http://blogsiteslist.com
उत्तर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
उत्तर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

बेवकूफ हैं तो प्रश्न हैं उसी तरह जैसे गरीब है तो गरीबी है

जब भी
कहीं
कोई प्रश्न
उठता है
कोई
ना कोई
कुछ ना
कुछ
कहता है

प्रश्न तभी
उठता है
जब उत्तर
नहीं मिलता है

एक ही
विषय
होता है
सब के
प्रश्न
अलग
अलग
होते हैंं

होशियार
के प्रश्न
होशियार
प्रश्न होते हैंं
और
बेवकूफ
के प्रश्न
बेवकूफ
प्रश्न होते हैं

होशियार
वैसे
प्रश्न नहीं
करते हैं
बस प्रश्नों
 के उत्तर
देते हैं

बेवकूफ
प्रश्न करते हैं
फिर
उत्तर भी
पूछते हैं
मिले हुऐ
उत्तर को
जरा सा
भी नहीं
समझते है

समझ
गये हैं
जैसे कुछ
का
अभिनय
करते हैं
बहस नहीं
करते हैं

मिले हुए
उत्तर के
चारों ओर
बस सर पर
हाथ रखे
परिक्रमा
करते हैं

समय भी
प्रश्न करता
है समय से
समय ही
उत्तर देता
है समय को

समय
होशियार
और
बेवकूफ
नहीं
होता है
समय
प्रश्नों को
रेत पर
बिखेर
देता है

बहुत सारे
रेत पर
बिखरे हुऐ
प्रश्न
इतिहास
बना देते हैं

रेत पानी में
बह जाती है
रेत हवा में
उड़ जाती है
रेत में बने
महल ढह
जाते हैं
रेत में बिखरे
रेतीले प्रश्न
प्रश्नों से ही
उलझ जाते हैं

कुछ लोग
प्रश्न करना
पसन्द करते हैं
कुछ लोग
उत्तर
के डिब्बे
बन्द करा
करते हैं

बेवकूफ
‘उलूक’
की आदत है
जुगाली करना
बैठ कर
कहीं ठूंठ पर
उजड़े चमन की
जहाँ हर तरफ
उत्तर देने वाले
होशियार
होशियारों
की टीम
बना कर
होशियारों
के लिये
खेतों में
हरे हरे
उत्तर
उगाते हैं

दिमाग
लगाने की
ज्यादा
जरूरत
नहीं है
देखते
रहिये
तमाशे 
होशियार
बाजीगरों के
घर में
बैठे बैठे

बेवकूफों के
खाली दिमाग
में उठे प्रश्न
होशियारों के
उत्तरों का
कभी भी
मुकाबला
नहीं करते हैं ।

चित्र साभार: Fools Rush In

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

प्रश्न हैं बने बनाये हैं बहुत हैं फिर किसलिये नये ढूँढने जाता है

प्रश्न उठना और
उठते प्रश्न को
तुरंत पूछ लेना
बहुत अच्छी बात है
लेकिन
किसी के लिये
समझना जरूरी है
किसी के लिये
बस एक मजबूरी है
प्रश्न कब पूछा जाये
किस से पूछा जाये
क्यों पूछा जाये
सबसे बड़ी बात
यह देखना
पूछने के लिये
उठे प्रश्न की
क्या औकात है
वैसे जैसा
साफ नजर आता है
पूछे गये प्रश्न से
पता चल जाता है
प्रश्न नियत होते हैं
उत्तर नियत होते हैं
प्रश्न पूछने वाले
नियत होते हैं
उत्तर देने वाले
नियत होते है
बस थोड़े से कुछ
दो चार बेवकूफ
सब कुछ समझते
बूझते हुऐ एक दूसरे
के साथ प्रश्नों की
अंताक्षरी फिर भी
खेल रहे होते हैं
रोज ही दूरदर्शन
में दूर से दर्शन होते है
बहस के लिये
हर तरफ की तरफ से
अपने अपने मुर्गे
खड़े किये होते हैं
किसी की कलगी
रंगीन होती है
किसी किसी ने
रामनामी दुपट्टे
ओढ़े हुऐ होते हैं
मुरगे लढ़ाने वाला
परदे के पीछे से
कहीं किसी अदृष्य
धागे से बंधा होता है
सामने से मगर
कठपुतलियों को
घो रहा है का जैसा
आभास दे रहा होता है
उसे पता होता है
वो खुद भी एक
कठपुतले के
हाथों खेल रहा
कठपुतला होता है
प्रश्न उठाये कोई
अपने आस पास से
एक नहीं अनेक
पड़े होते है
लेकिन प्रश्न पूछने
वाले हजार मील
दूर के पत्थर को
देख रहे होते हैं
अपना कुछ अपनी
सोच से बने वो
जमाने लद रहे होते हैं
 समय की बलिहारी है
ऐसे समय में गधे सारे
अपने अपने गधों की
लीद कुरेद रहे होते हैं
अपने गधे की लीद
की खुश्बू के नशे में
इतना झूम रहे होते हैं
सावन के सारे अंधे
जैसे हरी घास के
ढेर पर कूद रहे होते हैं
‘उलूक’
नोच सकता है
तू भी जितना
नोच ले प्रश्नों को
प्रश्नों के कपड़े
वैसे भी नहीं होते हैं
अपने आस पास से
उठे प्रश्नों पर आँख मूँद
और पूछ कहीं
आसमान के
नीले रंग पर
या सुबह की
सुर्ख धूप पर
या कुछ और
वो सब
जो भी तुझे
प्रश्न पूछना
सीखे  हुऐ
लोगो द्वारा
तुझसे पूछने
के लिये
सुझाया जाता है
आसपास के
ज्वलंत प्रश्नों से
जल जाने से अच्छा
किसी का सुझाया
किसी का बताया
प्रश्न पूछने से
साँप को मारना
और लाठी को टूटने
से बचाना भी सीखा
सिखाया जाता है
सबक भी मिलता है
बहुत दूर का
पूछा गया एक
छोटा सा प्रश्न
हमेशा अपने घर के
बड़े बड़े निरुत्तर
कर देने वाले प्रश्नो से
बचाना भी सिखाता है ।

 चित्र साभार: worldartsme.com

रविवार, 5 जुलाई 2015

कागज कलम और दवात हर जगह नहीं पाया जाता है

लिखा जाये
फिर
कुछ
खुशबू
डाल कर
महकाया
जाये

किसलिये
और क्यों
लिखा जाये
उसके जैसा
जिसके लिखे
में से 
खुशबू 
भी आती है

लिखे में
से
खुशबू  ?

अब आप
को भी
लग
रहा होगा

लिखने वाला
ही है
रोज का

आज शायद
ज्यादा ही
कुछ सनक
गया होगा

सनक तो
होती ही है
किसी को
कम होती है
किसी को
ज्यादा
होती है

कोई
आसानी से
मान लेता है
पूछते ही
क्या
सनकी हो
तुरंत ही
अपने दोनो
हाथ खड़े
कर लेता है

कोई ज्यादा
सनक जाता है
सनक ही
सनक में
ये भी
भूल जाता है
कि है
कि नहीं है

किसी के
पूछते ही
सनकी हो
कि नहीं हो
भड़भड़ा कर
भड़क जाता है

असली
लेखक
और
लेखक
हो रहे
लेखक का
थोड़ा सा
अंतर इसी
जगह पर
नहीं लिखने
पढ़ने वाला
बस
एक प्रश्न
बिना बंदूक
के दाग कर
पता कर
ले जाता है

होता
वैसे कुछ
नुकसान
जैसा
किसी को
कहीं देखा
नहीं जाता है

पूछने वाला
मुस्कुरा कर
पीछे लौट
जाता है

सनकी
अपनी
सनक
के साथ
व्यवस्था
में पुरानी
अपनी ही
बनी बनाई
में लगने
लगाने में
फिर से
लग
जाता है

यही
कारण है
कागज
कलम
और
दवात
हर जगह
नहीं पाया
जाता है ।

चित्र साभार: www.unwinnable.com

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

पढ़ पढ़ के पढ़ाने वाले भी कभी पानी भर रहे होते हैं

मत पूछ लेना
कि क्या हुआ है
अरे कुछ भी
नहीं हुआ है
जो होना है वो तो
अभी बचा हुआ है
हो रहा है बस
थोड़ा धीरे धीरे
हो रहा है
इस सब के
बावजूद भी कहीं
एक बेवकूफी
भरा सवाल
मालूम है
तेरे सिर में
कहीं उठ रहा है
अब प्रश्न उठते ही हैं
साँप के फन की तरह
पर सभी प्रश्न
 जहरीले नहीं होते हैं
हाँ कुछ प्रश्नों के
सिर और पैर
नहीं होते हैं
और कुछ के नाखून
नहीं होते हैं
खून निकला नहीं
करता है जब
प्रश्न ही प्रश्न को
खरोंच रहे होते हैं
वैसे ज्यादातर प्रश्नों
के उत्तर पहले से ही
कहीं ना कहीं
किताबों में लिखे होते हैं
और बहुत ज्यादा
पढ़ाकू टाईप के लोग
एक ना एक किताब
कहीं अपनी किसी
चोर जेब में लिये
घूम रहे होते हैं
बहुत भरोसे से
कह रहे होते हैं
प्रश्न और उत्तर
उनके भरोसे से ही
किताबों के किसी
पन्ने में रह रहे होते हैं
हँसी आ ही जाती है
कभी हल्की सी
बेवकूफी भरी
किसी किनारे से मुँह के
जब कभी किसी समय
हड़बड़ी में पढ़ाकू लोग
अपनी अपनी किताब
निकालने से परहेज
कर रहे होते हैं
प्रश्न कुछ आवारा से
इधर से उधर और
उधर से इधर
उनके सामने से ही
जब गुजर रहे होते हैं
समझने वाले
समझ रहे होते हैं
नासमझ कुछ
इस सब के बाद भी
प्रश्न कुछ नये तैयार
करने के लिये
अपनी अपनी किताब के
पन्ने पलट रहे होते हैं ।

चित्र साभार:
backreaction.blogspot.com  

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

“जीवन कैसा होता है” अभी कुछ भी नहीं पता है सोचते ही ऐसा कुछ आभास हो जाता है

बिना सोचे समझे
कुछ पर कुछ भी
लिख देने की आदत
लिख भी दिया
जाता है कुछ भी
बात अलग है
कुछ दिनों बाद
फिर से बार बार
कई बार पढ़ने पर
उस कुछ को
खुद को भी कुछ भी
समझ में नहीं आता है
किसी को लगने
लगता है शायद
सरल नहीं कुछ
गूढ़ कहा जाता है
कौऐ पर मोर पंख
लगा दिया जाये तो
ऐसा ही कुछ हो जाता है
और ऐसे में अनजाने में
उससे पूछ लिया जाता है
ऐसा प्रश्न जिसे
समझने समझने तक
अलविदा कहने का
वक्त हो जाता है
और प्रश्न प्रश्न वाचक चिन्ह
का पहरा करते हुऐ जैसे
कहीं खड़ा रह जाता है
“जीवन कैसा होता है ?”
कुछ कहीं सुना हुआ
जैसा कुछ ऐसा
नजर आता है
जिसपर सोचना
शुरु करते ही
सब कुछ उल्टा पुल्टा
होने लग जाता है
कुछ दिमाग में
जरूर आता है
थोड़ी सी रोशनी
भी कर जाता है
फिर सब वही
धुँधला सा धूल भरा
नीला आसमान
भूरा भूरा हो जाता है
बताया भी नहीं जाता है
कि सामने से कभी
एक परत दर परत
खुलता हुआ प्याज
आ जाता है
कभी एक साबुन का
हवा में फूटता हुआ
बुलबुला हो जाता है
कभी भरे हुऐ पेटों के
द्वारा जमा किया हुआ
अनाज की बोरियों का
जखीरा हो जाता है
क्या क्या नहीं
दिखने लगता है
सामने सामने
एक मरे शेर का
माँस नोचते कुत्तों
पर लगा सियारों का
पहरा हो जाता है
अरे नहीं पता चल
पाया होता है कुछ भी
‘उलूक’ को एक
चौथाई जिंदगी
गुजारने के बाद भी
एक तेरे प्रश्न से
जूझते जूझते
रात पूरी की पूरी
अंधेरा ही अंधेरे पर
सवार होकर जैसे
सवेरा हो जाता है
फिर कभी देखेंगे
पूछ कर किसी ज्ञानी से
“जीवन कैसा होता है”
सभी प्रश्नों का उत्तर देना
किस ने कह दिया
हर बार बहुत ही
जरूरी हो जाता है
पास होना ठीक है
पर कभी कभी
फेल हो जाना भी
किसी की एक बड़ी
मजबूरी हो जाता है ।

चित्र साभार: http://ado4ever.overblog.com/page/2

मंगलवार, 27 मई 2014

बस थोड़ी सी मुट्ठी भर स्पेस अपने लिये

बचने के लिये
इधर उधर रोज
देख लेना और
कुछ कह देना
कुछ पर आसान है
अचानक सामने
टपक पड़े खुद पर
उठे सवाल का
जवाब देना
आसान नहीं है
जरूरी भी नहीं है
प्रश्न कहीं हो
उसका उत्तर
कहीं ना कहीं
होना ही हो
एक नहीं ढेर सारे
अनुत्तरित प्रश्न
जिनका सामना
नहीं किया जाता है
नहीं झेला जाता है
किनारे को कर
दिया जाता है
कूड़ा कूड़ेदान में
फेंक दिया जाता है
कूड़ेदान के ढक्कन
को फिर कौन उठा
कर उसमें झाँकना
दुबारा चाहता है
जितनी जल्दी हो सके
कहीं किसी खाली
जगह में फेंक देना
ही बेहतर विकल्प
समझा जाता है
सड़ांध से बचने
का एकमात्र तरीका
कहाँ फेंका जाये
निर्भर करता है
किस खाली जगह
का उपयोग ऐसे में
कर लिया जाये
बस यही खाली
जगह या स्पेस
ही होता है एक
बहुत मुश्किल प्रश्न
खुद के लिये
जानबूझ कर
अनदेखा किया हुआ
पर हमेशा नहीं होता
उधड़ ही जाती है
जिंदगी रास्ते में
कभी यूँ ही और
खड़ा हो जाता है
यही प्रश्न बन कर
एक बहुत बड़ी मुश्किल
बहुत बड़ी मुसीबत
कहीं कुछ खाली जगह
अपने आप के लिये
सोच लेना शुरु किया
नहीं की दिखना
शुरु हो जाती हैं
कंटीली झाड़ियाँ
कूढ़े के ढेरों पर
लटके हुऐ बेतरतीब
कंकरीट के जंगल
जैसे मकानों की
फोटो प्रतिलिपियों
से भरी हुई जगहें
हर तरफ चारों ओर
मकानों से झाँकती
हुई कई जोड़ी आँखे
नंगा करने पर तुली हुई
जैसे खोज रही
हों सब कुछ
कुछ संतुष्टी
कुछ तृप्ति
पाने के लिये
पता नहीं पर शायद
होती होगी किसीके
पास कुछ उसकी
अपनी खाली जगह
उसके ही लिये
बस बिना सवालों के
काँटो की तार बाड़ से
घिरी बंधन रहित
जहाँ से बिना किसी
बहस के उठा सके
कोई अपने लिये
अपने ही समय को
मुट्टी में जी भर के
देखने के लिये
अपना प्रतिबिम्ब
पर मन को भी
नंगा कर उसके
आरपार देख कर
मजा लेने वाले
लोगों से भरी इस
दुनियाँ में नहीं है
सँभव होना
ऐसी कोई जगह
जहाँ अतिक्रमण ना हो
यहाँ तक जहाँ अपनी
ही खाली जगह को
खुद ही घेर कर
हमारी सोच
घुसी रहती है
दूसरों की खाली
जगहों के पर्दे
उतार फेंकने के
पूर जुगाड़ में
जोर शोर से ।

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

लो मित्र तुम्हारे प्रश्न का उत्तर हम यूं लेकर आते हैं

सुनो मित्र
तुम्हारे सुबह
किये गये
प्रश्न का उत्तर
देने जा रहा हूँ
पूछ रहे थे तुम
कौन सी कहानी
ले कर आज शाम
को आ रहा हूँ
कहानी और कविता
लेखक और कवि
लिखा करते
हैं जनाब
मैं तो बस
रोज की तरह
वही कुछ
बताने जा रहा हूँ
जो देख सुन
कर आ रहा हूँ
कहानियां
बनाने वाले
कहानियां
रोज ही बनाते हैं
उनका काम
ही होता है
कहानियां बनाना
वो कहानियां बना
कर इधर उधर
फैलाते हैं
कुछ फालतू लोग
जो उन कहांनियों को
समझ नहीं पाते हैं
उठा के यहां
ले आते हैं
कहानियां
बनाने वाले को
चलानी होती है
कोई ना कोई कार या
सरकार कहीं ना कहीं
उनके पास होते हैं
अपने काम को छोड़
कर काम कई
वो काम करते हैं
बकवास करने से
हमेशा कतराते हैं
सारे के सारे कर्मयोगी
इसीलिये हमेशा
एक साथ
एक जगह
पर नजर आते हैं
कहांनिया बनाने
वाले जन्म देत हैं
एक ही नहीं
कई कहानियों को
त्याग देखिये उनका
कभी किसी
कहानी को
खुद पढ़ने के लिये
कहीं नहीं जाते हैं
काम के ना काज के
दुश्मन अनाज के
कुछ लोग कहांनियां
बताने वाले
बन जाते हैं
पूरा देश ही
चल रहा है
कहानी बनाने
वालों से
आप और हम
तो बस
एक कहानी को
पीटने के लिये
रोज यहां
चले आते हैं ।

रविवार, 9 सितंबर 2012

जा भटक कर आ

उत्तर का प्रश्न
खुद अपने
से निकाले
संकरे से
भटकन भरे
रास्ते पर
चलने की
आदत डाले
सामने वाले
के लिये
एक उलझन
हो जाये
मुश्किल हो
जाती है
ऎसे में क्या
किया जाये
भटकने वाला
तो भटकना है
करके खुद
भटक जाता है
हैरानी की बात
इसलिये नहीं
होती है कि
उसको अच्छा
भटकना आता है
सीधे रास्ते पर
सीधे सीधे
चलने वाला
दूर दूर तक
साथ देने वाला
ढूँढने में जहाँ
बरसों लगाता है
भटकने वाले को
भटकाने के लिये
भटकता हुआ
कोई पता नहीं
कैसे तुरंत
मिल जाता है
भटक भटक कर
भटकते हुऎ
भटकाने वाले
का बेड़ा
भटकाव के
सागर में
भटक जाता है
सामने वाला
देख देख कर
पागल हो
जाता है
उसके पास
अपने सर के
बाल नोंचने
के अलावा
कुछ नहीं
रह जाता है ।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...