उलूक टाइम्स: विश्वविद्यालय
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बुधवार, 16 सितंबर 2020

लाशें जिंदा रहना बहुत जरूरी हैं मरे हुऐ लोगों के जिन्दा समाचारों लिये हमेशा

 

एक पुड़िया सफेद पाउडर मिला है

उस जगह पर जहाँ चॉक ही चॉक
पायी जाती रही है हमेशा से डिब्बा बन्द

अलग बात है
कहीं जरा सा भी नहीं घिसी रखी है इतिहास बनाने के लिये भी

हम सब
उसी को घिसने की रोटियां तोड़ते रहें हैं सालो साल

और कुछ
इसी की सफेदी को बिना छुवे हो लिये हैं बेमिसाल
खरीदे हैं जिन्होंने कई सम्मान अपने नाम से
अखबार साक्षी रहे हैं

अपनी नाकामियां लिखना आसान नहीं है

अखबार वाले के किये गये प्रश्न के उत्तर दिये गये हैं
किस तरह तराशे हुऐ निकलें
कल सुबह तक कुछ कहना ठीक नहीं है

और वैसे भी जो छपा आ जाता है
उसके बाद कहाँ कुछ किया जाता है

बहुत कुछ होता है आसपास कुछ अजीब सा हमेशा ही

अब हर बात कहाँ किसी अखबार तक पहुँचती है
और जो पहुँचाई जाती है कुछ दस्तखतों के साथ
उसकी तसदीक करने कभी कोई आता भी नहीं है

हमाम के अन्दर के कपड़े के बारे में पूछे गये प्रश्न
नाजायज हैं कह कर
खुद अपनी तस्वीर अपने ही आइने की
किसी को भी दिखा लेने की
आदत कभी बनी भी नहीं है

उलूक
चिड़िया कपड़े ना पहना करती है
ना उसे आदत होती है बात करने की नंगई की
उसकी जरूरत भी नहीं होती है

हम सब कर लेते हैं खास कर बातें कपड़ों की

और ढकी हुई उन सारी लाशों की
जिनकी खुश्बू पर कोई प्रश्न नहीं उठता है

आज के समाज में
लाशें जिंदा रहना बहुत जरूरी हैं
मरे हुऐ लोगों के जिन्दा समाचारों के लिये हमेशा ।

चित्र साभार:
https://twitter.com/aajtak

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2019

पुरानी कुछ इमारतें कई बार पैदा की जाती है हर बार एक नया नाम देकर उन्हें फिर लावारिस छोड़ दिया जाता है


कुछ की
किस्मत में
नहीं होता है
खुद जन्म लेना

उन्हें पैदा
किया जाता है

नश्वर
नहीं होते हैं
पर
मरने का उनके
मौका भी
नहीं आता है

जरूरी नहीं है
जीवन होना
सब कुछ में

कुछ निर्जीव
चीजों को भी
आदत हो जाती है

झेलना
जीवन को

जिसका असर
समय समय पर
देखा भी जाता है

कुछ
इमारतों के
पत्थर

आईना
हो जाते हैं

समय
का चेहरा
उनमें
बहुत साफ
नजर आता है

इतिहास
लिख देना
किसी चीज का
अलग बात हो जाती है

लिखने वाला
सामान्य मनुष्य ही हो
जरूरी नहीं हो जाता है

पूर्वाहग्रह ग्रसित होना
किसी
मानसिक रोग
की
श्रेणी में

कहीं
 लिखा हुआ
नजर नहीं आता है

ना नया
गृह बनता है
ना गृह प्रवेश होता है

कुछ घरों का नाम
समय के साथ
बदल दिया जाता है

जन्मदिन
मनाया जाता है
नगाढ़े भी बजते हैं
ढोल भी पीटे जाते हैं
अखबार के पन्ने को भी
रंग दिया जाता है

‘उलूक’
कुछ लावारिस

ऐसी ही
किस्मत लेकर
पैदा होते हैं

हर बार
जन्म देने के बाद
एक लम्बे समय के लिये

फटे हाल
होने के लिये
उन्हें छोड़ दिया जाता है।

चित्र साभार: https://making-the-web.com/university-cliparts

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

विश्वविद्यालय शिक्षक संघ चुनाव जितना ‘उलूक’ देख पा रहा है

विश्व
के एक
विद्यालय में

जल्द ही

संघ का
चुनाव होने
जा रहा है

मजे
की बात है

हर
लड़ने वाला
इस चुनाव में

अपना
झंडा
छुपा रहा है

बुद्धिजीवी
बड़ी बात है

किसी एक
बुद्धिजीवी को

वोट देने
जा रहा है

मुद्दे
किसी के
पास हैं
और क्या हैं

पूछने पर

कोई
कुछ नहीं
बता रहा है

विश्व का
यही एक
विद्यालय

जल्दी ही
दो में टूटने
जा रहा है

किसलिये
और क्यों
तोड़ा
जा रहा है

अलग बात है

अच्छा है
किसी से
उसकी
औकात के
बाहर का प्रश्न

पूछा भी
नहीं जा रहा है

शहर
जिले प्रदेश
से छाँट कर

किसी
एक को

दूसरी

ऐसी ही
किसी एक
ऊँची दुकान में

सामान
बेचने
के लिये
भेजा
जा रहा है

अखबार
शहर का

बेचने और
खरीदने की
बात छोड़ कर

दुकानदार
बनाये गये
बुद्धिजीवी के
गाये गये
गाने को
समझा रहा है

सब
पके
पकाये हैं

हर कोई
एक दूसरे को
पका रहा है

विश्व के
विद्यालय के
विख्यात
व्याख्याताओं को

दो हजार उन्नीस
नजर आ रहा है

समझ में
नहीं आती हैं
कुछ बातें

तो लिखने
चला आ रहा है

लिखना
नहीं आता है
फिर क्यों
और
किसलिये
पढ़ा रहा है

लूटना
सिखाना
गिरोह बनाना

नहीं सिखा
पा रहा है

बेकार है
जिन्दगी उसकी

जो खाली
विषय
पढ़ा रहा है

‘उलूक’
तेरी बात है
मान लेते हैं

तू खुद भी
नहीं समझ
पा रहा है

दुआ
उसको दे

जो
ऐसे कूड़े पर

फिर भी

टिप्पणी
दे कर
जा रहा है ।


चित्र साभार: www.thebiharnews.in

बुधवार, 30 जनवरी 2019

जरूरत नहीं है समझने की बहुत लम्बे समय से इकट्ठा किये कूड़े की उल्टी आज आ ही जा रही है


(उलूक को बहुत दूर तक दिखायी नहीं  देता है । कृपया दूर तक फैले देश से जोड़ कर मूल्याँकन करने का कष्ट ना करें। जो  लोग  पूजा में व्यस्त हैं  अपनी आँखे बंद रखें। बैकुण्ठी  के फिर से अवतरित होने के लिये मंत्र जपने शुरु करें)


कई
दिन हो गये

जमा करते करते

कूड़ा
फैलाने की

हिम्मत ही नहीं
आ पा रही है

दो हजार
उन्नीस में


सुना गया है


चिट्ठाकारी
पर
कोई

ईनाम

लेने के लिये

लाईन लगाइये


की मुनादी

करवायी
जा रही है


कई दिन से
ख्वाब में

मक्खियाँ ही
मक्खियाँ
नजर आ रही हैं


गिनना शुरु
करते ही
पता
चल रहा है

कुछ मकड़ी
हो चुकी हैं

खबरची
की खबर
बता रही है


मक्खियाँ
मकड़ी होते ही

मेज की
दूसरी ओर
चली जा रही हैं


साक्षात्कार
कर रही हैं

सकारात्मकता
के पाठ

कैसे
पढ़ाये जायेंगे

समझा रही हैं


मक्खियों
का राजा
मदमस्त है

लग रहा है
बिना अफीम
चाटे ही

गहरी नींद
आ रही है


खून
चूसने में
मजा नहीं है

खून
सुखाने के

तरीके
सिखा रही हैं


मकड़ियाँ
हो चुकी

मक्खियों के
गिरोह के

मान्यता प्राप्त
होने का सबूत

खबरचियों
की टीम
जुटा रही है


मकड़ी
नहीं हो सकी
मक्खियाँ

बुद्धिजीवियों
में अब
गिनी
जा रही हैं


इसलिये
उनके
कहने सुनने

लिखने पढ़ने
की बात

की बात
करने की

जरूरत ही
नहीं समझी
जा रही है


अखबार में

बस
मकड़ियों
की खबर

उनके
सरदार
के इशारों
से ही
छापी
जा रही है


गिरोह
की बैठकों
में तेजी
आती हुयी
नजर आ रही है


फिर किसी
बड़ी लूट की

लम्बी योजना पर
मुहर लगवाने के लिये

प्रस्ताव की
कापियाँ

सरकार
के पास
भेजी
जा रही हैं


अंग्रेजों के
तोड़ो और
राज करो
के सिद्धांत का

नया उदाहरण
पेश करने
की तैयारी है


एक
पुरानी दुकान की
दो दुकान बना कर

दो दुकानदारों
के लिये दो कुर्सी

पेश करने की
ये मारामारी है


गिरोह
की खबरें
छापने के लिये

क्या
मिल रहा है
खबरची को

खबर
नहीं बता रही है


हो सकता है

लम्बी लूट
की योजना में

उनको भी
कहा गया हो

उनकी भी
कुछ भागीदारी है


थाना कोतवाली
एफ आई आर
होने का
कोई डर हो

ऐसी बात
के लिये
कोई जगह
छोड़ी गयी हो

नजर
नहीं आ रही है


गिरोह
के मन मुताबिक
लुटने के लिये तैयार

प्रवेश
लेने वाले
अभ्यर्थियों की

हर साल
एक लम्बी लाईन

खुद ही
खुदकुशी
करने के लिये
जब
आ ही जा रही है


‘उलूक’
तू लिख

‘उलूक’
तू मत लिख

कुछ अलग
नहीं होना है
किसी भी जगह

इस देश में
सब वही है

सबकी
सोच वही है

तेरी खुजली

तुझे ही
खुजलानी है

इतनी सी अक्ल

तुझे पता नहीं

क्यों नहीं
आ पा रही है ।

चित्र साभार:
https://www.canstockphoto.com

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

इस घर को उस घर से निकाल किसी और घर में मिलाने का जल्दी ही कमाल होगा

दैनिक हिन्दुस्तान 15/01/2019
नये साल

जरूर

फिर से
कोई
बबाल होगा

बिकेगा
एक बार और
बिका घर

अलग
धमाल होगा

उस घर से
उठाया था
घर कभी

सोचे बिना
कोई
सवाल होगा

इस घर में
मिलाया था
सोच कर

कल सब
अपना ही
माल होगा

घर बेच
कर बना
घर का
मालिक

कितना
निहाल होगा

कफन
तीसरे साल
बदल
देने वाला

कितना
खुशहाल होगा

पाँच साल में
निकलेगा
फिर जनाजा

क्या
सूरते
हाल होगा

किसका मरा
कुछ नहीं होगा

सबसे आगे
सिर मुँडाया

वही
माई का
लाल होगा

बेवकूफ
‘उलूक’
दौड़ेगा

छोड़ कर
चलना
घुटनों के बल

देखना
बेमिसाल होगा

समझदारों
के गिरोह में
खिल उठेंगे
चेहरे सभी

इस
नये साल
पक्का

बेवकूफों का
फिर
इन्तकाल होगा।
 

चित्र साभार: दैनिक हिंदुस्तान, मंगलवार, 15/01/2019 पृष्ठ 11

रविवार, 9 दिसंबर 2018

पूरे साल का खाता बही फिर से याद आ रहा है देश तो सागर है ‘उलूक’ के कोटर एक नाली की बातें हैं रहने दीजिये काहे परेशान होना है मत झाँकिये

नियमावली
जरूर छापिये

 मोती जैसे
अक्षरों में
छपे हुऐ पन्ने

घर घर में
हर एक को
जा जा
कर बाँटिये

करा क्या है
किस ने आकर
किससे और
क्यों पूछना है

कुछ
अपने जैसों के
साथ मिल कर

 नियमों की
धज्जियाँ टाँकिये

मूँछों हों तो
ताव दीजिये

नहीं हों तो
खाँचे में मूँछ के

अँगुलिया
फेर घुमा
चिढ़ा चिढ़ा
कर मौज काटिये

बहुत ज्यादा
गधा गधा
मत बाँचिये

गधों
की अब
तरक्की
कर ही डालिये

घोड़े
पुकार कर
उनकी खुशी में

 उनके
साथ साथ
खुद भी नाँचिये

अपने
हिसाब के
आस पास के
किसी अस्तबल के

चक्रानुक्रमानुसार

तख़्त-ए-ताऊस छाँटिये

तीन साल तक
लगातार
घोड़े बना चुके
अपने अपने
गधों को
लम्बी दौड़ के
घोड़े बाँटिये

किसी से
चिढ़ हो
उसको
तीन टाँग टूटे
गधे की नकेल
थमा कर

घोड़ों की दौड़ में
शामिल होने का
आदेश थमा कर

 उसके गिरने की
खबर दौड़ से
पहले छापिये

लिखने लिखाने से
किसलिये भागना
मत भागिये
कुछ भी लिखिये
गिनतियों से
लिखे लिखाये को
जरूर नापिये

गिनना
बहुत जरूरी है
कितना लिख गये
गिनती नहीं आती
कोई बात नहीं
बगले मत झाँकिये

पैमाना
कोई होना
जरूरी है
मयखाने में
आने जाने
वालों के
जूते चप्पलों
की लम्बाई
ले कर ही सही
 मगर
 कुछ तो नापिये

रंग देखिये
रंग समझिये
रंग से झुड़े
करतबों के
ढंग समझिये

सरदार की
कठपुतलियाँ
बिना डोर के
पगलायी हुयी

अपने
आसपास
की समझिये

 सरदार
को ही
बस खाली
एक अखबार
की खबर
पढ़ कर
मत डाँठिये

समझिये
बड़े घपले
के पर्दे होते हैं
छोटे छोटे
भ्रष्टाचार के
सुर्खियों से भरे
समाचार
थोड़ा सा रुकिये
इतनी जल्दी मत हाँफिये

पूरे के पूरे सड़े
हुऐ कद्दू के
एक बीज के
सड़े होने की
खबर को लेकर
पुतला फूँकने
के लिये मत भागिये

‘उलूक’
की बड़बड़
पूरे साल की
कोई नयी बात नहीं है

दो हजार उन्नीस में
मिलने वाला है
यहाँ कोई ईनाम
किसी एक को

उधर की ओर ताकिये

ईवीएम नहीं होगी
इस के लिये यहाँ

 कुछ और जुगाड़
करना पड़ेगा

नेटवर्किंग
का जमाना है
नेटवर्किंग
के पर्फेक्ट
वर्किंग के लिये
अपने अपने वोट
कहाँ है जरा भाँपिये

अंत में सुझाव-ए-उलूक

पढ़े लिखे
बुद्धिजीवी से
उम्मीद मत रखिये
उसका दिमाग भी
एक बड़ा सा
पेट होता है

कुछ
बुद्धिजीवी
चने हो
आपके पास
तो बाँटिये ।

चित्र साभार: http://personligutvecklingcentrum.se

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

पुर्नस्थापितं भव


समर्पित समाज के लिये समर्पित
करता रहता है समय बे समय
अपना सब कुछ अर्पित

छोटे से गाँव से शुरु किया सफर 
शहर का हो गया कब
रहा हमेशा इस सब से बेखबर

नाम बदलता चलता चला गया

स्कूल से कालेज कालेज से विद्यालय
विद्यालय से विश्वविद्यालय हो गया

अचानक सफर के बीच का एक मुसाफिर
आईडिया अपना एक दे गया काफिर

स्थापना दिवस स्थापित का मनाना शुरु हो गया
एक तारा दो तारा से पाँच सितारा की तरफ
उसे खिसकाया जाना शुरु हो गया

देश के विकास की तरफ दौड़ने की कहानी
उसी बीच कोई आ कर सुनाना शुरु हो गया

नाक की खातिर किसी की नाक को
कुछ खुश्बू सी महसूस हुई
ना जाने किस मोड़ पर

नाक के ए बी सी डी से
ए को उठा ले आने का
जोड़ तोड़ करवाना शुरु हो गया

ए आया जरा सा भी नहीं शर्माया

बेशरम का रोज का ही
जगह जगह छप कर आना शुरु हो गया

निमंत्रण समर्पित जनता को
कब किसने दिया ना जाने

गायों को अपनी सुबह सुबह
छोड़ने आना शुरु हो गया

कारें स्कूटर घर की
जगह जगह खड़ी होने लगी

गैराज मुफ्त का
सब के काम आना शुरु हो गया

कुत्ते बकरियाँ बन्दर
सब दिखायी देने लगे घूमते
शौक से बिना जंगल का
चिड़ियाघर नजर आना शुरु हो गया

खेल कूद के मैदान में खुशियाँ बटने लगी
समय समय पर 
शादी विवाह कथा भागवत का पंडाल
बीच बीच में कोई बंधवाना शुरु हो गया

तरक्की के रास्ते खुलते चले गये

हर तीन साल में ऊँचाइयों की ओर ले जाने के लिये
एक कुछ और ऊँचा आ कर
ऊँचाईयाँ समझाना शुरु हो गया

क्या कहे क्या छोड़ दे कुछ कहता ‘उलूक’ भी

भीड़ में शामिल हो कर भीड़ के गीत में 
भीड़ का सिर नजर आने से

पुनर्मूषको भव: कथा को याद करते हुऐ
सब कुछ कहने से कतराना शुरु हो गया

जो भी हुआ जैसा हुआ
निकल गया दिन स्थापना का

फिर से स्थापित हो कर एक मील का पत्थर
अगले साल के स्थापना दिवस की आस लेकर

फिर से उल्टे पाँव भागना शुभ होता है
समझाना शुरु हो गया ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

देश प्रेम देश भक्ति और देश

विश्वविद्यालय
देश के
कहाँ होते हैं
विश्व के होते हैं

सिखाये
हुऐ के
हिसाब
से होते हैं

देशप्रेम
छोड़िये
बड़े प्रेम
विश्वप्रेम
पर चल
रहे होते हैं

पर कन्फ्यूजन
भी होते हैं
और
अपनी जगह
पर होते है

चाँसलर
वाईस चाँसलर
प्रोफेसर
देश के ही
बराबर के
ही होते हैं

कभी
लगता है
देश से
भी शायद
कुछ और
बड़े होते हैं

छात्र छात्राएं
अभिभावक
दलों के
हिसाब से
अलग अलग
होते हैं

नारे लगते
समय नहीं
दिखते हैं

जरूरत भी
नहीं होती है
और
वैसे भी
पता कहाँ
किसी को
होते हैं

कोई नहीं
पूछता है
हिसाब किताब
किताबों कापियों
की दुकानों का

स्कूल कालेज
और पढ़ाई
सब
अलग अलग
विषय होते हैं

हिन्दू
मुसलमान
शहर गाँव
इलाका विशेष
ठाकुर बनिया
बामन
कुत्ता बिल्ली
के काम्बिनेशन
अलग अलग
होते हैं

कहाँ किस
का प्रयोग
करना है
वही लोग
जानते हैं
जिनके
हिसाब किताब
के बही खाते
एक जैसे ही
और कुछ
अलग होते हैं

प्रयोग
जातियों पर
जितने
विश्वविद्यालयों
में होते हैं
और कहीं भी
नहीं दिखते हैं
ना ही कहीं होते हैं

कुत्ता
फालतू मे
गाली
खाता है
हमेशा ही
लेकिन वो
सही में कुछ
इस तरीके के ही
गली के कुत्ते होते हैं

नारे उगते हैं
पता नहीं
कहाँ किस
खेत में
बस दिखते हैं
उगते हुऐ
देश द्रोही
के नाम पर
सारों में
से कुछ
छोड़ कर
सारे के सारे
अन्दर हो
रहे होते हैं

जय हो देश की
देश प्रेमियों की

उनके पैजामों
के अन्दर
की हवा में
उनके उगाये
मटर हरे हरे
हो रहे होते हैं

देश का
खून पीने
के लिये
लगाये गये
नलों से
टपकने वाले
खून के चर्चे
कहीं भी नहीं
हो रहे होते हैं

पाले हुऐ
सरकार के
सरकारी लोगों के
काम देख कर भी
अनदेखे हो रहे होते हैं

जो नियम
से करते है
नियम को
देखसुन कर
नियम के
हिसाब से

ऐसे सारे
के सारे
देशद्रोही
देश के
कोने कोने मे
रो रहे होते हैं

माफ करियेगा
'उलूक'
जानता है
तेरे शहर में
तेरे मोहल्ले में
तेरे घर में
इस तरह
के जलवे
हो भी
और
नहीं भी
हो रहे होते हैं

लिखने दे
बबाल ना कर
मत बता
मुझे मेरे हाल
मुझे पता है
तेरे जैसे
ना हो
सकते हैं
ना होंगे
ना हो
रहे होते हैं ।

चित्र साभार: www.gograph.com

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

‘रोहित’

सारे के सारे
सब कुछ
कह चुके
गणित
लगा कर
जोड़ घटाना
गुणा भाग कर

अपने अपने
लिये
अपने अपने
हिसाब से
बना चुके
खाते खतौनी
तेरी मौत के

पर
दुख: है
गिनीज बुक
रिकॉर्डस
में नहीं
आ पायेगी
‘रोहित’

वो जो हुआ
तेरे साथ
कोई नई
चीज नहीं है

हर
विश्वविद्यालय
में हुई है
होनी होती है
सबसे
जरूरी होती है
यू जी सी को
भी पता होती है

कि
उपर चढ़ने
के लिये
जरूरी
हमेशा
जिंदा शरीर
से अच्छी एक
लाश ही होती है

हत्या
और आत्महत्या
तो बस एक
बात होती है

बाकी वो
राजनीति
क्या होती है
बस एक
बच्चा होती है
जो और
जगह होती है

खिचड़ी
पक रही
होती है
चावल
किसी का
दाल किसी
की होती है

सब को
पता होती है
कुत्तों के
नोचने के लिये
माँस चिपकी ह्ड्डी
ज्यादा अच्छी
चीज होती है

विश्वविद्यालय
बड़ी
क्या कहना
चाहिये
नहीं कही
जा रही है

जो देखकर
अपने घर
के पालतू
की शक्ल
जैसी ही एक
चीज की
मेल की
फीमेल
होती है

भड़वों
के लिये
वक्तव्य
देने सहेजने
की काँटेदार
झाड़ियों की
बीज होती है

जिस
गृह के
गृहपति
की बहुत बड़ी
कीमत होती है

उस घर
में हर एक
चीज बिकने
और
खरीदने की
चीज होती है

किसी
के हिस्से
में कटी टाँग
किसी
के हिस्से
में कटा हाथ
किसी
के हिस्से में
मौत की खबर
किसी
आत्माहीन
के हाथ में
मरे हुऐ की
आत्मा होती है

शोक सभा
होती है
जरूर होती है

शोक
संदेश भी
होता है
पढ़े लिखों
की भाषा
होती है

पर कहीं
नहीं होता है
आत्मा
को नोचने
वालों का
हिसाब किताब

उनके
हिसाब किताब
की किताब
उन लोगों
के खाते
देखने वालों
के पास होती है


विश्वविद्यालयों
जैसे 
एक
बड़े चीरफाड़ घर 

में लाशों के  
पहरेदारों की 
कमी नहीं होती है 

तेरी
मौत से
‘रोहित’
विश्वविद्यालयों
के अंदर
के पढ़े लिखे
कफन खोरों
कफन
बेचने वालों
और उनके
तीमारदारों
की आमदनी
में बढॉतरी
तेरे जैसे के
मरने के
बाद जरूर
होती है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

सोमवार, 13 जनवरी 2014

आज की बड़ बड़ “नैनीताल समाचार” वालों के लिये

बड़े बड़े अखबार
रोज सुबह घर के
दरवाजे पर हॉकर
आकर फेंक जाता है
मजबूरी होती है
उठाना ही होता है
आदमी या उसका
कोई आदमी जाकर
उठा ही लाता है
अखबार के हिसाब से
बाजार के हिसाब से
छोटी छोटी ज्यादा
बड़ी खबर कुछ कम
या खबर की कबर
की खबरें ढूँढने में
बहुत ज्यादा कुछ
मजा सा नहीं आता है
गड्ढे में घुसी हुई
कुछ गाड़ियाँ कुछ लाशें
कुछ घायल कुछ मुआवजा
कुछ अस्पताल में
मौत की सजा
सुनाये गये जच्चा बच्चा
अपने देश अपने प्रदेश
की जवानी के राज
खोल के जाता है
इंतजार रहता है
मगर कुछ छोटे
अखबारों का
जो रोज रोज नहीं
आ पाता है
कभी कभार अब
दिखने वाला डाकिये
के पास अब यही काम
ज्यादा पाया जाता है
खबरें ऐसी की पढ़कर
मजा आ जाता है
अब आप कहोगे
ऐसी कौन कौन सी
खबर होती हैं जिसे
पढ़ने में मजा
भी आता जाता है
मुख्य पृष्ठ पर एक कविता
“उदास बखत के रमोलिया”
एक जिंदा कवि
कुछ कोशिश करके
जैसे लाशों को जगाता है
चौथे पन्ने पर
थपलियाल जी का लेख
"चरित्रहीन शिक्षक कैसे
गढ़ सकेगा अच्छा समाज"
जैसे मुँह चिढ़ाता है
प्रवीण तोमर के
लेख का शीर्षक
“अध्यापक राजनीतिबाज
शिक्षा तवायफ और
समाज तमाशाबीन

पढ़कर ही दिल
गद्गद हो जाता है
जगमोहन रौतेला का लेख
“केंद्र के अधीन करने से
 कैसे सुधरेंगे विश्वविद्यालय”
सबका ध्यान कूड़े दान
हो रहे प्रदेश के
विश्वविध्यालयों की तरफ
आकर्षित कर ले जाता है
अब ये बात अलग है
एक छोटा सा अखबार
अपनी बड़ी बड़ी
खबरों के साथ
जिन पाठकों के
हाथ में जाता है
उन लोगोँ के पास
सड़ी मानसिकता
वाली बातों की खबरों को
निडरता से कह देने
वालो के लिये बस "वाह"
कह देने से ही
मामला यहीं पर
खत्म हो जाता है
जो कुछ नहीं
कर सकता कहीं
अखबार और
अखबार वालों को
“जी रया” का आशीर्वाद
खुश हो कर देते हुऐ
अपनी भड़ास
थोड़ी सी ही सही
मिटा ले जाता है ! 

शुक्रवार, 18 मई 2012

तबादला मंत्री

नयी
सरकार
लग रहा है

कुछ
कर दिखायेगी

सुना
जा रहा है
पहाड़ी राज्य में
तबादला उद्योग
जल्दी ही लगायेगी

पिछली
सरकार के
तबादला ऎक्ट को

रद्द करने
वो जा रही है

उसके लिये

विधान सभा
की मुहर
जरूरी है
बता रही है

वैसे
तबादले
करने से
क्या हो पाता है

मेरी
समझ मेंं
आज भी
ये नहीं आता है

मेरा
विश्वविद्यालय
संस्था एक
स्वायत्तशाशी है

तबादला
करने करवाने
की यहाँ नहीं
बदमाशी है

जो
काम करता है
वो करता ही
चला जाता है

जो
नहीं करता है
उससे काम
करवाने की
हिम्मत कोई
नहीं कर पाता है

क्यों
नहीं करता 
है पूछने पर

"बने रहो पगला
काम करेगा अगला"

मुहावरा
बड़े चाव
से सुनाता है

अपनी
सरकार को
एक सुझाव
मैं देने जा रहा हूँ

पहाड़ी
राज्य को
प्रगति के पथ पर
ले जाना चाह रहा हूँ

ये
ऎक्ट वेक्ट
खाली काहे
बदलवा रहे हो

तबादला
मंत्री का
पोर्टफोलियो एक
क्यों नहीं बना रहे हो

लाल बत्ती
के एक चाहने वाले को

क्यों नहीं
इसमें खपा रहे हो

तबादले में
सुना था
पिछली बार
बहुत कुछ
खाया जा रहा था

राज्य की
उन्नति में
उसमेंं से
धेला भी
नहीं लगाया
जा रहा था

मंत्रालय
हो जायेगा तो

एक उद्योग
पनप जायेगा

कुछ हिस्सा
तबादलाखोरी का

राज्य के
खजाने में
दो चार कौड़ी
तो जमा कर जायेगा।

बुधवार, 2 मई 2012

सरकार का आईना

उन्होंने
जैसे ही
एक बात
उछाली

मैंने तुरन्त
अपने मन
की जेब
में सम्भाली

घर आकर
चार लाईन
लिख
ही डाली

कह रहे थे
जोर लगाकर

किसी
राज्य की
सरकार का
चेहरा देखना
हो अगर 

उस राज्य के
विश्वविद्यालय 
पर सरसरी
नजर डालो

कैसी चल
रही है सरकार
तुरत फुरत में
पता लगालो

वाह जी
क्या इंडीकेटर
ढूंढ के चाचा
जी लाये हैं

अपनी पोल
पट्टी खुद ही
खोलने का
जुगाड़
बनाये हैं

मेरी समझ
में भी बहुत
दिनों से
ये नहीं
आ रहा था

हर रिटायर
होने वाला
शख्स
कोर्ट जा जा
कर स्टे
क्यों ले
आ रहा था

अरे
जब बूढ़े
से बूढ़ा
सरकार में
मंत्री हो
जा रहा था

इतने
बड़े राज्य
का बेड़ा गर्क
करने में
बिल्कुल भी
नहीं शरमा
रहा था

तो
मास्टर जी
ने 
किसी
का 
क्या 
बिगाड़ा था

क्यों
उनको साठ
साल होते ही
घर चले जाओ
का आदेश दिया
जा रहा था

काम धाम के
सपने
खाली पीली
जब राजधानी
में जा कर
सरकार जनता
को दिखाती है

उसी तरह
विश्विद्यालय
की गाड़ी
भी तो
खरामे खरामे
बुद्धि का
गोबर बनाती है

जो कहीं
नहीं हो
सकता है
उसे करने की
स्वतंत्रता भी
यहाँ आसानी से
मिल जाती है

बहुत सी
बाते तो
यहाँ कहने
की मेरी भी
हिम्मत नहीं
हो पाती है

सुप्रीम कोर्ट
भी केवल
बुद्धिजीवियों
के झांसे
में ही आ
पाती है

वाकई में
सरकार का
असली चेहरा
तो हमें
ये ही
दिखाती है।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

विश्वविद्यालय स्थापना दिवस

टूटती हुवी
चीज कोई
दिखाई दे
तो स्थापना
उसकी करवाईये

स्थापना
करने से
सुना है
दोष निवारण
हो जाता है

की हुवी
गलतियों पर
पर्दा सा एक
गिर जाता है

पाप बोध होने से
वो बच जाता है
जिसने टूटते हुवे
उस चीज पर
दांव कभी
लगाया था

मेरा घर
अगर कभी
मेरे से
गलती से
टूट जायेगा

मैं स्थापना
अपने घर की
करवाउंगा

परेशान
ना होईये
साथ में दावत
भी खिलवाउंगा

मेरी संताने
मेरे को नहीं
कोस पायेंगी

टूटे घर के
अवशेष
के साथ

जब वे
स्थापना के
शिलान्यास के
पत्थर को भी
गड़ा पायेंगी।