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बुधवार, 7 नवंबर 2012

ले खा एक स्टेटमेंट अखबार में और दे के आ

पागल उल्लू
आज फिर
अपनी
औकात
भुला बैठा

आदत
से बाज
नहीं आया
फिर एक
बार लात
खा बैठा

 बंदरों के
उत्पात पर
वकतव्य
एक छाप
बंदरों के
रिश्तेदारों के
अखबार
के दफ्तर
दे कर
आ बैठा

सुबह सुबह
अखबार में
बाक्स में
खबर बड़ी
सी दिखाई
जब पड़ी

 उल्लू के
दोस्तों के
फोनो से
बहुत सी
गालियाँ
उल्लू को
सुनाई 
पड़ी

खबर छप
गई थी
बंदरों के
सारे
कार्यक्रमों
की फोटो
के साथ

उल्लू बैठा
था मंच पर
अध्यक्ष भी
बनाया
गया था
बंदरों के
झुंड से
घिरा हुआ
बाँधे अपने
हाथों
में हाथ ।

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

मूल्याँकन का मूल्याँकन

दो सप्ताह से व्यस्त
नजर आ रहे थे
प्रोफेसर साहब
मूल्याँकन केन्द्र पर
बहुत दूर से आया हूँ
सबको बता रहे थे
कर्मचारी उनके बहुत ही
कायल होते जा रहे थे
कापियों के बंडल के बंडल
मिनटों में निपटा रहे थे
जाने के दिन जब
अपना पारिश्रमिक बिल
बनाने जा ही रहे थे
पचास हजार की
जाँच चुके हैं अब तक
सोच सोच कर खुश
हुऎ जा रहे थे
पर कुछ कुछ परेशान
सा भी नजर आ रहे थे
पूछने पर बता रहे थे
कि देख ही नहीं पा रहे थे
एक देखने वाले चश्में की
जरूरत है बता रहे थे
मूल्याँकन केन्द्र के प्रभारी
अपना सिर खुजला रहे थे
प्रोफेसर साहब को अपनी राय
फालतू में दिये जा रहे थे
अपना चश्मा वो गेस्ट हाउस
जाकर क्यों नहीं ले आ रहे थे
भोली सी सूरत बना के
प्रोफेसर साहब बता रहे थे
अपना चश्मा वो तो पहले ही
अपने घर पर ही भूल कर
यहाँ पर आ रहे थे
मूल्याँकन केन्द्र प्रभारी
अपने चपरासी से
एक गिलास पानी ले आ
कह कर रोने जैसा मुँह
पता नहीं क्यों बना रहे थे !

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

भाई फिर तेरी याद आई

गधे ने किसी
गधे को गधा
कह कर आज
तक नहीं बुलाया
आदमी कौन से
सुर्खाब के पर 

अपने लगा
कर है आया
बता दे कुछ
जरा सा भी
किसी धोबी के
दुख: को थोड़ा
सा भी वो कम
कभी हो कर पाया
किस अधिकार से
जिसको भी चाहे
गधा कहता हुआ
चलता है
चला
आज तक आया
गधों के झुंड
देखिये किस
शान से दौड़ते
जंगलों में
चले जाते हैं
बस अपनी
अपनी गधी
या बच्चों की
बात ही बस
नहीं सोच
पाते हैं
जान दे कर
जंगल के राजा
शेर की जान
तक बचाते हैं
बस घास को
भोजन के रूप
में ही  खाते हैं
घास की ढेरी
बना के कल
के लिये भी
नहीं वो बचाते हैं
सुधर जायें अब
लोग जो यूँ ही
गधे को बदनाम
किये जाते हैं
आदमी के कर्मों
क्यों अब तक
नहीं शर्माते हैं
गधा है कहने
की जगह अब
आदमी हो गया है
कहना शुरू क्यों
नहीं हो जाते हैं
गधे भी वाकई में
गधे ही रह जाते हैं
कोई आंदोलन
कोई सत्याग्रह
इस उत्पीड़न के
खिलाफ क्यों
नहीं चलाते हैं ।

रविवार, 7 अक्तूबर 2012

संडे है आज तुझे कर तो रहा हूँ याद

इस पर लिखा
उस पर लिखा
ताज्जुब की बात
तुझ पर मैने कभी
कुछ नहीं लिखा
कोई बात नहीं
आज जो कुछ
देख कर आया हूँ
उसे अभी तक
यहाँ लिख कर
नहीं बताया हूँ
ऎसा करता हूँ
आज कुछ भी
नहीं बताता हूँ
सीधे सीधे तुझ पर
ही कुछ लिखना
शुरू हो जाता हूँ
इस पर या
उस पर लिखा
वैसे भी किसी को
समझ में कब
कहाँ आता है
काम सब अपनी
जगह पर होता
चला जाता है
इतने बडे़ देश में
बडे़ बडे़ लोग
कुछ ना कुछ
करते जा रहे हैं
अन्ना जैसे लोग
भीड़ इकट्ठा कर
गाना सुना रहे हैं
अपने कनिस्तर को
आज मैं नहीं
बजा रहा हूँ
छोड़ चल आज
तुझ पर ही
बस कुछ कहने
जा रहा हूँ
अब ना कहना
तुम्हें भूलता
ही जा रहा हूँ ।

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

मंदिर और ऎसिडिटी

यहाँ पर
सुबह सुबह
पहले तो
एक मकान
के आगे
नतमस्तक
खड़ा हुआ
नजर आ
रहा था
आज से मंदिर
हो गया है
अखबार में
पढ़कर आ
रहा था
वहाँ पर
बेशरमों के बीच
शरम का एक
मंदिर बनाने
का प्रस्ताव
लाया जा
रहा था
बेशरम को जब
आती थी
शरम तो
ऎसी जगह
में फिर क्यों
जा रहा था
रोनी सी
सूरत ले
हमें बता
रहा था
किताबों में
लिखा हुआ
होता था
जो कभी
वो सब
अब कोई
नहीं सुना
रहा था
जो कहीं
नहीं लिखा
गया है कभी
उसपर दक्ष
हर कोई
नजर आ
रहा था
ताज्जुब की
बात हर
कोई कुछ
भी पचा
ले जा
रहा था
जिसे पच
नहीं पा
रहा था
डाक्टर के
पास जा
ऎसिडिटी का
इलाज करवा
रहा था ।

गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012

पकौड़ी


दर्द जब होता है हर कोई दवाई खाता है
तुझे क्या ऎसा होता है कलम उठाता है ।

रोशनी साथ मिलकर इंद्रधनुष बनाता है
अंधेरे में आँसू भी हो तो पानी हो जाता है ।

सपना देखता है एक तलवार चलाता है
लाल रंग की स्याही देखते ही डर जाता है ।

सोच को चील बना ऊँचाई पर ले जाता है
ख्वाब चीटियों से भरा देख कर मुर्झाता है ।

हुस्न और इश्क की कहानी बहुत सुनाता है
अपनी कहानी मगर हमेशा भूल जाता है ।

बहुत सोचने समझने के बाद समझाता है
समझने वाला हिसाब लेकिन खुद लगाता है ।

दुखी होता है जब जंगल निकल जाता है
डाल पर उल्लुओं को देख कर मुस्कुराता है ।

रोज का रोज मान लिया जलेबी बनाता है
पकौड़ी बन गई कभी किसी का क्या जाता है ।

चित्र साभार: 
peurecipes.blogspot.com

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

निपट गये सकुशल कार्यक्रम

गांंधी जी और शास्त्री जी
दो एक दिन से एक बार
फिर से इधर भी और
उधर भी नजर आ रहे थे
कल का पूरा दिन
अखबार टी वी समाचार
कविता कहानी और
ब्लागों में छा रहे थे
कहीं तुलना हो रही थी
एक विचार से
किसी को इतिहास
याद आ रहा था
नेता इस जमाने का
भाषण की तैयारी में
सत्य अहिंसा और
धर्म की परिभाषा में
उलझा जा रहा था
सायबर कैफे वाले से
गूगल में से कुछ
ढूंंढने के लिये गुहार
भी लगा रहा था
कैफे वाला उससे
अंग्रेजी में लिख कर
ले आते इसको

कहे जा रहा था
स्कूल के बच्चों को भी
कार्यक्रम पेश करने
को कहा जा रहा था
पहले से ही बस्तों से
भारी हो गई
पीठ वालो का दिमाग
गरम हुऎ जा रहा था
दो अक्टूबर की छुट्टी
कर के भी सरकार को
चैन कहाँ आ रहा था
हर साल का एक दिन
इस अफरा तफरी की
भेंट चढ़ जा रहा था
गुजरते ही जन्मोत्सव
दूसरे दिन का सूरज
जब व्यवस्था पुन:
पटरी पर  होने का
आभास दिला रहा था
मजबूरी का नाम
महात्मा गांंधी होने का
मतलब एक बार फिर
से समझ में आ रहा था ।

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

जानवर की खबर और आदमी की कबर

हथिनी के बच्चे का
नहर में समाना
कोशिश पर कोशिश
नहीं निकाल पाना
हताशा में चिंघाड़ना
और चिल्लाना
हाथियों के झुंड का
जंगल से निकल
कर आ जाना
आते ही दो दलों
में बट जाना
नहर में उतर कर
बच्चे को धक्के लगाना
बच्चे का सकुशल
बाहर आ जाना
हथिनी का बच्चे के
बगल में आ जाना
हाथियों का सूंड में
पानी भर कर लाना
बच्चे को नहलाकर
वापस निकल जाना
पूरी कहानी का
फिल्मी हो जाना
जंगली जीवन
की सरलता के
जीवंत उदाहरण का
सामने आ जाना
आपदा प्रबंधन का
नायाब तरीका
दिखा जाना
नजर हट कर
अखबार के दूसरे
कोने में जाना
आदमी की चीख
किसी का भी
ना सुन पाना
बच्चे के उसके
मौत को गले लगाना
आपदा प्रबंधन का
पावर पोइंट प्रेजेन्टेशन
याद आ जाना
सरकार का
लाश की कीमत
कुछ हजार बताना
सांत्वना की चिट्ठी
सार्वजनिक करवाना
मौत की जाँच पर
कमेटी बिठाना
तरक्की पसंद आदमी
की सोच का
जानवर हो जाना ।

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

बक बक संख्या तीन सौ

ये भी क्या बात है
उसको देख कर ही
खौरा तू जाता है
सोचता भी नहीं
क्यों जमाने के साथ
नहीं चल पाता है
अब इसमें उसकी
क्या गलती है
अगर वो रोज तेरे
को दिख जाता है
जिसे तू जरा सा भी
नहीं देखना चाहता है
तुझे पता है उसे देख
लेना दिन में एक बार
मुसीबत कम कर जाता है
भागने की कोशिश जिस
दिन भी की है तूने कभी
वो रात को तेरे सपने में
ही चला आता है
जानता है वो तुझे बस
लिखना ही आता है
इसलिये वो कुछ ऎसा
जरूर कर ले जाता है
जिसपर तू कुछ ना कुछ
लिखना शुरू हो जाता है
वैसे तेरी परेशानी का
एक ही इलाज अपनी
छोटी समझ में आता है
ऊपर वाले को ही देख
उसे उसके किसी काम पर
गुस्सा नहीं आता है
सब कुछ छोड़ कर तू
उसको ही खुदा अपना
क्यों नहीं बनाता है
खुदा का तुझे पता है
दिन में दिखना छोड़
वो किसी के सपने में
भी कभी कहाँ आता है ।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

बेबस पेड़

एक झंडा एक भीड़
बेतरतीब होते हुऎ
भी परिभाषित
दे देती है अंदाज
चाहे थोड़ा ही
अपने रास्ते का
अपनी सीमा का
यहाँ तक अपनी
गुंडई का भी
दूसरी भीड़
एक दूसरा झंडा
सब कुछ तरतीब से
कदमताल करते हुऎ
मोती जैसे गुंथे हों
माला में किसी
परिभाषित नजर
तो आती है पर
होती नहीं है
यहां तक कि
अपराध करने का
अंदाज भी होता है
बहुत ही सूफियाना
दोनो भीड़ होती हैं
एक ही पेड़
की पत्तियाँ
बदल देने पर
झंडे के रंग और
काम करने के
ढंग के बावजूद
भी प्रदर्शित
कर जाती हैं
कहीं ना
कहीं चरित्र
बेबस पेड़
बस देखता
रह जाता है
अपनी ही
पत्तियों को
गिरते गिरते
बदलते हुऎ
रंग अपना
पतझड़ में ।

बुधवार, 26 सितंबर 2012

मसला कुत्ते की टेढ़ी पूँछ

वैसे कुत्ते
के पास
मूँछ है
पर
ध्यान में
ज्यादा रहती
उसकी
टेढ़ी पूँछ है

उसको
टेढ़ा रखना
अगर
उसको
भाता है
हर कोई
क्यों उसको
फिर
सीधा करना
चाहता है

उसकी
पूँछ तक
रहे बात
तब भी
समझ
में आती है
पर
जब कभी
किसी को
अपने सामने
वाले की
कोई बात
पागल
बनाती है
ना जाने
तुरंत उसे
कुत्ते की
टेढ़ी पूँछ ही
क्यों याद
आ जाती है

हर किसी
की
कम से कम
एक पूँछ
तो होती है

किसी की
जागी होती है
किसी की
सोई होती है

पीछे होती है
इसलिये
खुद को दिख
नहीं पाती है
पर फितरत
देखिये जनाब
सामने वाले
की पूँछ पर
तुरंत नजर
चली जाती है

अपनी पूँछ
उस समय
आदमी भूल
जाता है
अगले की
पूँछ पर
कुछ भी
कहने से बाज
लेकिन नहीं
आता है

अच्छा किया
हमने अपनी
श्रीमती की
सलाह पर
तुरंत
कार्यवाही
कर डाली

अपनी पूँछ
कटवा कर
बैंक लाकर
में रख डाली

अब कटी
पूँछ पर कोई
कुछ नहीं
कह पाता है

पूँछ हम
हिला लेते हैं
किसी के
सामने
जरूरत
पड़ने पर
कभी तो
किसी को
नजर भी
नहीं आता है

इसलिये
अगले की
पूँछ पर
अगर कोई
कुछ कहना
चाहता है
तो पहले
अपनी पूँछ
क्यों नहीं
कटवाता है ।

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

सपना कर अपना पूरा कम्पनी बना

अपने
सपनों को
हकीकत
में नहीं
अगर
बदल पाओ

दिमाग
है ना
उसे 
काम
में लाओ

अपने
सपनों के
शेयर बनाओ

कुछ
अपने जैसे
सपने देखने
वालों के
सपनों के
साथ मिलाओ

कम्पनी
एक खड़ी
कर बाजार
में ले आओ

कम्पनी
के सपनों
की ये बात
किसी को
भूल कर भी
मत बताओ

ऎसा
मुद्दा एक
इसके
बाद उठाओ

जिसको
लेकर लोगों
के सपनों को
उकसा पाओ

पार्टी शार्टी
जात पात
भेद भाव
ऊँच नीच
की सोच पर
कुछ दिन
के लिये
विराम लगाओ

मनमोहन
के हो तो
आडवानी जी
वाले के साथ
कुछ दिन बिताओ

माया दीदी
से प्रेम
रखने वाले
मुलायम वाले
की साईकिल
पर बैठे
दिख जाओ

धार्मिक
आस्था भी
कुछ दिन
के लिये
भूल जाओ

एक
दूसरे में
हिल मिल
जाओ

देखने
वाले लोग
पागल हो जायें

कुछ कुछ
ऎसा माहौल
दो चार ही महीनो
के लिये बनाओ

कुछ दिन
मीटिंग सीटिंग
करते हुऎ
नजर आओ

पोस्टर
वोस्टर थोडे़
शहर में
वाओ

अखबार
में कुछ
समाचार
छपवाओ

इन सब
के बीच
काम हो गया
पता चलते ही
गोल हो जाओ

नजर
मत आओ
कम्पनी की टोपी
किसी दूसरे के
सर पर रख जाओ

सन्यासी
हो गये हैं
वो तो कब के
जैसी 
खबर
तुरंत फैलाओ 


जाओ
अब यहाँ
क्या बचा है
किसी और के
सपनो में अपना
सिर मत खपाओ ।

सोमवार, 24 सितंबर 2012

खरपतवार से प्यार

जंगल की सब्जियों
फल फूल को छोड़
घास फूस खरपतवार
के लिये थी जो होड़
उसपर शेर ने जैसे
ही विराम लगवाया
फालतू पैदावार के
सब ठेकों को दूसरे
जंगल के घोडों को
दिलवाने का पक्का
भरोसा दिलवाया
लोमड़ी के
आह्वाहन पर
भेड़ बकरियों ने
सियारों के साथ
मिलकर आज
प्रदर्शन करवाया
परेशानी क्या है
पूछने पर ऎसा कुछ
समझ में है आया
बकरियों ने अब तक
घास के साथ
खरपतवार को
जबसे है उगाया
हर साल की बोली में
हजारों लाखों का
हेर फेर है करवाया
जिसका हिसाब किताब
आज तक कभी भी
आडिट में नहीं आया
लम्बी चौड़ी खरपतवार
के बीच में सियारों ने भी
बहुत से खरगोशों
को भी शिकार बनाया
जिसका पता किसी को
कभी नहीं चल पाया
एक दो खरगोश
का हिस्सा लोमड़ी के
हाथ भी हमेशा
ही है आया
माना कि अब
खाली सब्जी ही
उगायी जायेगी
सबकी सेहत भी
वो बनायेगी
पर घास
खरपतवार की
ऊपर की कमाई
किसी के हाथ
नहीं आयेगी
सीधे सीधे
हवा में घुस जायेगी
इसपर नाराजगी को
है दर्ज कराया
बीस की भीड़ ने
एक आवाज से
सरकार को है चेताया
सौ के नाम एक
पर्ची में लिखकर
कल के अखबार में
छपने के लिये
भी है भिजवाया ।

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

खिलौना सोच

कुछ लोग बडे़
तो हो जाते हैं
पर खिलौनों से
खेलने के अपने
बचपन के दिन
नहीं भूल पाते हैं
खिलौनों में चाभी
भर कर भालू
को नचाना
बार्बी डौल में
बैटरी डाल कर
बटन दबाना
आँखे मटकाती
गुड़िया देख कर
खुश हो जाना
उनकी सोच से
निकल ही
नहीं पाता है
सामने किसी के
आते ही उनको
अपना बचपन
याद आ जाता है
खिलौना प्रेम पुन:
एक बार और
जागृत हो जाता है
खिलौनों की तरह
करता रहे कोई
उनके आगे या पीछे
कहीं भी कभी भी
तब तक वो
दिखाते हैं ऎसा
जैसे उनको कुछ
मजा नहीं आता है
जरा सा खिलौनापन
को छोड़ कर कोई
अगर कुछ अलग
करना चाहता है
तुरंत उनको समझ
में आ जाता है
अब उनका खिलौना
उनके हाथ से
निकल जाता है
सोच कर कि अब
आगे तो नहीं
कोई उनसे कहीं
बढ़ जाता है
फटाफट वो कुछ
ऎसा काम ढूँढ कर
ले आते है
खिलौने तो क्या
अच्छे भले आदमी
जो नहीं कर पाते है
फिर तो जब
उनका खिलौना
आदमी वाला काम
नहीं कर पाता है
तो वो ऎसा
दिखाते है
जैसा कि
खिलौने तो
उनको बिल्कुल
भी पसंद
नहीं आते हैं ।

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

बात की बात

बात पहले भी
निकलती थी
दूर तलक
भी जाती थी
बहुत समय
नहीं लगता था
पता नहीं कैसे
फैल जाती थी
साधन नहीं थे
आज के जैसे
बात तब भी
उछल जाती थी
आज भी बहुत
बात होती है
बात कभी तो
बाद में होती है
उससे पहले किसी
ना किसी के
पास होती है
कोई किसी से
नहीं पूछता है
अपने आप ही
आ जाती है
आज की बात में
वो बात पर नजर
नहीं  आती है
बात बडी़ बडी़
बातों के बीच में
कहीं खो जाती है
बहुत मुश्किल से
कोई बात का होना
बता पाता है
बात का ठिकाना
भी खोज लाता है
दबी हुई जबान से
बातों के बीच से
बात को निकाल
कर लाता है
उस बात की बात
लोग बस बनाते
ही चले जाते हैं
गाँधी जो क्या हैं 
कोई यहाँ जो
बात कहते कहते
देश को आजाद
कर ले जाते हैं
बात वैसे ही
कच्ची निकला
करती है अभी भी
लेकिन अब बात
को पहले लोग
पूरा पकाते हैं
मसाले नमक
मिर्च साथ में
मिलाते  हैं
जब बात के
होने का मतलब
निकल जाता है
बात बनाने वाला
खतरे को पार कर
अपने को बचा
ले जाता है
बात को तरीके से
सजाया जाता है
मौका देख कर
पूरा का पूरा
फैलाया जाता है ।

बुधवार, 19 सितंबर 2012

महापुरुष

बहुत कुछ कहें
या सब कुछ
कोई फर्क
नहीं होता है
एक महापुरुष
के पास जितना
अपना होता है
कहीं भी नहीं
उतना होता है
लिखना शुरु हो जाये
भरते चले जाते हैं
गागर सागरों से
जाते जाते अगर
लिख भी जाता है
जीवनवृतांत
कुछ नदियाँ नीर भरी
नीली नीली सी
फैल जाती हैं
गागर फिर भी
छलकता हुआ ही
नजर आता है
बचा हुआ भी इतना
ज्यादा होता है
एक दूसरा शख्स
उसपर उसकी
आत्मकथा लिख
ले जाता है
पन्ने दर पन्ने
किताब से किताब
होता हुआ वो कहीं
से शुरु होता हुआ
कहीं भी खत्म
नहीं हो पाता है
आज हर शख्स
अपने में एक
महापुरुष पाता है
एक पन्ना लिखना
भी चाहे तो भी
पूरा नहीं कर पाता है
महापुरुषों की
श्रेणी में फिर भी
आने का जुगाड़
लगाने का कोई
भी मौका नहीं
गवाना चाहता है ।

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

फेसबुक पर मिले एक संदेश का जवाब

S.k. Srivastava
  • Joshi ji ajkal apki kavitayen nahi aa rahi hai.

    हाँ वो आजकल
    नहीं आ रही है
    पता ही नहीं
    लग पा रहा है
    कहाँ जा रही है
    वैसे रोज ही
    कुछ ना कुछ
    देने आ जाती थी
    कुछ दिन से
    लग रहा है
    सब नहीं
    दे जाती थी
    कुछ कुछ छुपा
    भी ले जाती थी
    वैसे वो आये
    या ना आये
    बहुत अंतर
    नहीं आता है
    आती है तो
    कोई ना कोई
    कुछ ना कुछ
    कह जाता है
    नहीं आती है
    तब भी खाना तो
    पच ही जाता है
    अब जब आपने कहा
    वो आजकल
    नहीं आ रही है
    हमे भी लगा
    वाकई वो नहीं
    आ रही है
    फिर अगर वो
    नहीं आ रही है
    तो पता तो लगना
    ही चाहिये कि वो
    कहाँ जा रही है
    अब आप ही पता
    लगा दीजिये ना
    कुछ हमारा भी
    भला हो जायेगा
    कुछ होगा या नहीं
    ये बाद में फिर
    देखा जायेगा
    कम से कम
    आप की तरह कोई
    मेहरबान उसको
    पकड़ कर वापिस
    मेरे पास ले आयेगा
    वापिस आ गयी
    फिर से आने
    जाने लग जायेगी
    जैसे पहले आया
    जाया कर रही थी
    करना शुरु हो जायेगी
    फिर आप भी
    नहीं कह पायेंगे
    वो आजकल क्यों
    नहीं आ रही है
    क्या करें जब
    वो हमको ही
    आजकल
    कुछ
    नहीं बता रही है ।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

'ए' लो चाहे 'यू' लेलो

जल्दी बहुत वो
ऎसा कानून
लेकर आयेगी
कोई भी बात
अब खुले आम
नहीं कही जायेगी
एक एक को देखना
मनमोहन कृष्ण
बना ले जायेगी
कैसी भी बात हो
खुले आम बिल्कुल
नहीं कही जायेगी
कहने लायक है
या नहीं है
एक कमेटी बतायेगी
हर काम के
अलग अलग सेंसर
बोर्ड बनायेगी
बात पहले तराजू में
तुलवाई जायेगी
हल्की और भारी
अलग अलग
बताई जायेगी
कोई 'ए' तो कोई 'यू'
श्रेंणी में रखी जायेगी
उसी हिसाब का
प्रमाणपत्र पायेगी
श्रीमति जी को
लिखी चिट्ठी भी
पहले उनको खोल
कर दिखलाई जायेगी
प्रियतम लिखें
प्रिय लिखें
या ऎ जी लिखें
सरकारी कमेटी
ये सब बतायेगी
जनता आदतों को
बदल अगर नहीं पायेगी
इन्सान की तरह
अगर रह जायेगी
पूँछ हिलाना नहीं
कुछ सीख पायेगी
कमेटी के सामने
एक बुलवाई जायेगी
पूँछ कटी हुई एक
हाथ में दे दी जायेगी
कहने में साफ बात
हमको भी शर्म आयेगी
लेकिन फिर भी
इशारों में बताई जायेगी
एक पूँछ वाला जीव
बना दी जायेगी
अपने माथे पर 'यू'
चिपका हुआ पायेगी ।

बुधवार, 12 सितंबर 2012

चित्रकार का चित्र / कवि की कविता

तूलिका के छटकने
भर से फैल गये रंग
चारों तरफ कैनवास पर
एक भाव बिखरा देते हैं
चित्रकार की कविता
चुटकी में बना देते हैं
सामने वाले के लिये
मगर होता है  बहुत
मुश्किल ढूँढ पाना
अपने रंग उन बिखरे हुवे
इंद्रधनुषों में अलग अलग

किसी को नजर आने
शुरु हो जाते हैं बहुत से
अक्स आईने की माफिक
तैरते हुऎ जैसे हो उसके
अपने सपने और कब
अंजाने में निकल जाता है
उसके मुँह से वाह !
दूसरा उसे देखते ही
सिहर उठता है
बिखरने लगे हों जैसे
उसके अपने सपने
और लेता है एक
ठंडी सी आह !
दूर जाने की
कोशिश करता हुआ
डर सा जाता है
उसके अपने चेहरे का
रंग उतरता हुआ
सा नजर आता है
किसी का किसी से
कुछ भी ना
कहने के बावजूद
महसूस हो जाता है
एक तार का झंकृत
होकर सरगम सुना देना
और एक तार का
झंकार के साथ
उसी जगह टूट जाना
अब अंदर की
बात होती है
कौन किसी को
कुछ बताता है
कवि की कविता
और चित्रकार का
एक चित्र कभी कभी
यूँ बिना बात के
पहेली बन जाता है ।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

देशद्रोह

थोड़ा कुछ लिखना
थोड़ा कुछ बनाना
हो जाता है अब
अपने लिये ही
आफत को बुलाना
देखने में तो बहुत
कुछ होता हुआ
हर
किसी को नजर आता है
उस होते हुऎ पर
बहुत ऊल जलूल
विचार भी आता है
कोशिश करके बहुत
अपने को रोका जाता है
सब कुछ ना कह कर
थोड़ा सा इशारे के लिये
ही तो कहा जाता है
यही थोड़ा सा कहना
और बनाना अब
देशद्रोह हो जाता है
करने वाला ऊपर से
झंडा एक फहराता है
डंडे के जोर पर
जो मन में आये
कर ले जाता है
करने वाले से
कुछ बोल पाने की
हिम्मत कोई नहीं
कर पाता है
क्योंकी ऎसा करना
सम्मान से करना
कहा जाता है
लिखने बनाने वाले पर
हर कोई बोलना
शुरू हो जाता है
सारा कानून जिंदा
उसी के लिये हो जाता है
अंदर कर दिये जाने को
सही ठहराने के लिये
अपनी विद्वता प्रदर्शित
करने का यह मौका
कोई नहीं गंवाता है
अंधेर नगरी चौपट राजा
की कहावत का मतलब
अब जा कर अच्छी तरह
समझ में आ जाता है ।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

एक संत आत्मा का जाना

जगन भाई
के इंतकाल
की खबर
जब
मगन जी
को सुनाई

सुनते ही
अगले की
आँखें
भर आई

बोले
अरे
बहुत संत
महापुरूष थे

ना कुछ खाते थे
ना कभी पीते थे

किसी से भी कभी

पंगा नहीं लेते थे

बीड़ी
सिगरेट शराब
तम्बाकू गाँजा प्रयोग करने
वाले अगर
उनकी
संगत में
कभी आ जाते थे

हफ्ता दस
दिन में ही
सब कुछ
त्याग कर
सामाजिक
हो जाते थे

अब आप
ही 
बताइये
ऎसे लोगों
का दुनिया
में लम्बे
समय
तक रहना
ऊपर वाले
से भी क्यों 

नहीं देखा
जाता है

इतनी कम
उम्र में
वो इनको
सीधा
 ऊपर
ही उठा
ले जाता है

तब हमने
मगन जी
को ढाँढस
बंधाया

प्यार से
कंधे में
हाथ
रख कर
उनको
समझाया

देखिये
ये सब
चीजें भी
ऊपर
वाला ही
तो यहाँ
ला ला
कर
फैलाता है

अगर
कोई इन
सब चीजों
का प्रयोग
नहीं कर
पाता है

खुद भी
नहीं खाता है
खाने वाले
को भी
रोकने
चला जाता है

हर
दूसरा आदमी
ऎसा ही
करने लग
जायेगा तो

ऊपर
वाले की
भी तो सोचो जरा
उसका तो
दो नम्बर
का धंधा
मंदा
हो जायेगा

इसलिये
ऎसे में
ऊपर वाला
आपे से
बाहर हो
जाता है

शरीफ
लोगों को
जल्दी ऊपर
उठा ले
जाता है
और
जो
करते
रहते है
प्रयोग
उल्टी सीधी
वस्तुओं का
दैनिक जीवन में
उनको एक
दीर्घ जीवन
प्रदान करके
अपने धंदे को
ऊपर बैठ
कर ही
रफ्तार देता
चला जाता है

यहाँ वाला
बस कानून
बनाता ही
रह जाता है ।

रविवार, 9 सितंबर 2012

जा भटक कर आ

उत्तर का प्रश्न
खुद अपने
से निकाले
संकरे से
भटकन भरे
रास्ते पर
चलने की
आदत डाले
सामने वाले
के लिये
एक उलझन
हो जाये
मुश्किल हो
जाती है
ऎसे में क्या
किया जाये
भटकने वाला
तो भटकना है
करके खुद
भटक जाता है
हैरानी की बात
इसलिये नहीं
होती है कि
उसको अच्छा
भटकना आता है
सीधे रास्ते पर
सीधे सीधे
चलने वाला
दूर दूर तक
साथ देने वाला
ढूँढने में जहाँ
बरसों लगाता है
भटकने वाले को
भटकाने के लिये
भटकता हुआ
कोई पता नहीं
कैसे तुरंत
मिल जाता है
भटक भटक कर
भटकते हुऎ
भटकाने वाले
का बेड़ा
भटकाव के
सागर में
भटक जाता है
सामने वाला
देख देख कर
पागल हो
जाता है
उसके पास
अपने सर के
बाल नोंचने
के अलावा
कुछ नहीं
रह जाता है ।

शनिवार, 8 सितंबर 2012

बात की लम्बाई

कभी
लगता है
बात
बहुत लम्बी
हो जाती है

क्यों नहीं
हाईकू
या हाईगा
के द्वारा
कही जाती है

घटना
का घटना
लम्बा
हो जाता है

नायक
नायिका
खलनायक
भी उसमें
आ जाता है

उसको
पूरा बताने
के लिये
पहले खुद
समझा जाता है

जब
लगता है
आ गई
समझ में
कागज
कलम दवात
काम में आता है

सबसे
मुश्किल काम
अगले को
समझाना
हो जाता है

कहानी
तो लिखते
लिखते
रेल की
पटरी में
दौड़ती
चली जाती है

ज्यादा
हो गयी
तो हवाई
जहाज भी
हो जाती है

समझ
में तो
अपने जैसे
दो चार
के ही
आ पाती है

उस समय
निराशा
अगर
हो जाती है

तुलसीदास जी
की बहुत
याद आती है

समस्या
तुरंत हल
हो जाती है

उनकी
लिखी हुई
कहानी
भी तो
बहुत लम्बी
चली जाती है

आज नहीं
सालों पूर्व
लिखी जाती है

अभी तक
जिन्दा भी
नजर आती है

उस किताब
को भी
बहुत कम
लोग पढ़
पाते है

पढ़ भी
लेते है
कुछ लोग
पर
समझ
फिर भी
कहाँ पाते हैं ।

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

सदबुद्धि दो भगवान

एक बुद्धिजीवी
का खोल
बहुत दिन तक
नहीं चल पाता है
जब अचानक वो
एक अप्रत्याशित
भीड़ को अपने
सामने पाता है
बोलता बोलता
वो ये भी भूल
जाता है कि
दिशा निर्देशन
करने का दायित्व
उसे जो उसकी
क्षमता से ज्यादा
उसे मिल जाता है
यही बिल्ला उसका
उसकी जबान के
साथ फिसल कर
पता नहीं लगता

किस नाली में
समा जाता है
सरे आम अपनी
सोच को कब
नंगा ऎसे में वो
कर जाता है
जोश में उसे
कहाँ समझ
में आता है
एक भीड़ के
सपने को अपने
हित में भुनाने
की तलब में
वो इतना ज्यादा
गिर जाता है
देश के टुकडे़
करने की बात
उठाने से भी
बाज नहीं आता है
उस समय उसे
भारत के इतिहास
में हुआ बंटवारा भी
याद नहीं रह जाता है
ऎसे बुद्धिजीवियों से
देश को कौन
बचा पाता है
जो अपने घर
को बनाने के लिये
पूरे देश में
आग लगाने में
बिलकुल भी नहीं
हिचकिचाता है ।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

आयकर अधिकारी का निमंत्रण पत्र

आयकर अधिकारी
ने सूचना एक
भिजवाई थी
आज ही के दिन की
तारीख लगवाई थी
लिखा था मिलने
के लिये आ जाना
जो भी पूछूंगा यहाँ
आकर बता जाना
वेतनभोगी का वेतन
तो खाते मैं जाता है
जो भी होता है
साफ नजर आता है
आयकर तो नियोक्ता
खुद काट कर
भिजवाता है
साल में दो महीने
का वेतन आयकर
में चला जाता है
खुशी होती है
कुछ हिस्सा देश के
काम में जब आता है
समझ में नहीं आता है
ऎसे आदमी से
वो और क्या नया
पूछना चाहता है
अरबों खरबों के
टैक्स चोर घूम
रहे हैं खुले आम
उनसे टकराने की
हिम्मत तो कोई
नहीं कर पाता है
माना कि कोई
कोई मास्टर धंदेबाज
भी हो जाता है
वेतन के अलावा
के कामों में लाखों
भी कमाता है
ट्यूशन की
दुकान चलाता है
लाख रुपिये की
कापियाँ एक पखवाडे़
के अंदर ही
जाँच ले जाता है
उस आय से बीबी के
गले में हीरों का
हार पहनाता है
आयकर वाला
लगता है शायद
ऎसी बीबी को
बस कुछ ऎसे ही
देखता रह जाता है
पूछ कुछ नहीं पाता है
सड़क पर कोई
बेशकीमती गाडी़
दो दो भी दौडा़ता है
बहुमंजिले मकान पर
मकान बनाता है
अच्छा करता है
कोई अगर तकिये के
नीचे नोट छिपाता है
उधर पहुँचने पर
पेशी में पूछा जाता है
कितना राशन पानी
दूध चीनी तू
हर महीने अपने
घर को ले जाता है
हिसाब किताब
लिख कर दे जाना
अगली तारीख
लगा दी है
वो मुस्कुराते हुवे
जब बताता है
ईमानदारी वाकई
अभिशाप तो नहीं
ऎसे समय में
लगने लग जाता है
बेईमान होने से ही
शायद आदमी
इन लफड़ों में नहीं
कभी फंस पाता है ।

बुधवार, 5 सितंबर 2012

शिक्षक दिवस

माता पिता
समाज परिवेश
घर गाँव
शहर देश
पता नहीं
यहाँ तक
आते आते
किसने क्या
क्या
पढ़ाया 
शिक्षक दिवस
पर आज
अपने गुरुजनों
के साथ साथ
हर वो शख्स
मुझे याद आया
जिसने कुछ
ना कुछ
अच्छा बरा
मुझे
सिखाया 
कोशिश भी की
सीखने की
कुछ कुछ
हमेशा पर
रास्ता अपने
गुरु का
दिया हुआ
ही अपनाया
यहाँ तक
बेरोकटोक शायद
इसी लिये
चल के
आराम से
आ पाया
आसपास अपने
बोली भाषा
और पहनावे
को आज जब
मैं ुद नहीं
समझ पाया
प्रश्न उठना
ही था
मन के कोने
में कहीं
पूछ बैठा
उसी समय
अपने आप से
वहीं के वहीं
शिक्षा दी हो
शायद यही
मैंने ही
सब कुछ इन्हें
वही इन
सब के
व्यवहारों में
परिलक्षित हो
सामने से
है आया ।

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

सामान नहीं बस दुकानदार चाहिये

राशन की
दुकान पर
हो रही
मारामार हो
गैस और
कैरोसिन
के लिये
लगी लम्बी
कहीं एक
कतार हो

जब प्रश्न
जीवन और
जीने का
हो जाता है
जरूरी होता है
इसलिये
भीड़ होने
के बावजूद
हर कोई
चला जाता है

दूसरी तरफ
एक भीड़
उस दुकान
पर जाकर
पता नहीं
कोई क्यों
लगाता है

जहां होता
है बस
काम में
ना आने वाला
ढेर सारा
कुछ सामान

कुछ सड़
गया होता है
और
बचा हुआ
आउट
आफ डेट
हो गया
होता है

राशन
और
कैरोसिन
लेने
जाने वाला
उस दुकान
के बगल से
गुजर के
रोज जाता है
थोड़ा दिमाग
लगाता है
उसको
साफ साफ
अंदाज
आ जाता है

इस तरह की
दुकानों पर
हर कोई
सामान ही
खरीदने
को नहीं
आता है

कोई दिखाने
के लिये
चिड़िया के
पंख खरीद
भी अगर
ले जाता है

असली में
वो तो
दुकानदार
के लिये
वहाँ जाता है

उसके बाद
फिर कोई
प्रश्न किसी
के दिमाग में
कहाँ रह
जाता है ।

सोमवार, 3 सितंबर 2012

अच्छी दिखे तो डूब मर

घरवाली की आँखें
एक अच्छे डाक्टर
को दिखलाते हैं
काला चश्मा एक
बनवा के तुरंत
दिलवाते हँ
रात को भी
जरूरी है पहनना
एक्स्ट्रा पैसे देकर
परचे में लिखवाते हैं
दिखती हैं कहीं भी
दो सुंदर सी आँखें
बिना सोचे समझे
ही कूद जाते हैं
तैराक होते हैं
पर तैरते नहीं
बस डूब जाते हैं
मरे हुऎ लेकिन कहीं
नजर नहीं आते हैं
आयी हैं शहर में
कुछ नई आँखे
खबर पाते ही
गजब के ऎसे
कुछ कलाकार
कूदने की तैयारी
करते हुऎ फिर
से हाजिर
हो जाते हैं
हम बस यही
समझ पाते हैं
अच्छे पिता जी
अपने बच्चों को
तैरना क्यों नहीं
सिखाते हैं ।

रविवार, 2 सितंबर 2012

स्टिकर

कपड़े पुराने
हो जाते हैं
कपडे़ फट
भी जाते हैं
कपडे़ फेंक
दिये जाते हैं
कपडे़ बदल
दिये जाते हैं
कुछ लोग
फटे हुऎ कपडे़
फेंक नहीं
भी पाते हैं
पैबंद लगवाते हैं
रफू करवाते हैं
फिर से पहनना
शुरु हो जाते हैं
दो तरह के लोग
दो तरह के कपडे़
कोई नहीं करता
फटे कपडो़
की कोई बात
जाड़ा हो या
फिर हो बरसात
जिंदगी भी
फट जाती है
जिंदगी भी
उधड़ जाती है
एक नहीं
कई बार
ऎसी स्थिति
हर किसी की
हो जाती है
यहाँ मजबूरी
हो जाती है
जिंदगी फेंकी
नहीं जाती है
सिलनी पड़ती है
रफू करनी पड़ती है
फिर से मुस्कुराते हुऎ
पहननी पड़ है
अमीर हो या गरीब
ऎसा मौका आता है
कभी ना कभी
कहीं ना कहीं
अपनी जिंदगी को
फटा या उधड़ा हुआ
जरूर पाता है
पर दोनो में से
कोई किसी को
कुछ नहीं बताता है
आ ही जाये कोई
सामने से कभी
मुँह मोड़ ले जाता है
सिले हुऎ हिस्से पर
एक स्टिकर चिपका
हुआ नजर आता है
पूछ बैठे कोई कभी
तो खिसिया के
थोड़ा सा मुस्कुराता है
फिर झेंपते हुऎ बताता है
आपको क्या यहाँ
फटा हुआ कुछ
नजर आता है
नया फैशन है ये
आजकल इसे
कहीं ना कहीं
चिपकाया ही
जाता है
जिंदगी
किसकी
है कितनी 

खूबसूरत
चिपका हुआ
यही स्टिकर
तो बताता है ।

शनिवार, 1 सितंबर 2012

तेरी रोटी रोटी थी पर खोटी थी

अपनी एक
रोटी बनाना
टेढ़ी मेढ़ी
मोटी सूखी
स्वाद के साथ
उसको खाना
खुशी मनाना
किसी का इसको
ना देख पाना
उसका घीं का
डब्बा एक लाना
ला लाकर
सबको दिखाना
एक दिन
एक जगह पर
खाने के लिये
सबको बुलाना
सारे सूखी रोटी
वालों का
इक्ट्ठा होकर
वहाँ जाना
घीं वाले का
अपनी रोटी के
साथ वहाँ आना
टेढ़ी मेढ़ी रोटी
वालों को
डब्बा दिखाना
घीं लेकिन
अपनी रोटी
पर लगाना
सूखी रोटी
वालों का
दुखी बहुत
हो जाना
अपनी रोटी
लेकर वापस
अपने घर
आ जाना
घीं के डब्बे
वाले का
जम कर
गाली खाना
जो नहीं
गया कहीं
उसका अपनी
रोटी पर
इतराना
रोटी थी पर
खोटी थी
मुहावरे का
जन्म कहीं
हो जाना ।

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

कुछ कर

उधर की
मत सोच
आज इधर
को आ

कुछ अलग
सा कर
माहौल बना

गुलाब एक
सोच में
अपनी ला
खुश्बू भीनी
किताब
में दिखा
स्वाद की
रंगीन फोटो
चल बना
प्यार की
फिलम देख
रिश्तों के
धागे सुलझा

ध्यान मत
अब भटका
उधर होने दे
इधर को आ

अपना अपना
सब को
करने दे
तू अपना
भी करवा

कोई किसी
के लिये
नहीं मर
रहा है
तू भी
मत मर
कुछ अलग
सा तो कर

मधुशाला
की सोच
साकी को
सपने में ला
फूलों के
गिलास बुन
पराग की
मय गिरा

टेड़ा हो जा
हरी हरी
दूब बिछा
लुड़क जा

जब देख
रहा है
सब को
बेहोश
अपने होश
भी कभी
तो उड़ा

उनसे अपना
जैसा करवाने
की छोड़
उनका जैसा
ही हो जा

चैन से
बैठ कर
जुगाली कर
चिढ़ मत
कभी चिढ़ा

चल अपना
आज अलग
तम्बू लगा

कर ना
कुछ अलग
तो कर

उसको
उसका
उधर
करने दे
तू कुछ
इधर
अपना
भी कर ।

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

दो और दो पाँच

दो और दो
होता है चार

किताबों से
पढ़ा जाता है
ब्लैक बोर्ड में
लिखा जाता है

कोई पूछता है
तो समझाया
भी उसे जाता है
कि दो और दो
हमेशा ही चार
हो जाता है

असलियत में
दो और दो
होता है पाँच

खुद समझा
ऎसे ही
जाता है
किया भी
ऎसा ही
जाता है

मौका ज्यादा
अच्छा मिल
रहा हो
अगर तो
आठ भी
कर लिया
जाता है

किताब में
कुछ भी
लिख देने से
थोड़ा कुछ
हो जाता है

जमाने की
नब्ज भी तो
कोई चीज
हुआ करती है
उसे भी कुछ
समझा जाता है

उसके साथ
चला जाये
अगर तो
रास्ता आसान
हो जाता है

तू भी
दो और दो
को चार पढ़
पर जब
करता है
तो पाँच कर

सामने वाला
भी वही कर
रहा होता है
उसको प्यार से
नमस्कार कर

चार को दिखा
दिया कर
एक को
बचा लिया कर

सामने वाला
समझदार
होता है
उसको
दो और दो
चार समझ में
आ जायेगा
और
पाँचवा
तेरे लिये
बच जायेगा
किसी को
कुछ पता
भी नहीं
चल पायेगा ।

बुधवार, 29 अगस्त 2012

बाबा चमन चुप हो गया

चमन अपने
घरेलू मोर्चे पर
फेल हुआ
सड़क पर
निकल
कर आया
हरकतें जब
दिखीं उसकी
कुछ अजीबोगरीब
चमन से
चमन बाबा
लोगों ने
उसे बनाया
चमन बाबा
की खासियत
उसी को
समझ में
आती है
जिसकी ऊपरी
मंजिल
चमन बाबा
की सोच से
मेल कहीं
थोड़ा सा
खाती है
चमन बाबा
सड़क पर
रोज कहीं
ना कहीं
टकराता है
जब भी कहीं
एक कौआ
उसको नजर
आता है
एक भजन
उसके होंठो पर
चला आता है
चमन हंसता है
चमन मुस्कुराता है
इधर कुछ दिनो से
चमन बाबा
कुछ उदास सा
नजर आता है
ज्यादातर
किसी टी वी की
दुकान पर खड़ा
उसे हर कोई
पाता है
समाचार वो
सुनता है
एक कोने में
खड़ा होकर
और जैसे ही
कहीं उसे
संसद भवन
नजर आता है
चमन अपनी
अंगुली अपने
मुँह के ऊपर
ले आता है
मुड़ता है
और चुपचाप
चला जाता है ।

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

मनमौजी

इधर चुपके से
बिना कुछ
किसी को बताये
जैसे पायलों को
अपनी कोई
हाथ में दबाये
बगल ही से
निकल जाये
अंदाज भी
ना आ पाये
छम छम की
ख्वाहिश में
खोऎ हुऎ
के लिये बस
एक मीठा सा
सपना हो जाये
उधर तन्हाई के
एक सौदागर
के सामने
छ्म्म से
आ जाये
जितना कर
सकती हो
उतना शोर मचाये
अपनी छोड़ कुछ
इधर उधर
की पायलें भी
लाकर बजाये
चूड़ियां छनकाये
काले सफेद को
कुछ ऎसा दिखाये
इंद्रधनुष बिल्कुल
फीका पड़ जाये
कोई प्यार
नहीं पढ़ता उसे
मोहब्बत पढ़ाये
कोई मुहब्बत
है करता
उसे ठेंगा दिखाये
बतायेगी क्या
कभी कुछ
किसी को 
तेरे को ये
सब करना
कौन सिखाये
सब्र की गोली
हम भी बैठे
हैं खाये
खूबसूरत
ऎ जिंदगी
समय ऎसा
शायद कभी
तो आये
थोड़ा सा
ही सही
तू कुछ
सुधर जाये ।

शनिवार, 25 अगस्त 2012

पैर जमीन से उठा बड़ा आदमी हो जा

जब तक जमीन से
नहीं उठ पायेगा
बड़ा आदमी तुझे
कोई नहीं बनायेगा
सुन अगर बड़ा आदमी
सच्ची में तू बनना
बहुत ही ज्यादा चाहता है
तो मेरी एक सस्ती
आसान सी सलाह को
क्यों नहीं अपनाता है
अभी कहना मान जा
और कल को ही
बडे़ आदमी की सूची
देखने किसी बडे़ आदमी
के पास चला जा
वैसे अपना खुद भी
तो सोचा कर कुछ जरा
कब तक छोटे आदमी
की तरह करेगा मरा मरा
कोशिश कर पाँव थोड़ा
सा सही जमीन से उठा
हवा में तो कुछ लटका
अब चाहे इसके लिये
अपना घर बेच जेवर बेच
या फिर जमीन बेच के आ
साईकिल ही सही
अपने नीचे तो लगा
बस जमीन से पैर
कुछ ऊपर उठा
हैसियत इससे ज्यादा की
समझता है अपनी अगर
तो स्कूटर लगा
मोटरसाईकिल लगा
ज्यादा ही बड़ा होना
हो अगर तो चल
कार ही ला कर के लगा
पर देख बड़ा आदमी
अब तो हो ही जा
सबसे बड़ा आदमी
होने की ख्वाहिश
रखता है तू थोड़ी सी
भी अगर तो ऎसा कर
हवाई जहाज का
टिकट एक मंगवा
उस में बैठ और
पैर छोड़ पूरा का पूरा
हवा में चला जा
सबसे बडे़ आदमी
की सूची में जाकर
के जुड़जा और
हवा भी खा  ।

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

ज्योतिष हो गया अखबार

जन्म पत्री बाँचते हैं
बहुत ही ज्ञानी हैं
पंडित जी का
नहीं कोई सानी है
हर साल आते हैं
मेरे घर पर दो बार
माँगते हैं जन्म पत्री
सबकी हर बार
बताते हैं कुछ भूत
और कुछ भविष्य
वैसे का वैसा ही
जैसा बता गये थे
पिछली बार
आये कल भी
उसी तरह इस बार
पोथी निकाल कर
बैठे महानुभाव
शुरू किया बाँचना
हमेशा की तरह
नक्षत्रों को
सुनाने लगे
वही पुरानी रामायण
सुनते ही पुरानी कथा
जब नहीं रहा गया
पंडित जी से मैने
तब कह ही दिया
गुरू कुछ नई बात भी
कभी कभी बताया करो
जन्मपत्री से भी अगर
कुछ खोद नहीं
पा रहे हो तो
कम से से कम
अखबार तो पढ़ कर
के आया करो
आजकल तो जो
होना है आगे वो
पहले अखबार में
ही आता है
उसके बाद ही
होना है जो तभी
तो हो पाता है
मजे की बात
इसमें ये है
कि  ग्रह नक्षत्र
को भी पता नहीं
चल पाता है
कि अखबार
वालों को
ये सब कौन जा
के बताता है
इसीलिये तो
जो वाकई में
हो रहा है वो
अखबार में
कम ही
जगह पाता है
अखबार से
बढ़िया जन्मपत्री
पंडित अब तू भी
नहीं बाँच पाता है ।

सोमवार, 20 अगस्त 2012

पूरी बात

शर्ट की
कम्पनी
सामने
से ही
पता चल
जाती है
पर
अंडरशर्ट
कौन सी
पहन कर
आता है
कहाँ 
पता 
चल पाता है

अंदर
होती है
एक
पूरी बात
किसी के
पर वो
उसमें से
बहुत
थोडी़ सी
ही क्यों
बताता है

सोचो तो
अगर
इस को
गहराई से
बहुत से
समाधान
छोटा सा
दिमाग
ले कर
सामने
चला
आता है

जैसे
थोड़ी 
थोड़ी
पीने से
होता है
थोड़ा सा
नशा
पूरी
बोतल
पीने से
आदमी
लुढ़क
जाता है

शायद
इसीलिये
पूरी बात
किसी को
कोई नहीं
बताता है

थोड़ा थोड़ा
लिखता है
अंदर की
बात को
सफेद
कागज
पर अगर
कुछ
आड़ी तिरछी
लाइने ही
खींच पाता है

सामने वाला
बिना
चश्मा लगाये
अलग अलग
सबको
पहचान ले
जाता है

पूरी बात
लिखने की
कोशिश
करने से
सफेद
कागज
पूरा ही
काला हो
जाता है

फिर कोई
कुछ भी
नहीं पढ़
पाता है

इसलिये
थोड़ी
सी ही
बात कोई
बताता है

एक
समझदार
कभी भी
पूरी रामायण 
सामने नहीं
लाता है

सामने वाले
को बस
उतना ही
दिखाता है
जितने में
उसे बिना
चश्में के
राम सीता
के साथ
हनुमान भी
नजर आ
जाता है

सामने
वाला जब
इतने से
ही भक्त
बना लिया
जाता है

तो

कोई
बेवकूफी
करके
पूरी
खिचड़ी
सामने
क्यों कर
ले आता है
दाल और
चावल के
कुछ दानों
से जब
किसी का
पेट भर
जाता है ।

रविवार, 19 अगस्त 2012

खबर

बहुत से समाचार
लाता है रोज
सुबह का अखबार
कहाँ हुई कोई घटना
किस का टूटा टखना
मरने मारने की बात
लैला मजनूँ की बारात
कौन किसके साथ भागा
कहाँ पड़ गया है डाका
ज्यादातर खबर होती हैं
देखी हुई होती हैं
और पक्की होती हैं
सौ में पिचानवे
सच ही होती हैं
इन सब में से
मजेदार होती है
वो खबर जो कहीं
तैयार होती है
रात ही रात में बिना
कोई बीज को बोये
सुबह को एक ताड़
का पेड़ होती हैं
इस के लिये पड़ता है
किसी को कुछ
कुछ खुद बताना
चार तरह के लोगों से
चार कोनों में शहर के
एक जोर का ऎसा
भोंपू बजवाना
जिसकी आवाज का हो
किसी को भी सुनाई
में ना आना
जोर का हुआ था शोर
ये बात बस अखबार से ही
पता किसी को चल पाना
या कुछ बंदरों को जैसे
केलों के पेडो़ के
सपने आ जाना
बंदरों के सपनो की बातें
सियारों के सोर्स से
पता चल जाना
इसी बात को
गायों का भी
रम्भा रम्भा
कर सुनाना
पर अलग अलग
अखबार में
केलों के साईज का
अलग अलग हो जाना
बता देती है खबर किस
खेत में उगाई गयी है
मूली के बीच को बोकर
गन्ना बनाई गयी है
पर मूली गन्ने
और बंदर के केले को
किसी को भी
कहाँ खाना होता है
पता ये चल जाता है
कि किस पैंतरेबाज को
खबर पढ़ने वालों को
उल्लू बनाना होता है
बेखबर होते हैं ज्यादातर
खबर पढ़ने वाले भी
उनको कुछ समझ में
कहाँ आना होता है
पेंतरेबाजों को तो अपना
उल्लू कैसे भी सीधा
करवाना ही होता है ।

शनिवार, 18 अगस्त 2012

नागा बाबा

नागा बाबा 
एक
देखे मैंने
नंग धडंग
खडे़ 

एक टी वी 
की दुकान 
के सामने

देखते हुऎ
फ़ैशन
टी वी में
छोटे छोटे
कपड़ों में
माडलों का
कैट वाक

घर में टी वी
कभी भी
मैं नहीं
देखता हूँ
लेकिन
वहाँ
मैं भी तन
कर खड़ा
हो गया

जैसे चल
रहा हो
क्रिकेट मैच
कोई
भारत
पाकिस्तान का

फिर कीड़ा
कुलबुलाया

आम
आदमी
के पेट में
जैसे
पचती नहीं
कोई बात

टी वी को
कम
बाबा को
ज्यादा
देख रहा
था मैं
बहुत
देर तक
लेकिन
रुक
नहीं पाया
पूछ बैठा
बाबा से

बाबा जी
कौन सा
कपड़ा
आपको
पसंद आया

बाबा मुड़ा
मुझे घूरा
थोड़ा डर
भी लगा
लेकिन फिर
मुस्कुराया

पूछा मुझसे
उसने

ये बहुत
देर से
मैं भी
देख रहा हूँ
लेकिन
समझ नहीं
पा रहा था
कि
इनसे ऎसा
कौन है
जो ये
करवा
रहा था

यहाँ तो
हर आदमी
करता है
यही
कैट वाक
वो तो
टी वी में
कहीं नहीं
दिखाया
है जाता

देखते रहो
इनको
निर्विकार
भाव से
समझो
कैट और
कैट वाक
को इनके
और
मुस्कुरालो
तो जग है
जीत
लिया जाता

सभी तो
कर रहे हैं
कैट वाक
यहां
कपड़े अपने
उतार कर

पर कहलाना
नहीं चाहते
बस दिखवाना
चाहते है
अपने को
कैट वाक पर
कपड़े की बात
छोड़ कर

पर कौन
कर सकता
है ऎसा
करता तो
मेरे जैसे
बिना कपड़े
का एक
नागा बाबा
नहीं हो जाता

बच्चा
समझा कर
तू भी मुझ से
कहाँ फिर
कुछ
पूछ पाता

समझ में तेरे
कुछ आया है
तो यहाँ से
चला जा
नहीं तो
तू भी एक
नागा बाबा
बन जा
और मेरे
साथ आजा ।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

ब्लाग है या बाघ है

सपने भी
देखिये ना
कितने अजब
गजब सी चीजें
दिखाते हैं
जो कहीं
नहीं होता
ऎसी अजीब
चीजें पता नहीं
कहाँ कहाँ से
उठा कर लाते हैं
कल रात का
सपना कुछ
कुछ रहा है याद
अब किसी को
कैसे बतायेंं ये
अजीब सी बात
एक शहर जैसा
सपने में कहीं
नजर आ रहा था
घुसते ही
'ब्लाग नगर' का
बडा़ सा बोर्ड
दिखा रहा था
अंदर घुसे तो
जलसे जलूस
इधर उधर
जा रहे थे
ब्लाग काँग्रेस
ब्लाग सपा
जैसे झंडे
लहरा रहे थे
कुछ ब्लागर
कम्यूनिस्ट हैं
करके भी
समझा रहे थे
खेल का मैदान
भी दिखा जहाँ
ब्लाग ब्लाग का
खेल एक खेला
जा रहा था
टिप्पणियों का
होता है स्कोर
उस पर होती है
जीत और हार
ऎसा स्कोरबोर्ड
बता रहा था
हंसी आ रही थी
सुन सुन कर
जब सुना एक
ब्लागर ब्लाग
फिक्सिंग
करवा रहा था
टिप्पणियाँ किसी
ब्लाग की किसी
और को दे
आ रहा था
उसकी रिपोर्ट
करने दूसरा
ब्लागर ब्लाग थाने
में जा रहा था
ब्लाग पुलिस
को लाकर
घटनाक्रम की
एफ आई आर
की पोस्ट की
कापी बना
रहा था
आगे इसके
क्या हुआ
पता ही नहीं
चल पा रहा था
घड़ी का अलार्म
सुबह हो गयी
का बहुत शोर
मचा रहा था
सामने खड़ी
बिस्तरे के
श्रीमती मेरी
पूछ रही थी
मुझसे कि
तू सपने में
बाघ बाघ
जैसा क्यों
चिल्ला रहा था ।

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

भ्रम एक शीशे का घर

हम जब
शरीर
नहीं होते हैं
बस मन
और
शब्द होते हैं

तब लगता है
शायद ज्यादा
सुन्दर और
शरीफ होते हैं

आमने सामने
होते हैं
जल्दी समझ
में आते हैं
सायबर की
दुनियाँ में
कितने
कितने भ्रम
हम फैलाते हैं

पर अपनी
आदत से हम
क्योंकी बाज
नहीं आते हैं
इसलिये अपने
पैतरों में
अपने आप ही
फंस जाते हैं

इशारों इशारो
में रामायण
गीता कुरान
बाइबिल
लोगों को
ला ला कर
दिखाते हैं

मुँह खोलने
की गलती
जिस दिन
कर जाते हैं
अपने
डी एन ऎ का
फिंगरप्रिंट
पब्लिक में
ला कर
बिखरा जाते हैं

भ्रम के टूटते
ही हम वो सब
समझ जाते हैं

जिसको समझने
के लिये रोज रोज
हम यहाँ आते हैं

ऎसा भी ही
नहीं है सब कुछ
भले लोग कुछ
बबूल के पेड़ भी
अपने लिये लगाते हैं

दूसरों को आम
की ढेरियों पर
लाकर लेकिन
सुलाते हैं

सौ बातों की
एक बात अंत में
समझ जाते हैं

आखिर हम
हैं तो वो ही
जो हम वहाँ हैं
वहाँ होंगे
कोई कैसे
कब तक बनेगा
बेवकूफ हमसे

यहाँ पर अगर
हम अपनी बातों
पर टाई
एक लगाते हैं
पर संस्कारों
की पैंट
पहनाना ही
भूल जाते हैं ।

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी

देश बहुत
बड़ा है
आजादी
और
आजाद देश
को समझने
में कौन पड़ा है
जितना भी
मेरी समझ
में आता है
मेरे घर और
उसके लोगों
को देख कर
कोई भी अनाड़ी
आजादी का
मलतब आसानी
से समझ जाता है
इसलिये कोई
दिमाग अपना
नहीं लगाता है
देश की आजादी
का अंदाज
घर बैठे बैठे ही
जब लग जाता है
अपना काम
तो भाई आजादी
से चल जाता है
कहीं जाये ना
जाये आजाद
15 अगस्त और
26 जनवरी को
तो पक्का ही
काम पर जाता है
झंडा फहराता है
सलामी दे जाता है
राष्ट्रगीत में बकाया
गा कर भाग लगाता है
आजादी का मतलब
अपने बाकी आये हुऎ
आजाद भाई बहनो
चाचा ताइयों को
समझाता है
वैसे सभी को
अपने आप में
बहुत समझदार
पाया जाता है
क्योंकी आजादी को
समझने वाला ही
इन दो दिनो के
कार्यक्रमों में
बुलाया जाता है
फोटोग्राफर को भी
एक दिन का काम
मिल जाता है
अखबार के
एक कालम को
इसी के लिये
खाली रखा
जाता है
किसी एक फंड
से कोई
मिठाई सिठाई
भी जरूर
बंटवाता है
जय हिन्द
जय भारत के
नारों से
कार्यक्रम का
समापन कर
दिया जाता है
इसके बाद
के 365 दिन
कौन कहाँ
जाने वाला है
कोई किसी को
कभी नहीं
बताता है
अगले साल
फिर मिलेंगे
झंडे के साथ का
वादा जरुर
किया जाता है
जब सब कुछ
यहीं बैठ कर
पता चल जाता है
तो कौन बेवकूफ
इतना बडे़ देश
और
उसकी आजादी
को समझने के
लिये जाता है।

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

अब के तो छा जाना गलती मत दोहराना

अपने आस पास
गन्ने के खेत
जैसे उगे हुऎ
पता नहीं कितने
पर देखे जरूर
थे पिछली बार
बहुत सारे अन्ना
नतमस्तक
हो गया था
साथ में दुखी भी
हो गया था
कहीं भी किसी भी
खेत में नहीं
उग पाया था
बहुत झल्लाया था
इस बार
चांस हाथ से
नहीं जाने दूंगा
चाहे धरती
पलट जाये
मौका भुना
ही लूंगा
फिर से क्योंकी
लग रहा है कुछ
होने वाला है
सुगबुगाहट सी
दिख रही है साफ
पिछली बार के
कलाकारों में
सुना है जल्दी ही
इस बार वो रामदेव
हो जाने वाला है
अन्ना हो गये रामदेव
का समाचार भी
इन रामदेवों के
अपने अखबार का
संवाददाता इस बार भी
इनकी रोज आने वाली
खबर की जगह पर
ही देने वाला है
सोच कर दीजियेगा
अपनी खबर इन दिनो
आप भी जरा
आपकी खबर भी
इनकी खबर में
रोज की तरह मिलाकर
वो आप से मजे
भी लेने वाला है
बस एक सबक
सिखा गया अन्ना
इन अन्नाओं को
काम अपने रोज के
छोड़ के कोई भी
अन्ना यहां का
नहीं इस बार मैदान
में आने वाला है
पीछे से लंगड़ी
देने वाला है
गिराने वाला है
सामने से आकर
उठाने वाला है
रामदेव का मलहम
मुफ्त में दे के
जाने वाला है।

सोमवार, 13 अगस्त 2012

एक सीधा सा टेढ़ा

सालों साल लग गये
यहाँ तो समझने में
कि आँखिर किसे
कैसे क्या किसको
समझाना आता है
सीधा सीधा कहने
वाले को कहाँ बेवकूफ
बनाना आता है
अपनी भी समझ में
कुछ आया तो वो भी
कभी भी सीधा कहाँ आया
उसका कहना ही
समझ पाये हम
जिसे उल्टा कर के
समझाना आता है
ये भी समझ में आया
कि उल्टा कर के
समझाना सबसे अच्छा
समझाना होता है
पूरा उल्टा नहीं भी
कर के आओ तो
बस थोड़ा सा टेढा़
करके आना होता है
लेकिन इस टेढा़ करके
समझाने वाले को
खुद भी टेढ़ा हो
जाना होता है
धीरे धीरे ऎसे टेढे़ को
सामने वाले से केकड़ा
कहलवाना होता है
कोई काम दुनिया के
ऎसे हो या वैसे हों
कहाँ कभी रुकते हैं
उनको करने वाले को
अपने अपने ढंग से
करते ही जाना होता है
केकडे़ भी आदत से
मजबूर होते हैं
उनको भी केकड़ापन
अपना दिखाना होता है
तब तक सब अपनी
जगह पर जैसे तैसे
चलाना होता है
पर मुसीबत तो
तब आती है जब
टेढे़ के सामने किसी
एक टेढे़
को दूसरे टेढे़ को
समझाना होता है

टेढे़ टेढे़
होकर
एक दूसरे के नजदीक
जाना होता है
केकड़ापन अपने अपने
भूल कर सीधा
हो जाना होता है
जो भी समझाना होता है
ऎसे में बिल्कुल सीधा ही
समझाना होता है ।

रविवार, 12 अगस्त 2012

सच सुन आ पर पहले बीमा करा

सच को कहने से पहले
मीठा बनाना चाहिये
सीधे सीधे नहीं कुछ
घुमा फिरा के
लाना चाहिये
सच को कहना ही
काफी नहीं होता
उसको सच की तरह
समझाना भी तो
आना चाहिये
सच कहो तो
बहुत कम पचा
पाते हैं लोग
कहने वाले को
इतना तो समझ में
आना ही चाहिये
सच को पहले तो
किसी से कहना
ही नहीं चाहिये
कहना ही पढ़ जाये
किसी मजबूरी से अगर
तो पानी मिला के पतला
कर ही लेना चाहिये
साथ में हाजमोला
टाईप की कोई गोली
को भी देना चाहिये
खुले में ना कहकर
बंद कमरे में ले जाकर
कह देना चाहिये
सब से महत्वपूर्ण
बात सुन लीजिये
कहने से पहले एक
वैधानिक चेतावनी को
सुनने वाले को जरूर
ही दे देना चाहिये
इसमें सच है सच कहा है
सच को सुनने से अगर
आपको दुख होता है
तो आपको इसको नहीं
ही सुनना चाहिये
सुनना ही चाहते हो
फिर भी अगर तो
सच सुनने से होने वाले
नुकसान का बीमा
करा लेना चाहिये ।

शनिवार, 11 अगस्त 2012

श्रीमती जी की एक राय

लिख लिख 
और लिख
लिखता ही 

चला जा
पर तुझे वो कुछ 

नहीं है पता 
जो मुझको है पता
बस लिखने से
नहीं होने वाला है
तेरा कुछ भला
इन चार लोगों की
दी हुई टिप्पणियों
पर मत इतरा
कुछ मेरी भी
कभी सुनता जा
कुछ करना ही
चाहता है तो
जूते नये ब्राँडेड
लेकर आ
पालिश लगा
कर चमका
ऎसा एक ही दिन
नहीं करना है
समझ जा
इसे अपनी
रोज की
एक आदत बना
कोट की जेब
वो भी ऊपर वाली
में सफेद रुमाल भी
एक अटका
जरा सा धूल
नजर आये
कहीं भी जूते पर
तो थोड़ा रुक जा
रुमाल फिरा
और जूता चमका
व्यक्तित्व की
एक झलक होता है
किसी का
चमकता हुआ जूता
हींग लगे ना फिटकरी
सबसे सस्ता भी
होता है ये तरीका
जूते पर
कर भरोसा
अब भी समय है
समझ जा
लिखने को
मत आजमा
किसी को नहीं
आता है
तेरे लिखे में
कोई मजा
एक बार अपनी
श्रीमती के
कहने को
भी तो आजमा
फिर देख
कैसे उठता है
लोगों के
दिल से धुआँ ।

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

स्पोक्समैन

पढ़ा लिखा होने से
कुछ हो ना हो
आदमी समझदार
बड़ा हो जाता है
कुछ नहीं कहता है
उसे अपने मुँह पर
हैरीसन का ताला
लगाना आ जाता है
सबसे ज्यादा होशियार
पढ़ा लिखा पढे़ लिखों
की एक जमात का
कहने सुनने की जिम्मेदारी
अपने आप ही उठाता है
बिना किसी से पूछे हुऎ
अपने मन की कहानियाँ
खुद ही बनाता पकाता है
अखबार में अपने वक्तव्य
पढे़ लिखों की तरफ से
भिजवाता है छपाता है
अखबार वाला भी
पढे़ लिखों से कुछ
पूछने नहीं आता है
पढे़ लिखों की बाते हैं
सोच कर कुछ भी
छाप ले जाता है
पढे़ लिखे ने क्या कहा
उनको अखबार में
छपी खबर से ही
पता चल पाता है
पढ़ालिखा उसको
चश्मा लगा कर पढ़ता है
इधर उधर देखता
कि उसे पढ़ते हुऎ तो
कोई नहीं देखता है
और सो जाता है
पढ़ा लिखा सब्जी
की तरह होता है
बडी़ मुश्किल से
पैदा हो पाता है
उसकी तरफ से बात
को कहने वाला
झाड़ की माफिक होता है
कहीं भी किसी मौसम में
बिना खाद के उग जाता है
ऎसे पढे़ लिखे को आजकल
स्पोक्समैन कहा जाता है ।

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

अस्थायी व्यवस्था

हर तीसरे साल
के बाद बदल दिया
जाता रहा है
मेरी सस्ते गल्ले की
दुकान का मालिक
बात है ना मजेदार

उसके बाद चाहे तो भी
रुक नहीं पाता है
कोई भी हो ठेकेदार

बहुत समय से जबकी
लग जाते हैं इस काम में
लोग सपरिवार

दुकान का ठेका
उठाना चाह कर भी
नहीं हो पाते हैं
सफल हर बार

कोशिश करते ही
रह जाते हैं बेचारे
छोटे किटकिनदार

सरकार के काम
करने के सरकारी
तरीके को खुद कहाँ
जानती है सरकार

कुछ ऎसा ही एक
नजारा देखने में
आया है इस बार

एक बादल बेकार
नाराज हो कर
फट गया जा कर
एक कोने में
कहीं सपरिवार

ठेका देने वाले को
खुद उठाना पड़ा
एक कटोरा और
जाना पड़ गया
दिल्ली दरबार

प्रश्न गंभीर हो गया
अचानक
कौन चलायेगा
इस दुकान
को इस बार
आपदा की
इस घड़ी में
कौन ढूँढने जाता
एक सस्ते गल्ले की
दुकान के लिये
एक अदद ठेकेदार

मजबूरी में तंत्र
हुआ बेचारा लाचार
पकड़ लाया एक
पकौड़ी वाला जो
बेच रहा था
आजकल
कहीं पर
अपने ही अचार

कहा है उससे
जब तक हम
देते नहीं
दुकान को
एक अपना
ठेकेदार

तुझे ही
उठाना है
गिराना है
शटर इसका
पर पकाना
नहीं पकौड़े यहाँ

नहीं आना
चाहिये ऎसा
कोई अखबार
में समाचार ।

बुधवार, 8 अगस्त 2012

दूध मत दिखा दही जमा

सब सब
देखते हैं
तू भी देख
कर आ
किसी ने
नहीं है
तुझको
कहीं रोका

थोड़ा
बतायेगा
चलेगा
सब कुछ
मत बता
हमको भी
तो रहता
ही होगा
कुछ पता

कोई नई
छमिंंया
देख कर
आया है
अगर तो
किस्सा
सुना जा
काले बादल
की तरह रोज
कड़कड़ाता
है यहाँ
कभी
रिमझिम
सी बारिश
की फुहार
भी दिखा जा

कभी कभी
कहीं पर
थोड़ी मेहनत
भी कर
लिया कर
कहाँ जा
रही है
दुनियाँ
नये जमाने
में देख
भी कुछ
लिया कर

देखते सुनते
सभी आते हैं
कुछ ना कुछ
इधर उधर
बनाते हैं
अपने सपने
अपने ख्वाब
भी मगर

एक तू है
लकीर को
पीटने वाला
फकीर बन
जाता है
जो जो देख
कर आता है
यहाँ ला
कर उलट
पलट जाता है

अरे कुछ
अच्छा होता
तो अखबार
में नहीं आ
रहा होता
साथ में
माला पहने
हुऎ तेरी
फोटो भी
दिखा
रहा होता

कब
सुधरेगा
अब तो
सुधर जा
लोगों से
कुछ
तो सीख
कब ये
सब सीखेगा

दूध देख
कर आता
है तो थोड़ा
जामुन भी
मिला
लिया कर
दही बना
कर चीनी
के संग भी
कभी किसी
को खिला
दिया कर
खाली खाली
दूध यहाँ
मत लाया कर
लाता ही है
किसी मजबूरी
में अगर
रख दिया कर
कम से कम
रोज तो ना
फैलाया कर ।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

नये टाईप का दांत

खाने के
अलग
और
दिखाने
के अलग
होते हैं दांत
एक हाथी
के पास

सब को
समझ में
आता है

मुझे
पता नहीं
क्या क्या
दिखाई
दे जाता है

अपने
आस पास
खाने के भी
देखता हूँ
दिखाने के भी
देखता हूँ

और
एक ऎसे
भी होते हैं
जो हाथी
के पास
होते ही
नहीं वैसे

छिपाने के
भी देखता
हूँ दांत

लीजिये खाने
में लगे हैं
खाने के  है
तो खायेंगे
बजायेंगे तो
नहीं दांत

दिखाने में भी
लगे हैं
सारी दुनिया
दिखावे में
लगी हुवी है
अब जिनके
पास होंगे
वो ही तो
दिखायेंगे दांत

पर कोई नहीं
दिखाता अपने
छुपाने वाले दांत

मुस्कुरा भी
नहीं पाता
खुल कर हंस
भी नहीं पाता

कहीं गलती से
दिख गये तो दांत

इसलिये चुप
चुप रहता है
कुछ नहीं
कहीं कहता है

पूछो तो मौनी है
बताता है
बस सामने वाले
की हरकतों से
बिलकुल भी नजर
नहीं हटाता है

सारा का सारा
ध्यान किसी के
मौन को कुरेदने
में लगाता है

अर्जुन की तरह
बस छुपाने वाला
दांत किसी तरह
पकड़ पाये
इसके लिये
हर समय कोई
ना कोई योजना
अपने दिमाग में
ऎसी घुमाता है

सामने वाला
और
ज्यादा शातिर
हो जाता है
समझ जाता है
कोई देखना
चाहता है उसका
छुपाने वाला दांत

किसी को पर
पता नहीं
चल पाता है
इसका दांत
उसकी कब
चबाता है
उसका दांत
इसकी कब
चबाता है

छिपाने वाला
दांत छिपा ही
रह जाता है
किसी को भी
नजर कहीं
नहीं आता है ।

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