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शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

लिखने में अभी उतना कुछ नहीं जा रहा है

सभी के आसपास 
इतना कुछ होता है
जिसे वो अगर
लिखना चाहे तो
किताबें लिख सकता है
किसी ने नहीं कहा है
सब पर लिखना
जरूरी होता है
अब जो लिखता है
वो अपनी सोच
के अनुसार ही
तो लिखता है
ये भी जरूरी नहीं
जो जैसा दिखता है
वो वैसा ही लिखता है
दिखना तो ऊपर वाले
के हाथ में होता है
लिखना मगर अपनी
सोच के साथ होता है
अब कोई सोचे कुछ और
और लिखे कुछ और
इसमें कोई भी कुछ
नहीं कर सकता है
एक जमाना था
जो लिखा हुआ
सामने आता था
उससे आदमी की
शक्लो सूरत का भी
अन्दाज आ जाता था
अब भी बहुत कुछ
बहुतों के द्वारा
लिखा जा रहा है
पर उस सब को
पढ़कर के लिखने
वाले के बारे में
कुछ भी नहीं
कहा जा रहा है
अब क्या किया जाये
जब जमाना ही नहीं
पहचाना जा रहा है
एक गरीब होता है
अमीर बनना नहीं
बल्की अमीर जैसा
दिखना चाहता है
सड़क में चलने से
परहेज करता है
दो से लेकर चार
पहियों में चढ़ कर
आना जाना चाहता है
उधर बैंक उसको
उसके उधार के
ना लौटाने के कारण
उसके गवाहों को
तक जेल के अंदर
भिजवाना चाहता है
इसलिये अगर कुछ
लिखने के लिये
दिमाग में आ रहा है
तो उसको लिखकर
कहीं भी क्यों नहीं
चिपका रहा है
मान लिया अपने
इलाके में कोई भी
तुझे मुँह भी
नहीं लगा रहा है
दूसरी जगह तेरा लिखा
किसी के समझ में
कुछ नहीं आ रहा है
तो भी खाली परेशान
क्यों हुऎ जा रहा है
खैर मना अभी भी
कहने पर कोई लगाम
नहीं लगा रहा है
ऎसा भी समय
देख लेना जल्दी ही
आने जा रहा है
जब तू सुनेगा
अखबार के
मुख्यपृष्ठ में
ये समाचार
आ रहा है  
गांंधी अपनी
लिखी किताब
“सत्य के साथ 

किये गये प्रयोग “
के कारण मृ्त्योपरांत
एक सदी के लिये
कारावास की सजा
पाने जा रहा है ।

शुक्रवार, 14 जून 2013

दिशा है अगर तो है दिशाहीन

दिशा लेकर चलता है
बस वो एक ही
अकेला होता है
दिशाहीनो का तो
एक मसीहा होता है
मेरे घर में होता है
और ऎसा होता है
कहने को हर कोई
बहुत कुछ कहता है
जो करना ही
नहीं होता है
वही तो वो कहता है
मेरी बात पर तू कभी
कुछ नहीं कहता है
तेरे घर में क्या
ये नहीं होता है
मेरे घर के मुखिया
को सब पता होता है
जब भी कुछ होता है
तो वो कहीं भी
नहीं होता है
देश में पल पल
जो हो रहा होता है
वही सब मेरे घर में
घट रहा होता है
कोई गांधी और
कोई गोडसे
की दुहाई दे
रहा होता है
कोई पटेल
के नाम का
लोहा ले
रहा होता है
जो जो कह
रहा होता है
वो कहीं नहीं
हो रहा होता है
मेरे घर में रोज
ऎसा ही हो
रहा होता है
तेरे घर में
बता भी दिया
कर कभी
क्या कुछ स्पेशल
हो रहा होता है
मैं रोज अपने घर
की बात करता हूँ
फिर भी तू
कुछ कहाँ कह
रहा होता है
मेरे देश में कैसे
मान लू कुछ
अलग हो
रहा होता है
जब मेरे ही
घर में रोज
ऎसा ही हो
रहा होता है ।

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

निपट गये सकुशल कार्यक्रम

गांंधी जी और शास्त्री जी
दो एक दिन से एक बार
फिर से इधर भी और
उधर भी नजर आ रहे थे
कल का पूरा दिन
अखबार टी वी समाचार
कविता कहानी और
ब्लागों में छा रहे थे
कहीं तुलना हो रही थी
एक विचार से
किसी को इतिहास
याद आ रहा था
नेता इस जमाने का
भाषण की तैयारी में
सत्य अहिंसा और
धर्म की परिभाषा में
उलझा जा रहा था
सायबर कैफे वाले से
गूगल में से कुछ
ढूंंढने के लिये गुहार
भी लगा रहा था
कैफे वाला उससे
अंग्रेजी में लिख कर
ले आते इसको

कहे जा रहा था
स्कूल के बच्चों को भी
कार्यक्रम पेश करने
को कहा जा रहा था
पहले से ही बस्तों से
भारी हो गई
पीठ वालो का दिमाग
गरम हुऎ जा रहा था
दो अक्टूबर की छुट्टी
कर के भी सरकार को
चैन कहाँ आ रहा था
हर साल का एक दिन
इस अफरा तफरी की
भेंट चढ़ जा रहा था
गुजरते ही जन्मोत्सव
दूसरे दिन का सूरज
जब व्यवस्था पुन:
पटरी पर  होने का
आभास दिला रहा था
मजबूरी का नाम
महात्मा गांंधी होने का
मतलब एक बार फिर
से समझ में आ रहा था ।

शुक्रवार, 8 जून 2012

चल मुँह धो कर के आते हैं

अपनी भी कुछ
पहचान चलो
आज बनाते हैं

चल मुँह धो कर के आते हैं

मंजिल तक
पहुंचने के
लम्बे रास्ते
से ले जाते हैं
कुछ राहगीरों
को आज राह
से भटकाते हैं

चल मुँह धो 
कर के आते हैं

चलचित्र 'ए'
देखने का
माहौल बनाते हैं
उनकी आहट
सुनते ही
चुप हो जाते हैं
बात बदल कर
गांंधी की
ले आते हैं

चल मुँह धो 
कर के आते हैं

बूंद बूंद से
घड़ा भर जाये
ऎसा कोई
रास्ता अपनाते हैं
चावल की
बोरियों में छेद
एक एक
करके आते हैं

चल मुँह धो 
कर के आते हैं

अन्ना जी से
कुछ कुछ
सीख  कर
के आते हैं
सफेद टोपी
एक सिलवाते हैं

चल मुँह धो कर के आते हैं

किसी के कंधे
की सीड़ी
एक बनाते हैं
ऊपर जाकर
लात मारकर
उसे नीचे
गिराते हैं
सांत्वना देने
उसके घर
कुछ केले ले
कर जाते हैं

चल मुँह धो कर के आते हैं

देश का बेड़ा
गर्क करने की
कोई कसर कहीं
नहीं छोड़
कर के जाते हैं
भगत सिंह की
फोटो छपवा
कर के बिकवाते हैं
चल मुँह धो कर के आते हैं

एक रुपिया
सरकारी खाते
में जमा करके
बाकी निन्नानबे घर
अपने पहुंचवाते हैं
चल मुँह धो कर के आते हैं

अपनी भी
कुछ पहचान
चलो आज
बनाते हैं

चल मुँह धो कर के आते हैं।

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