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बुधवार, 3 मई 2017

समय गवाह है पर

समय गवाह है
पर गवाही
उसकी किसी
काम की
नहीं होती है

समय साक्ष्य
नहीं हो पाता है
बिना बैटरी की
रुकी हुयी
पुरानी पड़
चुकी घड़ियों
की सूईयों का

अब इसे
शरम कहो
या बेशर्मी

कबूलने में
समय के साथ
सीखे हुऐ झूठ
को सच्चाई
के साथ

क्या किया जाये
सर फोड़ा जाये
या फूटे हुऐ
समय के टुकड़े
एकत्रित कर
दिखाने की
कोशिश
की जाये

समझाने को
खुद को
गलती उसकी
जिसने
सिखाया गलत

समय के
हिसाब से
वो सारा
गलत

हस्ताँतरित
भी हुआ
अगली पीढ़ी
के लिये

पीढ़ियाँ आगे
बढ़ती ही हैं
जंजीरे समय
बाँधता है

ज्यादातर
खोल लेते हैं
दिखाई देती है
उनकी
उँचाइयाँ

जहाँ गाँधी
नहीं होता है

गाँधी होना
गाली होता है
बहुत छोटी सी

कोई किसी को
छोटी गालियाँ
नहीं देता है

ऊपर पहुँचने
के लिये बहुत
जरूरी होता है

समय के
साथ चलना
समय के साथ
समय को सीखना
समय के साथ
समय को
पढ़ लेना
और समझ कर
समय को
पढ़ा ले जाना

गुरु मत बनो
‘उलूक’
समय का

अपनी
घड़ी सुधारो
आगे बड़ो
या पीछे लौट लो

किसी को
कोई फर्क
नहीं पड़ता है

समय समय
की कद्र
करने वालों
का साथ देता है

जमीन पर
चलने की
आदत ठीक है

सोच
ठीक नहीं है

जमाना सलाम
उसे ही ठोकता है

जिसकी ना
जमीन होती है

और जिसे
जमीन से
कोई मतलब
भी नहीं होता है ।

चित्र साभार: Can Stock Photo

शनिवार, 18 मार्च 2017

निगल और निकल यही रास्ता सबसे आसान नजर आता है

कभी कभी
सब कुछ
शून्य हो
जाता है
सामने से
खड़ा नजर
आता है


कुछ किया
नहीं जाता है
कुछ समझ
नहीं आता है


कुछ देर
के लिये
समय सो
जाता है


घड़ी की
सूंइयाँ
चल रही
होती है
दीवार पर
सामने की
हमेशा की तरह

जब कभी
डरा जाता है
उस डर से

जो हुआ ही
नहीं होता है
बस आभास
दे जाता है
कुछ देर
के लिये

ऐसे
समय में
बहुत कुछ
समझा
जाता है

समय
समझाता है
समझाता
चला जाता है
समय के साथ
सभी को

कौन याद
रख पाता है
कहाँ याद
रहती हैं
ठोकरें
किसी को
बहुत लम्बे
समय तक

हर किसी
की आदत
नहीं होती है

हर कोई
सड़क पर
पड़े पत्थर को
उठा कर
किनारे
कहाँ
लगाता है

कृष्ण भी
याद ऐसे ही
समय में
आता है

ऐसे ही समय
याद आती है
किताबें

किताबों में
लिखी इबारतें

नहीं समझी
गई कहावतें

जो हो रहा
होता है
सामने सामने
सत्य बस
वही होता है

पचता
नहीं भी है
फिर भी
निगलना
जरूरी
हो जाता है

‘उलूक’
चूहों की दौड़
देखते देखते
कब चूहा हो
लिया जाता है

उसी समय
पता समझ
में आता है

जब टूटती है
नींद अचानक

दौड़
खत्म होने
के शोर से

और कोई
खुद को
अपनी ही
डाल पर

चमगादड़ बना
उल्टा लटका
हुआ पाता है ।

चित्र साभार: www.gitadaily.com

सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

कर कुछ उतारने की कोशिश तू भी कभी 'उलूक'

कोशिश
कर तो सही
उतारने की
सब कुछ
कभी
फिर दौड़ने
की भी
उसके बाद
दिन की
रोशनी में ही
बिना झिझक
जो सब
कर रहे हैं
क्यों नहीं
हो पा
रहा है
तुझसे
सोचने का
विषय है
तेरे लिये
उनके
लिये नहीं
जिन्होने
उतार
दिया है
सब कुछ
कभी का
सब कुछ
के लिये
हर
उतारा हुआ
उतारे हुए
के साथ
ही खड़ा
होता है
तू बस
देखता
ही रहता है
दोष
किसका है
उतार कर
तो देख
बस
एक बार
शीशे के
सामने
ही सही
अकेले में
समझ सकेगा
पहने हुऐ
होने के
नुकसान
जाति
उतारने
की बात
नहीं है
क्षेत्र
उतारने
की बात
नहीं है
धर्म
उतारने
की बात
नहीं है
कपड़े
उतारने
की बात
भी नहीं है
बात
उतरे हुए
को
सामने से
देख कर
ही समझ
में आती है
निरन्तरता
बनाये
रखने
के लिये
वैसे भी
बहुत
जरूरी है
कुछ ना
कुछ करते
चले जाना
समय के
साथ चलने
के लिये
समय
की तरह
समय पहने
तो
पहन लेना
समय उतारे
तो
उतार लेना
अच्छा है
सब को
सब की
सारी बातें
समझ में
आसानी से
नहीं आती हैं
वरना
आदमी
के बनाये
आदमी
के लिये
नियमों
के अन्दर
किसी को
आदमी
कह देने
के जुर्म में
कभी भी
अन्दर हो
सकता है
कोई भी
आदमी
आमने
सामने ही
पीठ करके
एक दूसरे
से
निपटने में
लगे हुऐ
सारे आदमी
अच्छी तरह
जानते हैं
उतारना
पहनना
पहनना
उतारना
तू भी
लगा रह
समेटने में
अपने
झड़ते हुए
परों को
फिर से
चिपकाने की
सोच लिये
‘उलूक’
जिसके पास
उतारने
के लिये
कुछ ना हो
उसे पहले
कुछ पहनना
ही पड़ता है
पंख ही सही
समय की
मार खा कर
गिरे हुए ।

चित्र साभार:
www.clipartpanda.com

रविवार, 4 सितंबर 2016

समय को मत समझाया कर किसी को एकदम उसी समय

ये तय है
जो भी
करेगा कोशिश
लिखने की
समय को
समय पर
देखते सुनते
समय के साथ
चलते हुए

समय से ही
मात खायेगा

लिखते ही हैं
लिखने वाले
समझाने के
लिये मायने
किसी और
की लिखी
हुई पुरानी
किताब में
किसी समय
उस समय के
उसके लिखे
लिखाये के

समझते हैं
करेंगे कोशिश
उलझने की
समय से
समय पर
ही आमने
सामने अगर
समय की
सच्चाइयों से
उसी समय की

समय के साथ
ही उलझ जाने
का डर
दिन की रोशनी
से भी उलझेगा
और
रात के सपनों
की उलझनों
को भी
उलझायेगा

अच्छा है बहुत
छोड़ देना
समय को
समझने
के लिये
समय के
साथ ही
एक लम्बे
समय के लिये

जितना पुराना
हो सकेगा समय
एक मायने के
अनेकों मायने
बनाने के नये
रास्ते बनाता
चला जायेगा

कोई नहीं
देखता है
सुनता है
समय की
आवाज को
समय के साथ
समय पर

ये मानकर

किसी का
देखा सुना
किसी को
बताया गया
किसी और
का लिखा
या किसी से
लिखवाया गया
बहुत आसान
होगा समझाना
बाद में कभी
समय लम्बा
एक बीत
जाने के बाद
उस समय
का समय
इस समय
लौट कर भी
नहीं आ पायेगा

कुछ का कुछ
या कुछ भी
कभी भी
किसी को भी
उस समय के
हिसाब से
समझा ही

दिया जायेगा ।

चित्र साभार: worldartsme.com

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

सारे नंगे लिख रहे होते हैं कपड़े जहाँ वहाँ चिंता की बात नहीं होती है नंगा हो जाना / बस हर तरफ कपड़े कपड़े हो जाने का इंतजार होना जरूरी होता है

मेरे घर से
शुरु होता है
शहर की गली
दर गली से
गुजरते हुए
दफ्तर दुकान
और दूसरे
के मकान
तक पहुँच
रहा होता है
हर नंगे के
हाथ में होता है
एक कपड़ा
जगह जगह
नंगा हो रहा
होता है
फिर भी
किसी को
पता नहीं
होता है
किसलिये
एक बेशरम
नजर नीची
कर जमीन
की ओर देख
रहा होता है
और
कपड़ा पहने
हुऐ उसी गली
से निकलता
हुआ एक
बेवकूफ
शरम से
जार जार
तार तार
हो रहा
होता है
कपड़ा होना
जरूरी होता है
किसी डंडे पर
लगा होना
एक झंडा
बना होना
ही कपड़े का
कपड़ा होना
होता है
हरी सोच के
लोगों का हरा
सफेदों का सफेद
और
गेरुई सोच
का गेरुआ
होना होता है
कुत्ते के पास
कभी भी
कपड़ा नहीं
होता है
आदमी होना
सबसे कुत्ती
चीज होता है
लिखने लिखाने
से कुछ नहीं
होता है
वो उसकी
देख कर
उसके लिये
उसकी जैसी
लिख रहा
होता है
कपड़ा लिखने
वाला कुछ
कहीं ढकने
ढकाने की
सोच रहा
होता है
किसी के
लिखे कपड़े
से कोई
अपनी कुछ
ढक रहा
होता है
हर कपड़ा
किसी के
सब कुछ
ढकने के
लिये भी
नहीं होता है
हर किसी को
यहाँ के भी
पता होता है
हर किसी को
वहाँ के भी
पता होता है
कपड़ा कुछ भी
कभी कहीं भी
ढकने के लिये
नहीं होता है
कुछ बना ले
जाते हैं पुतले
जिन्हें पता होता है
कपड़ा पुतला
जलाने के
लिये होता है
जिसके जलना
शुरु हो जाते हैं
पुतले उसका
अच्छा समय
शुरु हो जाने
का ये एक
अच्छा संकेत
होता है
मौज कर
'उलूक'
तेरे जैसे
बेवकूफों
के पुतले
फुँकवाने
के लिये
"होशियार"
के पास
समय ही
नहीं होता है ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

रविवार, 6 सितंबर 2015

मेंढक और योगिक टर्राना जरूरी है बहुत समझ में आना

एक ठहरा हुआ
पानी होता है
समुद्र का होता है
एक टेडपोल सतह
पर अपने आप को
व्हैल समझने लगे
ऐसा भी होता है
समय बलिहारी होता है
उसके जैसे बाकी
टैडपोल उसके लिये
कीड़े हो जाते हैं
क्योंकि वो नापना
शुरु कर देता है
लम्बाई पूँछ की
भूल जाता है
बनना सारे
टेडपोलों को
एक दिन मैंढक
ही होता है
टर्राने के लिये
टर्र टर्र पर
टेडपोल मुँह
नहीं लगाता है
किसी भी टेडपोल को
बहुत इतराता है
तैरना भी चाहता है
तो कहीं अलग
किसी कोने में
भूल जाता है
किसी दिन जब
सारे टैडपोल
मैंढक हो जायेंगे
कौन बड़ा हो जायेगा
कौन ज्यादा बड़ी
आवाज से टर्रायेगा
उस समय किसका
टर्राना समुद्र के
नमकीन पानी में
बस डूब जायेगा
कौन सुनेगा
बहुत ध्यान
से टर्राना और
किसका सुनेगा
कैसा महसूस होगा
उसे जब पुराने
उसी के किसी
टेड़ी पूँछ वाले
साँथी के पूँछ से
दबा हुआ उसे
नजर आयेगा
टर्राने का इनाम
इसी लिये
कहा जाता है
समय के साथ
जरूरी है औकात
बोध कर लेना
समय कर दे अगर
शुरु टर्राना ‘उलूक’
उस समय टेढ़ी पूँछ
को मुँह ना लगाना
गजब कर जायेगा
गीता पढ़ो
रामायण पढ़ो
राम नाम जपो
राधे कृष्ण करो
कुछ भी काम
में नहीं आयेगा
समय खोल देता है
आँखे ही नहीं आत्मा
को भी ‘उलूक’
समझ सकता है
अभी भी समझ ले
अपने कम से कम
चार साथियों को
नहीं तो अर्थी उठाने
वाला भी तेरी कोई
दूर दूर तक नजर
नहीं आयेगा ।

चित्र साभार: www.frog-life-cycle.com

शुक्रवार, 22 मई 2015

समय समय के साथ किताबों के जिल्द बदलता रहा

गुरु लोगों ने
कोशिश की
और सिखाया भी
किताबों में
लिखा हुआ काला
चौक से काले
श्यामपट पर
श्वेत चमकते
अक्षरों को उकेरते
हुऐ धैर्य के साथ
कच्चा दिमाग भी
उतारता चला गया
समय के साथ
शब्द दर शब्द
चलचित्र की भांति
मन के कोमल
परदे पर सभी कुछ
कुछ भरा कुछ छलका
जैसे अमृत क्षीरसागर
में लेता हुआ हिलोरें
देखता हुआ विष्णु
की नागशैय्या पर
होले होले डोलती काया
ये शुरुआत थी
कालचक्र घूमा और
सीखने वाला खुद
गुरु हो चला
श्यामपट बदल कर
श्वेत हो चले
अक्षर रंगीन
इंद्रधनुषी सतरंगी
हवा में तरंगों में
जैसे तैरते उतराते
तस्वीरों में बैठ
उड़ उड़ कर आते
समझाने सिखाने का
सामान बदल गया
विष्णु क्षीरसागर
अमृत सब अपनी
जगह पर सब
उसी तरह से रहा
कुछ कहीं नहीं गया
सीखने वाला भी
पता नहीं कितना कुछ
सीखता चला गया
उम्र गुजरी समझ में
जो आना शुरु हुआ
वो कहीं भी कभी भी
किसी ने नहीं कहा
‘उलूक’ खून चूसने
वाले कीड़े की दोस्ती
दूध देने वाली एक
गाय के बीच
साथ  रहते रहते
एक ही बर्तन में
हरी घास खाने
खिलाने का सपना
सोच में पता नहीं
कब कहाँ और
कैसे घुस गया
लफड़ा हो गया
सुलझने के बजाय
उलझता ही रहा
प्रात: स्कूल भी
उसी प्रकार खुला
स्कूल की घंटी
सुबह बजी और
शाम को छुट्टी
के बाद स्कूल बंद
भी रोज की भांति
उसी तरह से ही
आज के दिन
भी होता रहा ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

बचपन का खिलौना भी कभी बड़ा और जवान होता है एक खिलाड़ी जानता है इस बात को उसे पता होता है

जब तक पहचान
नहीं पाता है
खिलौनों को
खेल लेता है किसी
के भी खिलौने से
किसी के भी साथ
कहीं भी किसी
भी समय
समय के साथ ही
आने शुरु होते हैं
समझ में खिलौने
और खेल भी
खेलना खेल को
खिलौने के साथ
होना शुरु होता है
तब आनंददायक
और भी
कौन चाहता है
खेलना वही खेल
उसी खिलौने से
पर किसी और के
ना खेल ही
चाहता है बदलना
ना खिलौना ही
ना ही नियम
खेल के
इमानदारी
के साथ ही
पर खेल
होना होता है
उसके ही
खिलौने से
खेलना होता
है खेल को
उसके साथ ही
तब खेल खेलने
में उसे कोई
एतराज नहीं
होता है
खेल होता
चला जाता है
उस समय तक
जब तक खेल में
खिलौना होता है
और उसी का होता है ।

चित्र साभार: johancaneel.blogspot.com

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

चाय की तलब और गलत समय का गलत खयाल

अपने सामने
मेज पर पड़े
खाली चाय
के एक कप
को देख
कर लगा
शायद चाय
पी ली है
फिर लगा
नहीं पी है
अब चाय
पी या नहीं
कैसे पता चले
थोड़ी देर सोचा
याद नहीं आया
फिर झक मार
कर रसोई की ओर
चल देने का
विचार एक बनाया
पत्नी दिखी
तैयारी में लगी हुई
शाम के भोजन की
काटती हुई कुछ
हरे पत्ते सब्जी
के लिये चाकू
हाथ में ली हुई
गैस के चूल्हे के
सारे चूल्हे दिखे
कुछ तेज और कुछ
धीमे जले हुऐ
हर चूल्हे के ऊपर
चढ़ा हुआ दिखा
एक बरतन
किसी से निकलती
हुई भाप दिखाई दी
और
किसी से आती
हुई कुछ कुछ
पकने उबलने की
आवाज सुनाई दी
बात अब एक कप
चाय की नहीं हो गई
लगा जैसे जनता के बीच
बिना कुछ किये कराये
एक मजबूत सरकार की
हाय हाय की हो गई
थोड़ी सी हिम्मत जुटा
पूछ बैठा कुछ याद है
कि मैंने चाय पी
या नहीं पी
पिये की याद
नहीं आ रही है
और दो आँखें
सामने से एक
खाली कप चाय
का दिखा रही हैं
श्रीमती जी ने
सिर घुमाया
ऊपर से नीचे
हमे पूरा देखकर
पहले टटोला
फिर अपनी नजरों
को हमारे चेहरे
पर टिकाया
और कहा
बस यही होना
सुनना देखना
बच गया है
इतने सालों में
समझ में कुछ कुछ
आ भी रहा है
पढ़ पढ़ कर तुम्हारा
लिखा लिखाया
इधर उधर कापियों में
किताबों में दीवालों में
सब नजर के सामने
घूम घूम कर आ रहा है
पर बस ये ही समझ में
नहीं आ पा रहा है
किसको कोसना पड़ेगा
हो रहे इन सब
बबालों के लिये
उनको जिनको
देख देख कर
तुम लिखने लिखाने
का रोग पाल बैठे हो
या उन दीवालों किताबों
और कापियों को
जिन पर लिखे हुऐ
अपने कबाड़ को
बहुत कीमती कपड़े
जैसा समझ कर
हैंगर में टाँक बैठे हो
कौन समझाये
किसे कुछ बताये
एक तरफ एक आदमी
डेढ़ सौ करोड़ को
पागल बना कर
चूना लगा रहा है
और एक तुम हो
जिसे आधा घंटा
पहले पी गई चाय
को भी पिये का
सपना जैसा
आ रहा है
जाओ जा कर
लिखना शुरु करो
फिर किसी की
कहानी का
कबाड़खाना
चाय अब दूसरी
नहीं मिलने वाली है
आधे घंटे बाद
खाना बन जायेगा
खाने की मेज
पर आ जाना ।

चित्र साभार: pngimg.com

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

समय अच्छा या बुरा समय की समझ में खुद नहीं आ रहा होता है


समय को लिखने
वाले लोगों को
ना तो फुरसत होती है
ना ही कुछ लिखने
लिखाने का समय
उनके पास होता है
अवकाश के दिन भी
उनका समय समय
को ही ठिकाने
लगा रहा होता है
कोई चिंता कोई
शिकन नहीं होती है कहीं
कुछ ऐसे लोगों के लिये
जिनकी नजर में
लिखना लिखाना
एक अपराध होता है
और दूसरी ओर
कुछ लोग समय
के लिये लिख
रहे होते हैं
उन को आभास
भी नहीं होता है
और समय ही
उनको ठिकाने
लगा रहा होता है
समय समय की बातें
समय ही समझ
पा रहा होता है
एक ओर कोई
लिखने में समय
गंवा रहा होता है
तो दूसरी ओर
कुछ नहीं लिखने वाला
समय बना रहा होता है
किसका समय बर्बाद
हो रहा होता है
किसका समय
आबाद हो रहा होता है
‘उलूक’ को इन सब से
कुछ नहीं करना होता है
उस की समझ में
पहले भी कुछ
नहीं आया होता है
आज भी नहीं
आ रहा होता है ।

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

समय खुद लिखे हुऐ का मतलब भी बदलता चला जाता है

बहुत जगह
बहुत कुछ
कुछ ऐसे भी
लिखा हुआ
नजर आ जाता है
जैसे आईने पर पड़ी
धूल पर अँगुलियों
के निशान से कोई
कुछ बना जाता है
सागर किनारे रेत
पर बना दी गई
कुछ तस्वीरेँ
पत्थर की पुरानी
दीवार पर बना
एक तीर से
छिदा हुआ दिल
या फिर कुछ फटी हुई
कतरनों पर किये हुऐ
टेढ़े मेढ़े हताक्षर
हर कोई समय के
हिसाब से अपने
मन के दर्द और
खुशी उड़ेल
ले जाता है
कहीं भी
इधर या उधर
वो सब बस यूँ ही
मौज ही मौज में
लिख दिया जाता है
इसलिये लिखा जाता है
क्यूँकि बताना जब
मुश्किल हो जाता है
और जिसे कोई
समझना थोड़ा सा
भी नहीं चाहता है
हर लिखे हुऐ का
कुछ ना कुछ मतलब
जरूर कुछ ना कुछ
निकल ही जाता है
बस मायने बदलते
ही चले जाते हैं
समय के साथ साथ
उसी तरह जिस तरह
उधार लिये हुऐ धन पर
दिन पर दिन
कुछ ना कुछ
ब्याज चढ़ता
चला जाता है
यहाँ तक कि खुद
ही के लिखे हुऐ
कुछ शब्दों पर
लिखने वाला जब
कुछ साल बाद
लौट कर विचार
कुछ करना चाहता है
पता ही नहीं चलता है
उसे ही अपने लिखे हुऐ
शब्दो का ही अर्थ
उलझना शुरु हुआ नहीं
बस उलझता
ही चला जाता है
इसीलिये जरूरी और
बहुत ही जरूरी
हो जाता है
हर लिखे हुऐ को
गवाही के लिये
किसी ना किसी को
कभी ना कभी बताना
मजबूरी हो जाता है
छोटी सी बात को
समझने में एक पूरा
जीवन भी कितना
कम हो जाता है
समय हाथ से
निकलने के बाद
ही समय ही
जब समझाता है ।

रविवार, 22 दिसंबर 2013

किताब पढ़ना जरुरी है बाकी सब अपने ही हिसाब से होता है

किताबों तक पहुँच ही
जाते हैं बहुत से लोग
कुछ नहीं भी पहुँच पाते हैं


होता कुछ भी नहीं है
किताबों को पढ़ते पढ़ते
सब सीख ही जाते हैं
किताबें चीज कितने
काम की होती हैं
किताबों को साथ रखना
पढ़ना ही सिखाता है
अपनी खुद की एक
किताब का होना भी
कितना
 जरूरी हो जाता है
एक आदमी के कुछ
कहने का कोई
अर्थ नहीं होता है
क्या फरक पड़ता है
अगर वो गाँधी या
उसकी तरह का ही
कोई और भी होता है
लिखना पढ़ना
पाठ्यक्रम के हिसाब से
एक परीक्षा दे देना
पास होना या फेल होना
किताबों के होने या
ना होने का बस
एक सबूत होता है
बाकी जिंदगी के
सारे फैसले किताबों से
कौन और कब कहाँ
कभी ले लेता है
जो भी होता है
किसी की अपनी
खुद की किताब
में लिखा होता है
समय के साथ
चलता है एक एक
पन्ना
 हर किसी की 

अपनी किताब का 
कोई जल्दी और
कोई देर में
 कभी ना कभी तो अपने लिये भी
लिख ही लेता है
पढ़ता है एक किताब
कोई भी कहीं भी
और कभी भी
करने पर आता है
तो उसकी अपनी ही
किताब का एक
पन्ना
 खुला होता है ।

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

हो ही जाता है ऐसा भी कभी भी किसी के साथ भी

कभी
अचानक
उल्टी चलती
हुई एक
चलचित्र
की रील

अनायास
ही
पता नहीं
कैसे
बहुत पीछे
की ओर
निकल
पड़ती है

जब
सामने से
आता हुआ
कोई तुम्हें
देख कर
थोड़ा सा
ठिठकता
हुआ
आगे की
ओर चल
पड़ता है

बस
दो कदम
फिर
दोनो की
गर्दने
मुड़ती हैं
और
एक ही साथ
निकलता है
मुँह से
अरे आप हैं

इस बीच
दोनो
देखना
शुरु हो
चुके होते हैंं

एक दूसरे
के चेहरों पर
समय के
कुछ निशान

जैसे ढूँढ
रहे होंं
अपना सा
कुछ
जो अपने को
याद आ जाये

ऐसा कुछ
पता चले
या
खबर मिले

किसी की
कहीं से भी
पर
ऐसा होता
नहीं हैं

सारी बातें
इधर उधर
घूमती हैं
बेवजह

कुछ देर
ना वो कुछ
कह पाता है
ना ये ही
कुछ कह
लेना
चाहता है

हाथ
मिलते हैं
कुछ देर
जैसे
महसूस करना
चाह रहे
होते हैं कुछ

फिर हट
जाते हैं
अपनी अपनी
जगह

और
बाकी सब
ठीक ही
होगा पर
बात खत्म
हो जाती है

दोनो निकल
पड़ते हैं
फिर आगे
अपने
सफर पर
जैसे
कोशिश
कर रहे हों
वापस
उसी जगह
लौटने की
जहाँ पर
से पीछे
मुड़ पड़े
थे दोनो
दो दो
कदम ।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

कभी होता है पर ऐसा भी होता है

मुश्किल
हो जाता है
कुछ
कह पाना
उस
अवस्था में
जब सोच
बगावत
पर उतरना
शुरु हो
जाती है
सोच के
ही किसी
एक मोड़ पर

भड़कती
हुई सोच
निकल
पड़ती है
खुले
आकाश
में कहीं
अपनी मर्जी
की मालिक
जैसे एक
बेलगाम घोड़ी
समय को
अपनी
पीठ पर
बैठाये हुऐ
चरना शुरु
हो जाती है
समय के
मैदान में
समय को ही

बस
यहीं
पर जैसे
सब कुछ
फिसल
जाता है
हाथ से

उस समय
जब लिखना
शुरु हो
जाता है
समय
खुले
आकाश में
वही सब
जो सोच
की सीमा
से कहीं
बहुत बाहर
होता है

हमेशा
ही नहीं
पर
कभी कभी
कुछ देर के
लिये ही सही
लेकिन सच
में होता है

मेरे तेरे
उसके साथ

इसी बेबसी
के क्षण में
बहुत चाहने
के बाद भी
जो कुछ
लिखा
जाता है
उसमें
बस
वही सब
नहीं होता है
जो वास्तव में
कहीं जरूर
होता है

और जिसे
बस समय
लिख रहा
होता है
समय पढ़
रहा होता है
समय ही
खुद सब कुछ
समझ रहा
होता है ।

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

विनम्र श्रद्धांजलि राजेंद्र जी

एक सदी के अंदर एक
ज्यादा से ज्यादा दो
बहुत हो गया तो तीन
से ज्यादा को कभी भी
नहीं गिना जाता है
राजेंद्र यादव हिंदी साहित्य
का एक ऐसा ही स्तम्भ
जब यूं ही चला जाता है
उसको पढ़ने की कोशिश
करता हुआ एक
छोटा सा आदमी
समझ भी कुछ
कहां पाता है
ऐसे भीषण व्यक्तित्व
का कहा हुआ एक
वाक्य एक किताब के
बराबर हो जाता है
सुबह सवेरे समाचार पत्र में
लिखा हुआ कुछ कुछ
ऐसा जब सामने आता है
“जो तटस्थ हैं समय लिखेगा
उनका भी अपराध”
वाह निकलता है मुंह से
और सारा दिन सोचने में
ही निकल जाता है
जरूर लिखेगा बहुत लिखेगा
तटस्थ ही तो है एक
जिसे बस खुद के बारे
में ही सोचना आता है
लिखा जायेगा बहुत हो जायेगा
पता चलेगा इतिहास का भी
कैसे कैसे कूड़ा बनाया जाता है
एक तटस्थ अपनी
छोटी सोच को लेकर
माफी मांगते हुऐ फिर भी
अपनी विनम्र श्रद्धांजलि
देना ही चाहता है ।

मंगलवार, 1 मई 2012

"चर्चा जारी है"

बहुत वाद
विवाद के बाद
कुछ निकल
कर के आया
एक वक्ता
ने बताया
बंदरों की
शक्लों में
समय के
साथ किस
तरह का
परिवर्तन
है आया
शहर में
आजकल
हर मुहल्ले
के बंदर
अलग अलग
सूरतों के
नजर आ रहे हैं
आदतों में भी
किसी मुहल्ले
वासी से मेल
नहीं खा रहे हैं
जबकि
देखा गया है
अफ्रीका के
बंदर अफ्रीकी
योरोप के
बंदर यूरोपी
भारत के बंदर
भारतीय जैसे
ही दिखाई
दिया करते हैं
जैसा जनता
करती है
वैसा ही
वहां के बंदर
भी ज्यादातर
किया करते हैं
कोई ठोस उत्तर
जब कोई
नहीं दे पाया
तो इस विषय
को अगली
संगोष्ठी में
उठाया जायेगा
करके किसी
ने बताया
वैसे भी इस बार
थोड़ी जल्दीबाजी
के कारण
बंदरों का प्रतिनिधि
शरीक नहीं हो पाया
बंदरों की
तरफ से कोई
जवाब किसी ने भी
दाखिल नहीं कराया।

बुधवार, 18 जनवरी 2012

आशा है

समय के साथ
कितने माहिर
हो जाते हैं हम
चोरी घर में
यूँ ही
रोज का रोज
करते चले
जाते हैं हम
दिल्ली में चोर
बहुत हो गये हैं
जागते रहो
की आवाज भी
बड़ी होशियारी से
लगाते हैं हम
बहुत सारे चोर
मिलकर बगल
के घर में लगा
डालते हैं सेंघ
पर कभी कभी
पड़ोस में ही
होकर हाथ मलते
रह जाते हैं हम
चलो चोरी में
ना मिले हिस्सा
कोई बात नहीं
बंट जायेगा चोरी
का सामान कल
कुछ लोगों में जो
हमारे सांथ नहीं
फिर भी आशा
रखूंगा नहीं
घबराउंगा
बड़े चोर पर ही
अपना दांव
लगाउंगा
आज कुछ भी
हाथ नहीं
आया तो भी
बिल्कुल नहीं
पछताउंगा
कभी तो बिल्ली
के भाग से
छींका जरुर
टूटेगा और
मैं भी अपनी
औकात से
ज्यादा लपक के
ले ही आउंगा।

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