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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

कुर्सियों में बैठ लेने का मतलब बातें करना ही नहीं होता है हमेशा

एक तरफ
रोज ही आकर
बैठ जाना
कुछ लोगों का
एक दूसरे के
अगल बगल की
कुर्सियों में
और
सेंकना दोपहर
की तेज धूप में
सीमेंट के खम्बों
की छाँव को
वो इसलिये नहीं
कि कुर्सियाँ
खाली हैं
और कहीं
बैठने की जगह
भी नहीं है 
उनके लिये 
या फिर वो
सब मित्र हैं
एक दूसरे के
उनकी मजबूरी है
एक दूसरे के
साथ बैठना
और करना
देश और
देशभक्ति
की बातें
या बताना
अपनी अपनी
ईमानदारी की
परी कथाऐं
एक दूसरे को
कोई नहीं
सुनता है
किसी की
सबको कुछ ना
कुछ कहना होता है
कहते रहना होता है
और सबके कान
लगे होते हैं
एक दूसरे के
मुँह से निकलती
हुई बातों में
जैसे पता नहीं
किसी एक क्षण
किसी की जबान
फिसल जाये और
उसके अपने
मतलब का कुछ
निकल कर
हाथ में आ जाये
और दूसरी ओर
कुछ लोग
और होते हैं
जिनको कहीं
बैठना नहीं होता है
बस देखना होता है
कुर्सियों को
पहले खाली
फिर कुछ बैठे
हुऐ लोगों के साथ
रोज ही
जैसे उनके
भविष्य की चिंता
का बोझ लिये हुऐ
कुर्सियाँ लगी होती हैं
बहुत सी खाली
जगहों पर
या इसी तरह
कई और दूसरी
जगहों पर भी
जो रोज रख
दी जाती हैं
सुबह सुबह बाहर
और संभाल
दी जाती है
शाम को  
आने वाले कल
के दिन के लिये
फिर से बाहर
निकाल कर
रखने के लिये ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

सवाल सिस्टम और व्यवस्था का जब बेमानी हो जाता है

कैसे बनेगा
कुछ नया
उस से
जिसके
शब्दों की
रेल में
गिनती के
होते हैं
कुछ
ही डब्बे

और उसी
रेल को
लेकर वो
सफर
करता हो
हमेशा ही
एक इंटरसिटी
की यात्रा
की तरह

अपने घर से
मौहल्ले बाजार
होते हुऐ
शहर की
इस गली से
उस गली में
निकलते हुऐ
वही रोज की
गुड मोर्निंग
वही मुस्कुराहटें

वही पैदल
चलने वालों
को रौंदने
की इच्छा
करते हुऐ
सड़क पर
दौड़ते
दो पहिये
चार पहिये

कुछ कुत्ते
कुछ सांड
कुछ पुलिस
वाले बेचारे
नेताओं की
ओर से
मुँह फेरते हुऐ
बच्चों और
लड़कियों
को सीटी
बजाकर
उनके वाहनो
को खदेड़ने
के करते
हुऐ इशारे

मंदिरों के
सामने से
उनको ढकती
खड़ी होती
सड़क पर
पहँच कर
दुकाने
निकालती
चालीस
फीट उँचाई
के नियम को
तोड़ती बिखेरती
मीनारें

और अंत में
वही रोज
का तालाब
जिसके
किनारे से
लगा होता
है एक बोर्ड
यहाँ मछली
पकड़ना
सख्त मना है

और कोई भी
जहाँ मछली
पकड़ता हुआ
कहीं भी नजर
नहीं आता है

मछलियां
अपने आप
फंसना फंसाना
सीखती है

कोई किसी
से कुछ
नहीं कहता है
या कहो
कहना ही
नहीं चाहता है
या नहीं
कह पाता है
कुर्सियाँभी तो हर
जगह होती
ही हैं
किनारे किनारे
उन पर कोई भी
कभी भी कहीं भी
बैठ जाता है

बस कुछ
गोलियांं
रखता है
अपने पास
सबको बाँटता
चला जाता है

गोली देने में
कोई
जात पात
कोई
ईमान धर्म
भी नहीं
देखा जाता है

सब कुछ
लोकतांंत्रिक
तरीके से
किया जाता है

अब
‘उलूक’
का तो
रोज का
यही काम
रह जाता है

रोज शुरु
करता है
अपनी यात्रा

रोज जाता है
मछलियां
देखता है

और
वापिस भी
आ जाता है

रेल के कुछ
डब्बों को
आगे पीछे
करता हुआ

दूसरे दिन
के लिये
एक रेल
बनाता है

ऐसे में
कोई कैसे
उम्मीद
करता है

कुछ नया
खुद का
बनाया हुआ
रेल का एक
डब्बा ही सही

कोई क्यों नहीं
किसी को
दिखाता है ।

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