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सोमवार, 2 नवंबर 2015

खाली सफेद पन्ना अखबार का कुछ ज्यादा ही पढ़ा जा रहा था

कुछ ज्यादा
ही हलचल
दिखाई
दे रही थी
अखबार के
अपने पन्ने पर

संदेश भी
मिल रहे थे
एक नहीं
ढेर सारे
और
बहुत सारे
क्या
हुआ होगा
समझ में
नहीं आ
पा रहा था

पृष्ठ पर
आने जाने
वालों पर
नजर रखने
वाला
सूचकाँक
भी ऊपर
बहुत ऊपर
को चढ़ता
हुआ नजर
आ रहा था

और
ये सब
शुरु हुआ था
जिस दिन से
खबरें छपना
थोड़ा कम होते
कुछ दिन के
लिये बंद
हुआ था

ऐसा नहीं था
कि खबरें नहीं
बन रही थी

लूट मार हमेशा
की तरह धड़ल्ले
से चल रही थी
शरीफ लुटेरे
शराफत से रोज
की तरफ काम
पर आ जा रहे थे

लूटना नहीं
सीख पाये
बेवकूफ
रोज मर्रा
की तरह
तिरछी
नजर से
घृणा के
साथ देखे
जा रहे थे

गुण्डों की
शिक्षा दीक्षा
जोर शोर से
औने पौने
कोने काने
में चलाई
जा रही थी

पढ़ाई लिखाई
की चारपाई
टूटने के
कगार पर
चर्र मर्र
करती हुई
चरमरा रही थी

‘उलूक’
काँणी आँख से
रोज की तरह
बदबूदार
हवा को
पचा रहा था
देख रहा था
देखना ही था
आने जाने के
रास्तों पर
काले फूल
गिरा रहा था

कहूँ ना कहूँ
बहुत कह
चुका हूँ
सभी
कुछ कहा
एक ही
तरह का
कब तक
कहा जाये
सोच सोच
कर कलम
कभी
सफेद पानी में
कभी
काली स्याही में
डुबा रहा था

एक दिन
दो दिन
तीन दिन
छोड़ कर
कुछ नहीं
लिखकर
अच्छा कुछ
देखने
अच्छा कुछ
लिखने
का सपना
बना रहा था

कुछ नहीं
होना था
सब कुछ
वही रहना था
फिर लिखना
शुरु
किया भी
दिखा भी
अपनी सूरत
का जैसा ही
जमाने से
लिखा गया
आज भी
वैसा ही कुछ
कूड़ा कूड़ा
सा ही
लिखा जा
रहा था

जो है सो है
बस यही पहेली
बनी रही थी
देखने पढ़ने
वाला खाली
सफेद पन्ने को
इतने दिन
बीच में
किसलिये
देखने के लिये
आ रहा था ।

चित्र साभार: www.clker.com

शनिवार, 1 मार्च 2014

बादल भी कुछ नहीं लिखते बादलों को नहीं होती है घुटन

शायद
ज्यादा अच्छे
होते हैं वे लोग
जो कुछ
नहीं लिखते है

वैसे
किसी के
लिखने से ही
लिखने वाले के
बारे में कुछ
पता चलता हो
ऐसा भी जरूरी
नहीं होता है

पर
कुछ नहीं कहना
कुछ नहीं लिखना
नहीं लिखने वाले
की मजबूती का
पता जरूर देता है

लिखने
से ज्यादा
अच्छा होता है
कुछ करना

कहा
भी गया है
गरजते हैं
जो बादल
बरसते नहीं हैं

बादल
भी तो बहुत
चालाकी करते हैं

जहाँ
बनते हैं
वहाँ से
चल देते हैं

और
बरसते हैं
बहुत दूर कहीं
ऐसी जगह पर
जहाँ कोई
नहीं जानता है
बादल कहाँ
कैसे और
क्यों बनते हैं

एक
बहुत बड़े देश
के कोने कोने के
लोग भी तो
पहुँचते हैं हमेशा
एक नई जगह
और वहाँ बरसते
हुऐ दिखते हैं

कहीं भी
कोई जमीन
नम नहीं होती हैं
ना उठती है
थोड़ी सी भी
सोंधी गंध कहीं से
गीली मिट्टी की

बरसना
बादलों का
बादलों पर और
बरसात का नहीं होना

किसी
को कोई
फर्क भी
नहीं पड़ना

बहुत
कुछ यूँ ही
सिखा देता है
और
बादलों के
देश की
पानी की
छोटी बूँदें भी
सीख लेती हैं
नमीं सोख लेना

क्योंकि
जमीन की
हर बूँद को
खुद के लिये बस
बनना होता है
एक बड़ा बादल

बरसने
के लिये नहीं
बस सोखने
के लिये
कुछ नमीं

जो सब
लिखने से
नहीं आता है

बस
सीखा जाता है
उन बादलों से
जो बरसते नहीं
बस गरजते हैं

बहुत
दूर जाकर
जहाँ किसी को
फर्क नहीं पड़ता है

बिजली
की चमक से
या
घड़धड़ाहट से

बादल
भी कहाँ
लिखते हैं कुछ
कभी भी कहीं भी ।

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