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रविवार, 14 जून 2015

कोशिश कर घर में पहचान महानों में महान

एक खेत
सौ दो सौ
किसान
किसी का हल
किसी का बैल
बबूल के बीज
आम की दुकान
जवानों में बस
वही जवान
जिसके पास
एक से निशान
बंदूकें जंग
खाई हुई
उधार की
गोलियाँ
घोड़े दबाने
के लिये
अपने छोड़
सामने वाले
कंधे को
पहचान
मुँह में रामायण
गीता बाईबिल
और कुरान
हाथ में गिलास
बोतल में सामान
अपने मुद्दे मुद्दे
दूसरे के मुद्दे
बे‌ईमान
घर में लगे
तो लगे आग
पानी ले
चल रेगिस्तान
‘उलूक’ बंद रख
नाक मुँह
और कान
अपनी अपनी
ढपली
अपने अपने
गान
जय जवान
जय किसान ।



चित्र साभार: cybernag.in

रविवार, 17 नवंबर 2013

कंंधा नहीं लगायेगा तो ऊपर क्या है कैसे देख पायेगा

पता ही
नहीं चलता
कब कहाँ
किसी को
क्या नजर
आ जाये

किस
हाल में
किसी को
किसी
के लिये
क्या कुछ
करना ही
पड़ जाये

समझाता भी
कौन है यहां
किताबों से
बाहर की बातें

जो समझ में
आसानी से
किसी के
यूं ही आ जाये
कंंधा लगाये हुऐ

कुछ लोगों के
कंंधे पर चढ़ा
हुआ कोई
उँचाई पर
कुछ ढूंंढने
के लिये
जब चला जाये

क्या दिखा
क्या मिला
नीचे उतरने
पर भी
कंंधे दिये
हुओं को
तक भी
ना बताये

कंंधे
 लगाये
हुओं को
इस बात से
कोई मतलब
ही ना रह जाये

एक उतरा
नहीं नीचे
दूसरा कंंधों
पर चढ़ कर
ऊपर देखना
शुरु हो जाये

चढ़ना उतरना
चल रहा हो
ऊपर जाता
हुआ मगर
कोई नजर
कभी कहीं
भी नहीं आये

शायद हो
दही की मटकी
ऊपर कहीं
हुई लटकी
हिम्मत फोड़ने
की ऐसे में
कोई क्यों और
कैसे कर पाये

इंतजार में हो
सब कन्हैया के
सभी 
कंंधे
पै लगे हो

इसीलिये
अपना भी 
कंंधा लगाये
'उलूक'
देखे खुद
समझे खुद
और खुद को
खुद ही
ये समझाये

किसी की
समझ में इसमें
कुछ और
अगर आ जाये
तो बहुत
मेहरबानी होगी
पक्का बताये
जरूर बताये ।

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