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बुधवार, 26 अप्रैल 2017

लाश कीड़े और चूहों की दौड़

एक
सड़ रही
लाश को
ठिकाने लगा
रहे कीड़ों में

कुछ कीड़े
ऐसे भी
होते हैं
जो लाश के
बारे में
सोचना
शुरु कर
देते हैं
लाश को
दर्द नहीं
होता है
साले
कामचोर
होते हैं

आदत होती है
ऐसे कीड़ों की
ठेके लेना
अच्छाई के
संदेशों के बैनर
बनाने की

कीड़े
चूहा दौड़
में माहिर
होते हैं

जानते हैं
चूहों की
दौड़ को
दूर से
देखकर
उसपर
टिप्पणी
करने वाले
चूहे को कोई
भाव नहीं देता है

दौड़ में
शामिल होना
जरूरी होता है
चूहा होने
के लिये

अपने
आसपास की
हलचलों को
समझना बूझना
और फिर उसपर
कुछ कहने वाले
कुछ बेवकूफ चूहों
का काम होता है

चूहा दौड़
इसलिये
नहीं होती है
कि किसी को
कुछ जीतना
होता है

चूहा अपने
अगल बगल
आगे पीछे
दौड़ते हुऐ
चूहों को
देख कर
खुश होता है

और फिर
और जोर से
ताकत लगा कर
खुद भी दौड़ता है

रोज निकलते हैं
परीक्षाफल
चूहा दौड़ के

जीतने वाले
चूहे ही होते हैं

चूहे खुश होते हैं
फिर शुरु कर
देते हैं दौड़

क्योंकि चूहे
जीते होते हैं

लाश को नोचते
कीड़े अपना काम
कर रहे होते हैं

कीड़ों के भी
गिरोह होते हैं

‘उलूक’ समझ ले
दूर से बैठकर
तमाशा देखने
वाले कीड़े
कामचोर
कीड़े होते हैं

लाश के बारे में
सोचते हैं
और मातम
करते हैं
बेवकूफ होते  हैं
और रोते हैं । 


चित्र साभार: Kill Clip Art Illustrations.

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

चिकने घड़े चिकने घड़े की करतूत के ऊपर बैठ कर छिपाते हैं

अचानक
हवा चलनी
बन्द हो
जाती है

साँय साँय
की आवाज
सारे जंगल
से गायब
हो जाती है

कितनी भी
सूईंयाँ गिरा
ले जाये कोई
रास्ते रास्ते

आवाज
जरूर होती
होगी इतनी
खामोशी में

पर
कान तक
पहुँचने
पहुँचने तक
पता नहीं
चलता है

कैसे किस
सोख्ते में
सोख ली
जाती है

ढोलचियों
के खुद के
रोजाना
खुद के लिये
अपने हाथों
से ही पीटे
जाने वाले
ढोल सारे
लटके हुऐ
कहीं नजर
आते हैं

मातम मना
रहे हों जैसे
सारे मिल
जुल कर
कुछ इसी
तरह का
अहसास
कराते हैं

शेरों के
मुखौटे भी
नजर आते
हैं गर्दनों से
पीछे की
ओर लटके हुऐ

सारे गधे
गधों के
कान के
पीछे कुछ
फुसफुसाते
हुऐ पाये
जाते हैं

ये बात
कोई नयी
नहीं होती है

ऐसी बात
भी नहीं है
कि हमेशा
ही होती है

बस कभी
हजार दो
हजार
बार की
हरकतों
के बीच
कहीं

कोई एक
दो गिरोह
के साथी
अपने ही
घर की
थालियों
की रोटियाँ
छिपाते
हुऐ पकड़े
जाते हैं

कोई सजा
किसी को
नहीं होती है

अपनी
सरकार
होती है
इन्ही में से
किसी को
पुरुस्कार
बाँटे जाते हैं

खामोशी भी
कुछ दिनों
की होती है

चिकने घड़े
भी कहाँ
किसी के
हाथ में
आते हैं

शोर नहीं
होता है
कुछ देर में
फुसफुसाने
वाले भी
अपने अपने
घरों को
चले जाते हैं

हवा की
मजाल है
की रुक सके
ज्यादा देर तक

पेड़ जल्दी ही
साँय साँय
करना शुरु
हो जाते हैं

‘उलूक’
रोक लेता है
थूक अपना
अपने गले के
बीच में ही कहीं

सारे मुखौटे
पीठ के पीछे
से निकल कर

गधों के चेहरों
पर वापस
फिर से चिपके
हुऐ नजर आते हैं

उत्सव फिर
शुरु होते हैं
जश्न मनाते हुऐ
बेशरम ठहाके
भी साथ
में लगाते हैं।

चित्र साभार: fallout.wikia.com

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

विश्वविध्यालय बोले तो ? तेरे को क्या पड़ी है रे ‘उलूक’

जे एन यू
बनाने
की बात
करते
करते
स्टेशन
आ गया

वो उतरा
और
सवार
हो गया
उल्टी दिशा
में जाती
हुई ट्रैन में

शायद वो
दिशा
आक्स्फोर्ड
की
होती होगी

क्योंकि
अखबार वाला
बता रहा था
कुछ ऐसा ही
बनने वाला है

और
उसे बताया
गया है

जे एन यू
बनाने की
बात कहना
बहुत बड़ी
भूल थी
उनकी

ये अहसास
चुनाव के
पारिणामों के
आते ही
हो गया 
है

तीन साल
के बाद
अखबार के
पन्ने पर
एक नयी
तस्वीर
होती है

एक नये
आदमी की

और
एक नये
सपने की
बात

जिसमें
ताजमहल
जैसा कुछ
होता है

पिछले
तीन साल
पहले
अखबार ने
बताया था

बहुत उँचाइयों
पर ले जाने
वाला कोई
आया है

वही उँचाइयाँ
अब कैम्ब्रिज
बन गई हैं

किसी और
जगह के
किसी गली
के एक
बने बनाये
मकान की

लेकिन आदमी
आक्स्फोर्ड को
आधा बना कर
कैम्ब्रिज पूरा
करने पर
जुट गया है

सरकारें
बदलती हैं

झंडा बदल
कर कुछ भी
बदल सकता
है कोई भी

‘उलूक’
कभी तो
थोड़ा सा
कुछ ऐसी
बात
किया कर

जो किसी के
समझ में आये

सब कुछ
होता है
पाँच साल
में वहाँ

और
तीन साल
में यहाँ

तुझे आदत
है काँव काँव
करने की
करता चल

अभी एक
नया आया है
तीन साल
के लिये

उसे भी
कुछ
बनाना है
वो भी तो
कुछ बनायेगा

या
कौवे की
आवाज वाले
किसी उल्लू
की तरफ
देखता
चला जायेगा?

चित्र साभार: Southern Running Guide

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

बिना डोर की पतंग होता है सच हर कोई लपेटता है अपनी डोर अपने हिसाब से


सोचने
सोचने तक
लिखने
लिखाने तक
बहुत दूर
चल देता है
सोचा हुआ

भूला
जाता है
याद नहीं
रहता है
खुद ने
खुद से
कुछ कहा
तो था

सच के
बजूद पर
चल रही
बहस
जब तक
पकड़ती
है रफ्तार

हिल जाती है
शब्द पकड़ने
वाली बंसी

काँटे पर
चिपका हुआ
कोई एक
हिलता हुआ
कीड़ा

मजाक
उड़ाता है
अट्टहास
करता हुआ

फिर से
लटक
जाता है
चुनौती दे
रहा हो जैसे

फिर से
प्रयास
करने की

पकड़ने की
सच की
मछली को
फिसलते हुऐ
समय की
रेत में से

बिखरे हुऐ हैं
हर तरफ हैं
सच ही सच हैं

झूठ कहीं
भी नहीं हैं

आदत मगर
नहीं छूटती है
ओढ़ने की
मुखौटे सच के

जरूरी भी
होता है
अन्दर का
सच कहीं
कुढ़ रहा
होता है

किसने
कहा होता है
किस से
कहा होता है

जरूरत ही
नहीं होती है
आईने के
अन्दर का
अक्स नहीं
होता है

हिलता है
डुलता है
सजीव
होता है

सामने से
होता है
सब का
अपना अपना
बहुत अपना
होता है

सच पर
शक करना
ठीक नहीं
होता है

‘उलूक’

कोई कुछ
नहीं कर
सकता है
तेरी फटी
हुई
छलनी का

अगर
उसमें
थोड़ा सा
भी सच
दिखाने भर
और
सुनाने भर
का अटक
नहीं रहा
होता है ।

चित्र साभार: SpiderPic

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

फैसले के ऊपर चढ़ गई अधिसूचना एक पैग जरा और खींच ना

उच्च न्यायालय
राष्ट्रीय राज मार्ग
शटर गिराये
शराब की दुकानें
पता नहीं क्यों
अबकि बार

शहर की
बदनाम गली
गली से सटी
स्कूल की
चाहरदीवार


दोनों के बीच
में फालतू में
तनी खड़ी
बेकार
बेचती बाजार

बाजार में
फड़बाजों का शोर

आलू बीस के
ढाई किलो
आलू बीस
के तीन किलो
ले लो जनाब ले लो

मौका हाथ से
निकल जायेगा
कल तक सारा
आलू खत्म
हो जायेगा
फिर भी गरीब
खरीदने को
नहीं तैयार

शराब की
किल्लत की मार

सड़क पर
लड़खड़ाते
शाम के समय
घर को वापस जाते
दिहाड़ी मजदूर

जेब पहले से
ज्यादा हलकी
चौथाई के पैसे
की जगह
पूरे के पैसे
देने को मजबूर

चुनाव में पिया
धीरे धीरे
उतरता हुआ नशा
पहाड़ के जंगलों में
जगह जगह बिखरी
खाली बोतलें
पता नहीं चला
अभी तक
पिलाने वाले
और पीने वाले
में से कौन फंसा

पुरानी सरकार
की पुरानी बोतलों
का पुराना पानी
नयी सरकार की
नयी बोतलों
की चढ़ती जवानी

अभी अभी पैदा
हुये विकास की
दौड़ती
कड़क सड़क
को भड़कते हुऐ
लचीला करती
अधिसूचना

राष्ट्रीय राजमार्गों
के खुद के
रंगीन कपड़ों को
उनका
खुद ही नोचना

जीभ से अपने ही
होंठों को खुद ही
तर करता

शराफत की मेज
में खुली विदेशी
सोचता ‘उलूक’

चार स्तम्भों को
एक दूसरे को
नोचता हुआ
आजकल सपने
में देखता ‘उलूक’

चित्र साभार: The Sanctuary Model

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

खेल भावना से देख चोर सिपाही के खेल

वर्षों से
एक साथ
एक जगह
पर रह
रहे होते हैं

लड़ते दिख
रहे होते हैं
झगड़ते दिख
रहे होते हैं

कोई गुनाह
नहीं होता है
लोग अगर
चोर सिपाही
खेल रहे होते हैं

चोर
खेलने वाले
चोर नहीं हो
रहे होते हैं
और
सिपाही
खेलने वाले भी
सिपाही नहीं
हो रहे होते हैं

देखने वाले
नहीं देख
रहे होते हैं
अपनी आँखें

शुरु से
अंत तक
एक ही लेंस से
उसी चीज को
बार बार

अलग अलग
रोज रोज
सालों साल
पाँच साल

कई बार
अपने ही
एंगल से
देख रहे
होते हैं

खेल खेल में
चोर अगर कभी
सिपाही सिपाही
खेल रहे होते है

ये नहीं समझ
लेना चाहिये
जैसे चोर
सिपाही की
जगह भर्ती
हो रहे होते हैं

खेल में ही
सिपाही चोर
को चोर चोर
कह रहे होते है

खेल में ही
चोर कभी चोर
कभी सिपाही
हो रहे होते हैं

खबर चोरों के
सिपाहियों में
भर्ती हो जाने
की अखबार
में पढ़कर

फिर
किस लिये
‘उलूक’
तेरे कान
लाल और
खड़े हो
रहे होते हैं

खेल भावना
से देख
खेलों को
और समझ
रावणों में ही
असली
रामों के
दर्शन किसे
क्यों और कब
हो रहे होते हैं

ये सब खेलों
की मायाएं
होती हैं

देखने सुनने
पर न जा
खेलने वालों
के बीच और
कुछ नहीं
होता है
खेल ही हो
रहे होते हैं ।

चित्र साभार: bechdo.in

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