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बुधवार, 17 सितंबर 2014

सात सौ सतत्तरवीं बकवास नहीं कही जा सकती है बिना कुछ भी देखे सुने अपने आसपास

आप बीती
कह लीजिये
या जग बीती

जब
देखी सुनी
महसूस की
जाती हैं

तभी कही
और लिखी
भी जाती है

कहानियाँ
राजा रानी
राजकुमारी की
कह लीजिये
या परियों की
ऐसे वैसे भी
बुनी जाती हैं

सबको ही
दिखाई देता है
कुछ ना कुछ
अपने आस पास
देखने वाले की
नजर पर होता है

होने ना होने
में से कौन सी
चीज उसको
उसके काम की
नजर आती है

सभी पढ़ते हैं
एक ही किताब
से एक ही नज्म
हर किसी के
लिये नहीं होता
बन जाना
उसका एक गीत
किसी किसी को
दूर दूर तक
वही एक काली
भैंस की सींग
नजर आती है

‘उलूक’
सभी एक मत से
कह रहे होते हैं
जहाँ कुछ नहीं है
तेरी फितरत का
क्या किया जाये

समझ में
नहीं आता है
तुझे वहाँ पर भी
कुछ लिख लिखा
देने के लिये
एक तस्वीर
नजर आती है

हर कोई बजा
रहा है तालियाँ
हवा में उनके
हवा महल की
हवा में हो रही
हवा बाजी पर

कह क्यों नहीं
पाता उन सब की
हवा की तारीफ
करने में तेरी
खुद की हवा
निकल जाती है ।

चित्र साभार: http://blogs.msdn.com/

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