उलूक टाइम्स: तराजू
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गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

बातें करिए बातें बोइये बातें खेलिए करना किसी को नहीं है कुछ कहीं

कोशिश करते रहिये
कहने की सच
बात अलग है
कहने भर से ही बस काम नहीं हो जाएगा
जो कहा गया है उसको
किसी हजूर के तराजू में तोला भी जाएगा
बांट लिखने वाले के होंगे भी नहीं
कोर्ट कचहरी की अंधी मूर्ती से भी
काम नहीं चल पायेगा
आप से बस
हमेशा जोर लगा कर पूछा जाएगा
आप क्या सोच रहे हो
आपकी सोच को
इस तरह
सार्वजनिक किया जाएगा
सब शामिल हैं
इस खेल में घर से लेकर मैदान तक
बल्ला आपको दिए बिना
आपसे क्रिकेट खेलने को कहा जाएगा
बातें करिए बातों मैं कहीं भी आपको
आयकर लगा नजर नहीं आयेगा
जो जितना लंबा फेंकेगा
सोने का मैडल उसी के हाथ नजर आयेगा
प्रतिस्पर्धा कहीं है ही नहीं
मुकाबला करने आने वाले की
मुट्ठी गरम कर उसे
गीता का ज्ञान दिया जाएगा
एक ही चेहरे के साथ जीने वाले को
नरक ज्ञान की आभासी दुनियाँ
से भटका कर स्वर्गलोक में
होने का आभास
बातों से ही दे दिया जाएगा
बातें करिए बातें बोइये बातें खेलिए
करना किसी को नहीं है कुछ कहीं
‘उलूक’ तू खुद सोच ले
अपने दिन का सपना
तेरा रात का बकबकाना ही कहीं
तेरा फांसी का फंदा
तेरे लिए तो नहीं एक बन जाएगा ?

चित्र साभार : https://navbharattimes.indiatimes.com/

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

झगड़े होते होंगे कहीं पर अब सामने से खुलेआम नहीं होते हैं

बिल्लियाँ बंदर
तराजू और रोटी
की कहानी कोई
नई कहानी नहीं है
एक बहुत पुरानी
कहानी है
इतनी पुरानी कहानी
जिसे सुनाते सुनाते
सुनाने वाले सभी
घर के लोग इस समय
घर में बने लकड़ी के
कानस पर रखी हुई
फोटो में सूखे फूलों
की मालाऐं ओढ़े
धूल मिट्टी से भरे
खिसियाये हुऐ से
कब से बैठे हैं
जैसे पूछ रहे हैं
बिल्लियों बंदरों के
झगड़े क्या अब भी
उसी तरह से होते हैं
इस बात से अंजान
कि दीमक चाट चुकी है
कानस की लकड़ी को
और वो सब खुद
लकड़ी के बुरादे
पर चुपचाप बैठे हैं
कौन बताये जाकर
उन्हें ऊपर कहीं कि
बिल्लियाँ और बंदर
अब साथ में ही
दिखाई देते हैं
रोटी और तराजू भी
नजर नहीं आते हैं
तराजू की जरूरत
अब नहीं पड़ती है
उसे ले जाकर दोनों
साथ ही कहीं पर
टाँग कर बैठे हैं
तराजू देखने वाले
सुना है न्याय देते हैं
रोटी के लिये क्यों
और किस लिये
कब तक झगड़ना
इसलिये आटे को ही
दोनो आधा आधा
चुपचाप बांट लेते हैं
बिल्लियों और
बंदरों की नई
कहानियों में अब
ना रोटियाँ होती हैं
ना झगड़े होते हैं
ना तराजू ही होते हैं ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

समझौते होते हैं सब समझते हैं करने वाले बेवकूफ नहीं होते हैं

अपनी अच्छाइयों को
अपनी चोर जेबों
में छुपाये हुऐ
बस उसी तरह
जैसे छुपाना आसान
होता है अंधेरे में
अपनी परछाइयों को
समझौतों के तराजू
लिये फिर रहे हैं
गली गली
मजाल है कि
कोई पलड़ा
ऊँचा और कोई
नीचा हो जाये
तराजू भी हर
एक के पास
एक से समझौता ब्राँड
कहीं कोई चूक नहीं
हर एक के चेहरे पर
एक मुखौटा उसी तरह से
बचाव की मुद्रा में जैसे
लगा लेता है वैल्डिंग
करते समय आँखें
बचाने के लिये कोई
अच्छाई की शरम
गीली करती हुई जेबें
और समझौतों की
बेशर्मी से गरम होकर
खौलती फड़कती नसें
मेरी भी आदत में
आदतन शामिल
हो चुकी है उसी तरह
जिस तरह बंद
हो चुकी हों गीता कुरान
बाईबिल और रामायण
पढ़ने की कोशिश
करते करते किसी की
भारी बोझिल होते होते
आँखे और हर तरफ
फैल चुका हो चारों ओर
काला होता हुआ
सफेद कोहरे
में लिपटा हुआ
एक समझौता
एक ताबूत में
एक और कोशिश
हर किसी की
ताबूत के ढक्कन को
चाँदी से मढ़ कर
चमकदार बना देने की
ताकि गीली होती
चोर जेब से गिरती
शरम की गीली
ओस की बूँदे
साफ करती रहें
झूठ की चमक को
और सलामत रहे
हर किसी की
कुछ अच्छाई उसकी
चोर जेब में
बची रहे सड़ने से
समझौतों की सड़न से
बचते बचाते हुऐ
और समझौते होते रहें
यूँ ही मुखौटों की आड़ में
एक दूसरे के मुखौटों
की कतार के बीच
अच्छाइयाँ बची रहें
मिलें नहीं कभी
किसी की किसी से
समझौता करने
कराने के लिये
या खुद एक समझौता
हो जाने के लिये
अच्छाइयाँ
हर किसी की
होने के लिये ही
होती है बस
ताकी सनद रहे ।