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बुधवार, 13 सितंबर 2017

हजार के ऊपर दो सौ पचास हो गये बहुत हो गया करने के लिये तो और भी काम हैं

कुछ रोज के
दिखने से
परेशान हैं
कुछ रोज के
लिखने से
परेशान हैं
गली से शहर
तक के सारे
आवारा कुत्ते
एक दूसरे
की जान हैं

किस ने
लिखनी हैं
सारी
अजीब बातें
दिल खोल कर
छोटे दिल की
थोड़ा सा
लिख देने से
बड़े दिल
वाले हैरान हैं

बकरियाँ
कर गयी हैं
कल से तौबा
घास खाने से
खड़ी कर अपनी
पिछली टाँगे
एक एक की
एक नहीं कई हैं
घर में ही हैं
खुद की ही हैं
घास की दुकान हैं

पढ़ना लिखे को
समझना लिखे को
पढ़कर समझकर
कहना किसी को
नयी बात कुछ
भी नहीं है इसमें
आज की आदत है
आदत बहुत आम है

 कोई
शक नहीं
‘उलूक’
सूचना मिले
घर की दीवारों
पर चिपकी
किसी दिन
शेर लिखना
उल्लुओं का नहीं
शायरों का काम है ।

 चित्र साभार: Fotosearch

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

फैसले के ऊपर चढ़ गई अधिसूचना एक पैग जरा और खींच ना

उच्च न्यायालय
राष्ट्रीय राज मार्ग
शटर गिराये
शराब की दुकानें
पता नहीं क्यों
अबकि बार

शहर की
बदनाम गली
गली से सटी
स्कूल की
चाहरदीवार


दोनों के बीच
में फालतू में
तनी खड़ी
बेकार
बेचती बाजार

बाजार में
फड़बाजों का शोर

आलू बीस के
ढाई किलो
आलू बीस
के तीन किलो
ले लो जनाब ले लो

मौका हाथ से
निकल जायेगा
कल तक सारा
आलू खत्म
हो जायेगा
फिर भी गरीब
खरीदने को
नहीं तैयार

शराब की
किल्लत की मार

सड़क पर
लड़खड़ाते
शाम के समय
घर को वापस जाते
दिहाड़ी मजदूर

जेब पहले से
ज्यादा हलकी
चौथाई के पैसे
की जगह
पूरे के पैसे
देने को मजबूर

चुनाव में पिया
धीरे धीरे
उतरता हुआ नशा
पहाड़ के जंगलों में
जगह जगह बिखरी
खाली बोतलें
पता नहीं चला
अभी तक
पिलाने वाले
और पीने वाले
में से कौन फंसा

पुरानी सरकार
की पुरानी बोतलों
का पुराना पानी
नयी सरकार की
नयी बोतलों
की चढ़ती जवानी

अभी अभी पैदा
हुये विकास की
दौड़ती
कड़क सड़क
को भड़कते हुऐ
लचीला करती
अधिसूचना

राष्ट्रीय राजमार्गों
के खुद के
रंगीन कपड़ों को
उनका
खुद ही नोचना

जीभ से अपने ही
होंठों को खुद ही
तर करता

शराफत की मेज
में खुली विदेशी
सोचता ‘उलूक’

चार स्तम्भों को
एक दूसरे को
नोचता हुआ
आजकल सपने
में देखता ‘उलूक’

चित्र साभार: The Sanctuary Model

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

शव का इंतजार नहीं शमशान का खुला रहना जरूरी होता है

हाँ भाई हाँ
होने होने की
बात होती है
कभी पहले सुबह
और उसके बाद
रात होती है
कभी रात पहले
और सुबह उसके
बाद होती है
फर्क किसी को
नहीं पड़ता है
होने को जमीन से
आसमान की ओर
भी अगर कभी
बरसात होती है
होता है और कई
बार होता है
दुकान का शटर
ऊपर उठा होता है
दुकानदार अपने
पूरे जत्थे के साथ
छुट्टी पर गया होता है
छुट्टी लेना सभी का
अपना अपना
अधिकार होता है
खाली पड़ी दुकानों
से भी बाजार होता है
ग्राहक का भी अपना
एक प्रकार होता है
एक खाली बाजार
देखने के लिये
आता जाता है
एक बस खाली
खरीददार होता है
होना ना होना
होता है नहीं
भी होता है
खाली दुकान को
खोलना ज्यादा
जरूरी होता है
कभी दुकान
खुली होती है और
बेचने के लिये कुछ
भी नहीं होता है
दुकानदार कहीं
दूसरी ओर कुछ
अपने लिये कुछ
और खरीदने
गया होता है
बहुत कुछ होता है
यहाँ होता है या
वहाँ होता है
गन्दी आदत है
बेशरम ‘उलूक’ की
नहीं दिखता है
दिन में उसे
फिर भी देखा और
सुना कह रहा होता है ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

सोमवार, 21 सितंबर 2015

दुकान के अंदर एक और दुकान को खोला जाये

जब दुकान
खोल ही
ली जाये
तो फिर क्यों
देखा जाये
इधर उधर
बस बेचने की
सोची जाये

दुकान का
बिक जाये
तो बहुत
ही अच्छा
नहीं बिके
अपना माल
किसी और
का बेचा जाये

रोज उठाया
जाये शटर
एक समय
और
एक समय
आकर गिराया
भी जाये

कहाँ लिखा है
जरूरी है
रोज का रोज
कुछ ना कुछ
बिक बिका
ही जाये

खरीददार
अपनी जरूरत
के हिसाब से
अपनी बाजार की
अपनी दुकान पर
आये और जाये

दुकानदार
धार दे अपनी
दुकानदारी
की तलवार को
अकेला ना
काट सके
अगर बीमार
के ही अनार को
अपने जैसे
लम्बे समय के
ठोके बजाये
साथियों को
साथ में लेकर
किसी खेत
में जा कर
हल जोत
ले जाये

कौन देख रहा है
क्या बिक रहा है
किसे पड़ी है
कहाँ का
बिक रहा है
खरीदने की
आदत से
आदतन
कुछ भी
कहीं भी
खरीदा जाये

माल
अपनी दुकान
का ना बिके
थोड़ा सा
दिमाग लगा कर
पैकिंग का
लिफाफा
बदला जाये

मालिक की
दुकान के
अंदर खोल
कर एक
अपनी दुकान
दुकान के
मालिक का
माल मुफ्त में
एक के साथ एक
बेचा जाये

मालिक से
की जाये
मुस्कुरा कर
मुफ्त के बिके
माल की बात

साथ में
बिके हुऐ
दुकान के
माल से
अपनी और
ठोके पीटे
साथियों की
पीछे की
जेब को
गुनगुने नोटों
की गर्मी से
थोड़ा थोड़ा
रोज का रोज
गुनगुना
सेका जाये ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

सोमवार, 15 जून 2015

मुद्दा पाप और मुद्दा श्राप

पापों को धोने
का साबुन
अगर बाजार में
उतारा जायेगा
कोई बतायेगा
आज के दिन
उस साबुन का
नाम किसके
नाम पर
रखा जायेगा
साबुन बिकेंगे
अपने ही पूरे
देश में या
विदेशों में
ले जा कर भी
बेचा जायेगा
सीधे सीधे
खरीदेगा आदमी
साबुन खुद
अपने लिये
जा कर किसी
दुकान से या
राशन कार्ड में
दिलवाया जायेगा
बहुत सी बातें हैं
नई नई आती हैं
अंदाज नहीं
लग पाता है
किसको कितना
भाव दिया जायेगा
पाप के साथ
श्राप भी बिकने
की चीज है
बड़ी काम की
पुराने युगों की
श्राप देने लेने
का फैशन भी
क्या कभी लौट
कर आयेगा
पापी बेचेगा श्राप
खुद बनाकर
अपनी दुकान पर
या गलती से किसी
ईमानदार के हाथ
में ठेका लग जायेगा
कितने तरह के श्राप
बिकेंगे बाजार में
किसके नाम का श्राप
सबसे खतरनाक
माना जायेगा ?

चित्र साभार: churchhousecollection.blogspot.com

गुरुवार, 14 मई 2015

समझदार एक जगह टिक कर अपनी दुकान नहीं लगा रहा है

किसलिये
हुआ जाये
एक अखबार

 क्यों सुनाई
जाये खबरें
रोज वही
जमी जमाई दो चार

क्यों बताई
जाये शहर
की बातें
शहर वालों को हर बार

क्यों ना
कुछ दिन
शहर से
हो लिया जाये फरार

वो भी यही
करता है
करता आ
रहा है

यहाँ जब
कुछ कहीं
नहीं कर
पा रहा है

कभी इस शहर
तो कभी उस शहर
चला जा रहा है

घर की खबर
घर वाले सुन
और सुना रहे हैं

वो अपनी खबरों
को इधर उधर
फैला रहा है

सीखना चाहिये
इस सब में भी
बहुत कुछ है
सीखने के लिये ‘उलूक’

बस एक तुझी से
कुछ नहीं
हो पा रहा है

यहाँ बहुत
हो गया है
अब तेरी
खबरों का ढेर

कभी तू भी
उसकी तरह
अपनी खबरों
को लेकर

कुछ दिन
देशाटन
करने को
क्यों नहीं
चला जा रहा है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

इक्तीस दिसम्बर इस साल नहीं आ पाये सरकार के इस फरमान का मान रखें

ख्याल रखें
नया साल
इस साल
मनाने की
सोच कर
अपने लिये
पैदा नहीं करें
कोई बबाल
तुगलक और
उसके फरमानों
की फेहरिस्त
लिख लिखा कर
कहीं पैंट की जेब
में सँभाल रखें
इक्तीस दिसम्बर
को पूजा करें
हनुमान जी
का ध्यान धरें
राम नामी
माला ओढ़ कर
तुलसी माला के
108 दाने
दूध में धो कर
धूप में सुखाकर
जनता को कुछ
नया कर दिखाने
का मन ही
मन ठान रखें
बीमार नहीं होना है
छुट्टी नहीं लेनी है
पीने पिलाने का
कार्यक्रम करें
कोई रोक नहीं है
परदा लगा
कर एक मोटा
इक्तीस को
छोड़ कर
किसी और दिन
अपने घर से
कहीं दूर किसी
और की गली में
करते समय
ध्यान से अपने
चेहरे पर एक
रुमाल रखें
जनता के लिये
जनता के द्वारा
जनता के बीच
जनता के साथ
तुगलक के
नये वर्ष की
तुगलकी
एक जनवरी
साल के किसी
तीसरे या चौथे
महीने से शुरु
करते हुऐ
उम्मीदों को
खरीदने बेचने
की एक
नई दुकान की
नई पहल के
नये फरमान
का कुछ
तो मान रखें ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

बुधवार, 5 नवंबर 2014

हद हो गई बेशर्मी की देखिये तो जरा ‘उलूक’ को रविवार के दिन भी बेवकूफ की तरह मुस्कुराता हुआ दुकान खोलने चला आयेगा

कुछ दिन के लिये
छुट्टी पर चला जा
इधर उधर घूम
घाम कर आ जा
कुछ देख दाख
कर आयेगा
शायद उसके बाद
तुझसे कुछ अच्छा सा
कुछ लिख लिया जायेगा
सब के लिखने को
नहीं देखता है
हर एक लिखने
वाले की एक
सोच होती है
जब भी कुछ
लिखना होता है
कुछ ना कुछ
सोच कर ही
लिखता है
किसी सोच पर
लिखता है
तेरे से लगता है
कुछ कभी नहीं
हो पायेगा
तेरा लिखना
इसी तरह
हर जगह
कूड़ा करेगा
फैलता ही
चला जायेगा
झाड़ू सारे
व्यस्त हैं
पूरे देश के
तू अपनी
आदत से बाज
नहीं आयेगा
बिना किसी सोच के
बिना सोचे समझे
इसी तरह लेखन को
दो मिनट की मैगी
बना ले जायेगा
एक दिन
खायेगा आदमी
दो दिन खायेगा
आखिर हो ही
जायेगी बदहजमी
एक ना एक दिन
तेरे लिखे लिखाये
को देख कर ही
कुछ इधर को और
कुछ उधर को
भाग निकलने
के लिये हर कोई
कसमसायेगा
किसी डाक्टर ने
नहीं कहा है
रोज ही कुछ
लिखना है
बहुत जरूरी
नहीं तो बीमार
सीमार पढ़ जायेगा
अपनी ही अपनी
सोचने की सोच से
थोड़ा बाहर
निकल कर देख
यहाँ आने जाने
वाला बहुत
मुस्कुरायेगा
अगर सफेद पन्ने
के ऊपर सफेदी ही सफेदी
कुछ दिनों के लिये तू
यूँ ही छोड़ जायेगा
बहुत ही अच्छा होगा
‘उलूक’ सच में अगर
तू कुछ दिनों के लिये
यहाँ आने के बजाय
कहीं और को चला जायेगा ।

चित्र साभार: http://www.bandhymns.com

रविवार, 31 अगस्त 2014

बन रही हैं दुकाने अभी जल्दी ही बाजार सजेगा

सपने देखने
में भी सुना है
जल्दी ही एक
कर लगेगा
सपने बेचने
खरीदने का
उद्योग इसका
मतलब कुछ
ऐसा लगता है
खूब ही फलेगा
और फूलेगा
लम्बी दूरी की
मिसाइल की
तरह बहुत दूर
तक मार करेगा
आज का देखा
एक ही सपना
कई सालों तक
जिंदा भी रहेगा
कुछ ही समय
पहले किसने
सोचा था ऐसा भी
इतनी जल्दी ही
ये होने लगेगा
कितनी बेवकूफी
कर रहे थे इससे
पहले के सपने
दिखाने वाले लोग
अब पछता रहे होंगे
सोच सोच के
टिकाऊ सपने
बना के दिखाने
वाले का धंधा
इतनी जोर शोर
से थोड़े से समय में
ही चल निकलेगा
सपने आते ही
आँख बंद करने
लगा था ‘उलूक’
भी कुछ दिनो से
लगता है ये सब
सुन कर अब
सोने के बाद
अपनी आँखे
आधी या पूरी
खुली रखेगा ।

चित्र: गूगल से साभार ।

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

दुकानों की दुकान लिखने लिखाने की दुकान हो जाये

क्या ऐसा भी
संभव है
कि किसी दिन
लिखने लिखाने
के विषय ही
खत्म हो जायें
क्या लिखें
किस पर लिखें
कैसे लिखें
क्यों लिखें
जैसे विषय भी
दुकान पर किसी
बिकना शुरु हो जायें
लिखने लिखाने
के भी शेयर बनें
और स्टोक मार्केट में
खरीदे और बेचे जायें
लेखकों के बाजार हों
लेखकों की दुकान हों
लेखकों के मॉल हों
लेखक माला माल हों
लेखक ही दुकानदार हों
लेखक ही खरीददार हों
माँग और पूर्ति
के हिसाब से
लिखने लिखाने की
बात होना शुरु हो जाये
जरूरतें बढ़े
लिखने लिखाने
पढ़ने पढ़ाने की
लेखक व्यापारी और
लेखन बड़ा एक
व्यापार हो जाये
सपने देखने से
किसने किसको
रोका है आज तक
क्या पता
माईक्रोसोफ्ट या
गूगल की तरह
लिखना लिखाना
सरे आम हो जाये
‘उलूक’ नजर अपनी
गड़ाये रखना
क्या पता तेरे लिये भी
कभी अपनी उटपटांग
सोच के कारण ही
किसी लिखने लिखाने
वाली कम्पनी के
अरबपति सी ई ओ
होने का पैगाम आ जाये ।
(लेखकों की राय
आमंत्रित है
'उलूक' नहीं
गूगल पूछ रहा है
आजकल सबको
मेल भेज भेज कर :) )

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

एक ही जैसी कहानी कई जगह पर एक ही तरह से लिखी जाती है कोई याद दिलाये याद आ जाती है

घर से शहर की
तरफ निकलते
एक चौराहा
हमेशा मिलता है
जैसे बहुत ही
नजदीक का कोई
रिश्ता रखता है
चौराहे के पास
पहुँचते ही हमेशा
सोचा जाता है
किस रास्ते से
अब चला जाये
सोचा ही जाता है
एक थोड़ा सा लम्बा
पर धीमी चढ़ाई
दूसरी ऊँची सीढ़ियाँ
नाम बावन सीढ़ी
पता नहीं कभी
रही होंगी बावन
पर अब गिनते
गिनते छप्पन
कभी ध्यान हटा
गिनने से तो
अठावन भी
हो जाती हैं
दो चार सीढ़ियाँ
ऊपर नीचे गिनती
में हो जाने से
कोई खास परेशानी
होती हो ऐसी भी
बात कभी कहीं
नजर नहीं आती है
पर कुछ जगहें
बहुत सी खास
बातों को लिये हुऐ
एक इतिहास ही
हो जाती हैं
भूगोल बदलता
चला जाता है
कुछ पुरानी बातें
कभी अचानक
एक दिन कब
सामने आ कर
खड़ी हो जाती हैं
बता के नहीं
आ पाती हैं
'बाबू जी दो रुपिये
दो चाय पियूँगी'
नगरपालिका की
एक पुरानी
सफाई कर्मचारी
हाथ फैलाती थी
पैसे मिले नहीं
आशीर्वादों की झड़ी
शुरु हो जाती थी
क्या मजबूरी थी
क्यों आती थी
उसी जगह पर
एक गली
शराब की दुकान
की तरफ भी
चली जाती थी
बहुत से लोग
निकलते थे
निकलते ही
चले जाते थे
कुछ नहीं देते थे
बस कहते जाते थे
क्यों दे रहे हो
शाम होते ही ये
शराब पीने को
चली जाती है
पर कभी देखी
नहीं किसी जगह
कोई औरत भी
लड़खड़ाती है
बहुत दिन से
खयाल किया है
इधर बुढ़िया अब
नजर नहीं आती है
सीढ़िया चढ़नी
ही पड़ती हैं
अक्सर चढ़ी जाती हैं
छोर पर पहुँचते
पहुँचते अँगुलियाँ
जेब में सिक्के
टटोलने शुरु
हो जाती हैं
पान से लाल
किये होठों वाली
उस औरत का
ख्याल आते ही
नजर शराब की
दुकान की तरफ
जाने वाली गली
की तरफ अनजाने
में मुड़ जाती हैं
पता नहीं किस
की सोच का
असर सोच
को ये सब
करवाती है ।

रविवार, 12 जनवरी 2014

मिर्ची क्यों लग रही है अगर तेरी दुकान के बगल में कोई नयी दुकान लगा रहा है

माना कि नई दुकान
एक पुरानी दुकानों के
बाजार में घुस कर
कोई खोल बैठा है
पुराना ग्राहक इतने से
में ही पता नहीं क्यों
आपा खो बैठा है
खरीदता है सामान
भी अपनी ही दुकान
से धेले भर का
नई दुकान के नये
ग्राहकों को खाली पीली
धौंस पता नहीं
क्यों इतना देता है
अपने मतलब के समय
एक दुकानदार दूसरे
दुकानदार को माल
भी जो चाहे दे देता है
ग्राहक एक का
बेवकूफ जैसा
दूसरे के ग्राहक से
खाली पीली में
ही उलझ लेता है
पचास साठ सालों से
एक्स्पायरी का सामान
ग्राहकों को भिड़ा रहे हैं
ऐसे दुकानदारों के
कैलेण्डर ग्राहक
अपने अपने घर पर
जरूर लगा रहे हैं
माल सारा दुकानदारों
के खातों में ही
फिसल के जा रहा है
बाजार चढ़ते चढ़ते
बैठा दिया जा रहा है
नफा ही नफा हो रहा है
पुरानी दुकानों को
थोड़ा बहुत कमीशन
ग्राहकों में अपने अपने
पहुंचा दिया जा रहा है
ग्राहक लगे हैं अपनी
अपनी दुकानो के
विज्ञापन सजाने में
कोई अपने घर का
कोई बाजार का माल
यूं ही लुटा रहा है
क्या फर्क पड़ता है
ऐसे में अगर कोई
एक नई दुकान
कुछ दिन के लिये
ही सही यहाँ लगा रहा है
खरीदो आप अपनी ही
दुकान का कैसा भी सामान
क्यों चिढ़ रहे हो
अगर कोई नई दुकान
की तरफ जा रहा है
बाजार लुट रही है
कब से पता है तुम्हें भी
फिर आज ही सबको
रोना सा क्यों आ रहा है
बहुत जरूरी हो गया है
अब इस बाजार में
एक अकेला कैसे
सारी बाजार को लूट कर
अपनो में ही कमीशन
बटवा रहा हैं
तुम करते रहो धंदा
अपने इलाके में
अपने हिसाब से
एक नये दुकानदार की
दुकानदारी कुछ दिन
देख लेने में
किसी का क्या
जा रहा है !

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

दुकान नहीं थी फिर भी दुकानदार कह कर बुलाया

अगला बहुत गुस्से में
मुझे आज नजर आया
इस बात पर कि फंला
ने उसको दुकानदार
कह कर बुलाया
पूछने का तमीज जैसे
पूछने वाला अपने
घर छोड़ के हो आया
धंधा कैसा चल रहा है
जैसे प्रश्न एक शरीफ के
सामने दागने की हिम्मत
पता नहीं कैसे कर पाया
ये भी नहीं सोच पाया
इतनी सारी उपाधियां
जमा करने के कारण ही
तो कोई नीचे से ऊपर
तक है पहुंच पाया
बड़बड़ करते हुऐ
उसके निकलते ही
सामने से मुझे
अपने अंदर से
निकलता हुआ एक
दुकानदार नजर आया
मौका मिलते ही कुछ
बेच डालने के हुनरमंद
लोगों का खयाल आया
थोड़ा ईमान थोड़ा जमीर
बेचने का मौका आज के
समय पर थोड़ा थोड़ा तो
हर किसी ने कभी
ना कभी है पाया
ये बात अलग है
एक पक्की दुकान
बनाने की हिम्मत
कोई नहीं कर पाया
क्योंकि रोज के धंधे की
ईमानदारी के बुर्के की
आड़ को छोड़ने का
रिस्क लेने का थोड़ा सा
साहस बस नहीं कर पाया ।

बुधवार, 7 अगस्त 2013

कुछ उंचे नाम ढूंढ दुकान करेगी बूम

कुछ अच्छा कुछ नया
करने की इच्छा ही
कुछ कुछ करवाती है
ये बात जब सामने
दिखती है तभी जाकर
कुछ समझ में आती है
पलटते हुऎ कल रात
एक पत्रिका एक से
बढ़कर एक लेख
कविता कहानियों
से रूबरू हुआ
नयी चीज से एक
और सामना हुआ
बहुत से नामों की
सूची भी उसमें
दिखाई गई थी
पढ़ रहे हैं ये लोग
इस पत्रिका को
और जीवन भर
मंगा भी रहे हैं
पढ़ने के लिये
ये बात भी
समझाई गई थी
यही चीज पत्रिका
का भार एकदम
से दुगना किये
जा रही थी
एक जमाने में
पता ही नहीं
चल पाता था
कि कौन कौन
कौन सी पत्रिकाऎं
अपने घर के पते
पर मंगवाता था
बिरला ही दुकान
से खरीदता हुआ
कभी दिख पाता था
सभी दुकानदारों को
इस तरीके को
अपना लेना चाहिये
दुकान में अपने
ग्राहकों का फोटो
परिचय पत्र भी
लगवाना चाहिये
कौन ले जाता है
मूँगफली और
कौन ले जा
रहा है बादाम
बस ये ही नहीं
बताना चाहिये
ग्राहक तो खुश
होगा ही बहुत
सामान दुगना
ले जाना शुरु
हो जायेगा
ये ले जा रहा है
कुछ यहाँ से तो
वो भी ले जाना
शुरु हो जायेगा
कितना सरल
तरीका मिला है
एक भारी ग्राहक
का नाम दुकान के
ऊपर लिखने से
दुकान का नाम
ऊँचा हो जायेगा
समझ भी लो अब
क्या होगा अगर
बहुत से भारी भारी
नामों से दुकान का
बोर्ड पट जायेगा ।

शनिवार, 27 जुलाई 2013

लिखने से कोई विद्वान नहीं होता है

सम्पादक जी
को देखते ही
साथ में किसी
जगह कहीं

मित्र से रहा
नहीं गया

कह बैठे
यूँ ही

भाई जी
ये भी
लिख रहे हैं
कुछ कुछ
आजकल

कुछ
कीजिये
इन पर
भी कृपा

कहीं
पीछे पीछे
के पृष्ठ पर
ही सही
थोड़ा सा
इनका कुछ
छापकर

क्या पता
किसी के
कुछ समझ में
भी आ जाये

ऎसे ही कभी
बड़ी ना सही
कोई छोटी
सी दुकान

लिखने पढ़ने
की इनकी
भी कहीं
किसी कोने
में एक
खुल जाये

मित्रवर की
इस बात पर
उमड़ आया
बहुत प्यार

मन ही मन
किया उनका
आभार

फिर मित्र को
समझाने के
लिये बताया

पत्रिका में
जो छपता है
वो तो
कविता
या लेख
होता है

विद्वानो
के द्वारा
विद्वानो
के लिये
लिखा हुआ
एक संकेत
होता है

आप मेरे को
वहाँ कहाँ
अढ़ा रहे हो

शनील के
कपडे़ में
टाट का 

टल्ला क्यों
लगा रहे हो

मेरा लिखना
कभी भी
कविता या लेख
नहीं होता है

वो तो बस
मेरे द्वारा
अपने ही
आस पास
देखी
समझी गयी
कहानी का 
एक पेज
होता है

और
आस पास
इतना कुछ
होता है
जैसे खाद
बनाने के लिये
कूडे़ का एक
ढेर होता है

रोज अपने
पास इसलिये
लिखने के लिये
कुछ ना कुछ
जरूर होता है

यहाँ आ कर
लिख लेता हूँ
क्योंकि
यहाँ लिखने
के लिये ही
बस एक
विद्वान होना
जरूरी नहीं
होता है

खुद की
समझ में
भी नहीं
आती हैंं
कई बार
कई बात 

उसको भी
कह देने से
किसी को
कोई भी
कहाँ यहाँ
परहेज
होता है

विद्वान लोग
कुछ भी
नहीं लिख
देते हैं

'उलूक'
कुछ भी
लिख देता है

और
उसका
कुछ मतलब
निकल ही
आये ये
जरूरी भी
नहीं होता है ।

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

सामान नहीं बस दुकानदार चाहिये

राशन की
दुकान पर
हो रही
मारामार हो
गैस और
कैरोसिन
के लिये
लगी लम्बी
कहीं एक
कतार हो

जब प्रश्न
जीवन और
जीने का
हो जाता है
जरूरी होता है
इसलिये
भीड़ होने
के बावजूद
हर कोई
चला जाता है

दूसरी तरफ
एक भीड़
उस दुकान
पर जाकर
पता नहीं
कोई क्यों
लगाता है

जहां होता
है बस
काम में
ना आने वाला
ढेर सारा
कुछ सामान

कुछ सड़
गया होता है
और
बचा हुआ
आउट
आफ डेट
हो गया
होता है

राशन
और
कैरोसिन
लेने
जाने वाला
उस दुकान
के बगल से
गुजर के
रोज जाता है
थोड़ा दिमाग
लगाता है
उसको
साफ साफ
अंदाज
आ जाता है

इस तरह की
दुकानों पर
हर कोई
सामान ही
खरीदने
को नहीं
आता है

कोई दिखाने
के लिये
चिड़िया के
पंख खरीद
भी अगर
ले जाता है

असली में
वो तो
दुकानदार
के लिये
वहाँ जाता है

उसके बाद
फिर कोई
प्रश्न किसी
के दिमाग में
कहाँ रह
जाता है ।

मंगलवार, 12 जून 2012

विद्वान की दुकान

विद्वानो की छाया तक
भी नहीं पहुंच पाया
तो विद्वता कहाँ
से दिखा पाउंगा
कवि की पूँछ भी
नहीं हो सकता
तो कविता भी
नहीं कर पाउंगा
विचार तो थोड़े से
दिमाग वाले के भी
कुछ उधार ले दे के
भी पनप जाते हैं
कच्ची जलेबियाँ पकाने
की कोशिश जरूर करूंगा
हलुआ गुड़ का कम से कम
बना ही ले जाउंगा
भैया जी आपकी
परेशानी बेवजह है
किसी लेखन प्रतियोगिता
में भाग नहीं ही
कभी लगाउंगा
अब जब दुकान
खोल के बैठ ही गया
हूँ इस बाजार में
तो किसी ना किसी
तरह जरूर चलाउंगा
कहाँ कहाँ पिट पिटा
के आउंगा मलहम
कौन सा उसके बाद
हकीम लुकमान से
बनवा के लगवाउंगा
अब बोलचाल की
भाषा में ही तो यहाँ
आ के बता पाउंगा
किसी से कहलवा कर
पैसे जेब के लगवाकर
आई एस बी एन नम्बर
वाली कोई किताब भगवान
कसम नहीं छपवाउंगा
चिंता ना करें किसी नयी
विधा का अपने नाम से
जन्म/नामकरण हुवा है
कहकर कोई नया
सेल्फ फाईनेंस कोर्स
भी नहीं कहीं चलवाउंगा
आप अपनी दुकान की
चिंता करिये जनाब
अपने धंधे से आपके
व्यवसाय के रास्ते में
रोड़े नहीं बिछाउंगा
कोई नुकसान आपकी
विद्वता को मैं अनपढ़
बताइये कैसे पहुंचाउंगा।

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

"पप्पू और दुकान "

पप्पू की दुकान में
अब कोई नहीं आता
पिछली सरकार से
पप्पू का था कुछ नाता
पप्पू पाँच साल तक रहा
पुराना राशन बिकवाता
सभी संभ्रांत लोगों को
पप्पू था बहुत ही भाता
ज्यादातर लोगों का
पप्पू की दुकान तक
इसीलिये दिनभर में
एक चक्कर तो था
लग ही जाता
पप्पू का दीदार एकबार
होना ही खाना पचा पाता
जब से सरकार बदली है
अपने कर्मों से अभी तक
भी नहीं वो संभली है
पता नहीं चल पा रहा
ऊँट किस करवट
बैठने को है जाता
कौन सा दुकानदार
अबकी बार सरकार में
है कुछ पैठ बनाता
बुद्धिजीवी शाँत हो गया
कुछ नहीं है वो बताता
पप्पू भी अब दुकान में
बहुत कम ही है जाता
पप्पू की दुकान में
अब कोई नहीं आता।

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

अ धन ब का वर्ग

परीक्षाऎं हो गयी हैं शुरु
मौका मिलता है
साल में एक बार
मुलाकातें होती हैं
बहुत सी बातें होती हैं
बहुत से सद्स्यों की
टीम में एक हैं
मेरे आदरणीय गुरू
उनको बहुत कुछ
वाकई में आता है
प्रोफेसर साहब से रहा
नहीं जाता है
पढाने लिखाने की
आदत पुरानी है
किसी से कहीं भी
उन के द्वारा कुछ भी
पूछ ही लिया जाता है
कल की बात आज
वो खाली समय में
बता रहे थे
क्या होता जा रहा है
आज के बच्चों को
समझा रहे थे
सर में वैसे तो उनके
बाल बहुत कम दिखाई देते हैं
पर नाई की दुकान का
वर्णन वो अपनी कथाओं
में जरुर ले ही लेते हैं
बोले कल मैं जब एक
नाई की दुकान में गया
कक्षा नौ में पढ़ने वाली
एक बच्ची ने प्रवेश किया
नाई को बौय कट बाल
काटने का आदेश दिया
बच्ची बाल कटवा रही थी
मेरे दिमाग की नसें
प्रश्नो को घुमा रही थी
आदत से मजबूर मैं
अपने को रोक नहीं पाया
बच्ची के सामने एक प्रश्न
पूछने के लिये लाया
बेटी क्या तुम अ धन ब
का वर्ग कितना होगा
मुझे बता सकती हो
बच्ची मुस्कुराई
उसने नाई की कैंची
चेहरे के ऊपर से हटवाई
बोलते हुवे चेहरा अपना घुमाई
अरे अंकल आप तो
बड़ी कक्षाओं को पढ़ाते हो
ये फालतू के प्रश्न कैसे
अब सोच पाते हो
कैल्कुलेटर का जमाना है
बटन सिर्फ एक दबाना है
किस को पड़ी है अ या ब की
हमारी पीढी़ को तो राकेट
कल परसों में हो जाना है
तो फालतू में अ धन ब
फिर उसपर उसका वर्ग
करने काहे जाना है।

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

बाबा

पत्रकार मित्र
कई दिन से
पाल रहे थे
अपने मन में
एक विचार
भारत में
फलते फूलते
बाबा बाजार
को देख कर
उत्साहित
हो रहे थे
दिन में एक
नहीं कई बार
किसी एक दिन
दुकान पर बैठे
अखबारी मित्र
से कर रहे थे
मगन हो कर
इसी विषय पर
कुछ विचार

भूला भटका
पहुँच बैठा 

मैं भी उधर
पूछते पूछते
कटहल का
मीठा अचार
पहुंचते ही मेरे
मित्र के मित्र ने
मेरा किया
ऊपर से नीचे
तक मुआयना
और
पेश किया
फिर
तुरत फुरत
अपना विचार
ये कब हो
रहे हैं रिटायर
इनसे भी तो
काम चलाया
जा सकता है
एक सटीक
और मस्त बाबा
इनको भी
तो बनाया
जा सकता है

बस ये जबान
नहीं खोलेंगे
बाकी जनता
को तो हम
खुद ही धो लेंगे
मित्र ने
दिया जवाब
बहुत ही
लाजवाब
रिटायर होने
की प्रक्रिया
इन लोगों के
यहाँ धीरे धीरे
बंद ही हो
जाने वाली है
अभी ये पैंसठ
पर अढ़े हुवे हैं
उसके बार मरने
मरने तक की
जाने वाली है

अभी सरकार
से बोल रहे हैं
नहीं होंगे रिटायर
उसके बाद
भगवान की भी
बारी आने वाली है
भगवान से भी
ये कहने वाले हैं
तू हमे नहीं
उठा सकता
इस धरती से अभी
हम ऊपर नहीं
आने वाले हैं
वैसे भी बाबा
के कारोबार
और
इनकी दुकान
में मिलता है
एक तरह का
ही सामान
ये पढ़ाने लिखाने
के धंधे से
अनपढों को पैदा
करते जा रहे हैं
उधर इनकी
उगाई फसल से
बाबा लोग अपनी
फैक्ट्री चला रहे हैंं 
मेरी समझ में
भी कुछ कुछ
आने लगा था
विचार मित्र
का धीरे धीरे
पैठ मन में
बनाने लगा था

क्या नुकसान है
अगर मैं बाबा
भी बन जाता हूँ
कालेज में
वैसे भी
कक्षा में
जा कर भी
कहाँ कुछ
पढ़ा पाता हूँ
हाँ
अखबार वालोंं
बुला बुला कर
फोटो जरूर
छपवाता हूँ
बाबा बन जाउंगा
तो सारे काम
अपने आप ही
होते चले जायेंगे
मित्र लोग मेरे
मेरे लिये भीड़
को जुटवायेंगे
पत्रकार हैं तो
फोटो के लिये
भी किसी को
बुलाना
नहीं पड़ेगा
मौन रहना ही है
इशारे से 

ही काम
चलाना पड़ेगा

चल पड़ी
तो विदेश
जाने का
मौका भी
बिना कुछ
करे कराये
चुटकियों में
हासिल
हो जायेगा
वीसा पास्पोर्ट
कोई बेवकूफ
बना बनाया
लाकर बिना
पैसे का
हाथ में
दे जायेगा

ढोंगी बाबा
'उलूक'
तुम भी यहीं
हम भी यहीं
देख भी लेना
हाँका लगाने
वाला मदारी
प्रिय जमूरों
की खातिर
बाबा उद्योग
का अध्यादेश
आज नहीं तो
कल किसी दिन
ले कर आयेगा
और
पक्का आयेगा।


चित्र साभार: www.jagran.com

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