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रविवार, 17 जून 2018

‘उलूक’ तू दो हजार में उन्नीस जोड़ या इक्कीस घटा तेरी बकवास करने की आदत का सरकार पेटेंट कराने फिर भी नहीं जा रही है

झंडों को 
हो रही

इधर की
बैचेनी

कुछ कुछ
समझ में
आ रही है

शहर में
आज एक
नयी भीड़

एक नये
रंग के
एक नये
झंडे के नीचे

एक नया
झंडा गीत
गा रही है

पुराने
झंडों के
आशीर्वादों
से भर चुके

झंडा
बरदारों
को नींद से

लग रहा है
जैसे
नयी हवा
जगा रही है

कुछ उस
रंग के झंडे
के नीचे से
कुछ ला कर

कुछ इस
रंग के झंडे
के नीचे से
कुछ ला कर

कुछ बेरंगे
हो चुके रंगों
में नया रंग

भरने
जा रही है

एक नये रंग
के झंडे का
पुराने झंडों
में से ही

मिल जुल कर
पैदा हो जाने
की खबर

कल के
अखबार के
मुख्य पृष्ठ पर
सुबह सुबह
आने जा रही है

अवसरवादियों
की बाँछें
फिर से एक बार
और जोर लगा कर
मुस्कुरा रही हैं

इस झंडे को
उठाने वालों को
उस झंडे को
उठाने वालों से

मिलजुल कर
रहने का अभ्यास
नये झंडे तले
करा रही हैं

लाल गेरुआ
नीला पीला
हरा बैगनी
की बात
करने की
रुत जा रही है

मेला नजदीक है
सुनाई दे रहा है

झंडों की
नई दुकाने
सजाने के लिये

फड़ों
की लाईन
लगायी
जा रही है

झंडों के
ठेकेदारों की
नयी योजना से

बेपेंदे के लौटों
के लुढ़कने की
आदत सुना है
बदलने जा रही है

झंडे खुश हैं
झंडा बरदार
भी खुश हैं

धीरे धीरे
हौले हौले
टोपियाँ
इस सर से
उस सर
की ओर
खिसकायी
जा रही हैं

‘उलूक’
तू दो हजार
में उन्नीस
जोड़ या
इक्कीस घटा

तेरी
बकवास
करने की
आदत का
सरकार
पेटेंट कराने
फिर भी
नहीं जा
रही है।

 चित्र साभार: www.dreamstime.com

मंगलवार, 8 मई 2018

टिप्पणियों पर बिफरते नये शेर को देख कर पुराने हो चुके भेड़ को कुछ तो कह देना हो रहा है

सब कुछ
एक साथ
नहीं दौड़ता है

टाँगें
कलम हो जायें
बहुत कम होता है

वजूका
खेत के बीच में
भी हो सकता है
कहीं किनारे पर
बस यूँ ही खड़ा
भी किया होता है

कहने लिखने को
रोज हर समय
कुछ ना कुछ
कहीं किसी
कोने में
जरूर होता है

लिखे हुऐ
सारे में से
जान बूझ कर
नहीं लिखा गया
कहीं ना कहीं
किसी पंक्ति
के बीच से
झाँक रहा होता है

समुन्दर
लिख लेने
के बाद
नदी लिखने
का मन
किसी का
होता होगा
पता कहाँ
चलता है

कलम की
पुरानी
स्याही को
नाले के पास
लोटे में धोना
और फिर
चटक धूप में
सुखा कर
नयी स्याही
भर लेना

एक पुराना
मुहावरा
हो चुका
होता है

नये मुल्ले
और
प्याज पर
लिखने से
दंगा भड़कने
का अंदेशा
हो रहा
होता है

रोज के
रोजनामचे
को लिखने
वाले ‘उलूक’
का दिल

साप्ताहिक
हो लेने
पर भी
बाग बाग
हो रहा
होता है

लिखना
लिखाना
और
उस पर
टिप्पणी
पाने की
लालसा पर

हमेशा
की तरह
नये सिपाही
का बंदूक
तानने पर

अपनी
पुरानी
जंक लगी
बन्दूक से
खुद का
फिर से
सामना
हो रहा
होता है

अपना लिखना
अपने लिखे को
अपना पढ़ लेना
समझ में आ जाना
सालों साल में

पुराने प्रश्न से
जैसे नया
सामना हो
रहा होता है ।

शनिवार, 17 जून 2017

अट्ठाईस लाख का घपला पुराना हो भी अगर घर का ‘उलूक’ किस लिये बिना सबूत नया नया रो रहा होता है

सोच कर
लिखे गये
कुछ को
पढ़ कर
कोई 
कुछ भी
सोच रहा
होता है

लिखे हुऐ पर
लिखने वाला
समय 
नहीं
लिख
 रहा
होता है 


किसे
पता होता है
सोचने से
लिखने तक
पहुँच लेने में
कितना समय
लग रहा होता है

होने का क्या है
हो चुका कुछ
आज ही नहीं
हो रहा होता है

पता हेी
नहीं होता है
बहुत बार
पहले भी
कुछ कुछ
ऐसा ही
कई बार
हो रहा
होता है

सोच कर
लिखना
कई बार
लगता है
सच में बहुत
बुरा हो
रहा होता है

अपने शहर
की बात
अपने शहर
के लोगों से
करना ठीक
नहीं हो
रहा होता है

खून हो
रहा होता है
किसी के
हाथों से
खुले आम
हो रहा
होता है
अपना ही
कोई कर
रहा होता है
कोई कुछ भी
नहीं कहीं
कह रहा
होता है

मरने वाले
शहर में
रोज ही मर
रहे होते हैं
एक दो
बाजार में
अगले दिन
दिखने वाला
उसके जैसे
कोई भी
भूत नहीं
हो रहा
होता है

लिखना बेवफाई
बेवफाओं के देश में

इस से बढ़ कर
बड़ा गुनाह
कोई नहीं
 हो रहा होता है

हिस्सेदारी में
नहीं लगे
लोगों को
कहने का
कोई
हक नहीं
हो रहा होता है

लुटेरे सफेदपोशों
की लूट का हिस्सा
उनके अपनों में
बट रहा होता है

रविश को भी
मिल रही
हैं गालियाँ
लोकतंत्र का
सबूत बन रही हैं
गाँधी भेी
गालियाँ
खा रहा है
इससे अच्छा
कुछ भी कहीं
नहीं हो
रहा होता है

 ‘उलूक’
बहुत ही गंदी
आदत होती है
तेरे जैसे
कहने वालों की
बहुत सा
बहुत अच्छा
रोज ही जब
अखबारों में
रोज ही हो
रहा होता है ।

चित्रसा भार: Credit Union Times

सोमवार, 29 मई 2017

बहुत तेजी से बदल रहा है इसलिये कहीं नहीं मिल रहा है

सुना है
बहुत कुछ
बहुत तेजी से
बदल रहा है

पुराना
कुछ भी
कहीं भी
नहीं चल
रहा है

जितना भी है
जो कुछ भी है
सभी कुछ
खुद बा खुद
नया नया
निकल रहा है

लिखना नहीं
सीख पाया
है बेवकूफ
तब से अब तक

लिखते लिखते
अब तक
लिखता
चल रहा है

बेशरम है
फिर से
लिख रहा है

कब तक
लिखेगा
क्या क्या
लिखेगा
कितना
लिखेगा
कुछ भी
पता नहीं
चल रहा 
है

पुराना
लिखा सब
डायरी से
बिखर कर

इधर
और उधर
गिरता हुआ
सब मिल
रहा है

गली
मोहल्ले
शहर में
बदनाम
चल रहा है

बहुत दूर
कहीं बहुत
बड़ा मगर
नाम चल
रहा है

सीखना
जरूरी
हो रहा है

लिख कर
बहुत दूर
भेज देना

गली
में लिखा
गली में

शहर
में लिखा
शहर में

बिना मौत
बस कुछ
यूँ ही
मर रहा है

लत लग
चुकी है
‘उलूक’ को

बाल की खाल
निकालने की

बाल मिल
रहा है मगर

खाल
पहले से
खुद की
खुद ही
निकाला हुआ
मिल रहा है ।

चित्र साभार: Inspirations for Living - blogger

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

रास्ते का खोना या खोना किसी का रास्ते में

किसी
जमाने में
रोज आते थे
और
बहुत आते थे

अब नहीं आते
और जरा सा
भी नहीं आते

रास्ते
इस शहर के
कुछ बोलते नहीं

जो
बोलते हैं कुछ
वो
कुछ बताते ही नहीं

उस जमाने में
किस लिये आये
किसी ने
पूछा ही नहीं

इस जमाने में
कैसे पूछे कोई
वो अब
मिलता ही नहीं

रास्ते वही
भीड़ वही
शोर वही

आने जाने
वालों में
कोई नया
दिख रहा हो
ऐसा जैसा
भी नहीं

सब
आ जा रहे हैं
उसी तरह से
उन्हीं रास्तों पर

बस
एक उसके
रास्ते का
किसी को
कुछ पता ही नहीं

क्या खोया
वो या
उसका रास्ता
किससे पूछे
कहाँ जा कर कोई

भरोसा
उठ गया
‘उलूक’
जमाने का

उससे भी
और
उसके
रास्तों से भी

पहली बार
सुना जब से
रास्ते को ही
साथ लेकर अपने
कहीं खो गया कोई ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

बापू इस पुण्यतिथी पर आप ही कुछ नया कर लीजिये

बापू अब तो
कुछ नया
कर लीजिये
बहुत पुरानी
हो गई
धोती आपकी
नई डिजायन
कर करवा कर
डिजायनर
कर लीजिये
इतना गरीब
भी नहीं रहा
अब देश कि
आप धोती से
ही बदन
छुपाते रहें
आठ दस लाख
की सिल्क धोती
कम से  कम
पहन कर
जनता के
सामने आने
की अपनी
आदत कर लीजिये
जन्मदिन के तोहफे
जन्मदिन पर फिर
सुझा देंगे आपको
अभी बहुत दिन हैं
पुण्यतिथी पर
पहनियेगा नहीं भी
कोई बात नहीं
खरीद कर
बिकवाने की बात
ही कर लीजिये
गुजरात की या
हिंदुस्तान की सफेद
धोती हो ये भी
जरूरी नहीं
कौन पूछ रहा है
ग्लोबलाइजेशन
का फंडा सिखा
कर लंदन से ही
आयात कर लीजिये
हमने तो ना
आप को देखा बापू
ना ही आपकी
धोती को कभी
कहीं नजर तो
आइये कभी
धोती हाथ में
लेकर ही सही
आमना सामना
तो कर लीजिये
आदत हो गई है
‘उलूक’ को अब
झूठ के साथ
सफल प्रयोग
कर लेने की
कुछ हमें कर
लेने दीजिये नया
नये जमाने की
नयी चोरियाँ
आप बस फोटो में
बने रहने की
अपनी आदत अब
पक्की कर लीजिये ।

चित्र साभार: shreyansjain100.blogspot.com

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

नया साल कुछ नये सवाल पुराने साल रखे अपने पास पुराने सवाल

शायद कोई
चमत्कार होगा
और जरूर होगा
पहले कभी
नहीं हुआ तो
क्या होता है
इस बार होगा
पक्का होगा
असरदार होगा
हो सकता है
दो या तीन
बार होगा
हमेशा होते
रहने की आशा
या सोच नहीं
पक रही है कहीं
खाली दिमाग
के किसी
बिना ईधन
के चूल्हे में
दो या तीन
नहीं भी सही
एक ही बार सही
क्या पता
वो इस बार होगा
हर साल आता है
नया साल
पुराने साल
के जाते ही
इस बार भी
आ गया है
आज ही आया है
पुराना हिसाब
वहीं पीछे
छोड़ के आया है
या बैंक के खाते
के हिसाब की तरह
कुछ कुछ काम
का आगे को भी
सरकाया है
पहला पहला
दिन है साल का
अभी हाथ में
ही दिख रही है धूनी
जमाने का मौका
ही नहीं मिल पाया है
पिछले साल भी
आया था एक साल
इसी जोशो और
खरोश के साथ
जानते थे जानने वाले
चलेगा तो चलेगा
आँखिर कितना
बस एक ही तो साल
जमे जमाये
इस से पहले
क्यों नहीं कर
दिये जायें खड़े कुछ
अनसुलझे सवाल
उलझा इतना
कि साफ साफ
महसूस हुआ साल भर
कि सँभलते संभलते
भी नहीं संभल पाया है
नये साल की हो चुकी है
आज से शुरुआत
बस यही पता नहीं
कुछ चल पाया है
कि समझदार है बहुत
और सवाल अनसुलझे
पिछले साल के
अपने साथ में
ले कर आया है
या बेवकूफ है
‘उलूक’ तेरी
तरह का ही एक
खुद उलझने के
लिये सवालों से
नये सवालों
का न्योता
सवाल खड़े
करने वालों को
पिछले साल से ही
दे कर आया है ।

चित्र साभार: www.happynewyear2015clipart.in
   







रविवार, 28 दिसंबर 2014

फिसलते हुऐ पुराने साल का हाथ छोड़ा जाता नहीं है

शुरु के सालों में
होश ही नहीं था

बीच के सालों में
कभी पुराने साल
को जाते देख
अफसोस करते
और
नये साल को
आते देख
मदहोश होकर
होश खोते खोते
पता ही नहीं चला
कि
बहुत कुछ खो गया

रुपिये पैसे की
बात नहीं है
पर बहुत कुछ
से कुछ भी
नहीं होते होते
आदमी
दीवालिया हो गया

पता नहीं
समझ नहीं पाया
उस समय समझ थी
या
अब समझ खुद
नासमझ हो गई

साल के
बारहवें महीने
की अंतिम तारीख
आते समय
कुछ अजीब अजीब
सी सोच
सबकी होने लगी है
या
मेरे ही दिमाग
की हालत
कुछ ऐसी
या वैसी
हो गई है

पुराने साल
को हाथ से
फिसलते देख
अब रोना
नहीं आता है

नये साल के
आने की
कोई खुशी
नहीं होती है

हाथ में
आता हुआ
एक नया हाथ
जैसे पकड़ा
जाता नहीं है

पता होता है
तीन सौ
पैंसठ दिन
पीछे के
जाने ही थे
चले गये हैं

तीन सौ पैंसठ
आगे के आने है
आयेंगे ही शायद
आना शुरु हो गये हैं

खड़ा भी
रहना चाहो
बीच में
सालों के
बिना
इधर हुऐ
या बिना
उधर हुऐ ही
ऐसा किसी
से किया
जाता नहीं है

इक्तीस की रात
कही जा रही है
कई जमानों से
कत्ल की रात
यही राज तो
किसी के
समझ में
आता नहीं है
जिसके आ
जाता है
वो भी
समझाता नहीं है ।

चित्र साभार: community.prometheanplanet.com

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

इक्तीस दिसम्बर इस साल नहीं आ पाये सरकार के इस फरमान का मान रखें

ख्याल रखें
नया साल
इस साल
मनाने की
सोच कर
अपने लिये
पैदा नहीं करें
कोई बबाल
तुगलक और
उसके फरमानों
की फेहरिस्त
लिख लिखा कर
कहीं पैंट की जेब
में सँभाल रखें
इक्तीस दिसम्बर
को पूजा करें
हनुमान जी
का ध्यान धरें
राम नामी
माला ओढ़ कर
तुलसी माला के
108 दाने
दूध में धो कर
धूप में सुखाकर
जनता को कुछ
नया कर दिखाने
का मन ही
मन ठान रखें
बीमार नहीं होना है
छुट्टी नहीं लेनी है
पीने पिलाने का
कार्यक्रम करें
कोई रोक नहीं है
परदा लगा
कर एक मोटा
इक्तीस को
छोड़ कर
किसी और दिन
अपने घर से
कहीं दूर किसी
और की गली में
करते समय
ध्यान से अपने
चेहरे पर एक
रुमाल रखें
जनता के लिये
जनता के द्वारा
जनता के बीच
जनता के साथ
तुगलक के
नये वर्ष की
तुगलकी
एक जनवरी
साल के किसी
तीसरे या चौथे
महीने से शुरु
करते हुऐ
उम्मीदों को
खरीदने बेचने
की एक
नई दुकान की
नई पहल के
नये फरमान
का कुछ
तो मान रखें ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

इसके जाने और उसके आने के चरचे जरूर होंगे

समाधिस्त होने
की प्रक्रिया में
एक और वर्ष
संत
दो शून्य एक चार
चार की जगह पाँच
पैदा होने को तैयार
संतों की परम्पराओं
में खरा उतरने
कुछ नया करने
कुछ पुराने को कुतरने
सीमा पाँच दिन दूर
होना है कुछ तो
आर या पार
कंघा निकाल ले
तू भी गंजे
बाल ले अपने संवार
कपड़े अपने नहीं तो
पड़ोसी के ही सही
धुलवा कर स्त्री
करा ले नंगे
किसे पता है
किस गली में
कौन मिल जाये
भगवान भी खेलते हैं
जिस जमीन पर
चोर सिपाही और
तालियाँ पीटते हैं
साथ में भिखमंगे
किस के हाथ
क्या लगे
पानी में तक
नजर है
बहुतों की
गंदगी दिखना
बंद हो रही
बंद गले से
गूँगे भी चिल्लाने
की फिराक में हैं
हर हर गंगे
कूड़े की किस्मत
क्या कहें
झेंप रहा हो
शायद फिराक भी
मुँह छिपा कर
कहीं जन्नत के
किसी कवि
सम्मेलन में
रत्नों में रत्न
अगले किसी दशक
के होने वाले
देश रत्न
सड़क पर फिंकवा
रहे हैं ठेका ले कर
सस्ते में फिर भी
नहीं होते दिख रहे हैं
इस सब पर
कहीं भी पंगे
इंतजार है
बेसब्री से
इसके जाने का
और उसके आने का
पिछले में नहीं आये
अगले में मिल जायें
मरे हुऐ सपने
रात की नींद से
निकल कर कभी तो
जिंदा होकर सामने के
किसी मैदान पर
भगवान राम के साथ
पुष्पक विमान से
हैप्पी न्यू ईयर
कहते कहते शायद
कभी जमीन पर उतरेंगे ।

चित्र साभार: november2013calendar.org

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

जब नहीं दिखता है एक ‘ब्लागर’ कभी दूसरे ‘ब्लागर’ को बहुत दिनों तक

होता कुछ नहीं है वैसे
जब नहीं दिखता है
एक ब्लागर को
एक दूसरा ब्लागर यहाँ
जो दिखा करता था
कभी रोज ही
आता और जाता हुआ
यहाँ से वहाँ
और वहाँ से यहाँ
आना और जाना
तो चलता रहता है
इसका और उसके
शब्दों का वहाँ से यहाँ
और यहाँ से वहाँ
एक रोज आता जाता है
एक कभी आता है
एक कभी जाता है
रोज आने जाने
वाले को रोज
आने जाने वालों से
कोई परेशानी
नहीं होती है
परेशानी तब होती है
जब एक रोज
आने जाने वाला
अपने अगल बगल से
रोज आते जाते हुऐ को
बहुत दिनों से
आता हुआ नहीं
देख पाता है
दिन गुजरते हैं
रास्ते में कहीं पर
एक पुराना दिखता है
कहीं एक पुराने
के साथ एक
नया बिकता है
कहीं दो नयों के संग
एक पुराना दिखता है
ढूँढना चाहने वाले
ढूँढते भी हैं
एक का निशान
दूसरे के घर मिलता है
दूसरा किसी तीसरे
के घर कुछ ना कुछ
छोड़ कर चलता बनता है
अब लिखने लिखाने
की दुनियाँ है
यहाँ रोज एक नया
रिवाज कोई ना कोई
कहीं ना कहीं सिलता है
बहुत से नये दरवाजे
बंद होने से शुरु होते हैं
कहीं बहुत पुराना
दरवाजा भी
बहुत दिनों के
बाद खुलता है
याद आती है कभी
किसी की
दिखा करता था
अपने ही आस पास
रोज ही कहीं ना कहीं
बहुत दिनों से
कोई खबर ना कोई
पता मिलता है
देखिये और
ढूँढिये तो कहीं
कहाँ हैं जनाब
आजकल आप
आप ही को
ढूँढने के लिये
‘उलूक’ संदेश
एक लेकर कुछ यूँ
शब्दों के बियाबान
में निकलता है
होता कुछ नहीं है
वैसे जब कई कई
दिनों तक भी
एक ब्लागर को
एक दूसरे ब्लागर
का पता नहीं
भी चलता है ।

चित्र साभार: http://dlisted.com/

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

******एक पुरानी दीवार के पलस्तर को ढकने वाले हैं पुराने फटे कपड़े के दो टुकड़े कर दो नये करने वाले हैं******* संदर्भ: http://uttarakhandsamachar.navinjoshi.in/2014/10/blog-post.html

खबर हवा में
हो तो खुश्बू
खुश्बू? कहना
ठीक नहीं
गंध कहना
सही रहेगा
सड़ी गली
चीजों के साथ
रहते उठते
बैठते आदत
हो जाती है
और दुर्गंध भी
किसी के लिये
एक सुगँध
हो जाती है
अपनी अपनी
नाक से
अपने अपने
हिसाब से सूँघना
हाँ तो मैं
कहते कहते
गंध पर ही
अटक गया
क्या क्या नहीं
होता है अपने ही
आस पास भी
अटकने के लिये
ध्यान बंट
ही जाता है
खबर की गंध थी
आज आ भी गई
टी वी में अखबार में
जगह जगह के
समाचार में
एक फटे पैबंद से
पट चुके कपड़े के
दिन फिर से
फिरने वाले हैं
सरकार तैयार
हो गई है
दो टुकड़े करके
इधर उधर के
दो चार फटे कपड़ों
के साथ जोड़ जुगाड़
कर फिर से
सिलने वाले हैं
जिसे नया कपड़ा
कह कर उसी
पुराने नंगे बदन
को फिर से
ढकने वाले हैं
जिसके कपड़े
एक बार फिर से
आजादी के साठ
दशकों के बाद
काट छाँट करने
के लिये जल्दी
उतरने वाले हैं
बहुत खुश हैं
खुश होने वाले
लिखने वाले का
काम है लिखना
एक दो पन्ने
‘उलूक’ के
बही खाते में
गीले आटे को
पोत पात कर
चिपकने वाले हैं
चीटीं ने कौन
सा उड़ना है
अगर दिखे भी
सामने सामने से
उसके बदन पर
पर निकलने वाले हैं
जुगाड़ियों का
क्या जुगाड़ है
इस सब के पीछे
क्या सोचना
जुगाड़ियों के
दिन फिरते रहते हैं
जुगाड़ो से एक बार
शायद और भी
फिरने वाले हैं
भौंचक्का क्यों
होता है सुन कर
अच्छे दिन देश के
लिये ही जरूरी नहीं हैं
एक फटे कपड़े के
भी दिन फिरने वाले हैं ।

चित्र साभार: http://www.123rf.com/

बुधवार, 24 सितंबर 2014

बहुत कुछ है तेरे पास सिखाने के लिये पुराना पड़ा हुआ कुछ नई बाते नये जमाने की सिखाना भी सीख

सीख क्यों
नहीं लेता
बहुत कुछ है
सीखने के लिये
सीखे सिखाये
से इतर भी
कुछ इधर उधर
का भी सीख
ज्यादा लिखी
लिखाई पर
भरोसा करना
ठीक नहीं होता
जिसे सीख कर
ज्यादा से ज्यादा
माँगना शुरु कर
सकता है भीख
भीख भी सबके
नसीब में नहीं
होती मिलनी
पहले कुछ इधर
भी होना सीख
इधर आकर सीखा
जायेगा बहुत
कुछ इधर का
उसके बाद इधर
से उधर होना
भी कुछ सीख
बेनामी आदमी
हो लेना उपलब्धि
नहीं मानी जाती
किसी नामी आदमी
का खास आदमी
होना भी सीख
लाल हरी नीली
गेरुयी पट्टियाँ ही
अब होती हैं पहचान
कुछ ना कुछ
होने की सतरंगी
सोच से निकल
किसी एक रंग में
खुद को रंगने
रंगाने की सीख
रोज गिरता है
अपनी नजरों से
लुटेरों की सफलता
की दावतें देख कर
कभी सब कुछ
अनदेखा कर
अपनी चोर नजर
उठाना भी सीख
जो सब सीख रहे हैं
सिखा रहे हैं
कभी कभी उन
की शरण में
जाना भी सीख
अपना भला हो
नहीं सकता तुझसे
तेरे सीखे हुऐ से
किसी और का भला
उनकी सीख को
सीख कर ही
कर ले जाना सीख
कितना लिखेगा
कब तक लिखेगा
इस तरह से ‘उलूक’
कभी किसी दिन
खाली सफेद पन्नों
को थोड़ी सी साँस
लेने के लिये भी
छोड़ जाना भी सीख ।

चित्र साभार: http://www.clipartpal.com/

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

कोई नया नहीं है बहुत पुराना है फिर से आ रहा है वही दिन




अब दिन तो 
आते ही हैं 
किसी दिन 
किसी का दिन 
किसी दिन 
किसी का दिन 
एक दिन 
उसका दिन 
एक दिन 
इसका दिन 
एक दिन एक 
मरे हुऐ को 
याद करने 
का दिन 
एक दिन एक 
जिंदा को 
सलाम करने 
का दिन 
ग्लोबलाईजेशन 
के जमाने का 
असर झेलता 
रहा इसी तरह 
अगर दिन 
तो दिखेगा 
एक दिन में 
एक नहीं कई 
कई दिनों 
का दिन 
असल जिंदगी 
के टेढ़े मेढ़े 
दिनो को सीधा 
करता हुआ 
एक दिन 
रोज के आटे 
दाल सब्जी 
रोटी से जूझते 
रहने वाली की 
भी कुछ कुछ 
याद आ ही 
जाने का दिन 
इसका उसका 
नहीं हमारा दिन 
बस एक दिन 
जता लेने के 
लिये बहुत ही 
है प्यारा दिन 
कभी किसी दिन 
रहा होगा यही 
एक कुँवारा दिन 
अब आ ही 
जाता है हर साल 
बताने के लिये 
कहीं किसी ओर 
की तरफ भूल 
कर तो नहीं 
चला जा 
रहा है दिन 
साल के सारे 
दिनों का निचोड़ 
सारे के सारे 
तरह तरह के 
दिनों के ऊपर 
एक दिन के 
लिये ही सही 
मुस्कुराने की 
कोशिश करता 
हुआ बहुत भारी 
होने जा रहा दिन 
एक दो नहीं 
बाईस साला हो 
जा रहा एक दिन 
इतने मजबूत दिन 
के लिये मत
कह देना
 
किस तरह के 
दिन की बात 
बताने जा रहा है 
आज का वाला ये 
तुम्हारा दिन ।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

नया सीख कर आ ना कहना कुछ नहीं बचा

बहुत से मदारी
ताजिंदगी एक
ही बंदर से
काम चलाते हैं
इसी लिये
जमाने की
दौड़ में बस
यूँ ही पिछड़ते
चले जाते हैं
मेरा मदारी
भी सुना है
अब समझदारी
कहीं से सीख
के आ रहा है
कहते सुना
मैने उसे अब
मेरे नाच में
मजा नहीं
आ रहा है
वो एक नये
बंदर को ट्रेनिंग
देने चुपचाप
कहीं कहीं
कभी कभी
आ जा रहा है
जंजीर और
रस्सियों को
करने वाला
वो दरकिनार है
जमाना कब से
वाई फाई का
हुआ जा रहा है
उसकी अक्ल में
अब ये बहुत
अच्छी तरह से
घुस पा रहा है
रस्सी से तो
एक समय में
एक ही बंदर
को नचाया
जा रहा है
बंदर भी दिख
जा रहा है
रस्सी को भी
वो छुपा नहीं
पा रहा है
पर ई-दुनियाँ में
देखिये कितना
मजा आ रहा है
सब कुछ
पर्दे के पीछे ही
चला जा रहा है
बंदर और मदारी
दोनो का
एक साथ दीदार
हुआ जा रहा है
लेकिन किसने
मदारी बदल दिया
और किसके पास
नया बंदर
आ रहा है
इसका अंदाज
कोई भी नहीं
लगा पा रहा है
इन सब के बीच
गौर करियेगा जरा
मेरा सीखा
सिखाया हुआ नाच
कितनी बेदर्दी से
डुबोया जा रहा है
दिमाग वालों को कम
देखने वालों को
ज्यादा बारीकी से
ये सब समझ में
आ जा रहा है ।

रविवार, 24 जून 2012

कुछ नया किया जाये

खुद के मन के अंदर
घुमड़ रहा हो जो
जरूरी नहीं उसका
बादल बनने दिया जाये
दूसरा बादल कहीं और
बना के क्यों ना
बरसने दिया जाये
अपने चेहरे को अपने
आईने में ही देखा जाये
जरूरी नहीं जो दिखे
खुद को उसे किसी
और को दिखाया जाये
अपने अपने आईने को
पर्दों से ढक दिया जाये
कोई क्या देख रहा है
उनके अपने आईने में
किसी से ना पूछा जाये
वीराने बुनने वालों को
किसी दिन बिल्कुल
भी ना टोका जाये
एक दिन तो ऎसा
हो जिस दिन अपने
गमलों को बस देखा जाये
उनकी आवारगी को आज
नजरअंदाज कर दिया जाये
एक दिन के लिये सही 
अपना ही आवारा 
हो लिया जाये
चुपचाप आज दिन में
ही सो लिया जाये
कुछ पल का ही सही
मौन ले लिया जाये
अपनी बक बक की रेल
को लाल सिग्नल दिया जाये
किसी और का सुरीला गीत
आज के लिये सबको
सुनने को दिया जाये।

शुक्रवार, 22 जून 2012

कर नया कुछ

चलिये आज कुछ
मूड बदल दिया जाये
कुछ रूमानी बातों में
दिल को अपने
जबरदस्ती  
धकेल
लिया जाये

कहाँ से करें शुरू
कि

मजा ही मजा हो जाये

पिताजी आज बिजली
वाला आया था
पुराने बहुत से बिल
जमा नहीं हुवे हैं
समझाने आया था

छोड़िये भी
रहने दीजिये
इधर से भी
ध्यान हटाते हैं
बारिश नहीं हो रही है
बहुत समय से
लोग बताते हैं
कुछ बादलों की
सोच कर
सपनों में ही सही
नमी ले आते हैं

सुनते हो जी
गैस का सिलिण्डर
वापिस आ गया है
मेट को गाड़ी वाले ने
वापिस लौटा दिया है
कल से स्टोव में
खाना बनाइयेगा
आज अभी जा के
कैरोसिन पाँच लीटर
जरा बाजार से
ब्लैक में ले आइयेगा

उफ एक कोशिश
अंतिम कोशिश
क्या पता मूड
बन ही जाये
अंधे के हाथ में
कानी बटेर कहीं
से आ जाये

इंद्रधनुष देखे सोचे हुवे
एक अर्सा बीत गया
रंगों को सब काला सफेद
मौका मिलते ही
हर कोई कर गया
चलो घर पर ही
उसे बना लिया जाये
बल्ब की तेज रोशनी करके
पानी की फुहारों को
हवा में उडा़या जाये

आम जनता को
सूचित किया जाता है
बिजली कटौती से
चूंकि पम्प नहीं
चल पाता है
अगले दो दिन पानी
नहीं आ पायेगा
जिसे प्यास लग ही गयी
बिसलेरी बाजार से
अपने लिये खरीद
के ले आयेगा

रहने भी दीजिये
किसी और दिन अब
खुश रहने का जुगाड़
कर लिया जायेगा
आज भी कटे फटे
मुद्दों पर ही ध्यान
लगाया जायेगा
पढ़ने वाले भी
इसी के आदी
हो चुके हैं
खाली कहीं नई
रंगीन बात छपी
देख कर यहां
किसी को तेज
बुखार आ जायेगा ।

शुक्रवार, 15 जून 2012

कुछ नहीं

अच्छा तो फिर 
आज क्या कुछ 
नया यहाँ लिखने
को ला रहे हो
या रोज की तरह
आज भी हमको
बेवकूफ बनाने
फिर जा रहे हो
ये माना की
बक बक आपकी
बिना झक झक
हम रोज झेल
ले जाते हैं
एक दिन भी नागा
फिर भी आप
कभी नहीं करते
कुछ ना कुछ
बबाल ले कर
यहाँ आ जाते हैं
लगता है आज कोई
मुद्दा आपके हाथ
नहीं आ पाया है
या फिर आपका
ही कोई खास
फसाद कहीं कुछ
करके आया है
कोई बात नहीं
कभी कभी ऎसा
भी हो ही जाता है
मुर्गा आसपास
में होता तो है
पर हाथ नहीं
आ पाता है
आदमी अपनी
जीभ से लाख
कोशिश करके भी
अपनी नाक को
नहीं छू पाता है
लगे रहिये आप
भी कभी कमाल
कर ले जायेंगे
कुछ ऎसा लिखेंगे
कि उसके बाद
एक दो लोग
जो कभी कभी
अभी इधर को
आ जाते हैं
वो भी पढ़ने
नहीं आयेंगे
कुछ कहना लिखना
तो दूर रहा
सामने पढ़ ही गये
किसी रास्ते में
देखेंगे आपको जरूर
पर बगल की गली से
दूसरे रास्ते में खिसक
कर चले जायेंगे
बाल बाल बच गये
सोच सोच कर
अपने को बहलायेंगे।

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