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सोमवार, 3 अप्रैल 2017

खेल भावना से देख चोर सिपाही के खेल

वर्षों से
एक साथ
एक जगह
पर रह
रहे होते हैं

लड़ते दिख
रहे होते हैं
झगड़ते दिख
रहे होते हैं

कोई गुनाह
नहीं होता है
लोग अगर
चोर सिपाही
खेल रहे होते हैं

चोर
खेलने वाले
चोर नहीं हो
रहे होते हैं
और
सिपाही
खेलने वाले भी
सिपाही नहीं
हो रहे होते हैं

देखने वाले
नहीं देख
रहे होते हैं
अपनी आँखें

शुरु से
अंत तक
एक ही लेंस से
उसी चीज को
बार बार

अलग अलग
रोज रोज
सालों साल
पाँच साल

कई बार
अपने ही
एंगल से
देख रहे
होते हैं

खेल खेल में
चोर अगर कभी
सिपाही सिपाही
खेल रहे होते है

ये नहीं समझ
लेना चाहिये
जैसे चोर
सिपाही की
जगह भर्ती
हो रहे होते हैं

खेल में ही
सिपाही चोर
को चोर चोर
कह रहे होते है

खेल में ही
चोर कभी चोर
कभी सिपाही
हो रहे होते हैं

खबर चोरों के
सिपाहियों में
भर्ती हो जाने
की अखबार
में पढ़कर

फिर
किस लिये
‘उलूक’
तेरे कान
लाल और
खड़े हो
रहे होते हैं

खेल भावना
से देख
खेलों को
और समझ
रावणों में ही
असली
रामों के
दर्शन किसे
क्यों और कब
हो रहे होते हैं

ये सब खेलों
की मायाएं
होती हैं

देखने सुनने
पर न जा
खेलने वालों
के बीच और
कुछ नहीं
होता है
खेल ही हो
रहे होते हैं ।

चित्र साभार: bechdo.in

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

राम ही राम हैं चारों ओर हैं बहुत आम हैं रावण को फिर किसलिये किस बात पर जलाया

विजया दशमी
के जुलूस
में भगदड़
मचने पर
पकड़ कर
थाने लाये
गये दो लोगों
से जब
पूछताछ हुई

एक ने
अपने को
लंका का राजा
रावण बताया
दस सिर
तो नहीं थे
फिर भी
हरकतों से
सिर से पाँव
तक रावण
जैसा ही
नजर आया

और

दूसरे की
पहचान
बहुत
आसानी से
अयोध्या के
भगवान राम
की हुई
जिनको बिना
देखे भी
सारे के सारे
रामनामी
दुपट्टे ओढ़े
भक्तों ने
आँख नाक
कान बंद
कर के
जय श्री राम
का नारा
जोर शोर
से लगाया 


दोनो ने
अपना गाँव
इस लोक
में नहीं
परलोक में
कहीं होना
बताया

मजाक ही
मजाक में
उतर गये
उस लोक से
इस लोक में
इस बार
दशहरा
पृथ्वी लोक
में आकर
खुद ही देखने
का प्लान
उन्होने
खुद नहीं
उनके लिये
ऊपर उनके ही
किसी चाहने
वाले ने बनाया

ऊपर वालों ने
नीचे आने जाने
में अड़ंगा भी
नहीं लगाया

भीड़ से
पल्ला पड़ा जब
राम और
रावण का
नीचे उतर कर
भीड़ में से
किसी ने
अपने आप को
राम का भाई
किसी ने चाचा
किसी ने बहुत ही
नजदीक का
ताऊ बताया

रावण के
बारे में
पूछने पर
किसी ने
कोई जवाब
नहीं दिया
इसने उससे
और उसने
किसी और
से पूछने
की राय दे
कर अपना
मुँह इधर
और
उधर को किया
सभी ने
अपना अपना
पीछा रावण
को देखते
ही छुड़ाया

राम की
बाँछे खिली
सामने खड़ी
सारी जनता
से उनकी
खुद की
रिश्तेदारी मिली

और

रावण बेचारा
सोच में पड़े
खड़ा रह पड़ा
किसलिये
और
किस मुहूर्त में
राम के साथ
रामराज्य
की ओर
ऊपर से नीचे
एक बार
और
अपनी जलालत
देखने
निकल पड़ा ?

चित्र साभार: www.shutterstock.com

रविवार, 19 जुलाई 2015

हाशिये भी बुरे नहीं होते हैं अगर खुद ही खींचे गये होते हैं

हाशिये खुद ही बनें
खुद के लिये खुद ही
समझ में आ जायें
खुद चला चले कोई
मानकर कुछ
निशानों को हाशिये
और फिर खुद ही
खींच ले लक्ष्मण रेखा
हाशिये के पार
निकल लेने के बाद
सोच कर कि भस्म
वैसे भी कोई नहीं होता
रावण तक जब
नहीं हो सका
हाशियों में धकेलने
के मौके की तलाश में
रहने वालों के लिये
हाशिये माने भी
नहीं रखते हैं
एक जैसे ही रेंगते हुऐ
समझ में आने वाले
समझ लेते हैं रेंगना
एक दूसरे का बहुत
ही आसानी से
बहुत जल्दी और
आनन फानन में
खींच देते हैं एक
काल्पनिक हाशिया
सीधा खड़ा होने की
कोशिश में लगे
हुऐ के लिये और
जब तक समझ पाये
जमीन की हकीकत
खड़े होने की कोशिश
में धकियाये हुआ
हाशिये के पार से
देखता हुआ नजर
आता है खुद को ही
लक्ष्मण भी नहीं
होता है कहीं
रेखाऐं भी दिखती
नहीं हैं बस
महसूस होती हैं
क्या बुरा है ऐसे में
सीख लेना ‘उलूक’
पहले से ही खुद ही
चल कर खड़े हो लेना
हाशिये के पार
खुद खींच कर
खुद के लिये
एक हाशिया।

चित्र साभार: www.slideshare.net

रविवार, 27 अप्रैल 2014

कुछ दिन के लिये ही मान ले हाथ में है और एक कीमती खिलौना है

आज को भी
कल के लिये
एक कहानी
ही होना है
ना उसमें कोई
राम होना है
ना किसी रावण
को होना है
हनुमान दिख रहे
चारों तरफ पर
उन्हे भी कौन सा
एक हनुमान
ही होना है
राम की एक
तस्वीर होनी है
बंदरों के बीच
घमासान होना है
ना कौरव
को होना है
ना पाँडव
को होना है
शतरंज की बड़ी
बिसात होनी है
सेना को बस
एक लाईन में
खड़ा होना है
ना तलवार
होनी है
ना कोई
वार होना है
अंगुली स्याही
से धोनी है
बस एक काला
निशान होना है
बड़े मोहरों
को दिखना है
बिसात के
बाहर होना है
इसे उसके लिये
वहाँ कुछ कहना है
उसको इसके लिये
यहाँ कुछ कहना है
रावण को लंका
में ही रहना है
राम को अयोध्या
में ही कहना है
आस पास का
रोज का सब ही
एक सा तो रोना है
‘उलूक’ दुखी इतना
भी नहीं होना है
जो कुछ आ जाये
खाली दिमाग में
यहाँ लिख लिखा
के डुबोना है ।

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

जिसके लिये लिखा हो उस तक संदेश जरूर पहुँच जाता है !

पता नहीं क्या क्या और
कितना कितना बदला है
कितना और बदलेगा
और क्या फिर हो जायेगा
सुना था कभी राम थे
सीता जी थी
और रावण भी था
बंदर तब भी
हुआ करते थे
आज भी हैं
ऐसी बहुत से
वाकयों से
वाकिफ होते होते
कहां से कहां आ गये
बस कुछ ही
दिन हुऐ हों जैसे
छोटे शहर में
छोटी सी बाजार
चाय की
दुकानों में जुटना
और बांट लेना बहुत कुछ
यूं ही बातों ही बातों में
आज जैसे
वही सब कुछ
एक पर्दे पर आ गया हो
बहुत कुछ है
कहीं किसी के
पास आग है
किसी के
पास पानी है
कोई
आँसुओं के सैलाब में
भी मुस्कुरा रहा है
कोई
जादू दिखा रहा है
कहीं
झगड़ा है
कहीं
समझौता है
दर्द खुशी
प्यार इजहार
क्या नहीं है
दिखाना बहुत
आसान होता है
इच्छा होनी चाहिये
कुछ ना कुछ
लिखा ही जाता है
अब चाय की वो दुकान
शायद यहाँ आ गयी है
हर एक पात्र
किसी ना किसी में
कहीं ना कहीं
नजर आता है
हर पात्र के पास
है कुछ ना कुछ
कहीं कम
कहीं कहीं तो बहुत कुछ
चाय तो अब
कभी नहीं दिखती
पर सूत्रधार
जरूर दिख जाता है
कहानी कविता
यात्रा घटना दुर्घटना
और पता नहीं क्या क्या
सब कुछ
ऐसे बटोर के ले आता है
जैसे महीन
झाड़ू से एक सुनार
अपने छटके हुऐ
सोने के चूरे को
जमा कर ले जाता है
एक बात को लिखना जहां
बहुत मुश्किल हो जाता है
धन्य हैं आप
कैसे इतना कुछ
आपसे इतनी
आसानी से हो जाता है
आप ही के
लिये हैं ये उदगार
मुझे पता है
आप को सब कुछ
यहां पता चल जाता है ।

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

राम का नहीं पता रावण को जिंदा रखना चाहते हैं

हर साल ही तो हम
बुराई पर अच्छाई की
विजय का पर्व मनाते हैं
ऐक दिन के खेल के लिये
तेरा ही नहीं तेरे पूरे
खानदान के पुतले
हम बनाते हैं
साल दर साल
मैंदानो और सड़को पर
तेरा मजमा हम लगाते हैं
राम के हाथों आज के
दिन मारे गये रावण
विजया दशमी के दिन
हमें खुद पता नहीं होता है
कि हम क्या जलाते हैं
कितनी बार जल चुका है
अभी तक नहीं जल सका है
जिंदा रखने के लिये ही
उस चीज को हम
एक बार फिर जलाते हैं
आज के दिन को एक
यादगार दिन बनाते हैं
राम के हाथों हुआ था
खत्म रावण या रावणत्व
इतनी समझ आने में
तो युग बीत जाते हैं
शिव के लिये रावण की
अगाध श्रद्धा और उसके
लिखे शिव तांडव स्त्रोत्र की
बात किसी को कहाँ बताते हैं
किस्से कहाँनियों तक
रहती हैं बातें जब तक
सभी लुफ्त उठाने से
बाज नहीं आते हैं
पुतले जलाने वाले ही
पुतले जलाने के बाद
खुद पुतले हो जाते हैं
रावण की सेना होती है
उसी के हथियार होते हैं
सेनापति की जगह पर
राम की फोटो लगा कर
अपना काम चलाते हैं
बहुत कर लेते हैं जब
कत्लेआम उल्टे काम
माहौल बदलने के लिये
एक दिन पुतले जलाते हैं
रावण तेरी अच्छाईयां
कहीं समझ ना आ जायें
किसी को कभी यहां पर
आज भी राम को
आगे कर हम खुद
पीछे से तीर चलाते हैं ।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

तुलसीदास जी की दुविधा

सरस्वती प्रतिमा
को हाथ जोडे़ खडे़
तुलसीदास जी
को देख कर
थोडी़ देर को
अचंभा सा हुआ
पर पूछने से
अपने आप को
बिल्कुल भी
ना रोक सका
पूछ ही बैठा
आप और यहाँ
कैसे आज दिखाई
दे जा रहे हैं
क्या किसी को
कुछ पढा़ने के
लिये तो नहीं
आप आ रहे हैं
राम पर लिखा
किसी जमाने में
उसे ही कहाँ
अब कोई पढ़
पा रहा है
बस उसके नाम
का झंडा बहुतों
के काम बनाने
के काम में जरूर
आज आ रहा है
हाँ यहाँ तो बहुत
कुछ है नया नया
बहुत कुछ ऎसा
जैसे हो अनछुआ
अभी अभी देखा
नये जमाने का
नायक एक मेरे
सामने से ही
जा रहा है
उसके बारे में
पता चला कि
हनुमान उसे
यहाँ कहा
जा रहा है
हनुमान मेरी
किताब का
नासमझ निकला
फाल्तू में रावण से
राम के लिये
पंगा ले बैठा
यहाँ तो
सुना रावण
की संस्तुति
पर हनुमान
के आवेदन
को राम खुद ही
पहुँचा रहा है
समझदारी से देखो
कैसे दोनों का ही
आशीर्वाद बिना पंगे
के वो पा रहा है
राम और रावण
बिना किसी चिंता
2014 की फिल्म
की भूमिका बनाने
निकल जा रहे हैं
हनुमान जी जबसे
अपनी गदा यहाँ
लहरा रहे हैं
लंकादहन के
समाचार भी
अब अखबार
में नहीं पाये
जा रहे हैं
मैं भी कुछ
सोच कर यहाँ
आ रहा हूँ
पुरानी कहानी के
कुछ पन्ने हटाना
अब चाह रहा हूँ
क्या जोडूँ
क्या घटाऊँ
बस ये ही
नहीं कुछ समझ
पा रहा हूँ
विद्वानों की
छत्र छाया
शायद मिटा
दे मेरी
इस दुविधा
को कभी
इसीलिये आजकल
यहाँ के चक्कर
लगा रहा हूँ ।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

राम नहीं खोल सकता कोई वैंडर तेरे नाम का टेंडर

सोच रहा था कल से
इस पर कुछ भी नहीं
लिखना विखना चाहिये
करने वाले को कौन सा
इसे पढ़ ही लेना है
मुझे भी बस चुप
ही रहना चाहिये
पर मिर्ची खाने पर
पानी पीना कभी
पढ़ ही जाता है
सू सू की आवाज बंद भी
कर ली जाये तब भी
मुँह लाल होना तो
सामने वाले को
दिख ही जाता है
इसलिये रहा नहीं गया
जब देखा स्वयंवर
टाला ही जा चुका है
सारे के सारे बनाये गये
रामों को दाना डाला चुका है
बेशरम राम बनने का
जुगाड़ लगा रहे थे
देख भी नहीं रहे थे
राम की मुहर जब
ना जाने कब से
वो अपने पास
ही दिखा रहे थे
अब जब राम
भगवान होते हैं
पता था इन सबको
फिर ये कैसे सीता को
पाने के सपने
देखे जा रहे थे
खेमे पर खेमे
किसलिये बना रहे थे
सुग्रीव भी बेचारे
इधर से उधर
जाने में अपना
समय पता नहीं
क्यों गंवा रहे थे
रावण के परिवार की तरह
राज काज जब
संभाला जा रहा था
लोगों को दिखाने के लिये
रावण का पुतला भी
निकाला जा रहा था
सीता के अपहरण के लिये
राम बनकर ही मौका
निकाला जा रहा था
कैसे हो जायेगा स्वयंवर
उसके बिना मूर्खो
जब उसने अभी तक
अपना रामनामी चोला
अभी नहीं उतारा था ।

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