उलूक टाइम्स: दीवाने
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रविवार, 22 सितंबर 2013

छुट्टी पर जा कुछ लिख पढ़ के आ

लम्बे अर्से के बाद
मिले एक मित्र से
पूछ बैठा यूं ही
क्या बात है
बहुत दिनों के बाद
नजर आ रहे हो
आजकल काम पर
क्या किसी दूसरे
रास्ते से जा रहे हो
जवाब मिला कुछ ऐसा
काम के दिनों में
ज्यादातर छुट्टी पर
चला जाता हूं
कभी आप भी
चलिये ना मेरे साथ
चलकर आपको भी
किसी दिन वो
जगह दिखाता हूं
जहां चैन से बैठ कर
कुछ लिख पढ़
ले जाता हूं
काम का क्या है
बहुत से पागल होते हैं
काम के दीवाने
उनको थोड़ा थोड़ा
बांट के आता हूं
कागज कलम लेकर
लिखने में अब वो
मजा कहां रह गया
अखबार में लिखने पर
पता चला कि सब को
कहां हूं मैं का कुछ
पता चल गया
इसी लिये यहां
पर लिखता हूं
कौन हूं बस ये बात
किसी को नहीं बताता हूं
अंदर की बातें अपने
अंदर ही रखकर एक
छद्मरुप हो जाता हूं
बहुत सुकून मिलता है
उधर अपने किये हुऐ
इधर उधर का प्रायश्चित
इधर लिख लिख कर
पा जाता हूं
बस यही कारण है
काम के बोझ को
कम करने के लिये
लिखने पढ़ने को
कहीं को भी कभी भी
चला जाता हूं ।

गुरुवार, 28 जून 2012

दीवाने/बेगाने

चाँद
सोचना

चाँदनी
खोदना

तारों की
सवारी

फूलों पर
लोटना


तितलियों
को देख

खुश
हो जाना

मोरनियाँ
पास आयें

मोर
हो जाना

पंख फैलाना
नाच दिखाना

आँखे कहीं
दिख जायें

बिना देखे
कूद जाना

तैरना
आता हो

तब भी
डूब जाना


किसी और
को पिलाना

बहक खुद
ही जाना

जमाना
तो है ऎसे 

ही दीवानो
का दीवाना


लकड़ी की
सोचना

मकड़ियों
को देखना

सीधा कोई
मिल जाये

टेढ़ा हो जाना

मिट्टी तेल
की ढिबरी

से चाँद
तारे बनाना

जब तक
पडे़ नहीं

बैचेनी
दिखाना

पड़ी में
दो लात

ऊपर
से खाना

गधे की
सोचना

शुतुरमुर्ग
हो जाना


किसी के
भी फटे में

जाकर के
टांग अढ़ाना

किसकी
समझ में

आता है
ऎसों
का गाना

टूटे फूटे इन
बेगानों को

किसने है
मुँह लगाना।