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रविवार, 17 सितंबर 2017

इतना दिखा कर उसको ना पकाया करो कभी खुद को भी अपने साथ लाया करो

अपना भी
चेहरा कभी
ले कर के
आया करो


अपनी भी
कोई एक
बात कभी
आकर
बताया करो

पहचान चेहरे
की चेहरे से
होती है हजूर

एक जोकर को
इतना तो ना
दिखाया करो

बहुत कुछ
कहने को
होता है पास में
खुशी में भी
उतना ही
जितना उदास में

खूबसूरत हैं आप
आप की बातें भी
अपने आईने में
चिपकी तस्वीर
किसी दिन
हटाया करो

खिलौनों से
खेल लेना
जिन्दगी भर
के लिये
कोई कर ले
इस से अच्छा
कुछ भी नहीं
करने के लिये

किसी के
खिलौनों
की भीड़ में
खिलौना हो
खो ना
जाया करो

कहानियाँ
नहीं होती हैं
‘उलूक’ की
बकबक

बहके हुऐ
को ना
बहकाया करो

उसकी बातों
में अपना घर
इतना ना
दिखवाया करो

अपनी ही
आँखों से
अपना घर
देख कर के
आया करो।

चित्र साभार: CoolCLIPS.com

बुधवार, 30 नवंबर 2016

समीकरण

गणित
नहीं पढ़ी है
के बहाने
नही चलेंगे
समीकरण
फिर भी
पीछा नहीं
छोड़ेंगे

समीकरण
नंगे होते हैं

अजीब
बात है
समीकरण
तक तो
ठीक था
ये नंगे होना
समीकरण का
समझ में
नहीं आया

आयेगा
भी नहीं
गणित के
समीकरण में
क या अ
का मान
हल करके
आ जाता है
हल एक भी
हो सकता है
कई बार
एक से
अधिक भी
हो जाता है

आम
जिंदगी के
समीकरण
आदमी के
चाल चलन
के साथ
चलते हैं

नंगे आदमी
एक साथ
कई समीकरण
रोज सुबह
उठते समय
साबुन के साथ
अपने चेहरे
पर मलते हैं

समीकरण
को संतुष्ठ
करता आदमी
भौंक भी
सकता है
उसे कोई
कुत्ता कहने
की हिम्मत
नहीं कर
सकता है

समीकरण
से अलग
बैठा दूर
से तमाशा
देखता
क या अ
पागल बता
दिया जाता है

आदमी
क्या है
कैसा है
उसे खुद
भी समझ
में नहीं
आता है

सारे
समीकरणों
के कर्णधार
तय करते हैं
किस कुत्ते
को आदमी
बनाना है
और
कौन सा
आदमी खुद
ही कुत्ता
हो जाता है

जय हो
सच की
जो दिखाया
जाता है

‘उलूक’
तू कुछ भी
नहीं उखाड़
सकता
किसी का
कभी भी
तेरे
किसी भी
समीकरण
में नहीं होने
से ही तेरा
सपाट चेहरा
किसी के
मुँह देखने
के काम
का भी
नहीं रह
जाता है ।

चित्र साभार: Drumcondra IWB - Drumcondra Education Centre

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

शुतुरमुर्ग और शुतुरमुर्ग

कम नहीं हैं
बहुत हैं
चारों तरफ हैं
 फिर भी
मानते नहीं हैं
कि हैं
हो सकता है
नहीं भी होते हों
उनकी सोच में वो
बस सोच की
ही तो बात है
देखने की
बात है ही नहीं
हो भी नहीं
सकती है
जब गर्दन
किसी भी
शुतुरमुर्ग की
रेत के अन्दर
घुसी हुई हो
कितनी अजीब
बात है
है ना
आँख वाले
के पास देखने
का काम
जरा सा भी
ना हो
और सारे
शुतुरमुर्गों
के हाथ में
हो सारे देखने
दिखाने के
काम सारे
सभी कुछ
गर्दन भी हो
चेहरा भी हो
जो भी हो
घुसा हुआ हो
और
चारों तरफ
रेत हो
बस रेत
ही रेत हो
शुतुरमुर्ग
होने मे कोई
बुराई नहीं है
शुतुरमुर्ग होने
के लिये कहीं
मनाही नहीं है
कुछ होते ही हैं
शुतुरमुर्ग
मानते भी हैं
कि हैं
मना भी
नहीं करते हैं
शुतुरमुर्ग की
तरह रहते भी हैं
मौज करते हैं 
बेशरम शुतुरमुर्ग
नहीं कह सकते हैं
अपनी मर्जी से
रेत में गर्दन भी
घुसा सकते हैं
ईमानदार होते हैं
देखने दिखाने
और बताने का
कोई भी ठेका
नहीं लेते हैं
‘उलूक’
बकवास करना
बंद कर
गर्दन खींच
और घुसेड़ ले
जमीन के अन्दर
और देख
बहुत कुछ
दिखाई देगा
शुतुरमुर्गो
नाराज मत होना
बात शुतुरमुर्गों
की नहीं हो रही है
बात हो रही है
देखने दिखाने
और
बताने की
गर्दन घुसेड़ कर
रेत के अन्दर ।

चित्र साभार: www.patheos.com

बुधवार, 11 मई 2016

किसे पड़ी है तेरे किसी दिन कुछ नहीं कहने की उलूक कुछ कहने के लिये एक चेहरा होना जरूरी होता है

लिखा हुआ हो
कहीं पर भी हो
कुछ भी हो

देख कर उसे
पढ़ना और
समझना

हमेशा जरूरी
नहीं होता है

कुछ कुछ
खराब हो चुकी
आँखों को
खुली रख कर
जोर लगा कर
साफ साफ
देखने की
कोशिश करना

कुछ दिखना
कुछ नहीं दिखना
फिर दिखा दिखा
सब दिख गया कहना

कहने सुनने सुनाने
तक ही ठीक होता है

सुना गया सब कुछ
कितना सही होता है
सुनाई देने के बाद
सोचना जरूरी
नहीं होता है 


रोजाना कान की
सफाई करना
ज्यादातर लोगों
की आदत में
वैसे भी शामिल
नहीं होता है

लिखने लिखाने
से कुछ होना है
या नहीं होना है

लिखने वाले
कौन है और
लिखे को पढ़ कर
लिखे पर सोचने
लिखे पर कुछ
कहने वाले कौन हैं

या
किसने लिखा है
क्या लिखा है

लिख दिया है
बताने वाले
लोगों को
सारा लिखा
पता होना
जरूरी
नहीं होता है

लेखक लेखिका
का पोस्टर
लगा कर
दुकान खोल
लेने से
किताबें बिकना
शुरु होती भी हैं

तब भी
हर दुकान
का रजिस्ट्रेशन
लेखक के नाम से
हर जगह होना
होता है
या
नहीं होता है
किसे पता होता है

लिखने
लिखाने वाला

लिखने की
दुकान के
शटर खोलने की
आवाज के
साथ उठता है
शटर गिराने की
आवाज के
साथ सोता है

कौन जानता है
ऐसा भी होता है
या नहीं होता है

अपनी अपनी
किताबें संभाले
हुए लोगों को
आदत पड़
चुकी होती है

अपना लिखा
अपने आप
पढ़नें की

खुद समझ कर
खुद को खुदी
समझा ले जाना
खुदा भी समझ
पाया है या नहीं
खुदा ही जानता है
सब को पता हो
ये भी जरूरी
नहीं होता है

किसी के कुछ
लिखे को नकार
देने की हिम्मत
सभी में
नहीं होती है

पूछने वाले
पढ़ते हैं
या नहीं
पता नहीं
भी होता है

प्रश्न करना
इतना जरूरी
नहीं होता है

लिखना कुछ भी
कहीं भी कभी भी
इतना जरूरी होता है ?

दुनियाँ चलती है
चलती रहेगी
हर आदमी खरीफ
की फसल हो
जरूरी कहीं
थोड़ा सा होता है
कहीं जरा सा
भी नहीं होता है

फारिग हो कर
आया हर कोई
कहे जरूरी है
जमाने के
हिसाब से
खेत में जाना
इस जमाने में
अब जरूरी नहीं
थोड़ा नहीं 

बहुत ही
खतरनाक 

होता है

सफेद पन्ना 

दिखाने
के लिये 

रख 
काफी है
‘उलूक’
लिखा 

लिखाया
काला 

सब
सफेद 

होता है ।

 चित्र साभार: www.pinterest.com

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

जो जैसा था वैसा ही निकला था गलती सोचने वाले की थी उसकी सोच का पैर अपने आप ही फिसला था

भीड़ वही थी
चेहरे वही थे
कुछ खास
नहीं बदला था
एक दिन इसी
भीड़ के बीच
से निकल कर
उसने उसको
सरे आम एक
चोर बोला था
सबने उसे कहते
हुऐ देखा
और सुना था
उसके लिये उसे
इस तरह से
ऐसा कहना
सुन कर बहुत
बुरा लगा था
कुछ किया
विया तो नहीं था
बस उस कहने
वाले से किनारा
कर लिया था
पता ही नहीं था
हर घटना की तरह
इस घटना से भी
जिंदगी का एक नया
सबक नासमझी का
एक बार फिर
से सीखना था
सूरज को हमेशा
उसी तरह सुबह
पूरब से ही
निकलना था
चाँद को भी हमेशा
पश्चिम में जा
कर ही डूबना था
भीड़ के बनाये
उसके अपने नियमों
का हमेशा की तरह
कुछ नहीं होना था
काम निकलवाने
के क्रमसंचय
और संयोजन को
समझ लेना इतना
आसान भी नहीं था
मसला मगर बहुत
छोटा सा एक रोज
के होने वाले मसलों
के बीच का ही
एक मसला था
आज उन दोनों का
जोड़ा सामने से ही
हाथ में हाथ
डाल कर
जब निकला था
कुछ हुआ था या
नहीं हुआ था
पता ही नहीं
चल सका था
भीड़ वही थी
चेहरे वही थे
कहीं कुछ हुआ भी है
का कोई भी निशान
किसी चेहरे पर
बदलता हुआ
कहीं भी नहीं दिखा था
‘उलूक’ ने
खिसियाते हुऐ
हमेशा की तरह
एक बार फिर
अपनी होशियारी
का सबक
उगलते उगलते
अपने ही थूक के साथ
कड़वी सच्चाई
की तरह
ही निगला था ।

चित्र साभार: davidharbinson.com

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

कल फोड़ने के लिये रखे गये पठाकों को कोई पानी डाल डाल कर आज धो रहा है

फेशियल किया हुआ
एक एक चेहरा
चमक चमक कर
फीका होना
शुरु हो रहा है
उन सब चेहरों
पर सब कुछ
जैसे बिना जले
भी धुआँ धुआँ
सा हो रहा है
नजर फिसलना
शुरु हो गई है
चेहरे से
चेहरे के ऊपर
रखा हुआ चेहरा
देखना ही
दूभर हो रहा है
दिखने ही
वाला है सच में
सच का झूठ
और झूठ का सच
ऐसा जैसा ही
कुछ हो रहा है
ऐसे के साथ
वैसा ही कुछ कुछ
अब बहुत साफ साफ
दिखाई भी दे रहा है
उधर खोद चुके हैं
खाई खुद के लिये
इधर भूल गये शायद
उनका अपना ही
खोदा हुआ कुआँ
भरा भरा सा हो रहा है
उड़ गई है नींद रातों की
कोई कह नहीं पा रहा है
परेशान हो कर
दिन में ही कहीं
किसी गली में
खड़े खड़े बिजली के
खम्बे से सहारा
ले कर सो रहा है
गिर पड़ा है मुखौटा
शेर का मुँह के ऊपर से
बिल्ले ने लगाया हुआ है
साफ साफ पता
भी हो रहा है
सिद्धांतो मूल्यों की जगह
गाली गलौच करना
बहुत जरूरी हो रहा है
बहुत ज्यादा हो गया
बहुत कुछ उस की ओर को
अब इसकी ओर भी कुछ
होने का अंदेशा हो रहा है
जो भी हो रहा है ‘उलूक’
तेरे हिसाब से बहुत ही
अच्छा हो रहा है
दो चार दिन की बात है
पता चल ही जायेगा
दीदे फाड़ कर
बहुत हंसा वो
अब दहाड़े मार मार
कर रो रहा है ।

चित्र साभार: www.123rf.com

सोमवार, 17 नवंबर 2014

खुद का आईना है खुद ही देख रहा हूँ

अपने आईने
को अपने
हाथ में लेकर
घूम रहा हूँ

परेशान होने
की जरूरत
नहीं है
खुद अपना
ही चेहरा
ढूँढ रहा हूँ

तुम्हारे
पास होगा
तुम्हारा आईना
तुमसे अपने
आईने में कुछ
ढूँढने के लिये
नहीं बोल रहा हूँ

कौन क्या
देखता है जब
अपने आईने में
अपने को देखता है

मैंने कब कहा
मैं भी झूठ
नहीं बोल रहा हूँ

खयाल में नहीं
आ रहा है
अक्स अपना ही
जब से बैठा हूँ
लिखने की
सोचकर

उसके आईने में
खुद को देखकर
उसके बारे में
ही सोच रहा हूँ

सब अपने
आईने में
अपने को
देखते हैं

मैं अपने आईने
को देख रहा हूँ

उसने देखा हो
शायद मेरे
आईने में कुछ

मैं
उसपर पड़ी
हुई धूल में
जब से
देख रहा हूँ

कुछ ऐसा
और
कुछ वैसा
जैसा ही
देख रहा हूँ ।

चित्र साभार: vgmirrors.blogspot.com

रविवार, 7 सितंबर 2014

लिखा हुआ पढ़ते पढ़ते नहीं लिखा पढ़ने से रह गया था

कुछ था
जरूर
उन सब
जगहों पर
जहाँ से
गुजरा
था मैं

एक नहीं
हजार बार
जमाने के
साथ साथ

और
कुछ नहीं
दिखा था
कभी भी

ना मुझे
ना ही
जमाने को

कुछ दिखा
हो किसी को
ऐसा जैसा ही
कुछ लगा
भी नहीं था

अचानक
जैसे बहुत
सारी आँखे
उग आई थी
शरीर में
और
बहुत कुछ
दिखना शुरु
हो गया था

जैसे
कई बार
पढ़ी गई
किताब के
एक खाली
पड़े पन्ने को
कुछ नहीं
लिखे होने
के बावजूद
कोई पढ़ना
शुरु
हो गया था

आदमी
वही था
कई कई
बार पढ़ा
भी गया था

समझ में
हर बार
कुछ
आया था
और
जो आया था

उसमें
कभी कुछ
नया भी
नहीं था

फिर अचानक
ऐसा क्या कुछ
हो गया था

सफेद पन्ना
छूटा हुआ
एक पुरानी
किताब का
बहुत कुछ
कह गया था

एक जमाने
से जमाना
भी लगा
था पढ़ने
पढ़ा‌ने में

लिखा
किताब का

और
एक खाली
सफेद पन्ना
किसी का
सफेद
साफ चेहरा
हो गया था

‘उलूक’
आँख
ठीक होने से
ही खुश था

पता ही
नहीं चला
उसको
कि
सोच में
ही एक
मोतियाबिंद
हो गया था ।

चित्र साभार: http://www.presentermedia.com/

रविवार, 6 जुलाई 2014

साँप जहर और डर किसका ज्यादा कहर

साँप को देखकर
अत्यधिक भयभीत
हो गई महिला के
उड़े हुऐ चेहरे
को देखकर
थोड़ी देर के लिये
सोच में पड़ गया
दिमाग के काले
श्यामपट में
लिखा हुआ सारा
सफेद जैसे काला
होते हुऐ कहीं
आकाश में उड़ गया
साँप आ ही रहा
था कहीं से उसी
तरह सरसराता
हुआ निकल गया
हुआ कुछ किसी
को नहीं बस
माहौल थोड़ी देर
के लिये उलटा पुल्टा
होते होते डगमगाता
हुआ जैसे संभल गया
जहर था साँप के अंदर
कहीं रखा हुआ
उसे उसी तरह वो
कंजूस अपने साथ
लेकर निकल गया
महिला ने भी चेहरे
का रंग फिर बदला
पहले जैसा ही
कुछ ही देर में
वैसा ही कर लिया
रोज बदलता है
मेरे चेहरे का रंग
किसी को देखकर
अपने सामने से
शीशे ने भी
देखते देखते इससे
सामंजस्य कर लिया
साँप के अंदर के जहर
के बारे में सब ने
सब कुछ पता कर लिया
उसके अंदर कुछ भी नहीं
फिर कैसे साँप के जहर
से भी बहुत ज्यादा
बहुत कुछ करते ना
करते कर लिया
‘उलूक’ समझा कर
रोज मरने वाले से
अच्छा होता है
एक ही बार मर कर
पतली गली से जो
एक बार में ही
निकल लिया ।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

चेहरे को खुद ही बदलना आखिर क्यों नहीं आ पाता है

घर के चेहरे
की बात करना 
फालतू
हो जाता है
रोज देखने की
आदत जो
पड़ जाती है
याद जैसा
कुछ कुछ
हो ही जाता है
किस समय
बदला हुआ है
थोड़ा सा भी
साफ नजर में
आ जाता है
मोहल्ले से
होते हुऐ
एक चेहरा
शहर की
ओर चला
जाता है
भीड़ के
चेहरों में
कहीं जा
कर खो
भी अगर
जाता है
फिर भी
कभी दिख
जाये कहीं
जोर डालने
से याद
आ जाता है
चेहरे भी
चेहरे
दर चेहरे
होते हुऐ
कहीं से
कहीं तक
चले जाते हैं

कुछ टी वी
कुछ अखबार
कुछ समाचार
हो जाते हैं
उम्र का
असर
भी हो
तब भी
कुछ कुछ
पहचान ही
लिये जाते हैं
समय के
साथ
कुछ चेहरे
बहुत कुछ
नया भी
करना
सीख ही
ले जाते हैं
पहचान
बनाने
के लिये
हर चौराहे
पर
चेहरा अपना
एक टांक
कर आते हैं
कुछ चेहरों
को
चेहरे बदलने
में महारथ
होती है
एक चेहरे
पर
कई कई
चेहरे
तक लगा
ले जाते हैं
'उलूक'
देखता है
रोज ऐसे
कई चेहरे
अपने
आस पास
सीखना
चाहता है
चेहरा
बदलना
कई बार
रोज
बदलता है
इसी क्रम में
घर के
साबुन
बार बार
रगड़ते
रगड़ते
भी कुछ
नहीं हो
पाता है

सालों साल
ढोना एक
ही चेहरे को
वाकई
कई बार
बहुत बहुत
मुश्किल सा
हो जाता है !

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

चेहरे पर भी लिखा होता है

चेहरे पर भी
तो कुछ कुछ
लिखा होता है
ना कहे कुछ
भी अगर कोई
तब भी थोड़ा
थोड़ा सा तो
पता होता है
अपना चेहरा
सुबह सुबह ही
धुला होता है
साफ होता है
कुछ भी कहीं
नहीं कहता है
चेहरा चेहरे
के लिये एक
आईना होता है
अपना चेहरा
देखकर कुछ
कहाँ होता है
बहुत कम
जगहों पर
ही  एक आईना
लगा होता है
अंदर बहुत
कुछ चल
रहा होता है
चेहरा कुछ
और ही तब
उगल रहा
होता है
दूसरे चेहरे
के आते ही
चेहरा रंग
अपना बदल
रहा होता है
चेहरे पर
कुछ लिखा
होता है
ऎसा बस
ऎसे समय
में ही तो
पता चल
रहा होता है ।

बुधवार, 6 जून 2012

आँख आँख

घर में आँख से
आँख मिलाता है
खाली बिना बात के
पंगा हो जाता है
चेहरा फिर भाव
हीन हो जाता है
बाहर आँख वाला
सामने आता है
कन्नी काट कर
किनारे किनारे
निकल जाता है
आँख वाली से
आँख मिलाता है
डूबता उतराता है
खो जाता है
चेहरा नये नये
भाव दिखाता है
रोज कुछ लोग
घर पर आँख
को झेलते हैं
बाहर आ कर
खुशी खुशी आँख आँख
फिर भी खेलते हैं
आँख वाली की आँख
गुलाबी हो जाती है
आँख वाले को आँखें
मिल जाती हैं
सिलसिला सब ये
नहीं चला पाते हैं
कुछ लोग इस कला
में माहिर हो जाते हैं
करना वैसे तो बहुत
कुछ चाहते हैं
पर घर की आँखों
से डर जाते हैं
इसलिये बस
आँख से आँख
मिलाते हैं
पलकें झुकाते हैं
पलकें उठाते हैं
रोज आते हैं
रोज चले जाते हैं
आँख आँख में
अंतर साफ साफ
दिखाते हैं ।

बुधवार, 30 मई 2012

झंडा है जरूरी

ये मत समझ लेना
कि वो बुरा होता है

पर तरक्की पसन्द
जो आदमी होता है

किसी ना किसी
दल से जरूर
जुड़ा होता है

दल से जो 
जुड़ा
हुवा नहीं होता है

उसका दल तो
खुद खुदा होता है

स्टेटस उसका बहुत
उँचा उठा होता है

जिसके चेहरे पर
झंडा लगा होता है

सत्ता होने ना होने
से कुछ नहीं होता है

इनकी रहे तो
ये उनको
नहीं छूता है

उनकी रही तो
इनको भी कोई
कुछ नहीं कहता है

इस बार इनका
काम आसान होता है
उनका ये समय तो
आराम का होता है

अगली बार उनका
हर जगह नाम होता है
इनका कुन्बा दिन
हो या रात सोता रहता है

बिना झंडे वाले
बकरे का
बार बार काम
तमाम होता है

जिसे देखने
के लिये भी
वहाँ ना ये होता है
ना ही वो होता है

भीड़ काबू करने का
दोनो को जैसे कोई
वरदान होता है

भीड़ के एक छोटे
हिस्से पर इनका
दबदबा होता है
बचे हिस्से को
जो काबू में
कर ही लेता है

अपने कामों को
करने के लिये
झंडा मिलन भी
हो रहा होता है

मीटिंग होती है
मंच बनता है
उस समय इनका
झंडा घर में सो
रहा होता है

पर तरक्की पसंद
जो आदमी होता है
किसी ना किसी
झंडे से जुड़ा होता है

जिसका
कोई झंडा
नहीं होता है
वो कभी भी
ना ये होता है
ना वो होता है।

बुधवार, 2 मई 2012

सरकार का आईना

उन्होंने
जैसे ही
एक बात
उछाली

मैंने तुरन्त
अपने मन
की जेब
में सम्भाली

घर आकर
चार लाईन
लिख
ही डाली

कह रहे थे
जोर लगाकर

किसी
राज्य की
सरकार का
चेहरा देखना
हो अगर 

उस राज्य के
विश्वविद्यालय 
पर सरसरी
नजर डालो

कैसी चल
रही है सरकार
तुरत फुरत में
पता लगालो

वाह जी
क्या इंडीकेटर
ढूंढ के चाचा
जी लाये हैं

अपनी पोल
पट्टी खुद ही
खोलने का
जुगाड़
बनाये हैं

मेरी समझ
में भी बहुत
दिनों से
ये नहीं
आ रहा था

हर रिटायर
होने वाला
शख्स
कोर्ट जा जा
कर स्टे
क्यों ले
आ रहा था

अरे
जब बूढ़े
से बूढ़ा
सरकार में
मंत्री हो
जा रहा था

इतने
बड़े राज्य
का बेड़ा गर्क
करने में
बिल्कुल भी
नहीं शरमा
रहा था

तो
मास्टर जी
ने 
किसी
का 
क्या 
बिगाड़ा था

क्यों
उनको साठ
साल होते ही
घर चले जाओ
का आदेश दिया
जा रहा था

काम धाम के
सपने
खाली पीली
जब राजधानी
में जा कर
सरकार जनता
को दिखाती है

उसी तरह
विश्विद्यालय
की गाड़ी
भी तो
खरामे खरामे
बुद्धि का
गोबर बनाती है

जो कहीं
नहीं हो
सकता है
उसे करने की
स्वतंत्रता भी
यहाँ आसानी से
मिल जाती है

बहुत सी
बाते तो
यहाँ कहने
की मेरी भी
हिम्मत नहीं
हो पाती है

सुप्रीम कोर्ट
भी केवल
बुद्धिजीवियों
के झांसे
में ही आ
पाती है

वाकई में
सरकार का
असली चेहरा
तो हमें
ये ही
दिखाती है।

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

अभिनेता आज के समाज में

अंदर की
कालिख को
सफाई से
छिपाता हूँ
लेकिन चेहरा
मैं हमेशा
चमकाता हूँ
कितना शातिर
हूँ मैं भी
कोई नहीं जानता
हर कोई मुझे
देवता जैसे
के नाम से
है पहचानता
मेरा आज तक
किसी से कोई
रगड़ा नहीं हुवा
और तो और
बीबी से भी
कभी झगड़ा
नहीं हुवा
धीरे धीरे
है मैने अपनी
पैठ बनाई
बड़ी मेहनत से
दुकानदारी है चमकाई
कितनो को इस
चक्कर में
मैने लुटवा दिया
वो आज भी
करते हैं प्रणाम
सिर तक
अपने पांव में
झुकवा दिया
पर अंदाज
किसी को नहीं
कभी है आता
कि मैं
खेल खेल
में कैसे ये सब
हूँ कर जाता
बडे़ आराम से हूँ
चैन की बंसी
बजाता हूं
जो भी साहब
आता है
पहले उसको
फंसाता हूँ
सिस्टम को
खोखला करने में
हो गई है
मुझे महारत
तैयारी में हूँ
अब करवा सकता
हूँ कभी भी
महाभारत
तुम से ही
ये सारे
काम करवाउंगा
अखबार में
लेकिन फोटो
अपनी ही
छपवाउंगा
इस पहेली को
अब आपको ही
सुलझाना है
आसपास आज
आप के
कितने मैं
आबाद हो गये हैं
पता लगाना है
ज्यादा कुछ
नहीं करना है
उसके बाद
हल्का सा
मुस्कुराना है ।

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

समझ

मेरा अमरूद उनको
केला नजर आता है
मैं चेहरा दिखाता हूँ
वो बंदर चिल्लाता है
मैं प्यार दिखाता हूँ
वो दांत दिखाता है
मेरी सोच में लोच है
उसके दिमाग में मोच है
धीरे धीरे सीख लूंगा
उसको डंडा दिखाउंगा
प्यार से गले लगाउंगा
जब बुलाना होगा
तो जा जा चिल्लाउंगा
डाक्टर की जरूरत पड़ी
तो एक मास्टर ले आऊंगा
तब मेरा अमरूद उसको
अमरूद नजर आयेगा
मेरी उल्टी बातों को
वो सीधा समझ जायेगा ।

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