारह
बज कर
दो मिनट
पर दो
बार बजे
सायरन के
बीच के
दो मिनट

सायरन
मौन रहा
श्रद्धांजलि
देता रहा
हर वर्ष
की तरह

सड़क पर
दौड़ती
गाड़ियाँ
करती रही
चुनाव प्रचार

बजाती
रही भोंपू
चीखता रहा
भाड़े का
उद्घोषक

श्रद्धा के साथ
अपने गांंधी
का चित्र
लगाये
अपने कोट
के बटन
के बगल में

गांंधी
कभी एक
हुआ होगा
आज कई
हो गये हैं

जीवित
गांंधी का
श्रद्धांजलि
देना
गाँधी को
गाँधियों की
सभा में
ध्वनिमत से
हाथ खड़े
कर पारित
भी नहीं

समय रहते
श्रद्धा के साथ
कर ही लेना
चाहिये अपना
श्राद्ध खुद ही
गया जाकर

शास्त्र
सम्मत है
‘उलूक’
हिचक मत

सायरन
ग्यारह
बजे का
कब तक
इसी
तरह बजेगा

दो मिनट
का मौन
रखते हुऐ
किस गांंधी
के लिये
कौन
जानता है ?

चित्र साभार: www.thehindubusinessline.com

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

बिना झंडे के लोग लावारिस हो रहे हैं

चेहरे
दिखा
करते
थे कभी
आज झंडे
हो रहे हैं

उग रहे
हैं झंडे
बेमौसम
बिना पानी
झंडे ही झंडे
हो रहे हैं

चल रहे हैं
लिये हाथ में
डंडे ही डंडे
कपड़े रंगीले
हरे पीले
गेरुए
हो रहे हैं

धनुष है
ना तीर है
निशाने
सपनों
में लिये
अपने अपने
जगह जगह
गली कोने
अर्जुन
ही अर्जुन
हो रहे हैं

शक्ल
अपनी
आईने में
देखने से
सब के ही
आजकल
परहेज
हो रहे हैं

सच्चाई
सामने
देख कर
क्योंकि
कई क्लेश
हो रहे हैं

उग रहे हैं
रोज झंडे
चेहरों के
ऊपर कई
बस चेहरे
हैं कि
बेनूर हो
रहे हैं

खेत अपने
लिये साथ
में वो हैं
किसान
हो रहे हैं

झंडे लिये
हाथ में
किसी के
खेत में
कोई झंडे
बो रहे हैं

बिना डंडे
बिना झंडे
के बेवकूफ
सो रहे हैं

गली मोहल्ले
में तमाशे
करने वाले
अपनी किस्मत
पे रो रहे हैं

देश के लिये
इक्ट्ठा कर
रहे हैं झंडे
झंडों को
इधर भी
उधर भी

झंडे के
ऊपर भी
झंडे और
नीचे भी
झंडे हो
रहे हैं

इन्सान
की बात
इन्सानियत
की बात
फजूल की
बात है
इन दिनों
‘उलूक’

औकात की
बात कर
बिना झंडे
के लोग
लावारिस
हो रहे हैं ।

चित्र साभार: Canstockphoto.com

बुधवार, 25 जनवरी 2017

बधाई है बधाई है बधाई है बधाई है

गण हैं
तंत्र है
सिपाही हैं

झंडा है
एक है
तिरंगा है

आजाद हैं
आजादी है
शहनाई हैं
देश है
जज्बा है
सेवा है

मिठाई है
मलाई है
मेवा है

चुनाव हैं
जरूरी हैं
लड़ना है
मजबूरी है

दल है
बल है
कोयला है
कोठरी हैं

काजल है
धुलाई है
निरमा है
सफेद है
जल है
सफाई है

दावेदारी है
दावेदार हैं
कई हैं
प्रबल हैं

इधर हैं
उधर हैं
इधर से
उधर हैं
उधर से
इधर हैं

खुश हैं
खुशी है
शोर है
आवाजाही है

चश्मा है
लाठी है
धोती है
काली है
सूची है
नाम लेने
की भी
मनाही है

सिल्क है
अंगूठी है
कलफ है
कोठी है
वाह है
वाहवाही है

छब्बीस है
जनवरी है
सालों से
आई है

आती है
जाती है
आज
फिर से
चली आई है

शरम की
बात नहीं
बेशर्मी नहीं
बेहयाई नहीं
‘उलूक’ की
चमड़ी
खुजली
वाली है
खुजलाई है

कबूतरों की
बारात है
देखी कहीं
एसी कभी
कौओं की
अगुआई है
कौओं ने
सजाई है

गण हैं
तंत्र है
सिपाही हैं
झंडा है
बधाई है
बधाई है
बधाई है
बधाई है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

ताजी खबर है देश के एन जी ओ ऑडिट नहीं करवाते हैं

चोर सिपाही
खेल
खेलते खेलते
समझ में
आना शुरु
हो जाते हैं

चोर भी
सिपाही भी
थाना और
कोतवाल भी

समझ में
आ जाना
और
समझ में
आ जाने
का भ्रम
हो जाना
ये अलग
अलग
पहलू हैं

इस पर
अभी चलो
नहीं जाते हैं

मान लेते हैं
सरल बातें
सरल
होती हैं

सब ही
सारी बातें
खास कर
खेल
की बातें
खेलते
खेलते ही
बहुत अच्छी
तरह से
सीख ले
जाते हैं

खेलते
खेलते
सब ही
बड़े होते हैं
होते चले
जाते हैं

चोर
चोर ही
हो पाते हैं
सिपाही
थाने में ही
पाये जाते हैं

कोतवाल
कोतवाल
ही होता है

सैंया भये
कोतवाल
जैसे मुहावरे
भी चलते हैं
चलने भी
चाहिये

कोतवाल
लोगों के भी
घर होते हैं
बीबियाँ
होती हैं
जोरू का
गुलाम भी
बहुत से लोग
खुशी खुशी
होना चाहते हैं

पता नहीं
कहाँ से
कहाँ पहुँच
जाता है
‘उलूक’ भी
लिखते लिखते

सुनकर
एक
छोटी सी
सरकारी
खबर
कि
देश के
लाखों
एन जी ओ
सरकार का
पैसा लेकर
रफू चक्कर
हो जाते हैं

पता नहीं
लोग
परिपक्व
क्यों
नहीं हो
पाते हैं

समझ में
आना
चाहिये

बड़े
होते होते
खेल खेल में
चोर भी चोर
पकड़ना
सीख जाते हैं

ना थाने
जाते हैं
ना कोतवाल
को बुलाते हैं
सरकार से
शुरु होकर
सरकार के
हाथों
से लेकर
सरकार के
काम
करते करते
सरकारी
हो जाते हैं ।

चित्र साभार: Emaze

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

विश्व हिन्दी दिवस और शब्द क्रमंचय संचय प्रयोग सब करते हैं समझते एक दो हैं

क्रमंचय
संचय
कितने
लोग
जानते हैं
कितने
समझ
ले
जाते हैं


क्रमंचय
संचय
उच्च
गणित
में प्रयोग
किया
जाता है

गणित
विषय
पढ़ने
और
समझने
वाला भी
दिमाग में
जोर
लगाता है
जब
क्रमंचय
संचय के
सवालों को
हल करने
पर आता है

किताबों
को छोड़
दिया जाये
अपने
आसपास
के लोग
और
समाज को
देखा जाये

नहीं सुने
होते हैं
ना ही
पढ़े होते हैं
क्रमंचय
संचय
पर
कलाकारी
देखिये
आँखें बड़ी
कर ले
जाते हैं
काणे भी
देखना
शुरु हो
जाते हैं

सवाल हल
करने की
जरूरत ही
नहीं पड़ती है
जवाब हाथ में
लेकर खड़े
हो जाते हैं

काम
निकलवाना
ज्यादा
महत्वपूर्ण
होता है
सबको पता
होता है

निकालने
के तरीके
के लिये
सोचने
के लिये
कहाँ तक
जाना है
कौन कब
सोच पाते हैं
जात पात
अमीर गरीब
ऊँच नीच
मिलाकर
जो लोग
घोल बना कर
लोगों को
पिलाना शुरु
हो जाते हैं

नशा होता है
गजब का
होता है
पीने वाले
अपना पराया
भूल जाते हैं

चल पड़ते हैं
लामबन्द
होकर
किसी भी
सियार के लिये

शेर बना कर
उसे जंगल से
बाहर छोड़
कर भी आते हैं

क्रमंचय संचय
नहीं पढ़ते हैं
क्रमंचय संचय
नहीं समझते हैं

काम करते हैं
अवसरवादियों
 के लिये

क्रमंचय संचय
के एक सवाल
का असल हल
पेश करते हैं

अवसर वाद
सारे वादों के
ऊपर का
 वाद होता है
‘उलूक’

तेरे जैसे
कई होते हैं
अवसर
मिलता है
और
दूसरों को
देख हमेशा
आँख मलते हैं

क्रमंचय
संचय
करते हैं
देखते हैं
सारी दुनियाँ
को प्रयोग
करते हुए
क्रमंचय
संचय
वो लोग जो
कभी भी
गणित नहीं
पढ़ते हैं ।

चित्र साभार: Pinterest
 

रविवार, 8 जनवरी 2017

शुरु हो गया मौसम होने का भ्रम अन्धों के हाथों और बटेरों के फंसने की आदत को लेकर

कसमसाहट
नजर आना
शुरु हो गयी है

त्योहार नजदीक
जो आ गया है

अन्धों का ज्यादा
और बटेरों का कम

अपने अपने
अन्धों के लिये
लामबन्द होना
शुरु होना
लाजिमी है
बटेरों का

तू ना
अन्धा है
ना हो
पायेगा

बड़ी बड़ी
गोल आखें
और
उसपर
इस तरह
देखने की
आदत

जैसे बस
देखेगा
ही नहीं
मौका
मिले
तो घुस
भी पड़ेगा

बटेर होना
भी तेरी
किस्मत
में नहीं

होता तो
यहाँ लिखने
के बजाये
बैठा हुआ
किसी अन्धे
की गोद में
गुटर गुटर
कर रहा होता

अन्धों के
हाथ में बटेर
लग जाये या
बटेर खुद ही
चले जाये अन्धे
के हाथ में

मौज अन्धा
ही करेगा
बटेर त्यौहार
मना कर
इस मौसम का
अगले त्यौहार
के आने तक
अन्धों की
सही सलामती
के लिये बस
मालायें जपेगा

तू लगा रह
खेल देखने में
कौन सा अन्धा
इस बार की
अन्धी दौड़
को जीतेगा

कितनी बटेरों
की किस्मत
का फैसला
अभी करेगा

बटेरें हाथ में
जाने के लिये
बेकरार हैं
दिखना भी
शुरु हो गई हैं

अन्धों की आँखों
की परीक्षाएं
चल रही हैंं

जरा सा भनक
नहीं लगनी
चाहिये
थोड़ी सी भी
रोशनी के बचे
हुऐ होने की
एक भी आँख में
समझ लेना
अन्धो अच्छी
तरह से जरा

बटेर लपकने
के मौसम में
किसी दूसरे
अन्धे के लिये
बटेर पकड़
कर जमा
करने का
आदेश हाथ
में अन्धा
एक दे देगा

अन्धों का
त्योहार
बटेरों का
व्यवहार
कुछ नहीं
बदलने
वाला है

‘उलूक’

सब इसी
तरह से
ही चलेगा

तुझे मिला
तो है काम
दीवारें
पोतने
का यहाँ

तू भी
दो चार
लाईनेंं
काली
सफेद
खींचते हुए
पागलों
की तरह

अपने जैसे
दो चारों के
सिर
खुजलाने
के लिये
कुछ
ना कुछ
फालतू
रोज की
तरह का
कह देगा ।

चित्र साभार: The Blogger Times

बुधवार, 4 जनवरी 2017

कविता बकवास नहीं होती है बकवास को किसलिये कविता कहलवाना चाहता है

जैसे ही
सोचो
नये
किस्म
का कुछ
नया
करने की

कहीं
ना कहीं
कुछ ना
कुछ ऐसा
 हो जाता है
जो
ध्यान
भटकाता है
और
लिखना
लिखाना
शुरु करने
से पहले ही
कबाड़ हो
जाता है

बड़ी तमन्ना
होती है
कभी एक
कविता लिख
कर कवि
हो जाने की

लेकिन
बकवास
लिखने का
कोटा कभी
पूरा ही
नहीं हो
पाता है

हर साल
नये साल में
मन बनाया
जाता है

जिन्दे कवियों
की मरी हुई
कविताओं को
और
मरे हुऐ
कवियों की
जिंदा
कविताओं
को याद
किया जाता है

कविता
लिखना
और
कवि हो
जाना
इसका
उसका
फिर फिर
याद आना
शुरु हो
जाता है

कविता
पढ़
लेने वाले
कविता
समझ
लेने वाले
कविता
खरीद
और बेच
लेने वालों
से ज्यादा
कविता पर
टिप्प्णी कर
देने वालों के
चरण
पादुकाओं
की तरफ
ध्यान चला
जाता है

रहने दे
‘उलूक’
औकात में
रहना ही
ठीक
रहता है

औकात से
बाहर जा
कर के
फायदे उठा
ले जाना
सबको नहीं
आ पाता है

लिखता
चला चल
बकवास
अपने
हिसाब की

कितनी लिखी
क्या लिखी
गिनती करने
कोई कहीं से
नहीं आता है

मत
किया कर
कोशिश
मरी हुई
बकवास से
जीवित कविता
को निकाल
कर खड़ी
करने की

खड़ी लाशों
के अम्बार में
किस लिये
कुछ और
लाशें अपनी
खुद की
पैदा की हुई
जोड़ना
चाहता है ।

चित्र साभार: profilepicturepoems.com

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