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रविवार, 20 अगस्त 2017

आसपास कुछ ईश्वरीय होने का अहसास

सूक्ष्म मध्यम
महत दिव्य
अलौकिक

या और भी
कई प्रकार के
आभास कराते

अपने ही
आसपास के
कार्यकलाप


आसानी से जैसे
खेल खेल में
समझाते
सर्वशक्तिमान
सर्वज्ञ
सर्वव्यापी
सर्वभूत

दिलाते
अहसास
सभी
ज्यादातर
या कुछ
मनुष्यों
के ही
ईश्वर होने का

यहीं इति कर देना
या इसके बाद
लिख देना क्रमश:
शेष अगले अंक में

फर्क है
बहीखाते में
रोज का रोज
हिसाब
जोड़ लेने 
में 
हफ्ते में
सात दिन का
एक साथ
लिखने 
में 

या महीने भर 

के हिसाब को
किसी एक दिन
निचोड़ 
लेने में 

वैसे भी
आधी उम्र पार
करते करते
समझ में आना
शुरु हो ही जाता है

आधी उम्र तक
पहुँचने तक के
सब कुछ सीखे
हुऐ का सार

पाप पुण्य
की सीमा में
लड़खड़ाते
खुद के अच्छे
कर्मों से
पुण्यों को
जमा कर
लेने के भ्रम

अनदेखी
करते हुऐ
सामूहिक
अपराधों में
अपनी
भागीदारी को

अच्छा है
महसूस
कर लेना
‘उलूक’

स्वयं का भी
ईश्वर होना
डकारते हुऐ
अन्दर की ओर
अह्म ब्रह्मास्मि।

चित्र साभार: Clipart - schliferaward

बुधवार, 17 सितंबर 2014

सात सौ सतत्तरवीं बकवास नहीं कही जा सकती है बिना कुछ भी देखे सुने अपने आसपास

आप बीती
कह लीजिये
या जग बीती

जब
देखी सुनी
महसूस की
जाती हैं

तभी कही
और लिखी
भी जाती है

कहानियाँ
राजा रानी
राजकुमारी की
कह लीजिये
या परियों की
ऐसे वैसे भी
बुनी जाती हैं

सबको ही
दिखाई देता है
कुछ ना कुछ
अपने आस पास
देखने वाले की
नजर पर होता है

होने ना होने
में से कौन सी
चीज उसको
उसके काम की
नजर आती है

सभी पढ़ते हैं
एक ही किताब
से एक ही नज्म
हर किसी के
लिये नहीं होता
बन जाना
उसका एक गीत
किसी किसी को
दूर दूर तक
वही एक काली
भैंस की सींग
नजर आती है

‘उलूक’
सभी एक मत से
कह रहे होते हैं
जहाँ कुछ नहीं है
तेरी फितरत का
क्या किया जाये

समझ में
नहीं आता है
तुझे वहाँ पर भी
कुछ लिख लिखा
देने के लिये
एक तस्वीर
नजर आती है

हर कोई बजा
रहा है तालियाँ
हवा में उनके
हवा महल की
हवा में हो रही
हवा बाजी पर

कह क्यों नहीं
पाता उन सब की
हवा की तारीफ
करने में तेरी
खुद की हवा
निकल जाती है ।

चित्र साभार: http://blogs.msdn.com/

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