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रविवार, 29 जुलाई 2018

बकवास करेगा ‘उलूक’ मकसद क्या है किसी दीवार में खुदवा क्यों नहीं देता है

उसकी बात
करना
सीख क्यों
नहीं लेता है

भीड़ से
थोड़ी सी
नसीहत क्यों
नहीं लेता है

सोचना
बन्द कर के
देख लिया
कर कभी

दिमाग को
थोड़ा आराम
क्यों नही देता है

तेरा मकसद
पूछता है
अगर
उसका झण्डा

झण्डा
नहीं हूँ
कहकर
जवाब क्यों
नहीं देता है

आइना
नहीं होता है
कई लोगों
के घर में

अपने
घर में है
कपड़े उतार
क्यों
नहीं लेता है

साथ में
रहता है
अंधा बन
पूरी आँखे
खोलकर

पूछता है

क्या
लिखता है
बता क्यों
नहीं देता है

शराफत से
नंगा हो
जाता है

भीड़ में भी
एक शरीफ

नंगों की
भीड़ को
अपना पता

पता नहीं
क्यों नहीं
देता है

बहुत कुछ
लिखना है

पता होता है
‘उलूक’
को भी
हर समय

उस के
ही लोग हैं
उसके ही
जैसे हैं

रहने भी
क्यों नहीं
देता है ।

चित्र साभार: www.fineartpixel.com

रविवार, 15 जुलाई 2018

किसी किसी आदमी की सोच में हमेशा ही एक हथौढ़ा होता है

दो और दो
जोड़ कर
चार ही तो
पढ़ा रहा है
किसलिये रोता है

दो में एक
इस बरस
जोड़ा है उसने
एक अगले बरस
कभी जोड़ देगा
दो और दो
चार ही सुना है
ऐसे भी होता है

एक समझाता है
और चार जब
समझ लेते हैं
किसलिये
इस समझने के
खेल में खोता है

अखबार की
खबर पढ़ लिया कर
सुबह के अखबार में

अखबार वाले
का भी जोड़ा हुआ
हिसाब में जोड़ होता है

पेड़
गिनने की कहानी
सुना रहा है कोई
ध्यान से सुना कर
बीज बोने के लिये
नहीं कहता है

पेड़ भी
उसके होते हैं
खेत भी
उसके ही होते हैं

हर साल
इस महीने
यहाँ पर यही
गिनने का
तमाशा होता है

एक भीड़ रंग कर
खड़ी हो रही है
एक रंग से
इस सब के बीच

किसलिये
उछलता है
खुश होता है

इंद्रधनुष
बनाने के लिये
नहीं होते हैं

कुछ रंगों के
उगने का
साल भर में
यही मौका होता है

एक नहीं है
कई हैं
खीचने वाले
दीवारों पर
अपनी अपनी
लकीरें

लकीरें खीचने
वाला ही एक
फकीर नहीं होता है

उसने
फिर से दिखानी है
अपनी वही औकात

जानता है
कुछ भी कर देने से
कभी भी यहाँ कुछ
नहीं होना होता है

मत उलझा
कर ‘उलूक’
भीड़ को
चलाने वाले
ऐसे बाजीगर से
जो मौका मिलते ही
कील ठोक देता है

अब तो समझ ले
बाजीगरी बेवकूफ

किसी किसी
आदमी की
सोच में
हमेशा ही एक
हथौढ़ा होता है ।

चित्र साभार: cliparts.co

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

नियम नहीं हैं कोई गल नहीं बिना नियम के चलवा देंगे हजूर हम समझा देंगे

जो भी
आप
समझायेंगे हजूर

हम समझा देंगे

किस किस को
समझाना है
क्या क्या और
कैसे कैसे
बताना है
हमें लिख कर
बता देंगे हजूर

हम समझा देंगे

मत समझियेगा
हम भी समझ
ले रहे है वो सब

जो आप लोगों को
समझाने के लिये
हमें समझा रहे हैं

हम आप के
कहे को
जैसे का तैसा
इधर से उधर
पहुँचा देंगे हजूर

हम समझा देंगे

खाली किस लिये
अपना दिमाग
लगाना है
आप के दिमाग में
जब सब कुछ सारा
बहुत सारा
तेज धार
का पैमाना है

इशारा
करिये तो सही  
पानी में ही
आग लगा देंगे हजूर

हम समझा देंगे


अखबार में
आने वाली है
खबर पक कर
रात भर में

नमक मसालों
को ही बदलवा देंगे हजूर

हम समझा देंगे


नहीं होगा
नहीं होगा

छपवा कर
रखवा भी
दिया होगा


कहाँ तक
रखवायेगा कोई


और ऊपर से
जोर की डाँठ
पड़वा देंगे हजूर

हम समझा देंगे

चिंता जरा सा भी
मत कीजियेगा
ज्यादा से ज्यादा
कुछ नहीं होगा

टेंट लगवा कर
दो चार दिन एक
भीड़ को बैठा देंगे

हजूर हम समझा देंगे

‘उलूक’ तू भी
आँख बन्द कर
कान में उँगली
डाल कर बैठा रह

किसी
दिन आकर
तुझे भी
दो चार दिन
देश चलाने की
किताब के
दो पन्ने
तेरे शहर
के पढ़ा देंगे

हजूर
हम समझा देंगें। 


चित्र साभार: http://www.newindianexpress.com

गुरुवार, 21 जून 2018

कतारें खूबसूरत सारी की सारी बहुत सारी बस आज ऐसे ही बनानी हैं

तपती रेत है
बहुत तेज धूप है
हैरान नहीं होना है
रोज की परेशानी है

यहाँ की रेत की
बात यहीं तक रखनी है
किसी को नहीं बतानी है

बस हरी दूब लानी है

बहुत जगह उगी है
बहुत सारी उगी है
हरी हरी दूब है
पानी नहीं होने की
बात ही बेमानी है

बहुत तेज जोरों से
प्यास ही तो लगी है

धैर्य रख
ज्ञानी हैं विज्ञानी हैं
बस यहीं कहीं हैं
सच बात है
नहीं कोई कहानी है

करना कुछ नहीं है
सपने उगाने तो हैं
पर बोना कुछ नहीं हैं
बीज ही नहीं हैं

देखनी रेत है
दूब बस सोचनी है
कौन सा उगानी है

पानी नहीं है
पीना कुछ नहीं है

प्यास
बस एक सोच है
बातें की बहती हुई
नदी एक दिखानी है

एक साफ
चादर ही तो लानी है
गरम रेत
के ऊपर से बिछानी है

दूब हरी हरी
दूर से कहीं से भी
लाकर फैलानी है
बोनी नहीं है
उगानी नहीं है
बस एक दिन
की बात ही है
कुछ नहीं होना है
सूखनी है सुखानी है

गाय भैंस बकरी हैं
कम ज्यादा
कुछ भी मिले
बिकनी बिकानी है

कुछ खड़े होना है
कुछ देर सोना है
इसको उसको सबको
एक साथ एक बार
एक ही बात बतानी है

चोंच नीचे लानी है
पूँछ ऊपर उठानी है
‘उलूक’
कुछ भी कह देने की
तेरी आदत पुरानी है

भीड़ नहीं कहते हैं
बहुत सारे लोगों को

दूर तलक दूर दूर
कतारें खूबसूरत
सारी की सारी
बहुत सारी
बस आज
और आज
ऐसे ही
बनानी हैं।

चित्र साभार: www.123rf.com

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

उसी समय लिख देना जरूरी होता है जिस समय दूर बहुत कहीं अंतरिक्ष में चलते नाटक को सामने से होता हुआ देखा जाये

लिखना
पड़ जाता है
कभी मजबूरी में

इस डर से
कि कल शायद
देर हो जाये
भूला जाये

बात निकल कर
किसी किनारे
से सोच के
फिसल जाये

जरूरी
हो जाता है
लिखना नौटंकी को

इससे पहले
कि परदा गिर जाये

ताली पीटती हुई
जमा की गयी भीड़
जेब में हाथ डाले
अपने अपने घर
को निकल जाये

कितना
शातिर होता है
एक शातिर
शातिराना
अन्दाज ही
जिसका सारे
जमाने के लिये
शराफत का
एक पैमाना हो जाये

चल ‘उलूक’
छोड़ दे लिखना
देख कर अपने
आस पास की
नौटंकियों को
अपने घर की

सबसे
अच्छा होता है
सब कुछ पर
आँख कान
नाक बंद कर

ऊपर कहीं दूर
अंतरिक्ष में बैठ कर

वहीं से धरती के
गोल और नीले
होने के सपने को
धरती वालों को
जोर जोर से
आवाज लगा लगा
कर बेचा जाये।

चित्र साभार: www.kisspng.com

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

एक भीड़ से निकल कर खिसक कर दूसरी भीड़ में चला जाता है एक नयी भीड़ बनाता है दंगे तो सारे ऊपर वाला ही करवाता है


एक भीड़ से
दूसरी भीड़
दूसरी भीड़ से
तीसरी भीड़
भीड़ से भीड़ में
खिसकता चलता है
मतलब को जेब में
रुमाल की तरह
डाल कर जो
वो हर भीड़ में
जरूर दिखाई
दे जाता है



भीड़ कभी
मुद्दा नहीं
होती है
मुद्दा कभी
मतलबी
नहीं होता है
मतलबी
भीड़ भी
नहीं होती है

भीड़ बनाने वाला
भीड़ नचाने वाला
कहीं किसी भीड़ में
नजर नहीं आता है

जानता है
पहली
भीड़ के हाथ
दूसरी भीड़
में पहुँच कर
भीड़ के पाँव
हो जाते हैं

दूसरी भीड़ से
तीसरी भीड़ में
पहुँचते ही पाँव
पेट होकर
गले के रास्ते
चलकर
भीड़ की
आवाज
हो जाते हैं

ये शाश्वत सत्य है
भीड़ की जातियाँ
बदल जाती हैंं
धर्म बदल जाता है

अपने मतलब के
हिसाब से समय
घड़ी की दीवार से
बाहर आ जाता है

आइंस्टाईन
का सापेक्षता
का सिद्धांत
निरपेक्ष भाव से
आसमान में
उड़ते हुऐ
चील कव्वे
गिनने के
काम का भी
नहीं रह जाता है

आती जाती
भीड़ से
निकलकर
एक मोड़ से
दूसरे मोड़ तक
पहुँचने से पहले
ही फिसलकर
एक नयी
भीड़ बनाकर
एक नया
झंडा उठाता है
बस वही एक
सत्यम शिवम सुंदरम
कहलाता है

समझदार
आँख मूँद
कर भीड़ के
सम्मोहन में
खुद फंसता है
दूसरों को
फ़ंसाता है

फिर खुद
भीड़ में से
निकलकर
भीड़ में
बदलकर
भीड़ भीड़
खेलना
सीख जाता है

बेवकूफ
‘उलूक’
इस भीड़ से
उस भीड़
जगह जगह
भीड़ें गिनकर
भीड़ की बातों को
निगल कर
उगल कर
जुगाली करने में
ही रह जाता है।

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

अचानक से सूरज रात को निकल लेता है फिर चाँद का सुबह सवेरे से आना जाना शुरु हो जाता है

जब भी कभी
सैलाब आता है
लिखना भी
चाहो अगर कुछ

नहीं लिखा जाता है

लहरों के ऊपर
से उठती हैं लहरें
सूखी हुई सी कई
बस सोचना सारा
पानी पानी सा
हो जाता है

इसकी बात से
उठती है जरा
सोच
एक नयी
उसकी याद
आते ही सब  
पुराना पुराना
सा हो जाता है

अचानक नींद से
उठी दिखती है
सालों से सोई
हुई कहीं
की एक भीड़


फिर से तमाशा
कठपुतलियों का
जल्दी ही कहीं
होने का आभास
आना शुरू

हो जाता है

जंक लगता नहीं है
धागों में पुराने
से पुराने कभी भी
उलझी हुई गाँठों
को सुलझाने में
मजा लेने वालों
का मजा दिखाना 

शुरु हो जाता है 

पुरानी शराबें
खुद ही चल देती हैं
नयी बोतल के अन्दर
कभी इस तरह भी
‘उलूक’
शराबों के मजमें
लगे हुऐ जब कभी
एक लम्बा जमाना
सा हो जाता है ।

चित्र साभार: recipevintage.blogspot.com

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

खुद की सोच ही एक वजूका हो जाये खेत के बीच खड़ा हुआ तो फिर किसी और को क्या समझ में आये एक वजूका सोच से बड़ा होता है

क्या
बुराई है
हो जाने में
सोच का
खुद की
एक वजूका

और
जा कर
खड़े हो
लेने में
कहीं भी
किसी जगह


जरूरी नहीं
उस जगह
का एक
खेत
ही होना

वजूके
समझते हैं
वजूकों के
तौर तरीके

लगता है
पता नहीं
गलत भी
हो सकता है

वजूके
सोचते हैं
करते हैं
चलते हैं

वजूकों के
इशारों
इशारों पर
कुछ
वजूकी चालें

वजूकों के
पास शतरंज
नहीं होता है

सब
सामान्य
होता है

वजूके के लिये
वजूके के द्वारा
वजूके के हित में
जो भी होता है
वजूकों में
सर्वमान्य होता है

वजूके पेड़
नहीं होते हैं
वजूकों का
जंगल होना
भी जरूरी
नहीं होता है

वजूका
खेत में खड़ा कहीं

कहीं दूर से
दिखाई देता है

जिस पर
कोई भी ध्यान
नहीं देता है

चिड़िया कौए
वजूकों पर
बैठ कर
बीट करते हैं

वजूका कुछ
नहीं कहता है

वजूका ही
शायद एक
इन्सान
होता है

सब को
समझ में
नहीं आती
हैं इंसानों
की कही
हुई बातें
इंसानों के
बीच में हमेशा

वजूके कुछ
नहीं कहते हैं

वजूके वजूकों
को समझते हैं
बहुत अच्छी
तरह  से

लेकिन ये
बात अलग है

वजूकों की
भीड़ नहीं
होती है कहीं

वजूके के बाद

मीलों की
दूरी पर कहीं
किसी खेत में

एक और
वजूका अकेला
खड़ा होता है


‘उलूक’
तेरे करतबों
से दुनियाँ को
क्या लेना देना

हर किसी का
अपना एक
वजूका

पूरे देश में
एक ही
होता है

लेकिन
वजूका
होता है।

 चित्र साभार: Clipartix

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

रास्ते का खोना या खोना किसी का रास्ते में

किसी
जमाने में
रोज आते थे
और
बहुत आते थे

अब नहीं आते
और जरा सा
भी नहीं आते

रास्ते
इस शहर के
कुछ बोलते नहीं

जो
बोलते हैं कुछ
वो
कुछ बताते ही नहीं

उस जमाने में
किस लिये आये
किसी ने
पूछा ही नहीं

इस जमाने में
कैसे पूछे कोई
वो अब
मिलता ही नहीं

रास्ते वही
भीड़ वही
शोर वही

आने जाने
वालों में
कोई नया
दिख रहा हो
ऐसा जैसा
भी नहीं

सब
आ जा रहे हैं
उसी तरह से
उन्हीं रास्तों पर

बस
एक उसके
रास्ते का
किसी को
कुछ पता ही नहीं

क्या खोया
वो या
उसका रास्ता
किससे पूछे
कहाँ जा कर कोई

भरोसा
उठ गया
‘उलूक’
जमाने का

उससे भी
और
उसके
रास्तों से भी

पहली बार
सुना जब से
रास्ते को ही
साथ लेकर अपने
कहीं खो गया कोई ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

हैरान क्यों होना है अगर शेर बकरियों के बीच मिमियाने लगा है

पत्थर होता होगा
कभी किसी जमाने में
इस जमाने में
भगवान कहलाने लगा है
कैसे हुआ होगा ये सब
धीरे धीरे कुछ कुछ अब
समझ में आने लगा है
एक साफ सफेद झूठ को
सच बनाने के लिये
जब से कोई भीड़ अपने
आस पास बनाने लगा है
झूठ के पर नहीं होते हैं
उसे उड़ना भी कौन सा है
किसी सच को
दबाने के लिये
झूठा जब से जोर से
चिल्लाने लगा है
शक होने लगा है
अपनी आँखों के
ठीक होने पर भी कभी
सामने से दिख रहे
खंडहर को हर कोई
ताजमहल बताने लगा है
रस्में बदल रही हैं
बहुत तेजी से
इस जमाने की
‘उलूक’ शर्म
को बेचकर
बेशर्म होने में
तुझे भी अब
बहुत मजा
आने लगा है
तेरा कसूर है
या नहीं
इस सब में
फैसला कौन करे
सच भी भीड़
के साथ
जब से आने
जाने लगा है ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

बंदर बहुत हो गये है

बंदर बहुत
हो गये हैं
सड़क पर हैं 

तख्तियाँ लिये हुऐ
आदमी और 

औरतों की भीड़
आदमी के पास 

ही सही चलो
मुद्दे तो कुछ 

नये हो गये हैं
जुटी थी भीड़ 

इस से पहले भी
किसी का साथ 

देने के लिये कहीं
पता भी नहीं 

चला भीड़ को भी
और बनाने
वाले को भी
भीड़ के बीच
में से हट कर
कई लोग इधर 

और उधर जा जा
कर खड़े हो गये हैं
मुद्दे सच में
लग रहा है
कुछ नये पैदा
हो ही गये हैं
शहर और गाँव की
गली गली में
बंदर बहुत हो गये हैं
अचंभा होना
ही नहीं था
देख कर अखबार
सुबह सुबह का
होने ही थे
'उलूक' तेरे भी
छोटे राज्य
के बनते ही
सपने एक अंधे के
सारे ही हरे
हो गये हैं
बंदर बहुत हो गये हैं
बचे हैं साल
बस कुछ कम ही
सुनाई देना है
बस सब यही ही
उनके इधर हो गये हैं
इनके उधर हो गये हैं
समय के साथ
बदलने ही हैं
चोले पुराने तक तो
अब बिकने भी
शुरु हो गये हैं
बंदर बहुत हो गये हैं
मुद्दा गरम है बंदर का
राम नाम जपना
सिखाने को उनको
नये कुछ विध्यालय
भी खुलना
शुरु हो गये हैं
नये मुद्दे नये
तरीके के
नये जमाने
के हो गये हैं
बंदर बहुत हो गये हैं ।



चित्र साभार: www.cartoonpitu.top

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

जो जैसा था वैसा ही निकला था गलती सोचने वाले की थी उसकी सोच का पैर अपने आप ही फिसला था

भीड़ वही थी
चेहरे वही थे
कुछ खास
नहीं बदला था

एक दिन इसी
भीड़ के बीच
से निकल कर
उसने उसको
सरे आम एक
चोर बोला था
सबने उसे
कहते
हुऐ देखा
और सुना था

उसके लिये उसे
इस तरह से
ऐसा कहना
सुन कर बहुत
बुरा लगा था

कुछ किया
विया तो नहीं था
बस उस कहने
वाले से किनारा
कर लिया था

पता ही नहीं था
हर घटना की तरह
इस घटना से भी
जिंदगी का एक नया
सबक नासमझी का
एक बार फिर
से सीखना था

सूरज को हमेशा
उसी तरह सुबह
पूरब से ही
निकलना था
चाँद को भी हमेशा
पश्चिम में जा
कर ही डूबना था

भीड़ के बनाये
उसके अपने नियमों
का हमेशा की तरह
कुछ नहीं होना था
काम निकलवाने
के क्रमसंचय
और संयोजन को
समझ लेना इतना
आसान भी नहीं था

मसला मगर बहुत
छोटा सा एक रोज
के होने वाले मसलों
के बीच का ही
एक मसला था

आज उन
दोनों का जोड़ा
सामने से ही
हाथ में हाथ
डाल कर
जब निकला था

कुछ हुआ था या
नहीं हुआ था
पता ही नहीं
चल सका था

भीड़ वही थी
चेहरे वही थे
कहीं कुछ
हुआ भी है
का कोई
भी निशान
किसी चेहरे पर
बदलता हुआ
कहीं भी
नहीं दिखा था

‘उलूक’ ने
खिसियाते हुऐ
हमेशा की तरह
एक बार फिर
अपनी होशियारी
का सबक
उगलते उगलते
अपने ही
थूक के साथ
कड़वी सच्चाई
की तरह
ही निगला था ।

चित्र साभार: davidharbinson.com

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

जलते हुऐ दिये को पड़ गये कुछ सोच देख कर बहुत सारी अपने आस पास एक दिन रोशनियाँ

एक किनारे में
खड़ा एक भीड़ के
देखता हुआ
अपनी ही जैसे
एक नहीं कई
प्रतिलिपियाँ
और आस पास ही
उसी क्षण कहीं
खुल रही हों कई
सालों से बंद
पड़ी कुछ
खिड़कियाँ
कुछ कुछ सपने
जैसे ही कुछ
कुछ सामने
से ही उड़ती
हुई रंगबिरंगी
तितलियाँ
रोज तो दिखते
नहीं कभी
इस तरह के
दृश्य सामने से
एक सच की तरह
चिकोटी काट कर
हाथ में ही अपने
खुद के देख
रही थी उंगलिया
इसी तरह खड़ा
सोच में पड़ा
बहुत देर से
समझने के लिये
आखिर क्यों
हूँ यहाँ
किसलिये
किसके लिये
पूछ बैठा यूँ ही
बगल के ही
किसी से
अपने ही जैसे से
मुस्कुराहट
चेहरे पर लिये
बिखरते हुऐ
हँसी जैसे मोती
बिखर रहे हों
कहीं से कहीं
अरे सच में नहीं
जानते क्या
खुद को भी नहीं
पहचानते क्या
हम ही तो दिये हैं
 रोशनी के लिये हैं
आओ चले साथ
साथ एक ही दिन
यूँ ही जलें साथ
साथ एक ही दिन
रोशन करें
सारे जहाँ को
बाँटते चलें
जरूरत की सबको
सबके लिये
कुछ रोशनियाँ
कहाँ खुलती हैं रोज
खुली हैं आज
चारों ही तरफ
कुछ बंद खिड़कियाँ
दिये हैं हम
दिये हो तुम
दिये के खुद के लिये
जरूरी भी नहीं
होती हैं रोशनियाँ ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बहुत समय है फालतू का उसे ही ठिकाने लगा रहे हैं

भाई जी
क्या बात है
आजकल दिखाई
भी नहीं देते हो
हम तो रोज
उसी रास्ते पर
चल रहे हैं
उसी तरह से
सदियों से
आप क्यों अपने
रोज ही रास्ते
बदल देते हो
आया जाया करो
देखा दिखाया करो
तबियत बहल जाती है
हमारी तो इस तरह
आप भी कुछ
अपनी भी तो
कभी बहलाया करो
मिलोगे नहीं तो
अलग थलग
पड़ जाओगे
भूल जायेंगे लोग
याद ही नहीं आओगे
बताओ तो जरा
कहाँ रह जाते हो
आजकल
कुछ खबर ही
नहीं मिलती
पूछ्ते रहते हैं
हम सब से
अपने अगल
और बगल
कोई कह रहा था
कुछ नये अजीब से
काम से लगे हो
बताओ हम भी सुने
क्या नया खोदने
और बोने में लगे हो
अजी कुछ भी नहीं
बस कुछ नहीं
करने के तरीके
खोजने की कोशिश
जैसी हो रही है
तुम्हारे रास्तों में
अब हमारी जरूरत
किसी को भी जरा
सा भी नहीं हो रही है
एक नये रास्ते पर
अब लोग आ जा रहे हैं
जिनको कुछ नहीं
आता है जरा भी
उनसे कुछ नहीं
ढेर सारा लिखवा रहे हैं
हम भी हो लिये हैं
साथ भीड़ में घुसकर
कुछ नहीं पर कुछ कुछ
लिखना लिखाना
बस करा रहे हैं ।

गुरुवार, 22 मई 2014

पहचान के कटखन्ने कुत्तों से डर नहीं लगता है

पालतू भेड़ों
की भीड़ को
अनुशाशित
करने के लिये ही
पाले जाते हैं कुत्ते
भेड़ोँ को घेर कर
बाड़े तक पहुँचाने में
माहिर हो जाने से
निश्चिंत हो जाते हैं
भेड़ों के मालिक
कुत्तों के हाव भाव
और चाल से ही
रास्ता बदलना
सीख लेती हैं भेड़े
मालिक बहुत सारी
भेड़ों को इशारा करने
से अच्छा समझते हैं
कुत्तों को समझा लेना
भेड़ों को भी कुत्तों से
डर नहीं लगता है
जानती हैं डर के आगे
ही जीत होती है
भेड़ों को घेर कर
बाड़े तक पहुँचाने का
इनाम कुछ माँस
के टुकड़े कुत्ते भेड़ों
के सामने से ही नोचते हैं
भेड़े ना तो खाती हैं
ना ही माँस पसँद करती हैं
पर उनको कुत्तों को
माँस नोचता देखने
की आदत जरूर हो जाती है
रोज होने वाले दर्द
की आदत हो जाने
के बाद दवा की जरूरत
महसूस नहीं होती है ।

मंगलवार, 20 मई 2014

एक आदमी एक भीड़ नहीं होता है

बेअक्ल बेवकूफ
लोगों का अपना
रास्ता होता है
भीड़ अपने रास्ते
में होती है
भीड़ गलत
नहीं होती है
भीड़ भीड़ होती है
भीड़ से अलग
हो जाने वाले
के हाथ में
कुछ नहीं होता है
हर किसी के लिये
एक अलग रास्ते
का इंतजाम होना
सँभव नहीं होता है
भीड़ बनने का
अपना तरीका
होता है
इधर बने या
उधर बने
भीड़ बनाने का
न्योता होता है
भीड़ कुछ
करे ना करे
भीड़ से कुछ नहीं
कहना होता है
भीड़ के पास
उसके अपने
तर्क होते हैं
कुतर्क करने
वाले के लिये
भीड़ में घुसने का
कोई मौका ही
नहीं होता है
भीड़ के अपने
नियम कानून
होते हैं
भीड़ का भी
वकील होता है
भीड़ में किसका
कितना हिस्सा
होता है चेहरे में
कहीं ना कहीं
लिखा होता है
किसी की
मजबूरी होती है
भीड़ में बने रहना
किसी को भीड़ से
लगते हुए डर से
अलग होना होता है
छोटी भीड़ का
बड़ा होना और
बड़ी भीड़ का
सिकुड़ जाना
इस भीड़ से
उस भीड़ में
खिसक जाने
से होता है
‘उलूक’ किसी एक
को देख कर
भीड़ की बाते
बताने वाला
सबसे बड़ा
बेवकूफ होता है
चरित्र एक का
अलग और
भीड़ का सबसे
अलग होता है ।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

क्यों परेशाँ रहे कोई रात भर सुबह के अखबार से सब पता चल जाता है

कैसे काट लेता है
कोई बिना कुछ कहे
एक पूरा दिन यहाँ
जहाँ किसी का बोरा
गले गले तक शाम
होने से पहले
ही भर जाता है
सब कुछ सबको
दिखाने लायक
भी नहीं होता है
थोड़ा कुछ झाड़ पोछ
कर पेश कर
ही दिया जाता है
घर से निकलता है
बाहर भी हर कोई
रोज ही काम पर
कपड़े पहन कर आता है
कपड़े पहने हुऐ ही
वापस चला जाता है
आज का अभी
कह दिया जाये
ठीक रहता है
कल कोई सुनेगा
भरौसा ही कहाँ
रह पाता है
भीड़ गुजर जाती है
बगल से उसके
सब देखते हुऐ हमेशा
एक तुझे ही पता नहीं
उसे देखते ही
क्या हो जाता है
उसको भी पता है
बहुत कुछ तेरे बारे में
तभी तो तेरा जिक्र भी
ना किसी नामकरण में
ना ही किसी जनाजे में
कभी किया जाता है
इधर कुछ दिन तूने भी
रहना ही है बैचेन बहुत
उनकी बैचेनी के पते का
पता भी चल ही जाता है
डबलरोटी के मक्खन को
मथने के लिये कारों का
काफिला कर तो रहा है
मेहनत बहुत जी जान से
रोटी के सपने देखने वालों
की अंगुली में लगे
स्याही के निशान का फोटो
अखबार में एक जगह पर
जरूर दिखाया जाता है
कौन बनाने की सोच रहा है
एक नया रास्ता तुझे पता है
पुराने रास्तों की टूट फूट कि
निविदाओं से ही कागज का
मजबूत रास्ता रास्तों पर
मिनटों में बन जाता है
इसको जाना है इस तरफ यहाँ
उसको जाना है उस तरफ वहाँ 

उलूक बस एक तू ही अभी तक 
असमंजस में नजर आता है । 

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

एक भीड़ एक पोस्टर और एक देश

इधर कुछ
पढ़े लिखे
कुछ अनपढ़
एक दूसरे के
ऊपर चढ़ते हुऐ
एक सरकारी
कागज हाथ में
कुछ जवान
कुछ बूढ़े
किसी को
कुछ पता नहीं
किसी से कोई
कुछ पूछता नहीं
भीड़ जैसे भेड़
और बकरियों
का एक रेहड़
कुछ लैप टौप
तेज रोशनी
फोटोग्राफी
अंगुलियों और
अंगूठे के निशान
सरकार बनाने
वालों को मिलती
एक खुद की पहचान
एक कागज का टुकड़ा
'आधार' का अभियान
उसी भीड़ का अभिन्न
हिस्सा 'उलूक'
गोते लगाती
हुई उसकी
अपनी पहचान
डूबने से अपने
को बचाती हुई
दूसरी तरफ
शहर की सड़कों
पर बजते ढोल
और नगाड़े
हरे पीले गेरुए
रंग में बटा हुआ
देश का भविष्य
थम्स अप लिमका
औरेंज जूस
प्लास्टिक की
खाली बोतलें
सड़क पर
बिखरे खाली
यूज एण्ड थ्रो गिलास
हजारों पैंप्लेट्स
नाच और नारे
परफ्यूम से ढकी सी
आती एल्कोहोल
की महक
लड़के और लड़कियां
कहीं खिसियाता
हुआ 
 लिंगदोह
फिर कहीं 'उलूक'
बचते बचाते
अपनी पहचान को
निकलता हुआ दूसरी
भीड़ के बीच से और
तीसरी तरफ
प्रेस में छपते हुए
एक आदमी
के पोस्टर
जो कल
सारी देश की
दीवार पर होंगे
और
यही भीड़
पढ़ रही होगी
दीवार पर
लिखे हुऐ
देश के
भविष्य को
जिसे इसे ही
तय करना है ।

शुक्रवार, 7 जून 2013

क्या आपने देखी है/सोची है भीड़

भीड़ देखना
भीड़ सोचना
भीड़ में से
गुजरते हुऎ भी
भीड़ नहीं होना
बहुत दिन तक
नहीं हो पाता है
हर किसी के
सामने कभी
ना कभी
कहीं ना कहीं
भीड़ होने
का मौका
जरूर आता है
कमजोर दिल
भीड़ को देख
कर अलग
हो जाता है
भीड़ को दूर
से देखता
जाता है
मजबूत दिल
भीड़ से नहीं
डरता है कभी
भीड़ देखते ही
भीड़ हो जाता है
भीड़ कभी
चीटियों की
कतार नहीं होती
भीड़ कभी
बीमार नहीं होती
भीड़ में से
गुजरते हुऎ
भीड़ में
समा जाना
ऎसे ही
नहीं आ पाता है
भीड़ का भी
एक गुरु
होता है
भीड़ बनाना
भीड़ में समाना
बस वो ही
सिखाता है
भीड़ेंं तो बनती
चली जाती हैं
भीडे़ंं सोचती
भी नहीं हैं कभी
गुरु लेकिन
सीढ़ियाँ चढ़ता
चला जाता है
भीड़ फिर कहीं
भीड़ बनाती है
गुरू कब भीड़
से अलग हो गया
भीड़ की भेड़ को
कहाँ समझ में
आ पाता है ।

शनिवार, 11 मई 2013

फिर देख फिर समझ लोकतंत्र

रोज एक लोकतंत्र
समझ में आता है
तू फिर भी लोकतंत्र
समझना चाहता है
क्यों तू इतना
बेशरम हो जाता है
बहुमत को समझने
में सारी जिंदगी
यूँ ही गंवाता है
बहुमत इस
देश की सरकार है
क्या तेरे भेजे में
ये नहीं घुस पाता है
देखता नहीं
सबसे ज्यादा
मूल्यों की
बात उठाने वाला ही
तो मौका आने पर
अपना बहुमत
अखबार में
छपवाता है
मौसम मौसम
दिल्ली सरकार
और उसके लोगों
को कोसने वालों
की भीड़ का
झंडा उठाता है
अपनी गली में
उसी सरकार
के झंडे के
परदे का घूँघट
बनाने से बाज
नहीं आता है
मेरे देश की
हर गली
कूँचे में
एक ऎसा
शख्स जरूर
पाया जाता है
जो अपना
उल्लू सीधा
करने के लिये
लोकतंत्र की
धोती को सफेद
से गेरुआँ
रंगवाता है
तिरंगे के रंगो
की टोपियाँ
बेचता हुआ
कई बार
पकड़ा जाता है
ऎसा ही शख्स
कामयाबी की
बुलंदी छूने
की मुहिम में
इस समाज के
बहुमत से
दोनो हाथों
में उठाया
जाता है
और एक
तू बेशरम है
सब कुछ देखते
सुनते हुऎ
अभी तक
दलाली के
पाठ को नहीं
सीख पाता है
तेरे सामने सामने
कोई तेरा घर
नीलाम कर
ले जाता है
जब तू अपना
घर ही नहीं
बेच पाता है
तो कैसे
तू पूरे देश
को नीलाम
करने की
तमन्ना के
सपने पाल कर
अपने को
भरमाता है ।

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