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बुधवार, 18 अप्रैल 2018

उसी समय लिख देना जरूरी होता है जिस समय दूर बहुत कहीं अंतरिक्ष में चलते नाटक को सामने से होता हुआ देखा जाये

लिखना
पड़ जाता है
कभी मजबूरी में

इस डर से
कि कल शायद
देर हो जाये
भूला जाये

बात निकल कर
किसी किनारे
से सोच के
फिसल जाये

जरूरी
हो जाता है
लिखना नौटंकी को

इससे पहले
कि परदा गिर जाये

ताली पीटती हुई
जमा की गयी भीड़
जेब में हाथ डाले
अपने अपने घर
को निकल जाये

कितना
शातिर होता है
एक शातिर
शातिराना
अन्दाज ही
जिसका सारे
जमाने के लिये
शराफत का
एक पैमाना हो जाये

चल ‘उलूक’
छोड़ दे लिखना
देख कर अपने
आस पास की
नौटंकियों को
अपने घर की

सबसे
अच्छा होता है
सब कुछ पर
आँख कान
नाक बंद कर

ऊपर कहीं दूर
अंतरिक्ष में बैठ कर

वहीं से धरती के
गोल और नीले
होने के सपने को
धरती वालों को
जोर जोर से
आवाज लगा लगा
कर बेचा जाये।

चित्र साभार: www.kisspng.com

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

पीछे की बहुत हो गयी बकवासें कुछ आगे की बताने की क्यों नहीं सीख कर आता है

मत नाप
बकवास को
उसकी लम्बाई
चौड़ाई और
ऊँचाई से

नहीं होती हैं
दो बार की
गयी बकवासें
एक दूसरे की
प्रतिलिपियाँ

बकवासें जुड़वा
भी नहीं होती हैं

ये भी एक अन्दाज है
हमेशा गलत निशाना
लगाने वाले का

इसे शर्त
मत मान लेना
और ना ही
शुरू कर देना
एक दिन
की बकवास
को उठाकर
दूसरे दिन की
बकवास के ऊपर
रखकर नापना

बकवास आदत
हो जाती हैं
बकवास खूँन में
भी मिल जाती हैं

बैचेनी शुरु
कर देती हैं
जब तक
उतर कर
सामने से लिखे
गये पर चढ़ कर
अपनी सूरत
नहीं दिखाती हैं

कविता कहानियाँ
बकवास नहीं होती है
सच में कहीं ना कहीं
जरूर होती हैं

लिखने वाले कवि
कहानीकार होते है
कुछ नामी होते हैं
कुछ गुमनाम होते हैं

बकवास
बकवास होती है
कोई भी कर
सकता है
कभी भी
कर सकता है
कहीं भी
कर सकता है

बकवासों को
प्रभावशाली
बकवास बना
ले जाने की
ताकत होना
आज समझ
में आता है
इससे बढ़ा
और गजब का
कुछ भी नहीं
हो सकता है
बकवास करने
वाले का कद
बताता है

कुछ समय
पहले तक
पुरानी धूल जमी
झाड़ कर
रंग पोत कर
बकवासों को
सामने लाने
का रिवाज
हुआ करता था

उसमें से कुछ
सच हुआ करता था
कुछ सच ओढ़ा हुआ
परदे के पीछे से
सच होने का नाटक
मंच के लिये तैयार
कर लिये गये का
आभासी आभास
दिया करता था

रहने दे ‘उलूक’
क्यों खाली खुद
भी झेलता है और
सामने वाले को
भी झिलाता है

कभी दिमाग लगा कर
‘एक्जिट पोल’ जैसा
आगे हो जाने वाला
सच बाँचने वाला
क्यों नहीं हो जाता है

जहाँ बकवासों को
फूल मालाओं से
लादा भी जाता है
और
दाम बकवासों का
झोला भर भर कर
पहले भी
और बाद में भी
निचोड़ लिया जाता है ।

चित्र साभार: http://www.freepressjournal.in

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

बहकता तो बहुत कुछ है बहुत लोगों का बताते कितने हैं ज्यादा जरूरी है

परेशानी तो है
आँख नाक 

दिमाग
सब खोल के
चलने में

आजकल के
जमाने के
हिसाब से

किस समय
क्या खोलना है
कितना खोलना है
किस के लिये
खोलना है

अगर 
नहीं जानता
है कोई तो
पागल तो
होना ही 

होना है

पागल 
हो जाना
भी एक 

कलाकारी है
समय के 

हिसाब से

बिना 
डाक्टर को
कुछ भी बताये
कुछ भी दिखाये
बिना दवाई खाये
बने रहना पागल
सीख लेने के बाद
फिर कहाँ कुछ
किसी के लिये 

बचता है

सारा सभी कुछ
पैंट की नहीं तो
कमीज की ही
किसी दायीं या
बायीं जेब में
खुद बा खुद
जा घुसता है

घुसता ही नहीं है
घुसने के बाद भी
जरा जरा सा
थोड़े थोड़े से
समय के बाद
सिर निकाल
निकाल कर
सूंघता है 

खुश्बू के
मजे लेता है

पता भी नहीं
चलता है
एक तरह के
सारे पागल
एक साथ ही
पता नहीं क्यों
हमेशा एक साथ
ही नजर आते हैं

समय के हिसाब से
समय भी बदलता है
पागल बदल लेते हैं
साथ अपना अपना भी

नजर आते हैं फिर भी
कोई इधर इसके साथ
कोई उसके साथ उधर

बस एक ऊपर वाला
नोचता है एक
गाय की पूँछ या
सूँअर की मूँछ कहीं
गुनगुनाते हुऐ
राम नाम सत्य है
हार्मोनियम और
तबले की थाप के साथ

‘उलूक’ पागल होना
नहीं होता है कभी भी
पागल होना दिखाना
होता है दुनियाँ को

चलाने के लिये
बहुत सारे नाटक

जरूरी है
अभी भी समझ ले
कुछ साल बचे हैं
पागल हो जाने वालों 
के लिये अभी भी

पागल पागल खेलने
वालों से कुछ तो सीख
लिया कर कभी पागल ।

चित्र साभार: dir.coolclips.com

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

बंदरों के नाटक में जरूरी है हनुमान जी और राम जी का भी कुछ घसीटा

बंदर ने बंदर
को नोचा और
हनुमान जी ने
कुछ नहीं सोचा
तुझे ही क्यों
नजर आने
लगा इस सब
में कोई लोचा
भगवान राम जी
के सारे लोगों
ने सारा कुछ देखा
राम जी को भेजा
भी होगा जरूर
चुपचाप कोई
ना कोई संदेशा
समाचार अखबार
में आता ही है हमेशा
बंदर हो हनुमान हो
चाहे राम हो
आस्था के नाम पर
कौन रुका कभी
और किसने है
किसी को रोका
मौहल्ला हो शहर हो
राज्य हो देश हो
तेरे जैसे लोगों
ने ही
हमेशा ही
विकास के पहिये
को ऐसे ही रोका
काम तेरा है देखना
फूटी आँखों से
रात के चूहों के
तमाशों को
किसने बताया
और किसके कहने
पर तूने दिन का
सारा तमाशा देखा
सुधर जा अभी भी
मत पड़ा कर
मरेगा किसी दिन
पता चलेगा जब
खबर आयेगी
बंदरों ने पीटा
हनुमान ने पीटा
और उसके बाद
बचे खुचे उल्लू

उलूक को राम
ने भी जी भर कर
तबीयत से पीटा ।

चित्र साभार:
www.dailyslave.com

सोमवार, 6 जुलाई 2015

सवाल मत उठाओ मान भी जाओ सब कुछ तो ठीक है

सवाल मत
उठाओ
मान भी जाओ
सब कुछ
तो ठीक है
नाटक भी
दिखाओ
दर्शक भी
बढ़ाओ
पर्दे के
पीछे करो
देखने भी
मत जाओ
सब कुछ
तो ठीक है
सड़क पर
मत आओ
किनारे से
निकल जाओ
सब कुछ
तो ठीक है
आने की
जाने की
इधर की
उधर की
खबरें भी
फैलाओ
सब कुछ
तो ठीक है
बहस भी
चलाओ
दूर से भी
दिखाओ
दर्शन भी
कराओ
कुछ मत
छिपाओ
सब कुछ
तो ठीक है
घोटाले भी
खुलवाओ
खुले बंद
करवाओ
जाँच करने
कराने की
मशीने भी
मंगवाओ
उसने पूछना
बंद तो
कर दिया
तुम भी
किसी से
पूछने
ना जाओ
मान भी जाओ
पंगे ना उठाओ
वो भी चुप
हो गया है
तुम भी चुप
हो जाओ
सब कुछ
तो ठीक है ।

चित्र साभार: www.gograph.com

रविवार, 21 जून 2015

नाटक कर पर्दे में उछाल खुद ही बजा अपने ही गाल

कुछ भी संभव
हो सकता  है
ऐसा कभी कभी
महसूस होता है
जब दिखता है
नाटक करने वालों
और दर्शकों के
बीच में कोई भी
पर्दा ना उठाने
के लिये होता है
ना ही गिराने
के लिये होता है
नाटक करने वाले
के पास बहुत सी
शर्म होती है
दर्शक सामने वाला
पूरा बेशर्म होता है
नाटक करने भी
नहीं जाता है
बस दूर से खड़ा खड़ा
देख रहा होता है
वैसे तो पूरी दुनियाँ ही
एक नौटंकी होती है
नाटक करने कराने
के लिये ही बनी होती है
लिखने लिखाने
करने कराने वाला
ऊपर कहीं बैठा होता है
नाटक कम्पनी का
लेकिन अपना ही
ठेका होता है
ठेकेदार के नीचे
किटकिनदार होते हैं
किटकिनदार
करने कराने
के लिये पूरा ही
जिम्मेदार होते हैं
‘उलूक’ कानी आँखों से
रात के अंधेरे से पहले के
धुंधलके में रोशनी
समेट रहा होता है
दर्शकों में से कुछ
बेवकूफों को नाटक
के बीच में कूदते हुऐ
देख रहा होता है
कम्पनी के नाटककार
खिलखिला रहे होते हैं
अपने लिये खुद ही
तालियाँ बजा रहे होते हैं
बाकी फालतू के दर्शकों
के बीच से पहुँच गये
नाटक में भाग लेने
गये हुऐ नाटक
कर रहे होते हैं
साथ में मुफ्त में
गालियाँ खा
रहे होते हैं
गाल बजाने वाले
अपने गाल खुद ही
बजा रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.india-forums.com

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