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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

खबर

एक देता है कुछ
अनुदान दो को
दो कार्यक्रम
बनाता है
फिर तीन
को बताता है
तीन बहुत दूर से
चार को बुलाता है
अतिथि गृ्ह
में ठहराता है
सलाद कटवाता है
गिलास धुलवाता है
चार सेवा टहल
करवाता है
टी ए डी ए
भरवाता है
खर्राटे भरकर
सो जाता है
पांच झाडू़
लगवाता है
मंच सजाता है
देर से घर जाता है
पांच फिर सुबह
सुबह आ जाता है
आदत से मजबूर
खुद पर
खिसियाता है
कोई भी उपस्थित
नहीं हुवा समय
पर पाता है
दो और चार
टहल के आते हैं
कौलर अपने
उठाते हैं
धूप में
बैठ जाते हैं
श्रोता एक घंटा
देर से आते हैं
बेहयाई से फिर
मुस्कुराते हैं
तीन घर में
बीन बजाता है
कुछ को मोबाईल
फोन मिलाता है
कार्यक्रम हुवा या
नहीं पता लगाता है
अखबार वालों को
सब कुछ बताता है
पांच अगले दिन
खबर में पाता है
सारी खबर में
अखबार तीन ही
तीन दिखाता है
तीन घर में
रखी बीन फिर
से बजाता है
पांच अपनी
बीबी से डांठ
जोर की खाता है।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

राज काज

़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़
नैनीताल समाचार में छपी थी मेरी कुछ लाइने
कुछ वर्ष पूर्व। वहाँ त्रिवार्षिक कार्यकाल वालों के
लिये था। यहां त्रिवार्षिक बदल कर पंचवर्षीय
कर दे रहा हूँ। शेष लाइने वही हैं ।
़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़

कुत्तों की सभा का
पंचवर्षीय चुनाव
गीदड़ ने पहना ताज

ऎल्सेशियन से
बुलडौग लडा़या
पौमेरियन एप्सो
को छोटा बतलाया
ये था इसका राज

ये था इसका राज
गीदड़ अब रेवड़ी बांटे
कुत्ता अब कुत्ते को काटे
कोई ना रहा अपवाद

कोई ना रहा अपवाद
ढटुओं को अब रोना आया [ढटुआ = Street Dog]
रोते रोते अलख जगाया
गये शेर की मांद
शेर गुर्राया

डर डर कर कुत्तों
ने फरमाया
हर शाख पे उल्लू
बैठा है अंजामें
गुलिस्ताँ क्या होगा

सुन शेर को
गुस्सा आया
पी0 ए0 को
आदेश लिखाया
क्यों शाख पर
उल्लू बैठाया
तुरंत जाओ
कुत्ता देश

तुरंत जाओ
कुत्ता देश
शाख को काट
के लाओ
उल्लू को
आकाश उड़ाओ

हुवा पालन
आदेश
उल्लू अब
गीदड़ पर बैठे

कुत्ता राज
गीदड़ राजा
ना रहे उल्लू
ना रही अब
शाखा ।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

भीड़

भीड़ को
पढा़ते पढ़ाते
अब वो
भीड़ बनाना
अच्छा सीख
गया है

भीड़ पहले
कभी भी
उसका पेशा
नहीं रही

भीड़ से
निपटने में
अचानक
उसे लगा
भीड़ बहुत
काम की
चीज हो
सकती है

उस दिन
से उसने
पेशा ही
बदल डाला

अब वो
केवल एक
इशारा भर
करता है

कुछ
अजीब सा
वो भी
आसमान
की तरफ
देख कर

भीड़
चली आती है
भीड़
आपस में
बात करती है
खुले हाथ
लहराती है

लौटते हुवे
भीड़ की
मुट्ठियाँ
बंद होती हैं

एक दूसरे
से कुछ
छिपाते हुवे

एक भीड़
लौटी
वो फिर
इशारा
शुरू
कर देता है

मैने
बहुत दिन
असफल
कोशिश की
उस भीड़
का हिस्सा
बन जाने
के लिए

अब मैंने
भी वही
इशारा
करना शुरु
कर दिया है

पर कोई
नहीं आता
मेरे आसपास

भीड़
रोज
देखती है
मुझे उसी
इशारे के
साथ
जो उसका
भी है
और मैं
भीड़
देखता हूँ
जाते हुवे
उसकी तरफ
उसी इशारे
की तरफ
जिस इशारे
को सीखने
के लिये
मैने
भी अपना
पेशा छोड़
दिया है ।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

चुनाव

चूहा कूदा फिर कूदा
कूद गया फिसल पड़ा
एक कांच के गिलास
में जाकर डूब गया
छटपटाया फड़फड़ाया
तुरंत कूद के बाहर
निकल आया
सामने देखा तो
दिखाई दे गयी
अचानक उसे
एक बिल्ली
पर ये क्या
बिल्ली तो
नांक मुंह
सिकोड़ने
लगी
चूहे से मुंह
मोड़ने लगी
चूहा कुछ फूलने
सा लगा
थोड़ा थोडा़ सा
झूमने भी लगा
बिल्ली को देख कर
पूंछ उठाने लगा
फिर बिल्ली को
धमकाने लगा
बिल्ली बोली
बदबू आ रही है
जा पहले नहा के आ
वर्ना अपनी शकल
मुझे मत दिखा
चूहा मुस्कुराया
फिर फुसफुसाया
हो गया ना कनफ्यूजन
गिलास में क्या गिरा
बदबू तुम्हें है आने लगी
पर गिलास में शराब
नहीं है दीदी
वहां तो सरकार है
चुनाव नजदीक आ रहा है
टिकट बांटे जा रहे हैं
मैंने फिसल के
अपना भाग्य है चमकाया
जीतने वाली पार्टी
का टिकट उड़ाया
और कूद के बाहर
हूँ आया।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

आदमी / पागल

आदमी आदमी से
टकराने लगा है
पागल पागल को
समझाने लगा है
एक पागल आया
कल मेरे पास
उसने समझाया
उसकी भी समझ
में अब सब
आने लगा है
बोला पागल हूँ
तो क्या बेवकूफ
भी बना लोगे
मेरे हिस्से की
चांदनी भी
चुरा लोगे
धूप तो आप
रोज दिन में
चोरते आये हो
अब रात में
भी चोरी
करा लोगे
आदमी का
आदमी को
पागल बनाना
तो समझ
में आता है
आप तो
हदें पार
कर आये हो
चैन से रहने
देते ना भैया
मत छीनो
सुकून हमारा
आंखिर क्यों
आदमी बनाने
पर ही आप
उतर आये हो?

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

गोष्ठी

संगोष्ठी में
निमंत्रित
किये गये
ईश्वर गौड
और अल्ला
क्रिसमस की
पूर्व संध्या थी
होना ही
था हल्ला
केक काटे गये
संगीत हुवा
ड्रिंक्स कैसे
नहीं बंटते
भला
बातों बातों में
प्रश्न हुवा
बातों का हमारी
आदमी को
कैसे पता
चला
स्टिग आप्रेशन
आदमी
की थी
कारस्तानी
मामला
जब खुला
सभी प्रतिभागी
एकमत थे
बहुमत से
आदमी को
नहीं माना
गया बला
बनाया हमने
पढ़ाया हमने
लड़ाया हमने
भुगतेगा
जैसा चाहो
आप सभी
कल मिल
कर ले आते हैं
चलो एक
जलजला।

रविवार, 25 दिसंबर 2011

पहचानो ना

अंकपत्र
हाईस्कूल 
प्रमाणपत्र
राशनकार्ड 
मतदान
पहचान पत्र
टेलीफोन
का बिल

बैंक की
पासबुक

अंगूठे का
निशान

आदमी की
पहचान


सब के
सब अचल

जो चलता है
मतलब
दिमाग से है

बेकार की
एक चीज


दिमाग किसी
आदमी 
की
आईडेंटिटी नहीं

हो सकता कभी
पता ही नहीं है
दिमाग आदमी को
चलाये या आदमी
दिमाग को चलाये

चलता दिमाग
किसी को भी
अच्छा नहीं लगता
एक कूड़ा
दिमाग बौस

मातहत के
दिमाग 
को
हलुवा मानता है

जिसे कोई
भी पकाये

कोई भी खाये

दिमाग को
आडेंटिटी

नहीं बना सकते
पल में जनवरी
पल में दिसम्बर
हो जाता है दिमाग

अन्ना को कोई राय
नहीं दे सकता
फिंगर प्रिंट की
जगह मेंटल
प्रिंट करवायें
दिमाग 
हर क्षण
बदलता है दिमाग


और वाकई में
हो जाये ऎसा
तो दिमाग
पागल का

होगा एक
पहचान

और बाकी
छानते

फिरेंगे
कूड़ा
अपनी

पहचान
के लिए।

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

शब्द

शब्द मीठे होते हैं
कानों से होते हुवे
दिल में उतरते है
शहद घोल घोल के

शब्द ही खंजर से
तीखे भी हो जाते हैं
ले आते हैं
ज्वार और भाटे

सभी के पास ही
तो रखे होते हैं
अपने अपने शब्द

हर कोई ढाल
नहीं पाता है
सांचों में अपने
शब्दों को हमेशा

कोई उस्ताद होता है
दूसरों के शब्दों से
अपने को बचाने में
बना लेता है एक
ढाल शब्दों की

एक ही शब्द
देता हैं जिंदगी
किसी को
वही सिखाता है
बंदगी किसी को

किसी के लिये
हो सकता है
कमाल एक शब्द
कोई बना ले जाता
है जाल एक शब्द

तूफान भी अगर
लाता है एक शब्द
तो मलहम भी तो
लगाता है कभी
एक शब्द ।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

हिम्मत कर छाप

कुछ
सोचते हैं
कुछ
छांटते हैं
फिर
छलनी से
उठा कुछ
छापते हैं
क्योंकि
सच
छन जाते हैं
छोटे होते हैं
छनित्र में
चले जाते हैं

चलिये
करते हैं कुछ
उलटफेर
थोड़ा अंधेर

सभी
करना करें
शुरू
स्टेटस अपडेट
छलनी से नहीं
छनित्र से
उठा
दें कुछ
छाप यहां
बिना किसी
लाग लपेट

बबाल शुरू
हो जायेंगे
बगलें
झांकते हुवे
एक एक कर
ज्यादातर
फरमायेंगे
गलत चीजें
यहां छापी
जा रही हैं
संविधान की
फलाँ फलाँ
धारा बेशरमी
से लाँघी
जा रही है

एक सच
को
बता कर
स्पैम
रिपोर्ट
फटाफट
कर दी
जायेगी
पोस्ट
तुरन्त
डीलिट कर
सूचना
प्रसारित
की जायेगी

हो गयें है
प्रोफाईल
चोरी
चोर हैं जो
छाप
रहे हैं
अपने ही
अंदर की
कमजोरी ।

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

आईना

आज एक लम्बे
अर्से के बाद
पता नहीं कैसे मैं
जा बैठा घर के
आईने के सामने
मेरे दिमाग की तरह
आईने ने कोई अक्स
नहीं दिखलाया
मैं थोड़ा घबराया
नजर को फिराया
सामने कैलेण्डर में
तो सब नजर
आ रहा था
तो ये आईना
मुझसे मुझको
क्यों छिपा रहा था
सोचा किसी को बुलाउं
आईना टेस्ट करवाउं
बस कुता भौंकता
हुवा आया थोडा़ ठहरा
फिर गुर्राया जब
उसने अपने को आईने
के अंदर भी पाया
मुझे लगा आईना
भी शायद समय
के सांथ बदल रहा होगा
इसी लिये कबाड़ का
प्रतिबिम्ब दिखाने से
बच रहा होगा
विज्ञान का हो भी
सकता है ऎसा
चमत्कार
जिन्दा चीजों का ही
बनाता हो आईना
इन दिनो प्रतिबिम्ब
और मरी हुवी चीजों
को देता हो चेतावनी
कि तुम अब नहीं हो
कुछ कर सकते हो
तो कर लो अविलम्ब।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

कुछ कहो

बस दो चार ही
लोग गांव के
अब कुछ
अपने जैसे
नजर आते हैं
सड़क और गली
की बात मगर
कुछ और ही
दिखाई देती है
सारे ही कुत्ते
सामने पा कर
जोर जोर से
अपनी पूंछे
हिलाते हैं
फिर भी समझ
नहीं पाते हैं
पागलखाने के
डाक्टर साहब
को अब भी
नार्मल ही
नजर आते हैं
हां लोग देख
कर थोड़ा सा
अब कतराते हैं
बहुमत साथ ना
होने का फायदा
हमेशा पार्टी के
लोग उठाते हैं
फुसफुसा कर ही
करते हैं बात भी
मोहल्ले वाले
फिर गया दिमाग
कहते तो नहीं हैं
बस सोच कर
सामने सामने से
ही मुस्कुराते हैं
कुछ तो समझाओ
'उलूक' जमाने को
पागल खाने के डाक्टर
ऐसे लोगों को ऐसे में भी
मुहँ 
क्यों नहीं लगाते हैं?

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

होश

एक खामोश
कब जिंदगी
के आगोश
में मदहोश
हो जायेगा
ये होश में
रहने वाला
ही बता
पायेगा

बेहोश
लोगों 
के
शब्दकोश

में आक्रोश
नहीं होता
एक सरफरोश
कभी अहसान
फरामोश

नहीं होता
परहोश
भले ही

हो जायेगा
लेकिन
कभी भी

लच्छेदार
बातों 
में
नहीं आयेगा

बेहोश
करने 
वाले
होश में

योजनाऎं
बना

मदहोश
लोगों 
के
साथ फिर

एक बार
आ रहे हैं
परहोश
करने

लेकिन
इस 
बार
पाला

उल्टा पड़
जायेगा
बेहोश
जल्दी 
ही
इस बार

फिर से
होश 
में
आ जायेगा

ऎसा हसीन
सपना जब
किसी दिन
किसी 
को
आयेगा

उस दिन
वाकई

सवेरा हो
जायेगा

अंधेरे का
व्यापारी

कुछ भी नहीं
समझ पायेगा
और बेहोश
हो जायेगा।

रविवार, 18 दिसंबर 2011

शर्म

शर्म होती है
या
कहते हैं शरम
फर्क पड़ता है
क्या
कर लेते हैं
शरम का ही
चलो भरम
शरम नहीं
आती है तो
बन जाते हैं
सभी होने ना
होने वाले काम
शरमाने वाले को
तो लगता है
हो गया हो
जैसे
खतरनाक जुखाम
वो जुखाम को देखे
या करवाले
अपने कोई काम
आपको आती है क्या
आती है तो अभी
भी सम्भल जाइये
कुछ तो सीख लीजिये
शरमाना तो
कम से कम
भूल ही जाइये
जिसने की शरम
उसके फूटे करम
आपसे कोई कभी
नहीं कह पायेगा
आपकी हो
जायेगी चाँदी
पांचों अंगुलियां
होंगी घी में                
और
सर कढ़ाई
में डूब जायेगा
जनज्वार वाले
लगे हैं एक
खबर पढ़वाने में
जोर लगा रहे हैं
डाक्टरों के शर्माने में
अरे छोड़ भी
दीजिये जनाब
किस किस
को शरमाना
इस जमाने
में सिखायेंगे
ज्याद किया
तो खुद ही
शरमाना
भूल जायेंगे
मास्टरों ने
छोड़ दिया
कब से
शरमाना
डाक्टर भी
अब नहीं
शरमा रहा
मिल गया ना
आप को
एक बहाना
चलिये बताइये
या
कुछ गिनवाइये
कितनो को
आ रही है
इस देश में
इस समय शरम
नहीं गिनवा
पा रहे तो
करवा ही लिजिये
चलिये चुनाव
शरम आती है
या नहीं आती है
अब तो पता ही
नहीं लग पाता
लोकतंत्र है
शरमाता या
अन्ना को ही
आनी चाहिये
कुछ तो शरम
ये शरम भी ना
अब बड़ी
अजीब ही
होने लगी है
जिसको आती है
उसको हर जगह
मार खिलवाती है
जिसको नहीं आती
उसके पीछे पता नहीं
क्यूं खामखां पब्लिक
झाडू़ ले के पड़ जाती है ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

हे राम !

राम की
कहानी
तुलसी की
जुबानी
बहुत है
पुरानी
दादी से
माँ तक
आते आते
लगता है
अब चैन
की नींद
सो रही है
बच्चों के
भारी भारी
बस्तों में
स्कूल की
रेलमपेल में
सीता भी
उनींदी सी
किसी किताब
किसी कापी
के किसी
मुढ़े तुढ़े
पन्ने में कहीं
खो रही है
घर में भी
फुरसत में
बातों बातों
में कभी
राम भी अब
भूले से भी
नहीं आना
चाह रहे हैं
कर्म और
फल वाली
कहावत में
भी मजे
अब नहीं
आ रहे हैं
फलों के
पेड़ भी
अब लोग
गमलों में
तक कौन
सा लगाना
चाह रहे हैं
बोते हुवे
वैसे बहुत
से लोग
बहुत सी
चीजें बस
दिखाने
के लिये
दिखा
रहे हैं
आम का
बीज दिख
रहा है
उसी बीज
से बबूल
का पेड़
उगा ले
जा रहे हैं
दादी और
माँ ने भी
ऎसा कुछ
कभी क्यों
नहीं बताया
जो दिखाया
भी इस जमाने
के हिसाब से
बड़ा अजीब
सा ही दिखाया
अब वो सब
पता नहीं
कहां खोता
जा रहा है
जमाना जो
कुछ दिखा
रहा है
पता नहीं
चल रहा है
वो किस
खेत में
बोया जा
रहा है
बड़ी बैचेनी है
कोई इस बात
को क्यों नहीं
समझा रहा है
जब राम
का हो
रहा है
ये हाल
तो बतायें
क्या फिर
बच्चों को
कृ्ष्ण कबीर
तुलसी रहीम
के बारे में
जब राम
की कहानी
तुलसी की
जुबानी
बहुत ही
पुरानी जैसी
हो रही है
दादी से
माँ तक
होकर
मुझ तक
आते आते
जैसे कहानी
के अन्दर ही
किसी कहानी
में ही कहीं
खो रही है।

बात

सुबह से
शुरू होती
है बात

रात सोने
तक चलती
है बात

घर से
निकलते
बाजार
में चलते
आफिस
पहुंचने
तक होती
है बात

और
यहां हैं
भी तो
बात
ही बात

सबकी
अपनी बात
एक
अनोखी बात

मेरी तू
सुन बात
तेरी मैं
सुनुंगा बात

मेरे पड़ौस
में भी
आज हुवी
एक बात

बाजार में
भी सुनी
मैंने एक
रसीली बात

कालेज में
भी थी
कुछ
चटपटी बात

हाय ये
कैसी
अनोखी
अजीब सी
है बात

इन सब
बात में
एक भी
ऎसी
नहीं बात

मैं कैसे
किस
मुंह से
बताउं वो
सब बात

यहां कोई
ऎसी वैसी
नहीं करता
कभी बात

सब बनाते
हैं अपनी
अपनी
एक बात

लिखते चले
जाते हैं
आसानी से
वो बात

कोई नहीं
बताना
चाहता
सही
सही बात

ये भी क्या
हुवी बात

कह डाली
एक बात
उस बात
पर भी
सिब्बल की
करो बात
मना कर
रहा है वो

क्यों कर
रहे हो बात।

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

हैप्पी बर्थ डे अविनाश जी

ब्लागों के बाघ
शहनशाहे ब्लाग
जन्मदिन मना
रहे होंगे आज
पांच हजारवी
शुभकामना मेरी
भी कुबूल कर
लीजिये ना जनाब
केक बन कर
अब तक आ
जाना चाहिये
मोमबत्तियां ज्यादा
हो जायेंगी अब
आपको बस
एक लैम्प
जलाना चाहिये
ईश्वर करे आप
खूब लिखें
इतना लिखें
की पढ़ते पढ़ते
लोग बहक
जायें और
जब चटके
लगायें तो सब
मुस्कुरायें फिर
खिलखिलायें और
बाद उसके
लोट पोट
हो जायें ।

लोकतंत्र के घरों से

एक बड़े से
देश के
छोटे छोटे
लोकतंत्रों
में आंख बंद
और
मुह बंद
करना सीख
वरना भुगत
अरे हम अगर
कुछ खा रहे हैं
तो देश का
लोकतंत्र भी
तो बचा रहे हैं
देख नहीं रहा है
कितनी बड़ी
बीमारी है
एक बड़े
लोकतंत्र
के सफाई
अभियान
की बड़ी सी
तैयारी है
सारी आँखे
लगी हुवी है
भोर ही से
बाबाओं की ओर
बता अगर हम
ही नहीं जाते
जलूस में टोपियां
नहीं दिखाते
तो तुम्हारे
बाबा जी क्या
कुछ कर पाते
सीख कुछ
तो सीख
घर की बात
घर में रख
बाहर जा
अपने को परख
अरे बेवकूफ
खा भी ले
थोड़ी सी घूस
कुछ नहीं जायेगा
थोड़ा जमा करना
थोडा़ बाबा को देना
छोटा पाप कटा लेना
बड़े पुण्य से
एक बड़े लोकतंत्र
को बचा
छोटा लोकतंत्र
अगर डूब भी
जायेगा तेरा
क्या जायेगा
सोच बड़ा अगर
भूल से गया डूब
छोटा क्या कहीं
रह पायेगा
और
तू कल किसको
फिर मुंह दिखायेगा ?

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

इच्छा

कोई हमको
कभी क्यूं
नहीं बनाता
अपना दलाल
कब से कोशिश
कर रहे हैं
लग गये हैं
कई साल
क्या क्या
होना चाहिये
शक्ल में
कोई नहीं बताता
जिसको देखो
लाईन तोड़
हमसे आघे
निकल जाता
अटल जी के
लोगों ने
कभी नहीं दिया
हमें भाव
आदर्श दिखना
बोलना
शायद है
वहां का दांव
सोनिया के लोग
भी कन्नी
काट निकल
जाते हैं
अन्ना के जलूस
में नहीं
गये फिर भी
नहीं बुलाते हैं
हाथी मैडम के
पास जाने
के लिये
पैसे चाहिये
कालेज में
छोटे घोटाले
से इतना
कैसे बनाइये
हमारे दर्द
को जरा
अपना दर्द
कभी बनाइये
दलाली के
गुर हमें
भी कभी
सिखलाईये
बहुत इच्छा
है एक
नामी दलाल
बनने की
सफेद कुर्ता
पायजामा
सफेद टोपी
पहनने की ।

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

अखबार

आज का
अखबार

कल की
थीं खबर 

मुख्य पृष्ठ
पर दहाडे़

अन्ना लगा
निशाना

बेचारे राहुल
पर
सोनिया
को छोड़ कर 

छोड़ विदेशी
डालर
और मिशन
कुछ लोगों

ने लिया
सेना में कमीशन

बेटा कर्नल
बाप को

मार रहा
था सैल्यूट

यही परिवार
पीड़ी दर पीड़ी

सेना में
ठोक रहा
है बूट

पेज पलट
कर देखा

शिक्षण
संस्थाओं में

छात्र छात्राऎं
दिखा
रहे थे
बैनर झंडे

मास्टरों को
भगा रहे थे

दिखा दिखा
कर डंडे

विद्वतगणों की
मारा मारी

दिखा रहा
था पेज तीन

भारी भारी
लोग दिख

रहे थे
फोटो में तल्लीन

अपनी ही
प्रतिभा नहीं

आ रही
प्रदेश के काम

हैडिंग थी
खबर थी

अंत में थे
शहर

के भारी नाम
शिक्षा तंत्र
को
विकसित
करने
पर
लगायें जोर

आह ! 
कहाँ शरण
लेंगे
अब
शिक्षा माफिया

के नामी
गिरामी चोर

पेज चार
पर थी वही

वेतन की
मारा मारी

पेज पांच
पर बनायी

गयी थी
योजना
एक
बड़ी भारी

हिमालय बचाने
को
लाया
जाने वाला

है बहुत पैसा
सेमिनार
कार्यशाला

पर दिख
रहा था

विज्ञान का
भरोसा

पेज पांच से
अंत तक

विज्ञापन और
थे समाचार

जिन्हें पढ़ कर
आ रही
थी नींद

क्योंकी बिना
धंधे के

वे सब
थे बेकार ।

रविवार, 11 दिसंबर 2011

बूढ़े के भाग से छींका टूटा

कल की कहानी
आज चौबीस घंटे
पुरानी हो गयी
पडौ़सन जो कल
सिर्फ मम्मी थी
आज नानी हो गयी
अखबार में थे
कई समाचार
कुछ गंभीर कुछ
चटपटे और रसीले
बावरे मियां तो
बिना चश्मे के
भी हो रहे थे रंगीले
जो साठ में जाने
वाले थे और हो
रहे थे ढीले
कल अचानक हुवा
उर्जा का संचार
हो ही गयी पैंसठ
सुन कर बिस्तरे से
गिर पड़े नींद में
जैसे ही पत्नी ने
सुनाया फ्रंट पेज
का समाचार
आज सारे सैनिक
लौट के आने लगे
छुट्टियां करवा दी
सब कैंसिल
सारे के सारे
बिना घंटी सुने
कक्षाओं मे हैं
जाने लगे।

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

अन्नाभाई अविनाश जी

अविनाश वाचस्पति
कभी थे मुन्नाभाई
अन्ना का हुवा जब
अवतरण देव रुप सा
चिपका लिया इन्होने
भी अन्नाभाई और
दिया मुन्नाभाई को
विश्राम का आदेश
अभी तक मुलाकात
तो हुवी नहीं पर होंगे
एक अदद आदमी ही
ऎसा महसूस होता
सा रहता है हमेशा
बड़े अजब गजब
से करतब दिखाते हैं
शब्दों के कबूतर
बना यहां से वहां
हमेशा उड़ाते रहते हैं
और हम पकड़ने के
लिये जाल भी बिछा दें
तो भी नहीं पकड़
पाते हैं जब भी करी
कोशिश अपने को ही
शब्दों के मायाजाल
से घिरा पाते हैं
ब्लागिंग का रोग
बहुत फैलाया है
थोड़ा सा वायरस
इधर भी आया है
इनको तो नींद भी
कहाँ आती है
ये तो सोते हैं नहीं
हमें सपने में डराते हैं
इनके ब्लागों में
कितना माल समाया है
हम तो चटके लगाने में
ही भटक जाते हैं
इनके उपर लिखने
के लिये बहुत सामान
हो गया है जमा
अब जरूरत है एक
बड़ी आस की और
एक अदद् राम के
तुलसीदास की।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

भूखे के लिये सेमिनार

मैं जानता हूँ
बहुत दिनो से
उसकी जरूरत
भूख से बिलबिलाती
आंतो का हाल
जो उसके मुंह
पर साफ नजर
आता है और
मुझे ये भी
मालूम है
कि केवल एक
रोटी की जरूरत
भर से उसके
चेहरे पर
लाली भरपूर
आने वाली है
मैं खुश हूँ
तब से
जब से
सुना है
मैंने
बहुत जल्दी
ही होने
वाला है
इसका समाधान
शिक्षाविदों
कृषि विशेषज्ञों
पर्यावरण विशेषज्ञों
के एक
विशालकाय
सम्मेलन में।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

सौदागर

दूसरों के हिस्से की
धूप और चांदनी का
सौदा करने वालों को
इस बात से क्या
फरक पड़ता है कि
उनके उजाले में कोई
बरकत नहीं होने
वाली इस बात से
इतना भरोसा है
उनको अपने आप पर
कि वो रोक लेंगे
सावन की बूदों को
उसको भिगाने से
पहले कभी भी
हवा को रोकने का
दम भी रखते हैं
हमेशा से अपने पास
सांसे गिनने के
कारोबार से
सुना है बहुत
नफे में रहते हैं
पर जिसके हिस्से
की धूप चांदनी
सावन और सांसों
पर नजर रखते है वो
उसने कब परवाह
की ऎसे नादानों की
और फटेहाली
पर भी जो
मुस्कुराहट उसके
चेहरे पै आती है
उनको कहां
बता पाती है
कि ये सब
उन्ही ने दे
दिया उसको
भूल से।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

गौरैया

गौरैया
रोज की
तरह आज
सुबह चावल
के चार दाने
खा के उड़ गयी
गौरैया
रोज आती है
एक मुट्टी चावल
से बस चार दाने
ही उठाती है
पता नहीं क्यों
गौरेया
सपने नहीं देखती
होगी शायद
आदमी
चावल के बोरों
की गिनती करते
हुवे कभी नहीं थकता
चार मुट्ठी चावल
उसकी किस्मत
में होना जरूरी
तो नहीं फिर भी
अधिकतर
होते ही हैं
उसे मालूम है
अच्छी तरह
जाते जाते
सारी बंद मुट्ठियां
खुली रह जाती है
और उनमें चावल
का एक दाना
भी नहीं होता
गौरैया
शायद ये
जानती होगी

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

पिताजी की सोच

मैंने पिताजी को
मेरे बारे में
माँ से कई बार
पूछते हुवे सुना था
"इसके घोड़े हमेशा
इसकी गाड़ी के पीछे
क्यों लगे होते हैं?"
माँ मुस्कुराती
लाड़ झलकाती
और साड़ी का पल्लू
ठीक कर पिताजी
को तुरंत बताती
चिंता करने की
कोई बात नहीं है
अभी छोटा है
कुछ दिन देखिये
अपने आप सब
जगह पर आ जायेगा
गाड़ी भी और घोड़ा भी
ये बातें मैं कभी
भी नहीं समझ पाया
जब भी कोशिश की
लगता था खाली
दिमाग खपाया
माँ और पिताजी
आज दोनो नहीं रहे
बीस एक साल
और गुजर गये
मैं शायद अब
वाकई मैं बड़ा
हो पडा़ अचानक
आँख खुली और
दिखने लगे आसपास
के घोड़े और गाड़ियां
सब लगे हुवे हैं
उसी तरह जिस
तरह शायद मेरे
हुवा करते थे
और आज मैं
फिर से उसी
असमंजस मैं हूँ
कि आँखिर पिताजी
ऎसा क्यों कहा
करते थे?

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

श्रद्धांजलि

ना शोहरत ले गया
ना दाम ले गया
काम ही किया बस
ताजिंदगी छक कर
उसे भी कहां वो
बेलगाम ले गया
जीवट में सानी
कहां था कोई उसका
सब कुछ तो दे कर
कहां कुछ ले गया
जिंदादिली से भरकर
छलकाता रहा
वो कल तक
गीतों में भरकर
वोही सारी दौलत
नहीं ले गया वो
सरे आम दे गया
आनन्द देकर
देवों के धर को
वो बिल्कुल अकेला
चलते चला वो
चला ही गया
वो चला ही गया।

रविवार, 4 दिसंबर 2011

पहचान

शब्दों के समुंदर
में गोते लगाना
और ढूँढ के लाना
कुछ मोती इतना
आसान कहां होता है
कविता बता देती है
तुम्हारे अंदर के
कव्वे का पता
जो सफेद शब्द
खोज के लाता
तो है हमेशा
पर कव्वे की
काली छाया
उन्हे भी
बना देती है काला
और कोयल की
कूँक होते हुवे भी
वो न जाने क्यूं
कांव कांव ही
सुनायी देते हैं
और लोग जान
जाते हैं मुझे ।

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

समापन

अंधेरे के घेरे हैं
चारों तरफ
उजालों से नफरत
हो जायेगी
दिया लेकर
चले आओगे
रोशनी ही
भटक जायेगी
कितनी बेशर्मी से
कह गये वो
रोशन है आशियां
रोशनी भी आयेगी
बेवफाओं को
तमगे बटे हैं
वफा ही क्यों
ना शर्मायेगी
यकीं होने लगा
है पूरा मुझको
दुनियां यूं ही
बहल जायेगी ।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

विश्वविद्यालय स्थापना दिवस

टूटती हुवी चीज
कोई दिखाई दे
तो स्थापना
उसकी करवाईये
स्थापना करने से
सुना है दोष
निवारण हो जाता है
की हुवी गलतियों पर
पर्दा सा एक
गिर जाता है
पाप बोध होने से
वो बच जाता है
जिसने टूटते हुवे
उस चीज पर दांव
कभी लगाया था
मेरा घर अगर
कभी मेरे से
गलती से टूट जायेगा
मैं स्थापना अपने
घर की करवाउंगा
परेशान ना होईये
साथ में दावत
भी खिलवाउंगा
मेरी संताने
मेरे को नहीं
कोस पायेंगी
टूटे घर के
अवशेष के सांथ
जब वे स्थापना
के शिलान्यास
के पत्थर को भी
गड़ा पायेंगी।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

पक्का हो गया चोर भी

लिखता गया

लिखते
लिखते
शायद
लिखना
आ जाये
सोच कर

पढ़ता गया

पढ़ते
पढ़ते
शायद
पढ़ना
आ जाये
मान कर

लिखने
पढ़ने
का कुछ
हुवा
या नहीं
खुदा जाने

मक्कारी
में जरूर
उस्ताद
हो गया हूँ

निरक्षरों को
अब साक्षर
बना रहा हूँ

खाली बिलों
में दस्तखत
करना
सिखा रहा हूँ

बुद्धिजीवी
का
प्रमाण पत्र
जब से
मिला है

लाल बत्ती
गाड़ी पर
लगा रहा हूँ

पढ़ाई
लिखाई
के और
भी हैं
फायदे
उठा रहा हूँ

अनपढ़
दो चार
विधान सभा
में पहुंचाने
की जुगत
लगा रहा हूँ

आप भी कुछ
नसीहत लेते
हुवे जाईये

खुद पढ़िये
और
औरों को भी
पढ़ाईये

कम से कम
इतना काबिल
तो बनाईये

पूरा ना भी
समेंट सकें
बीस तीस
हिस्सा ही
गोल
करवाईये

बहुत मौके
होते हैं
अनपढ़ की
समझ में
नहीं आ
पाते हैंं

पढ़े लिखे
होते हैं
आसानी
से चूना
लगाते हैं

साथ में
राज्य रत्न
का मेडल
बोनस की
तरह मुफ्त
में पाते हैं।

बुधवार, 30 नवंबर 2011

याद आया किसी को पहाड़

चढ़ने के लिये
जरूरी हैं
देश विदेश के
पर्वतारोहियों
के लिये एक
मजबूरी
कभी नहीं
हुवे पहाड़ ।

उतरना कभी
जरूरी नहीं
हुवा करता
पर अब मजबूरी
बन गया उतरना
वो ही पहाड़ ।

जरूरी है अब
खाली हो जाना
तमाशा खत्म
हो गया हो जब
बनते ही नया
पहाड़ी राज्य
अब तेरा
क्या काम
रे पहाड़ ।

गड़े झंडे
आ जाते नजर
बहुत दूर से
आंदोलनरत था
जब पहाड़ी
और पहाड़ ।

पुराने दिन
किसे हैं
याद जब
कहलाता था
पूरा राज्य दुर्गम
तब भी कहां कोई
आना जाना
चाहता था पहाड़।

चिंता में है
सुना केंद्र
पलायन से
बेरोजगार के
अचंभा हो रहा है
क्यों किसी को
याद अचानक
आ गया
फिर से पहाड़।

मुद्दा आया
हाथ में एक
गरम हमारी
सरकार के
चुनाव पर
एक बार फिर
छला जाने
वाला है पहाड़।

खाली क्यों
हो रहे हैं
देश में पहाड़
हर प्रकार के
दिल्ली देहरादून
में बैठौं को
सपने में
दिखे हैं
कल पहाड़।

सर्वेक्षण में
जुटेंगे कुछ
खिलाड़ी भीषण
सूबेदार के
चढ़ने वाले
नहीं हैं फिर भी
वो भूल कर
हल्द्वानी
से पहाड़।

आंकड़े खोजेंगे
अधिकारी
पहली बार
इस प्रकार के
अमरउजाला में
एक बार फिर
छपता दिख गया
पहाड़ो में पहाड़।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

ब्लाग का भिखारी

किस्म किस्म
के पकवान
लेकर रोज
पहुंचे
पहलवान

सुबह के
नाश्ते से
लेकर
शाम का
भोजन
तैयार है

किसी में
नमक
ज्यादा
तो कोई
पकने से
ही कर
चुका
इन्कार है

फिर भी
हर कोई
खिलाना
चाहता है
ना खाओ
तो भी
चिपकाना
चाहता है

कोई
पेट खराब
के बहाने
से खुद
को बचा 

ही ले
जाता है

किसी को
व्रत त्योहार
का बहाना
बनाना
बहुत अच्छी
तरह से
आता है

कुछ
मजबूरी
में
पसंद पे
चटका
लगा कर
हाथ
झाड़ लिया
करते हैं

बहुत से
कुछ नहीं
पकाते हैं

इधर
का खाना
उधर से
उधार लिया
करते हैं

बाजार में
हलचल है
लोग तेजी
से इधर
उधर जा
रहे हैं

पूछने पर
पता चला
वो भी
शाम को
अब यहीं
कहीं आ
जा रहे हैं

लोग मेरे
शहर के
बहुत खुश हैं

वो अब
चाटने के                
लिये नहीं
आता है
सन्नाटा
हो गया
हो कहीं पर
धमाका
रोज यहां
वो कर
जाता है

किसी को
कैसे चले
पता अब वो
यहां का चटोरा
बन गया है

लोग भी
कैसे मुंह
बचायें अपना
भिखारी
का एक
कटोरा
बन गया है

दे दे
अल्ला के
नाम पर
एक पसंद
का चटका
दे भी दे
तेरा क्या
जायेगा

जो दे
उसका भी
भला होगा
जो ना दे
वो भी
कभी अपने
लिये कुछ
मांंगने
के लिये
आयेगा ।

रविवार, 27 नवंबर 2011

सब की पसंद

मछलियों को
बहलाता फुसलाता
और बुलाता है
वो अपने आप
को एक बड़ा
समुंदर बताता है
पानी की एक बूंद
भी नहीं दिखती
कहीं आसपास
फिर भी ना जाने
क्यों हर कोई उसके
पास जाता है
मर चुकी
उसकी आत्मा
कभी सुना
था बुजुर्गों से
कत्ल करता है
कलाकारी से
और जीना
सिखाता है
अधर्मी हिंसंक
झूठा है वो
पंडालों में
पूजा जाता है
जमाना आज का
सोच कर
उसको ही तो
गांधी बताता है
देख कर उसे
ना जाने मुझे
भी क्या
हो जाता है
कल ही कह रहा
था कोई यूं ही
कि अन्ना तो
वो ही बनाता है ।

शनिवार, 26 नवंबर 2011

थप्पड़

थप्पड़ घूंसे
और लात
बहुत पुरानी
तो नहीं
कुछ समय
पहले पैदा
हुवी संस्कृति
पूर्ण रूपेण
भारतीय
दूसरी तरफ
अन्ना
सफेद टोपी
और
उनकी आरती
वो भी पूर्ण
भारतीय
दोनों में
पब्लिक का
जबर्दस्त
देख लो ना
योगदान
ओ कदरदान
भाषण वक्तव्य
समाचार
और टी वी
के प्रोग्राम
टी आर पी
बढ़ाने के
नित नवीन
प्रयोग
इसे क्या
नहीं कहेंगे
केवल एक
संयोग
कि नहीं
समझ पाया
आज तक
कोई
भारत का
भीड़ योग
अन्ना आता है
भीड़ लाता है
सब शान्ति से
निपट जाता है
अन्ना जाता है
भीड़ ले जाता है
और परदा
गिरते ही
बेचारा
एक नेता
मुफ्त में
थप्पड़ खा
जाता है ।

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

अभिनेता आज के समाज में

अंदर की
कालिख को
सफाई से
छिपाता हूँ
लेकिन चेहरा
मैं हमेशा
चमकाता हूँ
कितना शातिर
हूँ मैं भी
कोई नहीं जानता
हर कोई मुझे
देवता जैसे
के नाम से
है पहचानता
मेरा आज तक
किसी से कोई
रगड़ा नहीं हुवा
और तो और
बीबी से भी
कभी झगड़ा
नहीं हुवा
धीरे धीरे
है मैने अपनी
पैठ बनाई
बड़ी मेहनत से
दुकानदारी है चमकाई
कितनो को इस
चक्कर में
मैने लुटवा दिया
वो आज भी
करते हैं प्रणाम
सिर तक
अपने पांव में
झुकवा दिया
पर अंदाज
किसी को नहीं
कभी है आता
कि मैं
खेल खेल
में कैसे ये सब
हूँ कर जाता
बडे़ आराम से हूँ
चैन की बंसी
बजाता हूं
जो भी साहब
आता है
पहले उसको
फंसाता हूँ
सिस्टम को
खोखला करने में
हो गई है
मुझे महारत
तैयारी में हूँ
अब करवा सकता
हूँ कभी भी
महाभारत
तुम से ही
ये सारे
काम करवाउंगा
अखबार में
लेकिन फोटो
अपनी ही
छपवाउंगा
इस पहेली को
अब आपको ही
सुलझाना है
आसपास आज
आप के
कितने मैं
आबाद हो गये हैं
पता लगाना है
ज्यादा कुछ
नहीं करना है
उसके बाद
हल्का सा
मुस्कुराना है ।

बुधवार, 23 नवंबर 2011

आदमी / बंदर

डारविन को
कोट कर
सुना है बंदर
को आदमी
बना दिया गया
उन किताबों मे
लिखा गया है
जिनका
आई एस बी एन
नम्बर भी हुवा
करता है
यानि
जो आदमी
को कभी
कुछ अंक भी
दिया करता है
बंदर से
एक पक्का
आदमी
बनाने में
जब से
अंको की
गिनती होना
शुरू हुवी है
बंदर भी सुना
अंको के
जुगाड़ में हैं
बंदर अब खेत
नहीं उजाड़ते
किताबे छापना
शुरू कर
दिये हैं
और तब से
किसी भी
बंदर को डारविन
का डर नहीं
सताता
अब बंदर
आदमी को देख
कर भागना
बंद करने
वाले हैं
अंक पूरे कर
आदमी ही
हो जाने
वाले हैं ।

रिटायरमेंट

साठ से
हो गयी
पैंसठ
की हवा
फिर से
अचानक
क्या उड़ी
सुनते ही
शर्मा जी
की लाठी
पीछे गली
में जा पड़ी
नाई की
दुकान में
हो गया
बबाल
मेंहदी के
दाम में
देखा गया
अचानक
उछाल
पचास से
जो लोग
छुट्टियों में
थे जाने लगे
आज मेडिकल
सी एल पी एल
सभी को वापिस
मंगवाने लगे
और तो और
कई उम्रदराज
दस से चार
दिखाई दिये
साढ़े चार पर
चपरासी की
विदाई किये
उपर वाले
देख ले
साठ के उपर
पांच पर
जब आ रहा है
इतना ज्वार
पैंसठ छोड़ ना
पूरे सौ बना
फिर देखना
बूढ़े बूढ़े तेरे
से कितना
करने
लगते हैं
प्यार।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

राजा लोग

कुछ साल
पहले ही
की बात है

हर शाखा
का
होता था
एक राजा

प्रजा भी
होती थी
चैन से
सोती थी

खुशहाली
ना सही
बिकवाली
तो नहीं
होती थी

राजा
आज भी
हुवा करता है

पर प्रजा
अब
पता नही
कहाँ है

अब तो
हर शख्स
राजा बना
बैठा है

कोई
राजा भी
कभी
राजा की
सुनता है

इसलिये
हर एक
अपना
किला
बुनता है

हर तरफ
किलों कि
भरमार है

लेकिन
सिपाही
फिर भी
ना
जाने क्यों
रहे हार हैं ?

सब ठीक है

सब कुछ
आराम से
चलता रहे
इस देश में
अगर
कुछ लोग
फालतू में
अन्ना ना
बनकर
दूसरौं के
गन्नो को
लहलहाने दें
सब कुछ
ठीक चलता
रहता है
सिर्फ
थोड़ी देर
असमंजस
होती है उसे
जिसे
फटे में टांग
अड़ाने की
आदत है
सब कुछ
होता है
सब स्वीकार
करते हैं
बस कुछ
बिल्लियां
खिसियाती हैं
और पंजो
के निशान
आप देख
सकते हैं
ब्लाग के
पन्नो पर ।

टी ऎ डी ऎ

एक पैन
एक कागज
ही तो
चाहिये होता
है बस

बनाने
के लिये
चार लोग
एक कार
को

रेल
हवाई जहाज
या बैलगाड़ी
के चार लोग

बाजीगरी
खूँन में
नहीं आती
किसी के

हुनर सिखाने
में माहिर
हो गये हैं
मेरे मोहल्ले
के लोग ।

ईमानदार

आज
अचानक मैं
कहीं
गलती से
पहुंच बैठा
तभी कोई
सामने आया
और बोला
गुरू जी
भ्रष्टाचार
के विरुद्ध
चल रही है
अंदर
हाल में
लड़ाई
आप भी
शामिल हो के
जरा ले लो
ना अंगड़ाई
मैं झेंपा
थोड़ा शर्माया
फिर थोड़ा
हिम्मत कर
बड़बड़ाया
भाई क्यों
मुझ भ्रष्ट को
ताव दिला
रहे हो
बहुत कुछ
हो रहा है
शहर में
वहां
क्यों नहीं
बुला रहे हो?
कुछ उधर
मेरा जुगाड़
लगाओ तो
बात बने
कुछ नोट
हाथ लगें
तो तन्ख्वाह
के सांथ
दाल में तड़का
तो लगे।

रविवार, 20 नवंबर 2011

रंग

आदमी भी
तो बदलता
है कई रंग
पर नहीं सुना
कभी उसे
किसी के द्वारा
बुलाते हुवे
'ऎ इन्द्र धनुष'
आज जब
वो पारंगत
हो चुका है
कई रंग
बदलने में
फिर भी
कहलाया जा
रहा है
केवल एक
'गिरगिट'।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

दौरा

एक गड्ढा
जो बहुत
दिनो से
बहुत
लोगो को
गिरा रहा था

आज शाम
पी डबल्यू डी
की फौज द्वारा
भरा जा रहा था

सारे अफसरों के
हाथ में झाडू़
तक दिखाई
दे रहे थे

होट मिक्स
हो रहे थे
रोलर तक
चलाये दे
रहे थे

पब्लिक की
समझ में
कुछ नहीं
आ रहा था

जिसको देखो
वो कुछ ना कुछ
अंदाज लगा
रहा था

अरे कल
उत्तराखंड
का बर्थडे है
एक बता
रहा था

डी ऎम की
कार तक
बेटाईम
खड़ी थी
माल रोड पर

किसी से पूछा
तो पता चला
वो भी शहर में
चक्कर लगा
रहा था

इतने में
"मोतिया"
हंसता
हुवा आ
रहा था

बड़े जोर
जोर से
ठहाके लगा
रहा था

पूछा तो
बोलता जा
रहा था

पागल मत
हो जाओ
गड्ढा ही तो
भरा जा
रहा है

सालों को
पता भी नहीं
कल मुख्यमंत्री
बाय रोड
आ रहा है ।

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

दंगे

नटखट चूहे
की खटखट
से चौंक कर
लटपट करते
उठी तुरंत
फेंक रजाई
चटपट गिरा
जमीन पर
दौड़ पडी़
रसोई की ओर
हुवी भी नहीं
थी भोर
अल्साये
अंधेरे में
मलते हुवे आंख
भूल गयी
समय की ओर
देखना भी
रोज की तरह
चूल्हे पर
चाय की
केतली चढ़ा
जोर से बड़बड़ाई
माचिस की डिब्बी
को ढूंढते
खिड़की के
दरवाजे से टकराई
हमेशा की तरह
बाहर आयी
फिर अचानक
बैठ गयी
दरवाजे पर
याद आ गया
उसे फिर कि
बेटा तो
दंगे की भेंट
चढ़ गया
किसी और के
बेटे को
बचाते बचाते
और सुबह की
चाय का पानी
खौलता रहा
केतली में ।

गांधी

गांंधी तेरी याद
हो गयी फिर
एक साल पुरानी
पिछले साल
थी आयी
फिर आ गयी
इस साल
कुछ फोटो
पोस्टर बिके
मूर्तियां धुली
धुली सी
मुस्कुरा रहा था
आज
फूल बेचने
वाला भी
दो अक्टूबर
बर्बाद हो गया
बच्चे कह रहे थे
मायूसी से
आज तो
रविवार हो गया
सुबह सुबह
उठकर
जाना पड़ा
झंडा धूल झाड़
फहराना पडा़
तब किये
सत्य पर प्रयोग
अब कोई
कैसे करे उपयोग
सत्य जैसे अब
खादी हो गया
आदमी जीन्स का
आदी हो गया
गांधी चले जाओ
अब शाम हो गयी
लाठी चश्मा घड़ी
तो नीलाम हो गयी
आ जाना
अगले साल
फिर से एक बार
नमस्कार जी
नमस्कार जी
नमस्कार ।

"Its fashion to walk in hills and not to ride a car"

दो वर्ग
किलोमीटर के
मेरे शहर की
कैन्टोंन्मेंट
की दीवार
उस पर लिखी
ये इबारत

अब मुंह चिढ़ाती है

शहर के लोग
अब
सब्जी खरीदने
कार में
आने लगे हैं

वो
उनके बच्चे
दोपहियों
पर भी
ऎसे उड़ते हैं
जैसे
शहर पर
आने वाली है
कोई आफत

वो नहीं पहुंचे
अन्ना हजारे
और जलूस
दूर निकल जायेंगे
बाबा रामदेव
भाषण खत्म
कर उड़ जायेंगे

जिस दिन
बढ़ जाते हैं
पैट्रोल के दाम
और दौड़ने
लगती हैं
चमकती दमकती
कुछ और
मोटरसाईकिलें
मालरोड पर

थरथराने
लगते हैं
बच्चे बूढ़े
सूखे पत्तों
की तरह

पट्टी बंधवाते
दिखते हैं
कुछ लोग
हस्पताल में

चेहरे पर रौनक
दिखाई देती है
पुलिस वालो के

महसूस होती है
जरूरत
एक सीटर
हैलीकोप्टर की
मेरे शहर के
जांबाज बच्चो,
बच्चियों, मांओं
पिताओं के
हवा में
उड़ने के लिये

गर्व से कहें वो

हम पायलट है
जमीन पर नहीं
रखते कदम

और

जमीन पर
चलने वाले
बच्चे बूढ़े
कर सकें
कुछ देर
मुस्कुराते हुवे
सड़कों पर
कदमताल ।

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

नासमझ

कहाँ पता
चल पाता है
आदमी को

कि वो
एक माला
पहने हुवे
फोटो हो
जाता है

अगरबत्ती
की खुश्बू
भी कहां आ
पाती है उसे

तीन पीढ़ियों
के चित्र
दिखाई देते हैं
सामने
कानस में
धूल झाड़ने
के लिये
दीपावली से
एक दिन पहले

चौथी पीढ़ी
का चित्र
वहां नहीं
दिखता
शायद मिटा
चुका होगा
सिल्वर फिश
की भूख

गद्दाफी को
क्रूरता से
नंगा कर
नाले में
दी गयी मौत
कोल्ड स्टोरेज
में रखा
उसका शव
भी नहीं देख
पाया होगा
वो अकूत
संपत्ति जो
अगली
सात पीढ़ियों
के लिये भी
कम होती

पर बगल में
पड़ा
उसके बेटे
का शव भी
खिलखिला
के हँसता
रहा होगा
शायद

कौन
बेवकूफ
समझना
चाहता है
ये सब
कहानियां

रोज
शामिल
होता है
एक शव
यात्रा में
लौटते
लौटते
उसे याद
आने
लगती है
जीवन बीमा
की किस्त ।

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

समझ

मेरा अमरूद उनको
केला नजर आता है
मैं चेहरा दिखाता हूँ
वो बंदर चिल्लाता है
मैं प्यार दिखाता हूँ
वो दांत दिखाता है
मेरी सोच में लोच है
उसके दिमाग में मोच है
धीरे धीरे सीख लूंगा
उसको डंडा दिखाउंगा
प्यार से गले लगाउंगा
जब बुलाना होगा
तो जा जा चिल्लाउंगा
डाक्टर की जरूरत पड़ी
तो एक मास्टर ले आऊंगा
तब मेरा अमरूद उसको
अमरूद नजर आयेगा
मेरी उल्टी बातों को
वो सीधा समझ जायेगा ।

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