http://blogsiteslist.com
कुर्सी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कुर्सी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 2 जून 2017

चोर चोर चिल्लाना शगुन होता है फुसफुसाना ठीक नहीं माना जाता है

महीना
बदलने से
किसने
कह दिया

लिखना
बदल
जाता है

एक
महीने में
पढ़ लिख
कर कहाँ
कुछ नया
सीखा
जाता है

खुशफहमी
हर बार ही
बदलती है
गलतफहमी में

जब भी
एक पुराना
जाता है
और
कोई नया
आता है

कोई तो
बात होती
ही होगी
फर्जियों में

फर्जियों
का पुराना
खाता बिना
आवेदन किये
अपने आप
नया हो
जाता है

कान से
होकर
कान तक
फिसलती
चलती है
फर्जीपने के
हिसाब की
किताबें

फर्जियों
की फर्जी
खबर पर
सीधे सीधे
कुछ
कह देना
बदतमीजी
माना जाता है

बाक्स
आफिस
पर
उछालनी
होती है
फिलम
अगर

बहुत
पुराना
नुस्खा है
और
आज भी
अचूक
माना
जाता है

हीरो के
हाथ में
साफ साफ
मेरा बाप
चोर है
काले रंग में
सजा के
लिखा
जाता है

‘उलूक’
चिड़ियों की
खबरों में भी
कभी ध्यान
लगाता थोड़ा
सा भी  अगर

अब तक
समझ चुका
होता शायद

तोते को
कितना भी
सिखा लो
चोर चोर
चिल्लाना

चोरों के
मोहल्ले में
तो इसी
बात को
कुर्सी में
बैठने का
शगुन माना
जाता है ।

चित्र साभार: Clipart Panda

गुरुवार, 12 मार्च 2015

आदमी की खबरों को छोड़ गधे को गधों की खबरों को ही सूँघने से नशा आता है

अब ये तो नहीं पता
कि कैसे हो जाता है
पर सोचा हुआ
कुछ कुछ आगे
आने वाले समय में
ना जाने कैसे
सचमुच ही
सच हो जाता है
गधों के बीच में
रहने वाला गधा
ही होता है
बस यही सच
पता नहीं हमेशा
सोचते समय कैसे
भूला जाता है
गधों का राजा
गधों में से ही एक
अच्छे गधे को
छाँट कर ही
बनाया जाता है
इसमें कोई गलत
बात नहीं ढूँढी
जानी चाहिये
संविधान गधों का
गधों के लिये
ही होता है
गधों के द्वारा
गधों के लिये ही
बनाया जाता है
तरक्की भी गधों
के राज में गधों
को ही दी जाती है
एक छोटी कुर्सी से
छोटे गधे को
बड़ी कुर्सी में
बैठाया जाता है
छोटी कुर्सी के लिये
एक छोटा मगर
पहले से ही
जनप्रिय बनाया और
लाईन पर लगाया
गधा बैठाया जाता है
सब कुछ सामान्य
सी प्रक्रियाऐं ही
तो नजर आती है
बस ये समझ में
नहीं आ पाता है
जब खबर फैलती है
किसी गधे को
कहीं ऊपर बैठाये
जाने की ‘उलूक’
तुझ गधे को पसीना
आना क्यों
शुरु हो जाता है ?

चित्र साभार: www.clipartof.com

गुरुवार, 6 मार्च 2014

एक अरब से ऊपर के उल्लू हों चार पाँच सौ की हर जगह दीवाली हो

कहाँ जायेगा
कहाँ तक जायेगा
वही होना है
यहाँ भी
जिसे छोड़ कर
हमेशा तू
भाग आयेगा
भाग्य है अरब
से ऊपर की
संख्या का
दो तीन चार
पाँच सौ
के फैसलों पर
हमेशा ही
अटक जायेगा
उधर था वहाँ भी
इतने ही थे
इधर आया
यहाँ भी
उतने ही हैं
फर्क बहुत बारीक है
वहाँ सामने दिखते हैं
यहाँ बस कुछ शब्द
फैले हुऐ मिलते हैं
कुर्सी हर जगह है खाली
हर जगह होती है
वहाँ भी बैठ
लेता है कोई भी
यहाँ भी बैठ
लेता है कोई भी
परिक्रमा करने
वाले हर जगह
एक से ही होते हैं
कुर्सी पर बैठे हुऐ
के ही फैसले ही
बस फैसले होते हैं
कुर्सियां बहुत सी
खाली हो गई होती हैं
मामले गँभीर
सारे शुरु होते हैं
कहीं भी कोई अंतर
नहीं होता है
हर जगह एक
भारतीय होता है
अपने देश में
होता है तो ही
कुछ होश खोता है
दूसरे देश में
होने से ही बस
गजब होता है
इसलिये होता है
कि वहाँ का
कुछ कानून
भी होता है
यहाँ होता है तो
कानून उसकी
जेब में होता है
घर हो आफिस हो
बाजार हो लोक सभा हो
विधान सभा हो
कलाकारों का दरबार हो
ब्लागिंग हो ब्लागरों
का कारोबार हो
एक सा होता है
चाहे अखबारों का
कोई समाचार हो
एक अरब की
जनसंख्या पर
कुछ सौ का ही
कुछ एतबार हो
यहीं होता है
कुछ अनोखा
हर नुक्कड़ पर
जश्ने बहार हो
काँग्रेस हो
चप्पा चप्पा वाली हो
केजरीवाल की
बिकवाली हो
एक अरब से
ऊपर के लोगों को
फिर से वही
चार पाँच सौ के
हाथों ही होने
वाली दीवाली हो
कुर्सी भरी रहे
किसने भरी
किससे भरी
मेज को कौन सी
परेशानी कहीं भी
होने वाली हो
हर किसी के
लिखने के अंदाज
का क्या करेगा
“उल्लूक”
तेरी कलम से
निकलने वाली
स्याही ही कुछ
अजीब रंग जब
दिखाने वाली हो ।

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

हर खाली कुर्सी में बैठा नहीं जाता है

आँख में बहुत मोटा
चश्मा लगाता है
ज्यादा दूर तक
देख नहीं पाता है
लोगों से ही
सुनाई देता है
चाँद देखने के लिये
ही आता जाता है
वैसे किसी ने नहीं
बताया कभी आसमान
की तरफ ताकता हुआ
भी कहीं पाया जाता है
कोई क्यों परेशान
फिर हुआ जाता है
अपने आने जाने
की बात अपनी
घरवाली से कभी
नहीं छुपाता है
अपने अपने ढंग से
हर कोई
जीना चाहता है
कहाँ लिखा है
किसी किताब में
काम करने
की जगह पर
इबादत करने को
मना किया जाता है
छोटी छोटी बातों के
मजे लेना सीख
क्यों जान बूझ कर
मिर्ची लगा सू सू करने
की आदत बनाता है
क्या हुआ अगर कोई
अपनी कुर्सी लेकर ही
कहीं को चला जाता है
अपनी अपनी किस्मत है
जिस जगह बैठता है
वही हो जाता है
तुझे ना तो किसी
चाँद को देखना है
ना चाँद तेरे जैसे को
कभी देखना चाहता है
रात को बैठ लिया कर
घर की छत में
आसमान वाला चाँद
देखने के लिये कोई
कहीं टिकट
नहीं लगाता है
धूनी रमा लिया कर
कुर्सी में बैठना
सबके बस की
बात नहीं होती है
और फिर हर
किसी को कुर्सी पर
बैठने का तमीज
भी कहाँ आ पाता है ।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

दीमकों में से हो और दीमक नहीं हो नहीं होता है !


दीमकों का
काम ही होता
है कुतरना
उसी काम को
वो करते जा रहे हैं
सारे दीमक कुतरने
में लगे हुऎ हैं जब
एक निकाय को
हे दीमक तेरे रंग ढंग
मेरी समझ में तो
नहीं आ रहे हैं
दीमक है दीमकों के
बीच में रहता है
दीमक हूँ भी हमेशा
से खुद ही कहता है
फिर वो कौन लोग हैं
जो तुझ को तेरे
पेशे से ही दूर
ले जा रहे हैं
ऎसी अजीब सी
हरकत तुझसे
पता नहीं क्यों
करवा रहे हैं
लगता है दीमकों की
रानी का नहीं होना
तेरे कदमों को पीछे
को ले जा रहे हैं
समझता क्यों नहीं
राजतंत्र अब बचा नहीं
दीमक ही उसे कुतर
कर दफना कर
के आ रहे हैं
दीमकतंत्र का आह्वान
किया जा चुका है
दीमकों की बीच
से ही एक को
दीमकों की रानी की
कुर्सी में बैठाया
भी जा चुका है
दीमक अब दीमकतंत्र
को फैला रहे हैं
उसी का बाजा
बजा रहे हैं
उसी को खाये
भी जा रहे हैं
दीमक हैं और
दीमकों के जैसे
कामों को ही
तो कर रहे हैं
खुद कुतर रहे हैं
कुतरने के काम ही
करवाऎ जा रहे हैं
ये सब तो आम
सी ही बातें हैं
इस को हम कहाँ
किसी को समझाने
को जा रहे हैं
पर दीमकों मे से
एक दीमक इतना
ऎबनार्मल हो जायेगा
बस यही बात
अपने गले के नीचे
नहीं उतार पा रहे हैं
समझता क्यों नहीं
कुतरने का काम तो
चलता ही चला जायेगा
निकाय को गिरना ही
है एक दिन वो गिर कर
जमीन पर आ ही जायेगा
दीमकों ने कुतर कुतर
के खा दिया है अंदर से
किसी को कहाँ ये सब
पता चल पायेगा
गिरने से पहले ही
हर दीमक भाग कर
दूसरी नयी जगह पर
जब पहुँच जायेगा
ना तेरा नाम होगा
नहीं कुतरने वालों में
ना कुतरने वालों को
ही कहीं गिना जायेगा
वो सब भी दीमक ही रहेंगे
तुझे भी दीमकों में
ही गिना जायेगा
आपदा के नाम से
किसी के हाथ में एक
कटोरा जरूर आ जायेगा
दीमकों को कहीं
और कुतरने के काम
के लिये भेज दिया जायेगा
तू कुतर तू ना कुतर
तुझे दीमक ही तो
तब भी कहा जायेगा
सारे दीमक लगे हैं
जब कुतरने में
कोई इतना समय
कहाँ निकाल पायेगा
फिर ये बात पता नहीं
कौन आ कर तुझे
इस समय समझायेगा
हे दीमक तू दीमक था
दीमक है दीमक ही रहेगा
दीमक ही एक कहलायेगा ।

गुरुवार, 8 मार्च 2012

सबक

मायूस क्यों
होता है भाई
कुर्सी तेरे
आदमी तक
अगर नहीं
पहुंच पायी

तू लगा था
सपने देखने मे
तेरे हाथ भी
कभी एक
स्टूल आ
ही जायेगा
शेखचिल्ली
बनेगा तो
आगे भी जमीन
पर ही आयेगा
आसमान
से गिरेगा
खजूर में
अटक जायेगा

इधर तू दूल्हा
सजा रहा था
उधर तेरा
ही रिश्तेदार
कुर्सी
खिसका रहा था

कहा गया है
कई बार
जिसका काम
उसी को साजे
और करे
तो ठेंगा बाजे

अब भी
सम्भल जा
उस्तरा उठा
और
सम्भाल अपनी
दुकान को
नाई था
नाई हो जा
नेता जी
की दुकान
सजाने अब
तो नहीं जा

कुर्सी सबके
नसीब में होती
तो मैने भी
पैदा होते ही
एक मेज
खरीद ली होती

नाई
दुकानदार
हलवाई
सब अपनी
अपनी जगह
ठीक लगते
हैं भाई

इतिहास
गवाह है
जिस दिन
मास्टर बंदूक
उठाता है
शेर के
शिकार
पर जाना
चाहता है
गोली पेड़
की जड़ मे
लगी हुवी
पाता है
और
मुंह की
खाता है

नेता को
नेतागिरी
अब तो
मत सिखा
लौट के
दुकान पर आ
उस्तरा उठा
शुरू हो जा।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

रिटायर्ड चपरासी

गुरु जी झूट नहीं बोलुंगा
आपसे तो कम से कम नहीं
बस एक पव्वा ही लगाया है
बिना लगाये जाओ तो
काम नहीं हो पाता है
साहब कुछ समझता ही नहीं
डाँठता चला जाता है
खुश्बू लगा के जाओ तो
कुर्सी में बैठाता है
तुरत फुरत पी ए
को बुलाता है
थोड़ा नाक सिकौड़
कर फटाफट दस्तखत
कर कागज लौटाता है
भैया अगर खुश्बू से
काम चल ही जाता है
तो फिर छिड़क
कर जाया करो
पी के अपने स्वास्थ
को ना गिराया करो
दिन में ही
शुरू हो जाओगे
तो कितने
दिन जी पाओगे
गुरू जी आप तो
सब जानते हैं
बड़े बड़े आपका
कहना मानते हैं
पर ये लोग बहुत
खिलाड़ी होते हैं
शरीफ आदमी इनके
लिये अनाड़ी होते हैं
एक दिन मैने
एसा ही किया था
कोट पर थोड़ा
गिरा कर दारू
साहब के पास
चला गया था
साहब ने उस
दिन कोट मुझसे
तुरंत उतरवाया था
दिन दोपहरी धूप में मुझे
दिन भर खड़ा करवाया था
तब से जब भी
पेंशन लेने जाता हूँ
अपने अंदर ही भर
कर ले जाता हूँ
मेरे अंदर की खुश्बू
कैसे सुखा पायेगा
खड़ा रहूँगा जब तक
सूंघता चला जायेगा
उसे भी पीने की
आदत है वो कैसे
खाली खुश्बू सूंघ पायेगा
तुरंत मेरा काम वो करवायेगा
मेरा काम भी हो जायेगा
उसको भी चैन आ जायेगा।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...