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बुधवार, 18 अप्रैल 2018

उसी समय लिख देना जरूरी होता है जिस समय दूर बहुत कहीं अंतरिक्ष में चलते नाटक को सामने से होता हुआ देखा जाये

लिखना
पड़ जाता है
कभी मजबूरी में

इस डर से
कि कल शायद
देर हो जाये
भूला जाये

बात निकल कर
किसी किनारे
से सोच के
फिसल जाये

जरूरी
हो जाता है
लिखना नौटंकी को

इससे पहले
कि परदा गिर जाये

ताली पीटती हुई
जमा की गयी भीड़
जेब में हाथ डाले
अपने अपने घर
को निकल जाये

कितना
शातिर होता है
एक शातिर
शातिराना
अन्दाज ही
जिसका सारे
जमाने के लिये
शराफत का
एक पैमाना हो जाये

चल ‘उलूक’
छोड़ दे लिखना
देख कर अपने
आस पास की
नौटंकियों को
अपने घर की

सबसे
अच्छा होता है
सब कुछ पर
आँख कान
नाक बंद कर

ऊपर कहीं दूर
अंतरिक्ष में बैठ कर

वहीं से धरती के
गोल और नीले
होने के सपने को
धरती वालों को
जोर जोर से
आवाज लगा लगा
कर बेचा जाये।

चित्र साभार: www.kisspng.com

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

सुबह एक सपना दिखा उठा तो अखबार में मिला

कठपुतली वाला
कभी आता था
मेरे आँगन में
धोती तान दी
जाती थी एक
मोहल्ले के बच्चे
इक्ट्ठा हो जाते थे
ताली बजाने के
लिये भी तो कुछ
हाथ जरूरी हो
जाते थे
होते होते सब
गायब हो गया
कब पता ही
कहाँ ये चला
कठपुतलियाँ
नचाने वाले
नियम से
चलते हुऎ
हमेशा ही देखे
जाते थे
धोती लांघ कर
सामने भी नहीं
कभी आते थे
कठपुतलियाँ
कभी भी पर्दे
के पीछे नहीं
जाती थी
काठ की जरूर
होती थी सब
पर हिम्मत की
उनकी दाद
सभी के द्वारा
दी जाती थी
धागे भी दिखते
थे साफ साफ
बंधे हुऎ कठपुतलियों
के बदन के साथ
समय के साथ
जब समझ कुछ
परिपक्व हो जाती है
चीजें धुँधली भी हों
तो समझ में आनी
शुरु हो जाती है
कठपुतली वाला
अब मेरे आँगन
में कभी नहीं आता है
कठपुतलियाँ के काठ
हाड़ माँस हो गये हैं
वाई फाई के आने से
धागे भी खो गये हैं
धोती कौन पहनता
है इस जमाने में
जब बदन के कपडे़
ही खो गये हैं
बहुत ही छोटे
छोटे हो गये हैं
कठपुतली का नाच
बदस्तूर अभी भी
चलता जा रहा है
सब कुछ इतना
साफ नजर सामने
से आ रहा है
कठपुतलियाँ ही
कठपुतलियों को
अब नचाना सीख
कर आ रही है
पर्दे के इधर भी हैं
और पर्दे के उधर
भी जा रही हैं
बहुत आराम से
है कठपुतलियाँ
नचाने वाला
अब कहीं और
चला जाता है
उसको इन सब
नाचों में उपस्थिती
देने की जरूरत
कहाँ रह जा रही है
खबर का क्या है
वो तो कुछ होने
से पहले ही
बन जा रही है
क्या होगा ये
भी होता है पता
कठपुतलियाँ सब
सीख चुकी हैं
ऎ आदमी तू
अभी तक है कहाँ
बस एक तुझे ही
क्यों नींद आ रही है
जो सुबह सुबह
सपने दिखा रही है ।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

कृपया लोटे ही इसे पढे़

बिन पैंदी के
लोटों के बीच
बहुत बार लुढ़कते
लुढ़कते भी कुछ
नहीं सीख पाता हूँ
लोटों के बीच
रहकर भी क्यों नहीं
लोटों की तरह
व्यवहार कर पाता हूँ
सामने सामने जब
बहुत से लोटों को
एक लोटे के लिये
लोटों के चारों और
लुढ़कता हुआ
देखता जाता हूँ
वैसे समझता भी हूँ
पैंदी का ना होना
वाकई में कई बार
खुदा की नैमत
हो जाती है
लुढ़कते हुऎ लोटों द्वारा
लुढ़कते लुढ़कते
कहाँ जा कर
किस लोटों को कब
कौन सी टोपी
पहना दी जाती है
ये बात लोटों के
समझ में नहीं
कभी आ पाती है
लोटों में से एक
अन्धे लोटे के लिये
रेवड़ी बन के
बहार ले आती है
लोटों की और भी
बहुत सी लोटागिरी
कायल कर घायल
कर ले जाती है
जब कहानी कभी
गलती से समझ
में आ जाती है
बहुत दिन से लोटा
लोटा एक जी के
चारों और लुढ़कने का
कार्यक्रम चला रहा था
सारे लोटों को नजर ये
सब साफ साफ
आ रहा था
उधर लोटा दो अपनी
पोटली कहीं खोल
बाट आ रहा था
अपनी दुकान के
प्याज का भाव
चढ़ गया करके
अखबार में रोज
छपवा रहा था
तुरंत ही लोटा
अपना लुढ़कना
साम्यावस्था बनाने की
तरफ झुका रहा था
सीन बदलने में
समय ही नहीं लगता है
ये बाकी लोटों का
लोटे की ओर
लोटे के पीछे
लुढ़कता हुआ
चला जाना
साफ साफ
दिखा रहा था
बहुत से
अच्छे भले लोग
जो हमेशा हमारे
लोटा हो जाने पर
आँख दिखा रहे थे
इन लुढ़कते हुऎ
लोटों के बीच में
कब लोटे
हो जा रहे थे
उनकी सोच भी
लोटा सोच है करके
जबकि कहीं नहीं
दिखाना चाह रहे थे
पता नहीं क्या
मजबूरी उनकी
हो जा रही थी
जो लोटे के लिये
लोटे के साथ
लोटों की भीड़ में
ताली बजाने वाला
एक लोटा हो कर
रह जा रहे थे । 

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