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सोमवार, 11 अप्रैल 2016

आदत है उलूक की मुँह के अंदर कुछ और रख बाहर कुछ और फैलाने की



चर्चा है कुछ है
कुछ लिखने की है
कुछ लिखाने की है
टूटे बिखरे पुराने
बेमतलब शब्दों
की जोड़ तोड़ से
खुले पन्नों की
किताबों की 
एक दुकान को
सजाने की है
शिकायत है
और बहुत है
कुछ में से भी
कुछ भी नहीं
समझा कर
बस बेवकूफ
बनाने की है
थोड़ा सा कुछ
समझ में आने
लायक जैसे को भी
घुमा फिरा कर
सारा कुछ लपेट
कर ले जाने की है
चर्चा है गरम है
असली खबर के
कहीं भी नहीं
आने की है
आदमी की बातें हैं
कुछ इधर की हैं
कुछ उधर की हैं
कम नहीं हैं
कम की नहीं हैं
बहुत हैं बहुत की हैं
मगर आदमी के लिये
उनको नहीं
बना पाने की है
कहानियाँ हैं लेकिन
बेफजूल की हैं
कुछ नहीं पर भी
कुछ भी कहीं पर भी
लिख लिख कर
रायता फैलाने की है
एक बेचारे सीधे साधे
उल्लू का फायदा
उठा कर हर तरफ
चारों ओर उलूकपना
फैला चुपचाप झाड़ियों
से निकल कर
साफ सुथरी सुनसान
चौड़ी सड़क पर आ कर
डेढ़ पसली फुला
सीना छत्तीस
इंची बनाने की है
चर्चा है अपने
आस पास के
लिये अंधा हो
पड़ोसी  के लिये
सी सी टी वी
कैमरा बन
रामायण गीता
महाभारत
लिख लिखा
कर मोहल्ला रत्न
पा लेने के जुगाड़ में
लग जाने की है
कुछ भी है सब के
बस की नहीं है
बात गधों के
अस्तबल में रह
दुलत्ती झेलते हुए
झंडा हाथ में
मजबूती से
थाम कर जयकारे
के साथ चुल्लू
भर में डूब
बिना तैरे तर
जाने की है
मत कहना नहीं
पड़ा कुछ
भी पल्ले में
पुरानी आदत
है
उलूक की
बात मुँह के अंदर
कुछ और रख
बाहर कुछ और
फैलाने की है ।

चित्र साभार:
www.mkgandhi.org

बुधवार, 12 अगस्त 2015

‘उलूक’ की आदत है लिखे जा रहा है क्या फर्क पड़ता है कौन पढ़ने आ रहा है

बहुत सुकून सा
महसूस हो रहा है
वो सब देख कर जो
सामने से हो रहा है
जो हो रहा है वही
सब कुछ दिखाया
भी जा रहा है
उसी हो रहे के बारे में
बताया भी जा रहा है
गरम चर्चाऐं हैं बहस हैं
हो रहे में से ही कुछ को
बुलाया भी जा रहा है
हो क्या रहा है
ये अपना बता रहा है
उसने भी बताना है
वो भी बता रहा है
समझाने बुझाने में
कोई नहीं आ रहा है
अच्छा है हो रहा है
हो रहा है और हुऐ
भी जा रहा है
हो रहे को कोई रोक
भी नहीं पा रहा है
इस सब में सबको
ही मजा आ रहा है
बताने वाले के पास
काम हो जा रहा है
दिखाने वाला भी
सब दिखा रहा है
देखने वाले देख रहे हैं
जो जो जब से
हुआ जा रहा है
इस होने में वैसे कोई
नई बात भी नहीं
हुई जा रही है
पहले भी हुआ करती थी
पता तक नहीं चलता था
कोई परदा लगा रहा है
परदे में सालों साल
चलता रहने वाला अब
परदे फाड़ कर परदों से
बाहर आ रहा है
अच्छा संकेत है
देश अच्छी दिशा
में जा रहा है
‘उलूक’ की आदत है
लिखे जा रहा है
क्या फर्क पड़ता है
कौन पढ़ने आ रहा है ।

चित्र साभार: www.ndtv.com

सोमवार, 1 जून 2015

बुद्धिजीवियों के शहर में चर्चा है किताबों की का कुछ शोर हो रहा है

भाई बड़ा गजब हो रहा है
कोई कुछ भी नहीं कह रहा है
फुसफुसा कर कहा
बुद्धिजीवियों से भरे
एक शहर के एक बुद्धिजीवी ने
बगल में बैठे दूसरे बुद्धिजीवी से
चिपकते चिपकते हुऐ कान
के पास मुँह लगाते हुऐ
बहुत बुरा
सच में बहुत बुरा हो रहा है
बड़ा ही गजब हो रहा है
मैं भी देख रहा हूँ
कई साल से यहाँ पर
बहुत कुछ हो रहा है
समझ भी नहीं पा रहा हूँ
कोई कुछ भी क्यों
नहीं कह रहा है
एक ने सुनते ही
दूसरे का जवाब
जैसे ही लगा उसे
उसका तीर निशाने
पर लग रहा है
दुबारा फुसफुसा कर कहा
सुनो
सुना है कल शहर में
कुछ बाहर के शहर के
बुद्धिजीवियों का कोई
फड़ लग रहा है
किताबों पर किसी
लिखने लिखाने वाले की
कोई चर्चा कर रहा है
फुसफुसाते क्यों नहीं
तुम वहाँ जा कर कि
यहाँ हो रहा है और
गजब हो रहा है
कितनी अजीब सी
बात है देखिये तो जरा
हर कोई एक दूसरे के
कान में जा जा कर
फुस फुस कर रहा है
कोई किसी से कुछ
नहीं कह रहा है
कुछ आप ही कह दें
इस पर जरा जोर
कुछ लगाकर
यहाँ तो फुसफुसाहट
का ही बस जोर हो रहा है ।

चित्र साभार: www.clipartreview.com

बुधवार, 13 जून 2012

कुछ तो सीख

रसोईया मेरा बहुत अच्छे
गाने सुनाता है
तबला थाली से ही
बजा ले जाता है
बस कभी कभी
रोटियां जली जली
सी खिलाता है
अखबार देने एक
ऎसा आदमी आता है
ना कान सुनता है
ना ही बोल पाता है
हिन्दुस्तान डालने को
अगर बोल दिया
उस दिन पक्का
टाईम्स आफ इंडिया
ले कर आ जाता है
लेकिन दांत बहुत ही
अच्छी तरह दिखाता है
बरतन धोने को जो
महिला आती हैं
छ : सिम और एक
मोबाईल दिखाती है
आते ही चार्जर को
लाईन में घुसाती है
उसके आते ही
घंटियाँ बजनी शुरु
घर में हो जाती हैं
बरतनो में खाना
लगा ही रह जाता है
पानी मेरी टंकी का
सारा नाली में बह
के निकल जाता है
मेहमान मेरे घर
में जब आते हैं
अभी तक मास्टर
ही हो क्या
पूछते हैं फिर
मुस्कुराते हैं
कुछ अब कर
भी लीजिये जनाब
की राय मुझे
जाते जाते जरूर
दे के जाते हैं
अब कुछ उदाहरण
ही यहाँ पर बताता हूँ
चर्चा को ज्यादा लम्बा
नहीं बनाता हूँ
बाकी लोगों के
कामों की लिस्ट
अगले दिन के
लिये बचाता हूँ
पर इन सब से
पता नहीं मैं
अभी तक भी
कुछ भी क्यों नहीं
सीख पाता हूँ।

मंगलवार, 1 मई 2012

"चर्चा जारी है"

बहुत वाद
विवाद
के बाद
कुछ निकल
कर के आया

एक वक्ता
ने बताया

बंदरों की
शक्लों में
समय
के साथ

किस
तरह का
परिवर्तन
है आया

शहर में
आजकल
हर मुहल्ले
के बंदर
अलग अलग
सूरतों के
नजर आ रहे हैं

आदतों में भी
किसी मुहल्ले
वासी से मेल
नहीं खा रहे हैं

जबकि
देखा गया है
अफ्रीका के
बंदर अफ्रीकी

योरोप के
बंदर यूरोपी

भारत के बंदर
भारतीय
जैसे ही
दिखाई
दिया करते हैं

जैसा जनता
करती है
वैसा ही
वहां के
बंदर भी
ज्यादातर
किया करते हैं

कोई
ठोस उत्तर
जब कोई
नहीं दे पाया

तो इस विषय
को अगली
संगोष्ठी में
उठाया जायेगा
करके
किसी ने बताया

वैसे भी
इस बार
थोड़ी
जल्दीबाजी
के कारण

बंदरों का
प्रतिनिधि
शरीक
नहीं हो पाया

बंदरों की
तरफ से
कोई जवाब
किसी ने भी
दाखिल
नहीं कराया।

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