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मंगलवार, 8 मई 2018

टिप्पणियों पर बिफरते नये शेर को देख कर पुराने हो चुके भेड़ को कुछ तो कह देना हो रहा है

सब कुछ
एक साथ
नहीं दौड़ता है

टाँगें
कलम हो जायें
बहुत कम होता है

वजूका
खेत के बीच में
भी हो सकता है
कहीं किनारे पर
बस यूँ ही खड़ा
भी किया होता है

कहने लिखने को
रोज हर समय
कुछ ना कुछ
कहीं किसी
कोने में
जरूर होता है

लिखे हुऐ
सारे में से
जान बूझ कर
नहीं लिखा गया
कहीं ना कहीं
किसी पंक्ति
के बीच से
झाँक रहा होता है

समुन्दर
लिख लेने
के बाद
नदी लिखने
का मन
किसी का
होता होगा
पता कहाँ
चलता है

कलम की
पुरानी
स्याही को
नाले के पास
लोटे में धोना
और फिर
चटक धूप में
सुखा कर
नयी स्याही
भर लेना

एक पुराना
मुहावरा
हो चुका
होता है

नये मुल्ले
और
प्याज पर
लिखने से
दंगा भड़कने
का अंदेशा
हो रहा
होता है

रोज के
रोजनामचे
को लिखने
वाले ‘उलूक’
का दिल

साप्ताहिक
हो लेने
पर भी
बाग बाग
हो रहा
होता है

लिखना
लिखाना
और
उस पर
टिप्पणी
पाने की
लालसा पर

हमेशा
की तरह
नये सिपाही
का बंदूक
तानने पर

अपनी
पुरानी
जंक लगी
बन्दूक से
खुद का
फिर से
सामना
हो रहा
होता है

अपना लिखना
अपने लिखे को
अपना पढ़ लेना
समझ में आ जाना
सालों साल में

पुराने प्रश्न से
जैसे नया
सामना हो
रहा होता है ।

बुधवार, 23 अगस्त 2017

पढ़ने वाला हर कोई लिखे पर ही टिप्पणी करे जरूरी नहीं होता है

जो लिखता है
उसे पता होता है

वो क्या लिखता है
किस लिये लिखता है
किस पर लिखता है
क्यों लिखता है

जो पढ़ता है
उसे पता होता है
वो क्या पढ़ता है
किसका पढ़ता है
क्यों पढ़ता है

लिखे को पढ़ कर
उस पर कुछ
कहने वाले को
पता होता है
उसे क्या
कहना होता है

दुनियाँ में
बहुत कुछ
होता है
जिसका
सबको
सब पता
नहीं होता है

चमचा होना
बुरा नहीं होता है

कटोरा अपना
अपना अलग
अलग होता है

पूजा करना
बहुत अच्छा
होता है

मन्दिर दूसरे
का भी
कहीं होता है

भगवान तैंतीस
करोड़ बताये गये हैं

कोई
हनुमान
होता है
कोई राम
होता है

बन्दर
होना भी
बुरा नहीं
होता है

सामने से
आकर
धो देना
होली का
एक मौका
होता है

पीठ पीछे
बहुत करते हैं
तलवार बाजी

‘उलूक’
कहीं भी
नजर नहीं
आने वाले
रायशुमारी
करने वालों का
सारे देश में
एक जैसा एक ही
ठेका होता है ।

चित्र साभार: Cupped hands clip art

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

सच कहा जाये तो दिल की बात कहने में दिल घबराता है

कितना कुछ भी
लिख दिया जाये
वो लिखा ही
नहीं जाता है
जो बस अपने
से ही साझा
किया जाता है
इस पर लिखना
उस पर लिखना
लिखते लिखते
कुछ भी लिखना
बहुत कुछ ऐसे ही
लिखा जाता है
लिखते लिखते भी
महसूस होना कि
कुछ भी नहीं
लिखा जाता है
हर लिखने वाला
इसी मोड़ पर
बहुत ही कंजूस
हो जाता है
पढ़ने वाले भी
बहुत होते हैं
कोई पूरा का पूरा
शब्द दर शब्द
पढ़ ले जाता है
बेवकूफ भी
नहीं होता है
फिर भी कुछ भी
नहीं समझ पाता है
शराफत होती है
बहुत अच्छा लिखा है
की टिप्पणी एक
जरूर दे जाता है
बहुत अच्छा
लिखने वाले को
पाठक ही नहीं
मिल पाता है
एक अच्छी तस्वीर
के यहाँ बाजार
लगा नजर आता है
कुछ अच्छा लिख
लेने की सोच
जब तक पैदा
करे कोई
एक कभाड़ी 
बाजार भाव
गिरा जाता है
बहुत से पहलवान
हैं यहाँ भी
और वहाँ भी
दादागिरी करने में
लेखक और पाठक से
कमतर कोई नजर
नहीं आता है
दाऊद यहाँ भी
हैं बहुत से
पता नहीं मेरा
ख्वाब है या
किसी और को
भी नजर आता है ।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

विनती

खाली घूमने
आते हैं
ना आयें
कहीं और
चले जायें
टिप्पणी का
बाजार ना
ही बनायें
लिखा हुआ
पढ़े पूरा
समझ में
नहीं आये
तो लिखें
नहीं समझ पाये
हिम्मत करें
कहें कूड़ा है
जो लिखा है 

खुद कूड़ा
ना फैलायें
ना ही कोई
फैलानें पाये
इतना साहस
पैदा कर
सकते हैं
तो यहाँ आयें
जरूर आयें।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

ब्लाग है या बाघ है

सपने भी
देखिये ना
कितने अजब
गजब सी चीजें
दिखाते हैं
जो कहीं
नहीं होता
ऎसी अजीब
चीजें पता नहीं
कहाँ कहाँ से
उठा कर लाते हैं
कल रात का
सपना कुछ
कुछ रहा है याद
अब किसी को
कैसे बतायेंं ये
अजीब सी बात
एक शहर जैसा
सपने में कहीं
नजर आ रहा था
घुसते ही
'ब्लाग नगर' का
बडा़ सा बोर्ड
दिखा रहा था
अंदर घुसे तो
जलसे जलूस
इधर उधर
जा रहे थे
ब्लाग काँग्रेस
ब्लाग सपा
जैसे झंडे
लहरा रहे थे
कुछ ब्लागर
कम्यूनिस्ट हैं
करके भी
समझा रहे थे
खेल का मैदान
भी दिखा जहाँ
ब्लाग ब्लाग का
खेल एक खेला
जा रहा था
टिप्पणियों का
होता है स्कोर
उस पर होती है
जीत और हार
ऎसा स्कोरबोर्ड
बता रहा था
हंसी आ रही थी
सुन सुन कर
जब सुना एक
ब्लागर ब्लाग
फिक्सिंग
करवा रहा था
टिप्पणियाँ किसी
ब्लाग की किसी
और को दे
आ रहा था
उसकी रिपोर्ट
करने दूसरा
ब्लागर ब्लाग थाने
में जा रहा था
ब्लाग पुलिस
को लाकर
घटनाक्रम की
एफ आई आर
की पोस्ट की
कापी बना
रहा था
आगे इसके
क्या हुआ
पता ही नहीं
चल पा रहा था
घड़ी का अलार्म
सुबह हो गयी
का बहुत शोर
मचा रहा था
सामने खड़ी
बिस्तरे के
श्रीमती मेरी
पूछ रही थी
मुझसे कि
तू सपने में
बाघ बाघ
जैसा क्यों
चिल्ला रहा था ।

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