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गुरुवार, 10 मार्च 2016

कुछ लोग लोगों को उनके बारे में सब कुछ बताते हैं

कुछ लोग
भगवान
नहीं होते हैं

बस उनका
होना ही
काफी होता है

किसी को भी
अपने बारे में
उतना पता
नहीं होता है
जितना
कुछ लोगों को
सारे लोगों
के बारे में
पता होता है

रात के देखे
सभी सपने
सुबह होने होने
तक बहुत ही
कम याद रहते हैं

बिना धुले
साबुन के
मटमैले कपड़े
जैसे ही धुँधले
हो चुके होते हैं

उन सारे
सपनों की
खबर को
लोगों को
सुनाने में
इन कुछ
लोगों को
महारत
हासिल होती है

अलसुबह
मुँह धोने
से पहले
आईने के
सामने खड़ा
जब तक
कोई खुद
को परख
रहा होता है

इन लोगों
की तीसरी
आँख से
देखा सब कुछ
बिस्तरे की
सिलवट की
गिनतियों के
साथ कहीं
किसी सुबह
के अखबार
के मुख्य
पृष्ठ पर
बड़े अक्षरों में
छप रहा होता है

ये लोग
अपने जैसे
सभी भगवानों
को बारीकी से
पहचानते हैं

बोलते
नहीं है
कुछ भी
कहीं भी
किसी से
किसी के लिये

लेकिन
हवा हवा में
हवा की
धूल मिट्टी को
भी छानते हैं

सारा सब कुछ
इन्हीं की
सदभावनाओं
पर टिका
और चल
रहा होता है

अपने बारे में
अच्छी  दो चार
गलफहमियाँ
पाला हुआ
कोई अपनी
अच्छाइयों के
जनाजों को
कहीं गिन
रहा होता है

उसकी गिनती
सही है और
गलत है
यही
कुछ लोग
बताते हैं

जानकारी
आदमी की
आदमी के
अंदर से
निकाल कर
आदमी को
बेच जाते हैं

आदमी
अपने बारे में
सोचता रहता है

होने ना
होने के
हिसाब से
कुछ लोग
उसका
कहीं भी
नहीं होना
हर जगह
जा जा
कर बताते हैं

भगवानों
में भगवान
धरती में
पैदा हुऐ
इन्सानों
से अलग

कुछ अलग
तरह के लोग
सब कुछ
हो जाते हैं

‘उलूक’
भगवान की पूजा
करने से नहीं
मिलता है मोक्ष

कुछ लोगों
की शरण में
जाना पड़ता है

आज के
जमाने में
भगवान भी
उन्ही लोगों
से पूछने
कुछ ना
कुछ आते हैं ।

चित्र साभार: fremdeng.ning.com

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

कुछ भी लिख देना लिखना नहीं कहा जाता है

एक बात पूछूँ
पूछ
पर पूछने से पहले
ये बता
किस से पूछ रहा है
पता है
हाँ पता है
किसी से नहीं
पूछ रहा हूँ
आदत है पूछने की
बस यूँ ही ऐसे ही
कुछ भी कहीं भी
पूछ रहा हूँ
तुमको कोई
परेशानी है
तो मत बताना
बताना जरूरी
नहीं होता है
कान में बता
रहा हूँ वैसे भी
कोई नहीं
कुछ बताता है
पूछने से ही
गुस्सा हो जाता है
गुर्राता है
कहना शुरु
हो जाता है
अरे
तू भी पूछने
वालों में
शामिल हो गया
मुँह उठाता है
और पूछने
चला आता है
ये नहीं कि
वैसे ही हर कोई
पूछने में लगा
हुआ होता है
एक दो पूछने
वालों के लिये
कुछ जवाब सवाब
ही कुछ बना कर
क्यों नहीं ले आता है
हमेशा जो दिखे
वही साफ साफ
बताना अच्छा
नहीं माना जाता है
रोटी पका सब्जी देख
दाल बना भर पेट खा
खाली पीली
अपनी थाली अपने पेट
से बाहर किसलिये
फालतू में झाँकने
चला आता है
‘उलूक’
समाज में रहता है
क्यों नहीं
रोज ना भी सही
कुछ देर के लिये
सामाजिक क्यों
नहीं हो जाता है
पूछने गाछने के
चक्कर में किसलिये
प्रश्नों का रायता
इधर उधर फैलाता है ।

चित्र साभार: serengetipest.com

रविवार, 20 सितंबर 2015

देखा कुछ ?

देखा कुछ ?
हाँ देखा
दिन में
वैसे भी
मजबूरी में
खुली रह जाती
हैं आँखे
देखना ही पड़ता है
दिखाई दे जाता है
वो बात अलग है
कोई बताता है
कोई चुप
रह जाता है
कोई नजर
जमीन से
घुमाते हुऐ
दिन में ही
रात के तारे
आकाश में
ढूँढना शुरु
हो जाता है
दिन तो दिन
रात को भी
खोल कर
रखता हूँ आँखें
रोज ही
कुछ ना कुछ
अंधेरे का भी
देख लेता हूँ
अच्छा तो
क्या देखा ? बता
क्यों बताऊँ ?
तुम अपने
देखे को देखो
मेरे देखे को देख
कर क्या करोगे
जमाने के साथ
बदलना भी सीखो
सब लोग एक साथ
एक ही चीज को
एक ही नजरिये
से क्यों देखें
बिल्कुल मत देखो
सबसे अच्छा
अपनी अपनी आँख
अपना अपना देखना
जैसे अपने
पानी के लिये
अपना अपना कुआँ
अपने अपने घर के
आँगन में खोदना
अब देखने
की बात में
खोदना कहाँ
से आ गया
ये पूछना शुरु
मत हो जाना
खुद भी देखो
औरों को भी
देखने दो
जो भी देखो
देखने तक रहने दो
ना खुद कुछ कहो
ना किसी और से पूछो
कि देखा कुछ ?

चित्र साभार: clipartzebraz.com

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

कुछ लिखने वाले के कुछ पढ़ने वाले कुछ भी पढ़ते पढ़ते उसी के जैसे हो जाते हैं

इतना इतना
कितना कितना
लिखता है
देखा कर कभी
तो सही खुद भी
पढ़ कर जितना
जितना लिखता है
लिखने का कोई
नियम कहीं भी
किसी भी पन्ने में
नजर नहीं आता है
लगता है बिना
नापे तोले कुछ भी
कहीं से हाथ मार कर
झोले के अंदर
से निकाल कर
ले आता है
कभी सौ ग्राम
लिखने की भी
नहीं सोचता है
हर पन्ना जैसे
एक डेढ़ किलो का
रोज ही बनाना
जरूरी हो जाता है
शब्द भी गिने चुने
दो चार हर बार
वही नजर आते हैं
बार बार कई बार
खुद को बेशर्मी
से दोहराते हैं
बातें जमाने की
वही घिसी पिटी
जो अमूमन सभी
किया करते हैं
तेरे शब्द ही
उसी में से कुछ
खोज निकाल कर
उसी से उलझ जाते हैं
कितने शरीफ होते है
फिर भी पढ़ देने वाले
तेरे लिखे को ‘उलूक’
धन्य हैं कुछ लोग
ज्यादा नहीं भी सही
दो चार रोज फिर भी
कभी इधर से नहीं तो
दो चार कभी उधर के
आ ही आते हैं
झेलते हैं अच्छा है
बहुत ही अच्छा है
लिखने लिखाने के
बाद चले भी जाते हैं
कुछ भी लिख देने
वाले का साथ
यहीं पर दिखता है
कुछ भी पढ़ देने वाले
जरूर निभाते हैं ।

चित्र साभार: jaysonlinereviews.com

बुधवार, 8 जुलाई 2015

कुछ कुछ पर लिखना चाहो कुछ लिखने वाले बहुत कुछ लिख ले जाते हैं

माने निकाले
तो कोई
कैसे निकाले
कुछ के कुछ भी
माने नहीं होते हैं
कुछ के कुछ
माने होने जरूरी
भी नहीं होते हैं
बहुत से लोग
बहुत कुछ
लिखते हैं
बहुत से लोग
कुछ कुछ
लिखते हैं
कुछ लोग
बहुत कुछ
पढ़ते हैं
कुछ लोग
कुछ कुछ
ही पढ़ते हैं
इतना कुछ है
यहाँ देखिये
लिखने वाला
अटक रहा है
भी तो कहाँ
कुछ पर या
कुछ कुछ पर
अब एक कुछ का
कुछ माने होना
और कुछ के साथ
एक कुछ और
लगा देने से
माने बदल जाना
कुछ कुछ का
कुछ हो जाना
कुछ लोग कुछ
पर ही लिखते हैं
कुछ लोग कुछ
कुछ पर ही
लिखते हैं
कितनी मजेदार
है ना ये बात
कुछ लोग कुछ
लोगों को ही
पढ़ना चाहते हैं
कुछ लोग सब
लोगों को पढ़ना
चाह कर भी
नहीं पढ़ पाते हैं
अब क्या
क्या लिखेंगे
कितना लिखेंगे
कुछ पर कुछ
लिखना चाह
कर भी कुछ लोग
कुछ भी नहीं
लिख पाते हैं
‘उलूक’ तेरा कुछ भी
नहीं हो सकता है
लोग बहुत कुछ
करना चाहते हैं
कुछ लोगों की
नजरे इनायत है
कुछ लोग कुछ
करना चाहकर भी
कुछ नहीं कर पाते हैं ।

चित्र साभार: www.boostsolutions.com

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

लिखना कुछ कुछ दिखने के इंतजार के बाद कुछ पूरा कुछ आधा आधा

अपना कुछ लिखा होता
कभी अपनी सोच से
उतार कर किसी
कागज पर जमीन पर
दीवार पर या कहीं भी
तो पता भी रहता
क्या लिखा जायेगा
किसी दिन की सुबह
दोपहर में या शाम
के समय चढ़ती धूप
उतरते सूरज
निकलते चाँद तारे
अंधेरे अंधेरे के समय
के सामने से होते हैं
सजीव ऐसे जैसे को
बहुत से लोग
उतार देते हैं हूबहू
दिखता है लिखा हुआ
किसी के एक चेहरे
का अक्स आईने के
पार से देखता हो
जैसे खुद को ही
कोशिश नहीं की
कभी उस नजरिये
से देखने की
दिखे कुछ ऐसा
लिखे कोई वैसा ही
आदत खराब हो
देखने की
इंतजार हो होने के
कुछ अपने आस पास
अच्छा कम बुरा ज्यादा
उतरता है वही उसी तरह
जैसे निकाल कर
रोज लाता हो गंदला
मिट्टी से सना भूरा
काला सा जल
बोतल में अपारदर्शी
चिपका कर बाहर से
एक सुंदर कागज में
सजा कर लिख कर
गंगाजल ताजा ताजा ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

रविवार, 28 जून 2015

नहीं भी हुआ हो तब भी हो गया है हो गया है कह देने से कुछ नहीं होता है

बहुत सारे लोग
कह रहे होते हैं
एक बार नहीं
बार बार
कह रहे होते हैं
तो बीच में
अपनी तरफ से
कुछ भी कहना
नहीं होता है
जो भी कहा
जा रहा होता है
नहीं भी समझ में
आ रहा होता है
तो भी समझ में
अच्छी तरह से
आ रहा है ही
कहना होता है
मान लेना होता है
हर उस बात को
जिसको पढ़ा
लिखा तबका
बिना पढ़े लिखे
को साथ में लेकर
मिलकर जोर शोर
से हर जगह
गली कूँचे
ऊपर से नीचे
जहाँ देखो वहाँ
कह रहा होता है
नहीं भी दिख
रहा होता है
कहीं पर भी
कुछ भी उस
तरह का जिस
तरह होने का
शोर हर तरफ
हो रहा होता है
आने वाला है
कहा गया होता है
कभी भी पहले
कभी को
आ गया है
मान कर
जोर शोर से
आगे को बढ़ाने
के लिये अपने
आगे वाले को
बिना समझे
समझ कर
मान कर उसके
आगे वाले से
कहने कहाने
के लिये बस कह
देना होता है।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शनिवार, 14 मार्च 2015

तेरे लिखे हुऐ में नहीं आ रहा है मजा

बहुत कुछ लिख रहे हैं
बहुत ही अच्छा
बहुत से लोग यहाँ
दिखता है आते जाते
लोगों का जमावाड़ा वहाँ
कुछ लोग कुछ भी
नहीं लिखते हैं
उनके वहाँ ज्यादा
लोग कहते हैं आओ
यहाँ और यहाँ
क्या किया जा सकता है
उस के लिये जब
किसी को देखना पड़ता है
जब चारों ओर का धुआँ
सोचना पड़ता है धुआँ
और मजबूरी होती है
लिखना भी पड़ता है
तो बस कुछ धुआँ धुआँ
रोज कोई ना कोई
खोद लेता है अपने लिये
कहीं ना कहीं एक कुआँ
किस्मत खराब कह लो
या कह लो कुछ भी तो
नहीं है कहीं भी कुछ हुआ
अच्छा देखने वाले
अच्छे लोगों के लिये
रोज करता है कोई
बस दुआ और दुआ
दिखता है सामने से
जो कुछ भी खुदा हुआ
कोशिश होती है
छोटी सी एक बस
समझने की कुछ
और समझाने की कुछ
फोड़ना पड़ता है सिर
‘उलूक’ को अपने लिये ही
आधा यहाँ और आधा वहाँ
होता किसी के आस पास
वो सब कहीं भी नहीं है
जो होता है
अजीब सा हमेशा
कुछ यहाँ
और कुछ वहाँ
देखने वालों की जय
समझने
वालों की जय
होने देने
वालों की जय
ऊपर वाले
की जय जय
उसके होने का
सबूत ही तो है
जो कुछ हो रहा है
यहाँ और वहाँ ।

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

कह दे कुछ भी कभी भी कहीं भी कुछ नहीं होता है

कुछ कहने
के लिये कुछ
करना जरूरी
नहीं होता है
कभी भी
कुछ भी
कहीं भी
कह लेना
एक मजबूरी
होता है
करने और
कहने या
कहने और
करने में
बस थोड़ा सा
अंतर होता है
कहने के बाद
करना जरूरी
नहीं होता है
खामियाजा
छोटा सा ही
बस रहने या
नहीं रहने
के जितना
ही होता है
एक बार
कह देने का
एक मौका
जरूर होता है
दूसरी बार
कहने का
मौका कोई
नहीं देता है
कहने के बाद
मिले मौके को
जो खो देता है
उसके पास
करने का मौका
अगली बार
नहीं होता है
जो दिख रहा
होता है वो ही
सही होता है
समझ ले जो
इसके साथ
इस बार होता है
उसी जैसा कुछ
अगली बार
उसके साथ
होता है
जो कहा है उसे
खुद ही समझ ले
अच्छी तरह
समझने के लिये
अलग से समय
नहीं होता है
कई बार हो
और बार बार हो
उससे पहले
कहे हुऐ
एक बार को
एक ही बार
याद क्यों नहीं
कर लेता है
सपने देखना
सभी चाहते हैं
सपने दिखाने
वाला एक बार
के बाद एक
सपना खुद का
खुद के लिये
हो लेता है
लोकतंत्र का
मंत्र खाली
किताबों में
लिखा नहीं
होता है
पढ़ने के साथ
स्वाहा भी
कहना होता है ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

करेगा कोई करे कुछ भी बता देगा वो उसी को एक साँस में और एक ही बार में

है कुछ भी
अगर पास तेरे
बताने को
क्यों रखता है
छिपा कर अपने
भेजे में संभाल के
देख ले क्या पता
कुछ हो ही जाये
कोशिश तो कर
छोटी सी ही सही
हिम्मत कर के
तबीयत से हवा में
ही ज्यादा नहीं तो
थोड़ा सा ही
ऊपर को उछाल के
तैरता भी रहेगा
माना कुछ कुछ
कुछ समय तक
समय की धार में
नहीं भी पकड़ेगा
कोई समझ कर
कबूतर का पंख
जैसा कुछ भी
अगर मान के
आकार में मिट्टी
या धूल का
एक गोला जैसा
ही कुछ देखेगा
कुछ देर के लिये
सामने अपनी
किसी दीवार के
खुश ही हो ले
दीवाना कोई
फुटबॉल ही समझ
लात मार कर
कहीं किसी गोल
में ले जा कर
ही डाल के
दो चार छ: आठ
बार में कुछ
करते करते
कई दिनों तक
कुछ हो ही जाये
यूँ ही कुछ कहीं
भी कभी एक दिन
किसी मंगलवार के
एक कहने वाला
कर जाये दो मिनट
में आकर बात फोड़
उस कमाल पर
करके धमाल
अपने जीभ की
तलवार की
तीखी धार के
तेरे कहने को
ना कहने से भी
होने जा रहा
कुछ नहीं है
निकलना है जब
तस्वीर का
उसके ही बोल
देने का
सब कुछ
पन्ने में
उसके ही किसी
अखबारों के
अखबार के
सोच ले ‘उलूक’
जमा करने पर
नहीं होना है
कुछ भी को
जमा कर लेने पर
कौड़ियों की सोच
का कोई खरीददार
नहीं मिलता है
इस जमाने की
दुकानों में
किसी भी
बाजार के ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com

शनिवार, 6 सितंबर 2014

किसी एक दिन की बात उसी दिन बताता भी नहीं हूँ

ऐसा नहीं है कि
दिखता नहीं है
ऐसा भी नहीं है
कि देखना ही
चाहता नहीं हूँ
बात उठने
उठाने तक
कुछ सोचने
सुलझाने तक
चाँद पूरा
निकल कर
फैल जाता है
तारा एक
बहुत छोटा सा
पीली रोशनी में
कहीं खो जाता है
रोज छाँटता हूँ
अपने बाग में
सुबह सुबह
एक कली और
दो पत्तियाँ
शाम लौटने तक
पूजा कि धुली
थालियों के साथ
किसी पेड़ की
जड़ में पड़ा
उन्ही और उन्ही
को पाता भी हूँ
और दिन भर में
होता है कुछ
अलग अलग सा
इसके साथ भी
उसके साथ भी
कुछ होता भी
है कही और
क्या कुछ होता है
समझने समझाने
तक सब कुछ ही
भूल जाता भी हूँ
उसके रोज ही
पूछने पर मुझसे
मेरे काम की
बातों को
बता सकता
नहीं हूँ कुछ भी
बता पाता भी नहीं हूँ
उसके करने कराने
से भर चुका है
दिल इतना ‘उलूक’
ऐसा कुछ करना
कराना तेरी कसम
चाहता भी नहीं हूँ
लिख देना
कुछ नहीं करने
की कहाँनी रोज
यहाँ आ कर
काम होता
ही है कुछ कुछ
फिर ना कहना
कभी कुछ कुछ
सुनाता ही नहीं हूँ ।

चित्र साभार: http://thumbs.dreamstime.com/

शनिवार, 30 अगस्त 2014

कभी ‘कुछ’ कभी ‘कुछ नहीं’ ही तो कहना है

अच्छी तरह पता है
स्वीकार करने में
कोई हिचक नहीं है
लिखने को पास में
बस दो शब्द ही होते हैं
जिनमें से एक पर
लिखने के लिये
कलम उठाता हूँ
कलम कहने पर
मुस्कुराइयेगा नहीं
होती ही नहीं है
कहीं आज
आस पास
किसी के भी
दूर कहीं रखी
भी होती होगी
ढूँढने उसे
जाता नहीं हूँ
प्रतीकात्मक
मान लीजिये
चूहा इधर उधर
कहीं घुमाता ही हूँ
चूहा भी प्रतीक है
गणेश जी के
वाहन का जिसको
कहीं बुलाता नहीं हूँ
माउस कह लीजिये
आप ठीक समझें
अगर हिलाता
इधर से उधर हूँ
खाली दिमाग के
साथ चलाता भी हूँ
दो शब्द में एक
‘कुछ’ होता है
और दूसरा होता है
‘कुछ नहीं’
सिक्का उछालता हूँ
यही बात बस एक
किसी को बताता
कभी भी नहीं हूँ
नजर पड़ती है
जैसे ही कुछ पर
उसको लिखने
के लिये बस कलम
ही एक कभी
उठाता नहीं हूँ
लिखना दवा
होता नहीं है हमेशा
बीमार होना मगर
कभी चाहता नहीं हूँ
मछलियाँ मेरे देश
की मैंने कभी
देखी भी नहीं
मछलियों की
सोचने की सोच
बनाता भी नहीं हूँ
चिड़िया को चावल
खिलाना कहा था
किसी ने कभी
मछलियों को खिलाने
जापान भी कभी
जाता नहीं हूँ
समझ लेते है
‘कुछ’ को भी मेरे
और ‘कुछ नहीं’ को
भी कुछ लोग बस
यही एक बात कभी
समझ लेता हूँ
कभी बिल्कुल भी
समझ पाता नहीं हूँ ।


चित्र: गूगल से साभार ।

शनिवार, 31 मई 2014

साथ होना अलग और कुछ होना अलग होता है

उसके और मेरे बीच
कुछ नहीं था
ना उसने
कभी कहा था
ना मैंने कभी
कोशिश की थी
कुछ कहने की
अब 
आपस में
बात करने का
मतलब कुछ
कहना होता है
ऐसा जरूरी भी
नहीं होता है
बहुत साल
आस पास
रह लेने से भी
कुछ नहीं होता है
साथ साथ बड़ा होना
खेलना कूदना
घर आना जाना
कहीं घूमने
साथ चले जाना
एक रास्ते से
बहुत सालों तक
एक सी जगहों
को टटोलना
बहुत से लोग
करते हैं
रास्ते अलग
हो जाते हैं
लोग अलग
अलग दिशाओं
को चले जाते हैं
यादों का क्या है
उनका काम भी
आना और जाना
ही होता है
वो भी आती
जाती रहती है
कभी किसी की
आ जाती है
कभी किसी की
आ जाती है
कुछ देर के
लिये ही सही
बहुत से लोगों
के बीच बहुत
कुछ होने से
भी क्या होता है
उससे भी क्या होता है
अगर कोई कभी
उसके मेरे बीच
कभी भी कुछ नहीं था
कह ही देता है।

सोमवार, 19 मई 2014

सब कुछ लिख लेने का कलेजा सब के हिस्से में नहीं आ सकता है

सब कुछ साफ साफ
लिख देने के लिये
किसी को मजबूर नहीं
किया जा सकता है
सब कुछ वैसे भी
लिखा भी नहीं
जा सकता है
इतना तो एक
अनपढ़ की समझ में
तक आ सकता है
सब कुछ लिख लेने
का बस सोचा ही
जा सकता है
कुछ कुछ पूरा
लिखने की कोशिश
करने वाला
पूरा लिखने से
पहले ही इस
दुनियाँ से बहुत
दूर भी जा सकता है
सब कुछ लिख देने
की कोशिश करने में
आपदा भी
आ सकती है
साल दो साल नहीं
सदियाँ भी पन्नों
में समा सकती हैं
नदियाँ समुद्र तक
जा कर लौट कर
भी आ सकती हैं
सब कुछ सब लोग
नहीं लिख सकते हैं
उतना ही कुछ
लिख सकते हैं
उतना ही कुछ
बता सकते हैं
जितने को लिखने
या बताने में
कुछ ना कुछ
पी खा सकते हैं
कुछ आने वाली
पीढ़ियों के लिये
बचा सकते हैं
सब कुछ लिख देने
वाला अच्छी तरह
से जानता है
बाहर के ही नहीं
अंदर के कपड़े भी
फाड़े या उतारे
जा सकते हैं
हमाम में कोई भी
कभी भी आ
जा सकता है
नहाना चाहे
नहा सकता है
डुबकी लगाने
की भी मनाही
नहीं होती है
डुबकी एक नहीं
बहुत सारी भी
लगा सकता है
साथ किसी के
मिलकर करना हो
कुछ भी किसी भी
सीमा तक कर
करा सकता है
किसी अकेले का
सब कुछ किये हुऐ
की बात शुरु करने
से ही शुरु होना शुरु
होती है परेशानियाँ
सब कुछ लिखने
लिखाने की हिम्मत
करने वाले का कुछ
या बहुत कुछ नहीं
सब कुछ भी भाड़
में जा सकता है
‘उलूक’ कुछ कुछ
लिखता रह
पंख नुचवाता रह
सब कुछ लिखने का
जोखिम तू भी नहीं
उठा सकता है
अभी तेरी उड़ान
रोकने की कोशिश
से ही काम चल
जाता है जिनका
तेरे सब कुछ
लिख देने से
उनका हाथ तेरी
गरदन मरोड़ने के
लिये भी आ सकता है ।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

जो होना होता है वही हो रहा होता है

कोई भी तो
कुछ नहीं कह
रहा होता है
फिर भी किसी
को कैसे ये लग
रहा होता है
हर समय
कहीं ना कहीं
कुछ ना कुछ
हो रहा होता है
खाना पकता है
खुश्बू आती है
पता चलता है
प्रेशर कूकर हुआ
तो सीटी दे देता है
तेरा कुछ नहीं
हो सकता है
बिना बात के
एक बात की
सौ बात
कर देता है
कई तरह की
बीमारियाँ होती हैं
कई तरह के
बीमार होते हैं
कोशिश की जाती है
इलाज भी होता है
सारे मरीज
मर ही जो
क्या जाते हैं
कुछ की बीमारियों
को डाक्टर ठीक
भी कर देता है
तेरा कुछ नहीं
हो सकता है
तू दवाई की
पर्चियों के ऊपर
भी कुछ ना कुछ
लिख देता है
कहीं भी कुछ
भी नहीं हो
रहा होता है
कोई भी संकेत
नहीं होता है
कुछ तेरे जैसे
लोगों को बस
एक वहम हो
रहा होता है
कोई किसी बात
पर कुछ नहीं
कह रहा होता है
सब कुछ अपनी
जगह पर जैसा था
वैसा ही हो
रहा होता है
बस तुझे ही
कुछ कुछ हमेशा
की तरह का
हो रहा होता है
तेरा सच में
कुछ भी नहीं
हो सकता है
सब के मौज
हो रहे होते हैं
हर कोई खुश
हो रहा होता है
बस एक तू
अपनी आदत
के कारण
कुछ होने या
ना होने पर
रो रहा होता है
तेरा कुछ नहीं
हो सकता है
कुछ होने वाला
होता भी है
तब भी तेरा
जैसा ही बस
कोई यही कह
रहा होता है
हो रहा है जो
कुछ कहीं भी
हो रहा होता है
आँखिर क्यों हो
रहा होता है ।

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

कुछ ना इधर कुछ ना उधर कहीं हो रहा था

लिखा हुआ
पत्र एक
हाथ में
कोई लिया
हुआ था

किस समय
और कहाँ पर
बैठ कर
या खड़े होकर
लिखा गया था

शांति थी साथ में
या बहुत से लोगो
की बहस सुनते हुऐ
कुछ अजीब सी
जगह से बिना
सोचे समझे ही
कुछ लिख विख
दिया गया था

कितनी पागल
हो रही थी सोच
किस हाल में 

शरीर बहक
रहा था

नहा धो कर
आया हुआ
था कोई
और खुश्बू से
महक रहा था

बह रही
थी नाक
छींकों
के साथ
जुखाम
बहुत
जोर का
हो रहा था

झगड़ के
आया था
कोई कहीं
आफिस में
बाजार में
या घर की
ही मालकिन से
पंगा हो रहा था

नीरो की
बाँसुरी भी
चुप थी
ना कहीं
रोम ही
जल रहा था

सब कुछ
का आभास
होना इस
आभासी
दुनियाँ में
कौन सा
जरूरी
हो रहा था

अपनी अपनी
खुशी
छान छान
कर कोई
अगर
एक छलनी
को धो रहा था

दुखी और बैचेन
दूसरा कोई कहीं
दहाड़े मार मार
कर रो रहा था

बहुत सी जगह
पर बहुत कुछ
लिखा हुआ पढ़ने
का शायद कुछ
ऐसा वैसा ही
असर हो रहा था

पत्र हाथ में
था उसके
पर पढ़ने का
बिल्कुल भी मन
नहीं हो रहा था

अपने अपने
कर्मो का
मामला होता है

कोई इधर तो
कोई उधर पर
खुद ही
ढो रहा था ।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

उसके जैसा ही क्यों नहीं सोचता शायद बहुत कुछ बचता

हर आदमी
सोच नहीं रहा
अगर तेरी तरह
तो सोचता
क्यों नहीं
जरुर ही कहीं
खोट होगा
तेरी ही सोच में
सोचने की
कोशिश तो
करके देख
जरा सा
सुना है
कोशिश
करने से
भगवान
भी मिले हैं
किसी किसी
को तो
सोच मिलना
तो बहुत
ही छोटी
सी बात है
कभी कहीं
लिखा हुआ
देखा था
किसी ने
सुनाया था
या पढ़ाया था
याद नहीं है
 पर होता
होगा पक्का
क्योंकी हकीम
लुकमान की
सोचने की दवा
बनाने की विधि
में भी कुछ
ऐसा ही लिखा
हुआ साफ
नजर आता है
विश्वास नहीं होता है
तो थोड़ी देर के लिये
पुस्तकालय में जाकर
पढ़ देख कर क्यों
नहीं आ जाता है
बैठा रहता है
फालतू में
जब देखो कहीं भी
कभी भी किसी
बात पर भी
कुछ भी लिख
देने के लिये
कभी तो कुछ
सोच ही लिया कर
जैसा लोग सोचते हैं
देख तो जरा
किसी और की
तरह सोच कर
फिर पता
चलेगा तुझे भी
सोच और सोच
का फरक
क्या पता इसी
सोच की सोच
को अपना
कर कुछ
तू भी कुछ
सुधर जाये
तेरी सोच को कुछ
उनकी सोच
का जैसा ही
कुछ हो जाये
बहुत कुछ बचेगा
जब हर कोई
एक जैसा
ही सोचेगा
उसी सोच
को लेकर
हर कोई कुछ
कुछ करेगा
अच्छा नहीं
होगा क्या
एक के सोचने
के बाद किसी
और को कुछ
भी नहीं
सोचना पड़ेगा
क्योंकि लिख दिया
जायेगा कहीं पर
कि ये सोचा
जा चुका है
कृपया इस पर
सोचने की अब
कोशिश ना करें
कुछ और सोचने से
पहले भी पता करलें
और पूछ लें
कुछ सोचना
है कि नहीं ।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

कर कुछ भी कर बात कुछ और ही कर

कुछ इधर
की बात कर
कुछ उधर
की बात कर

करना बहुत
जरूरी है
बेमतलब
की बात कर

समझ में
कुछ आये
कहा कुछ
और ही जाये
बातों की
हो बस बात
कुछ ऐसी ही
बात कर

इससे करे
तो उसकी
बात कर
उससे करे
तो इसकी
बात कर

जब हों
आमने
सामने
ये वो
तो मौसम
की बात कर

कुछ भी
करना
हो कर
जैसे भी
करना
हो कर

बात करनी
ही पड़े तो
कुछ नियम
की बात कर

थोड़ी चोरी
भी कर
कुछ
बे‌ईमानी
भी कर
बात पूरी
की पूरी
ईमानदारी
की कर

इसके पीने
की कर
उसके पीने
की कर
खुद के
बोतल में
गंगाजल
होने की
बात कर

कहीं भी
आग लगा
जो मन में
आये जला
बात
आसमान
से बरसते
हुऐ पानी
की कर

अपनी भूख
को बढ़ा
जितना खा
सकता है खा
बात भूखे
की कर
बात गरीबों
की कर

 बात
करनी है
जितनी भी
चाहे तू कर
बात करने
पर ही
नहीं लगता
है कर
यहां कोई
बात कर
वहां कोई
बात कर
बाकी पूछे
कोई कभी
कहना ऊपर
वाले से डर ।

शनिवार, 22 जून 2013

कुछ नहीं कुछ बहुत कुछ

कुछ लोग
बहुत थोडे़
शब्दों में
बहुत कुछ
कह ले
जाते हैं
उनके शब्द
उनकी तरह
सुन्दर होते हैं
उनके बारे में
कुछ कहाँ
बता जाते हैं
शब्द मेरे
पास भी
नहीं होते हैं
ना ही मेरी
सोच में ही
आ पाते हैं
किसे बताउँ
क्या बताउँ
कैसे कैसे लोग
क्या क्या कर
ले जाते हैं
कुछ लोग बस
खाली बैठे बैठे
शर्माते हैं
सीख क्यों नहीं
लेते कुछ शब्द
ऎसे जो सब
लोग कह
ले जाते हैं
सब लोग
समझ जाते हैं
सबके आस पास
सब कुछ हो
रहा होता है
हर कोई किसी
चीज पर कुछ
ना कुछ कह
रहा होता है
कुछ लोग वो
सब कुछ क्यों
नहीं देख
ले जाते हैं
जिस पर
लिखने से
लोग शोहरत
पा ले जाते हैं
समान समान में
विलय हो जाता है
सिद्धान्त पढ़ते पढ़ाते
भी कुछ लोग नहीं
समझ पाते हैं
कुछ लोग ही तो
होते हैं जो कुछ
लोगों का कहे को
ही कहा है
कहे जाते हैं
लोग लोग होते हैं
इधर होते हैं या
उधर हो जाते है
कुछ लोग ही
जानते हैं जाने वाले
किधर किधर जाते हैं
बहुत से शब्द
बहुत से लोगों के
पास हो जाने से
कुछ भी नहीं
कहीं होता है
कुछ लोगों के
कुछ शब्द ही
कुछ कहा गया है
कि श्रेणी में
आ पाते हैं
मेरे तेरे और
उसके जैसे लोग
तो आते हैं और
चले जाते हैं
कुछ लोगों के
लिये ही होती हैं
बही कुछ चीजें
उन का लुफ्त
कुछ लोग ही
उठा पाते हैं
कहीं से शुरु कर
कहीं पर खतम
कर के देख ले
आज कल हो
या परसों
कुछ लोग ही
दुनियाँ को
चलाते हैं
बहुत से लोग
मर भी जायें
कुछ लोगों के
लिये से कुछ
नहीं होता है
शहीद कुछ
लोगों में से ही
गिने जाते हैं
कुछ बातें
कुछ लोगों की
कुछ लोग ही
समझ पाते हैं ।

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

कुछ कर

उधर की
मत सोच
आज इधर
को आ

कुछ अलग
सा कर
माहौल बना

गुलाब एक
सोच में
अपनी ला
खुश्बू भीनी
किताब
में दिखा
स्वाद की
रंगीन फोटो
चल बना
प्यार की
फिलम देख
रिश्तों के
धागे सुलझा

ध्यान मत
अब भटका
उधर होने दे
इधर को आ

अपना अपना
सब को
करने दे
तू अपना
भी करवा

कोई किसी
के लिये
नहीं मर
रहा है
तू भी
मत मर
कुछ अलग
सा तो कर

मधुशाला
की सोच
साकी को
सपने में ला
फूलों के
गिलास बुन
पराग की
मय गिरा

टेड़ा हो जा
हरी हरी
दूब बिछा
लुड़क जा

जब देख
रहा है
सब को
बेहोश
अपने होश
भी कभी
तो उड़ा

उनसे अपना
जैसा करवाने
की छोड़
उनका जैसा
ही हो जा

चैन से
बैठ कर
जुगाली कर
चिढ़ मत
कभी चिढ़ा

चल अपना
आज अलग
तम्बू लगा

कर ना
कुछ अलग
तो कर

उसको
उसका
उधर
करने दे
तू कुछ
इधर
अपना
भी कर ।

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