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मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

एक पन्ने पर कुछ देर रुक कर अच्छा होता है आवारा हो लेना पूरी किताब लिखनी जरूरी है कहाँ लिखा होता है

दरवाजा
खोल कर
निकल लेना
बेमौसम
बिना सोचे समझे

सीधे सामने के
रास्ते को
छोड़ कर कहीं

मुड़ कर
पीछे की ओर
ना चाहते हुऐ भी

जरूरी
हो जाता है
कभी कभी

जब हावी
होने लगती
है सोच
आस पास की
उड़ती हवा की

यूँ ही
जबर्दस्ती
उड़ा ले जाने
के लिये
अपने साथ
लपेटते हुए
अपनी सोच
के एक
आकर्षक
खोल में

अपने अन्दर
के 'ना' को
नकारने में माहिर

बहुत सारे
साफ हाथों से
सुलेख में
'हाँ' लिखे हुऐ
पोस्टर बैनर
ली हुयी
भीड़ के बीच

'नहीं' को
बचा ले जाने
की कोशिशें
नाकाम होनी
ही होती हैं

अच्छा होता है
नजर हटा लेना
अपने अन्दर
जल रही
आग से
बने कोयले
और राख से
पारदर्शी आयने
हो चुके चेहरों से

और देख लेना
आरपार
सड़क पर खड़े एक
जीवित शरीर को
आत्मा समझ कर
दूर कहीं
हरे भरे पेड़ पौंधों
उड़ते हुऐ चील कौवों
या क्रिकेट खेलते हुऐ
खिलदंडों से भरे
मैदान से उड़ती
हुई धूल को

कविताओं के शोर में
दब गयी आवाज को
बुलन्द कर ले जाना
आसान नहीं होता है

चलती साँस को
कुछ देर रोक कर
धीरे से छोड़ने के लिये
इसीलिये कहा जाता
होगा शायद

खाली
सफेद पन्ने भी
पढ़े जा सकते हैं
लिखना छोड़ कर
किसी मौसम में
‘उलूक’

खुद ही पढ़ने
और
समझ लेने
के लिये
खुद लिखे गये
आवारा रास्तों
के निशान।

चित्र साभार: canstockphoto.com

गुरुवार, 20 मार्च 2014

आवारा होगा तभी तो उसने कह दिया होगा

शायद सच कहा होगा 
या गफलत में ही 
कह गया होगा 
उसने कहा और 
मैंने सुना मेरे बारे में 
मुझ से कुछ इस तरह 
आवारा हो जाना सबके 
बस में नहीं होता 
जो हो लेता है बहुत 
बड़ी शख्सियत होता है 
तू अंदर से आवारा 
आवारा हो गया है 
सुनी सुनाई गजल 
तक जैसे दिल 
धीरे से चल दिया 
"ये दिल ये पागल 
दिल मेरा क्यों 
बुझ गया आवारगी"
फिर लगा आवारा का 
मतलब उसका कहीं 
उठाईगीर से तो नहीं होगा 
या कामचोर या आलसी 
या फिर इधर उधर 
घूमने वाला जैसा ही
उसे कहीं कुछ दिखा होगा
वाह क्या उसने 
मुझ में मेरे अंदर 
का ढूँढ निकाला होगा 
सब कुछ सही बस 
सही बता डाला होगा
पहले लगा था बहुत 
मासूमियत में उसने 
कुछ कह दिया होगा 
हुआ थोड़ा सा 
आश्चर्य फिर अपने में 
नहीं पहुँच पाया 
जिस जगह तक 
आज तक भी कभी 
वो कैसे इतनी 
आसानी से 
पहुँच गया होगा 
कुछ भी कभी भी
लिख लेने का 
मतलब शायद
आवारगी हो गया होगा
तुझे नहीं पता होगा
उसे पता हो गया होगा ।

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

क्या हुआ अगर खुद लिख कर खुद ही कोई समझ रहा है

रात रात भर
भौंक रहा है
आजकल घर का
पालतू कुत्ता
भौंक रहा है तो
भौंक रहा है
रोकने की कोशिश
भी जारी है
पर फिर भी कुछ
कहीं नहीं हो रहा है
अब जब आदमी को
मौका मिल रहा है
स्कूल जाने का
तो पढ़ लिख
ले रहा है
कोई कहीं भी उसे
रोक नहीं रहा है
जो नहीं जा पा
रहा है स्कूल
वो पढ़े लिखों की
संगत में रहकर
पढ़ने लिखने की
सोच ले रहा है
क्या बुरा कर रहा है
जहाँ तक कुछ
लिख लेने की
बात आती है
लिखना बस
चाहने तक की
बात होती है
हर कोई कुछ ना कुछ
लिख ही ले रहा है
अब कौन लिख रहा है
क्या लिख रहा है
क्यों लिख रहा है
किस पर लिख रहा है
किसी को इस सब से
कहाँ कोई मतलब
जैसा ही हो रहा है
खाना खाता है हर कोई
एक समय मिल गया
तो भी ठीक
नहीं तो कोई दो दो समय
भी अपना पेट भर रहा है
सुबह से लेकर शाम तक
कभी ना कभी फारिग
भी हो ले रहा है
चल रहा है होना ही है
इसलिये हो रहा है
किसी के फारिग
हो लेने से किसी को
क्या कोई फर्क पड़ रहा है
क्या किया जाये अगर
दिमाग किसी का
चल रहा है
चल रहा है तो
चल रहा है
कमप्यूटर के प्रिंटर का
रिफिल जो क्या है
कह दिया जाये
आज खाली हो रहा है
बाजार में नया
नहीं मिल रहा है
फर्क बस इतना है
कि पालतू कुत्ता
अकेला भौं भौं
नहीं कर रहा है
पूरी रात भौकता है
जब एक बार
शुरु कर रहा है
शहर के हर कोने से
कोई ना कोई जानवर
पालतू या आवारा
उसका साथ देने में
कोई कसर भी
नहीं कर रहा है
बात अलग है
कि उलूक के पल्ले
कुछ नहीं पड़ रहा है
इतना सोच कर बस
खुश हो ले रहा है
कि पढ़े लिखे होने का
असर कहीं तो
किसी पर पड़ रहा है !

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