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रविवार, 31 दिसंबर 2017

वर्ष पूरा हुआ एक और बनी रहे पालतू लोगों की फालतू होड़ कल आ रहा हूँ मैं अबे ओ कुर्सी छोड़

आईये
फिर से
शुरु हो जायें
गिनती करना
उम्मीदों की

उम्मीदें
किसकी कितनी
उम्मीदें कितनी
किससे उम्मीदें

हर बार
की तरह
फिर एक बार
मुड़ कर देखें


कितनी
पूरी हो गई

कितनी अधूरी
खुद ही रास्ते में
खुद से ही
उलझ कर
कहीं खो गई

आईये
फिर से उलझी
उम्मीदों को
उनके खुद के
जाल से
निकाल कर
एक बार
और सुलझायें

धो पोछ कर
साफ करें
धूप दिखायें

कुछ लोबान
का धुआँ
लगायें

कुछ फूल
कुछ पत्तियाँ
चढ़ायें

कुछ
गीत भजन
उम्मीदों के
फिर से
बेसुरे रागों
में अलापें
बेसुरे हो कर
सुर में
सुर मिलायें

आईये
फिर से
कमजोर
हो चुकी
उम्मीदों की
कमजोर
हड्डियों की
कुछ
पन्चगुण
कुछ
महानारयण
तेल से
मालिश
करवायें

आह्वान करें
आयुर्वेदाचार्यों का
पुराने अखाड़ों
को उखाड़ फेंक
नयी कुश्तियाँ
करवाने के
जुगाड़ लगवायें

आईये
हवा से हवा में
हवा मारने
की मिसाईलें
अपनी अपनी
कलमों में
लगवायें

करने दें
कुर्सीबाजों
को सत्यानाश
सभी का

खीज निकालें
खींस निपोरें
बेशरम हो जायें

करने वाले
करते रहें
मनमानी

कुछ ना
कर सकने का
शोक मनायें

बहुत
लिख लिया
‘उलूक’
पिछ्ले साल
अगले साल
के लिये
बकवासों की
फिर से
बिसात बिछायें

इकतीस
दिसम्बर
को लुढ़कें
होश गवायें

एक
साल बाद
उठ कर
कान
पकड़ कर
माफी माँग
फिर से
शुरु हो जायें।

(श्वेता जी के अनुरोध पर 2018 की शुभकामनाओं के साथ) :

चित्र साभार: http://tvtropes.org

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

हिमालय में अब सफेद बर्फ दूर से भी नजर नहीं आती है काले पड़ चुके पहाड़ों को शायद रात भर अब नींद नहीं आती है

कविता
करते करते
निकल पड़ा
एक कवि 
हिमालयों से

हिमालय की
कविताओं को
बोता हुआ

हिमालयी
पहाड़ों
के बीच से
छलछल करती
नदियों के साथ
लम्बे सफर में
दूर मैदानों को

साथ चले उसके
विशाल देवदार
के जंगल
उनकी हरियाली

साथ चले उसके
गाँव के
टेढ़े मेढे‌ रास्ते

साथ चली उसके
गोबर मिट्टी
से सनी
गाय के गोठ की
दीवारों की खुश्बूएं

और वो सब कुछ
जिसे समाहित
कर लिया था उसने
अपनी कविताओं में

ब्रह्म मुहूर्त की
किरणों के साथ
चाँदी होते होते
गोधूली पर
सोने में बदलते
हिमालयी
बर्फ के रंग
की तरह आज
सारी कविताएं
या तो बेल हो कर
चढ़ चुकी हैं
आकाश
या बन चुकी हैं
छायादार वृक्ष

बस वो सब
कहीं नहीं बचा
जो कुछ भी
रच दिया
था उसने

अपनी
कविताओं में


आज भी
लिखा जा
रहा है समय


पर कोई
कैसे लिखे

तेरी तरह
का जादू


वीरानी देख
रहा समय

वीरानी
ही लिखेगा


वीरानी को
दीवानगी

ओढ़ा कर
लिखा हुआ

भी दिखेगा
पर
उसमें तेरे
लिखे का

इन्द्रधनुष
कैसे दिखेगा


जब सोख
लिये हों
सारे रंग
आदमी की भूख ने

‘सुमित्रानन्दन पन्त’
हिमालय में अब
सफेद बर्फ
दूर से भी
नजर नहीं आती है

काले पड़ चुके
पहाड़ों को शायद
रात भर अब
नींद नहीं आती है

पुण्यतिथी पर
नमन और
श्रद्धाँजलि
अमर कविताओं
के रचयिता को
 ‘उलूक’ की ।

चित्र साभार: https://www.samanyagyan.com/famous-people/sumitranandan-pant-biography.php

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

‘उलूक’ की 2017 की सौवीं बकवास गालिब के नाम : अच्छा हुआ गालिब उस जमाने में हुआ और कोई गालिब हुआ

दो सौ के
ऊपर से
और बीस
बीत गये साल
कोई दूसरा
नहीं गालिब हुआ

अब तो समझा
भी दे गालिब
गालिब हुआ भी तो
कोई कैसे गालिब हुआ

बहुत शौक है
दीवानों को
गालिब हो जाने
का आज भी
जैसे आज ही
गालिब हुआ

लगता है
कभी तो हुआ
कुछ देर को
ये भी
गालिब हुआ
और वो भी
गालिब हुआ

समझ में
किसे आता है
पता भी
कहाँ होता है
अन्दाजे गालिब
हुआ तो क्या हुआ

बयाने गालिब
पढ़ लिया बस
उसी समय से
सारा सब कुछ
ही गालिब हुआ

ये हुआ गालिब
कुछ नहीं हुआ
फिर भी इस साल
का ये सौवाँ हुआ

तेरे जन्मदिन
के दिन भी कोई
नयी बात नहीं हुई
वही कुछ रोज का
धुआँ धुआँ हुआ

अब तो एक ही
गालिब रह गया है
जमाने में गालिब
कुछ भी कहना
उसी का
शेरे गालिब हुआ

‘उलूक’ की नीयत
ठीक नहीं हैं गालिब
क्या हुआ अगर कोई
इतना भी गालिब हुआ ।

चित्र साभार: http://youthopia.in/irshaad-ghalib/


 गालिब का मतलब : सं-पु.] - उर्दू के एक प्रख्यात कवि (शायर) का उपनाम। [वि.] 1. विजयी 2. प्रबल 3. ज़बरदस्त; बलवान 4. जिसकी संभावना हो; संभावित 5. 
दूसरों को दबाने या दमन करने वाला

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

हैप्पी क्रिसमस मेरी क्रिसमस जैसे कह रहे हों राम ईसा मसीह से आज कुछ ऐसी सोच जगायें


ईसा मसीह को
याद कर रही है
जहाँ सारी दुनियाँ
बहुत सी और भी
हैं महान आत्माएं

किस किस को
याद करें
किस किस को
भूल जायें

पराये अपने
होने लगे हैं
बहुत अच्छा है
आईये कुछ
मोमबत्तियाँ
प्यार के
इजहार
की जलायें
रोशनी प्रेम
और भाईचारे
की फैलायें

सीमायें
तोड़ कर सभी
चलो इसी तरह
किसी एक
दिन ही सही
मंशा आदमियत
की बनायें
आदमी हो जायें

सहेज लें
समय को
मुट्ठी में
इतना कि
अपने पराये
ना हो पायें

याद
आने लगे हैं
अटल जी
याद आ रहे हैं
मालवीय
याद आने
शुरु हो गये हैं
और भी अपने
आस पास के
आज एक नहीं
कई कई

न्यूटन जैसे
और भी हैं
इन्हीं
कालजयी
लोगों में
आज के दिन
जन्म लिये
महापुरुषों में

सभी
तारों को
एक ही
आकाश में
चाँद सूरज
के साथ
देखने की
इच्छा जतायें

पिरो लें
सभी
फूलों को
एक साथ
एक धागे में
एक माला
एक छोटी
ही सही
यादों को
सहेजने
की बनायें

याद आ रहे हो
बब्बा आज
तुम भी बहुत
इन सब के बीच में
तुम्हारी जन्मशती
के दिन हम सब
मिलकर सब के साथ
दिया एक यादों का
आज चलो जलायें

हैप्पी क्रिसमस
मेरी क्रिसमस
जैसे कह
रहे हों राम
ईसा मसीह से
आज कुछ ऐसी
सोच जगायें।

चित्र साभार: Shutterstock



स्व. श्री देवकी नन्दन जोशी
25/12/1917 - 12/02/2007

रविवार, 24 दिसंबर 2017

लिखने वाले को लिखने की बीमारी है ये सब उसके अपने करम हैं । वैधानिक चेतावनी: (कृपया समझने की कोशिश ना करें)

डूबेगी नहीं
पता है
डुबाने वाला
पानी ही
बहुत
बेशरम है

बैठे हैं
डूबती हुई
नाव में लोग

हर चेहरे पर
फिर भी नहीं
दिख रही है
कोई शरम है

पानी नाव
में ही
भर रहा है
नाव वालों के
अपने भी
करम हैं

डुबोने वाले को
तैरने वालों के भी
ना जाने क्यों
डूब जाने
का भरम है

अच्छाई से
परेशान होता है
बुराई पर
नरम दिखता है
दिखाने के लिये
थानेदार
बना बैठा है

थाने का हर
सिपाही भी
नजर आता है
जैसे बहुत गरम है

लिखा होता है
बैनर होता है
आध्यात्मिक
होता है

ईश्वरीय होता है
विश्वविद्यालय होता है
सब कुछ परम है

याद आ गयी
तो देखने चल दिये
पता चलता है
 कुछ भी नहीं है
बस एक बहुत
बड़ा सा एक हरम है

अजीब है रिवायते हैं
किसी को पता
भी नहीं होता है
क्या करम है
क्या कुकरम हैं

बस देखता
रहता है ‘उलूक’
दिन में भी अंधा है
रात की चकाचौंध
का उसपर भी
कुछ रहम है ।

आभार: गूगल

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

चल रहा है सिलसिला लिखने लिखाने का फिर फिर वही बातें नया तो अब वैसे भी कहीं कुछ होना ही नहीं है

लिखना
सीख ही
रहा है
अभी भी

कई सालों से
लिखने वाला

क्या
लिख रहा है

क्यों
लिख रहा है

अभी तो
पूछना
ही नहीं है

शेर गजल
कविता भी
पढ़ रहा है

लिखी लिखाई
बहुत सी कई

शेर सोचने
और गजल
लिखने की

अभी तो
हैसियत
ही नहीं है

मत बाँध लेना
उम्मीद भी
किसी दिन

नया कुछ
लिखे
देखने की

सूरतें सालों
साल हो गये हैं

कहीं भी
कोई भी
अभी तो
बदली
ही नहीं हैं

किताबों में
लिख दी
गयी हैं

जमाने भर
की सभी
बातें कभी के

किसलिये
लिखता है
खुराफातें

जो किताबों
तक अभी
भी पहुँची
ही नहीं हैं

कल
लिख रहा था
आज
लिख रहा है
कल भी
लिखने के लिये
आ जायेगा

होना जब
कुछ भी
नहीं है
तो लिखने
की भी
जरूरत
ही नहीं है

अच्छा नहीं है
लिये घूमना
खाली गिलास
खाली बोतलों
के साथ
लिखने के
लिये शराबें

‘उलूक’
कुछ ना कुछ
पी रहा है
हर कोई
अपने
हिसाब का

समझाता
हुआ
जमाने को

पीने
पिलाने की
कहीं भी अब
इजाजत
ही नहीं है ।

चित्र साभार: Childcare

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

जरूरी नहीं है कि लिखने वाला किसी को कुछ समझाने के लिये ही लिखना चाहता है क्योंकि हजूर यहाँ सबको सब समझ में आता है



लिखे हुऐ को
सात बार पढ़ कर

जनाब पूछ्ते हैं

ओये तू कहना
क्या चाहता है

साफ साफ
असली बात को
दो चार सीधे साधे
शब्दों में ही बता
कर क्यों नहीं जाता है

बात को लपेट कर
घुमा कर फालतू
की जलेबी बना कर
किसलिये लिखने को
रोज का रोज
यहाँ पर आ जाता है

सुनिये जनाब
जिसकी जितनी
समझ होती है
वो उतना ही तो
समझ पाता है

बाकि बचे का
क्या करे कोई
कूड़ेदान में ही
तो जा कर के
फेंका जाता है

ये भी सच है
कूड़ेदान पर
झाँकने के लिये
आज बस वो
ही आता है

जिसकी
समझ में
गाँधी की फोटो
के साथ लगा हुआ
एक झाड़ू से
सजा पोस्टर

और
उसको बनवाने
वाले की मंशा का
पूरा का पूरा खाँचा
आराम से घुस कर

साफ सफाई का
धंधा फैलाने के
मन्सूबे धीरे धीरे
पैर उठा कर
सपने के ऊपर
सपने को चढ़ाता है

कबाड़ी
कबाड़ देखता है
कबाड़ी
कबाड़ छाँटता है
कबाड़ी
कबाड़ खरीदता है
कबाड़ी
कबाड़ बेचता है

कबाड़ी
के हाथों से
होकर उसके
बोरे में पहुँचकर
चाहे धर्म ग्रंथ हो
चाहे माया मोह हो
सारा सब कुछ
कबाड़ ही हो जाता है

कबाड़ी
उसी सब से
अपनी रोजी चलाता है
भूख को जगाता है
रोटी के सपने को
धीमी आँच में
भूनता चला जाता है

इसी तरह का
कुछ ऐसा कबाड़
जो ना कहीं
खरीदा जाता है

ना कहीं
बेचा जाता है
ना किसी को
नजर आते हुऐ
ही नजर आता है

एक कोई
सरफिरा

उसपर
लिखना ही
शुरु हो जाता है

‘उलूक’
क्या करे
हजूरे आला
अगर कबाड़ पर
लिखे हुऐ उस
बेखुश्बूए
अन्दाज को
कोई खुश्बू
मान कर
सूँघने के लिये
भी चला आता है ।

चित्र साभार: http://www.maplegrovecob.org

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

पीछे की बहुत हो गयी बकवासें कुछ आगे की बताने की क्यों नहीं सीख कर आता है

मत नाप
बकवास को
उसकी लम्बाई
चौड़ाई और
ऊँचाई से

नहीं होती हैं
दो बार की
गयी बकवासें
एक दूसरे की
प्रतिलिपियाँ

बकवासें जुड़वा
भी नहीं होती हैं

ये भी एक अन्दाज है
हमेशा गलत निशाना
लगाने वाले का

इसे शर्त
मत मान लेना
और ना ही
शुरू कर देना
एक दिन
की बकवास
को उठाकर
दूसरे दिन की
बकवास के ऊपर
रखकर नापना

बकवास आदत
हो जाती हैं
बकवास खूँन में
भी मिल जाती हैं

बैचेनी शुरु
कर देती हैं
जब तक
उतर कर
सामने से लिखे
गये पर चढ़ कर
अपनी सूरत
नहीं दिखाती हैं

कविता कहानियाँ
बकवास नहीं होती है
सच में कहीं ना कहीं
जरूर होती हैं

लिखने वाले कवि
कहानीकार होते है
कुछ नामी होते हैं
कुछ गुमनाम होते हैं

बकवास
बकवास होती है
कोई भी कर
सकता है
कभी भी
कर सकता है
कहीं भी
कर सकता है

बकवासों को
प्रभावशाली
बकवास बना
ले जाने की
ताकत होना
आज समझ
में आता है
इससे बढ़ा
और गजब का
कुछ भी नहीं
हो सकता है
बकवास करने
वाले का कद
बताता है

कुछ समय
पहले तक
पुरानी धूल जमी
झाड़ कर
रंग पोत कर
बकवासों को
सामने लाने
का रिवाज
हुआ करता था

उसमें से कुछ
सच हुआ करता था
कुछ सच ओढ़ा हुआ
परदे के पीछे से
सच होने का नाटक
मंच के लिये तैयार
कर लिये गये का
आभासी आभास
दिया करता था

रहने दे ‘उलूक’
क्यों खाली खुद
भी झेलता है और
सामने वाले को
भी झिलाता है

कभी दिमाग लगा कर
‘एक्जिट पोल’ जैसा
आगे हो जाने वाला
सच बाँचने वाला
क्यों नहीं हो जाता है

जहाँ बकवासों को
फूल मालाओं से
लादा भी जाता है
और
दाम बकवासों का
झोला भर भर कर
पहले भी
और बाद में भी
निचोड़ लिया जाता है ।

चित्र साभार: http://www.freepressjournal.in

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

सारा सब कुछ अभी ही लिख देगा क्या माना लिख भी लेगा तो आगे फिर लिखने के लिये कुछ भी नहीं बचेगा क्या ?


रहने भी दे
हमेशा
खुद से ही
बहस मत
कर लिया कर

कुछ औरों का
लिखना भी
कभी तो देख
भी लिया कर

अपना अपना
भी लिख रहे हैं
लिखने वाले

 तू भी कभी
कुछ अपना ही
लिख लिया कर

इधर उधर
देखना
थोड़ी देर के
लिये ही सही

कभी आँखें ही
कुछ देर
के लिये सही
बन्द भी
कर दिया कर

कभी कुछ नहीं तो

हो भी
सकने वाला
एक सपना ही
लिख दिया कर

लिखे हुऐ कुछ में
समय कितनों के
लिखे में दिखता है

ये भी कभी कुछ
देख लिया कर

हमेशा
घड़ी देखकर
ही लिखेगा क्या

कभी चाँद तारे
भी देख लिया कर

सब का लिखा
घड़ी नहीं होता है

बता पायेगा क्या
कितने बज रहे हैं
अपने लिखे हुऐ
को ही देख कर कभी

रोज का ना सही
कभी किसी जमाने
के लिखे को
देखकर ही

समय उस समय
का बता दिया कर

घड़ी पर
लिखने वाले
बहुत होते हैं
घड़ी घड़ी
लिखने वाले
घड़ी लिख लें
जरूरी नहीं

कभी
किसी दिन
किसी की
घड़ी ना सही

घड़ी की
टिक टिक
पर ही कुछ
कह दिया कर

समय
सच होता है
सच लिखने
वाले को
समय दूर
से ही सलाम
कर देता है

समय
लिखने वाले
और समय
पढ़ने वाले
होते तो हैं
मगर
थोड़े से होते हैं

कभी समय
समझने वालों
को समझकर

समय पर
मुँह अँधेरे
भी उठ
लिया कर

अपनी
नब्ज अपने
हाथ में होती है

सब नाप
रहे होते हैं
थोड़े से
कुछ होते हैं
नब्ज दूसरों
की नापने वाले

उन्हें डाक्टर कहते हैं

कभी
किसी दिन
किसी डाक्टर
का आला ही
पकड़ लिया कर

‘उलूक’ देखने
सुनने लिखने
तक ठीक है
हर समय
फेंकना
ठीक नहीं है

औरों
को भी कभी
कुछ समय
के लिये
समय ही सही
फेंकने दिया कर ।

चित्र साभार: http://www.toonvectors.com

रविवार, 10 दिसंबर 2017

जानवर पैदा कर खुद के अन्दर आदमी मारना गुनाह नहीं होता है

किस लिये
इतना
बैचेन
होता है

देखता
क्यों नहीं है
रात पूरी नींद
लेने के बाद भी

वो दिन में भी
चैन की
नींद सोता है

उसकी तरह का ही
क्यों नहीं हो लेता है

सब कुछ पर
खुद ही कुछ
भी सोच लेना
कितनी बार
कहा जाता है
बिल्कुल
भी ठीक
नहीं होता है

नयी कुछ
लिखी गयी
हैं किताबें
उनमें अब
ये सब भी
लिखा होता है

सीखता
क्यों नहीं है
एक पूरी भीड़ से

जिसने
अपने लिये
सोचने के लिये
कोई किराये पर
लिया होता है

तमाशा देखता
जरूर है पर
खुश नहीं होता है

किसलिये
गलतफहमी
पाल कर
गलतफहमियों
में जीता है

कि तमाशे पर
लिख लिखा
देने से कुछ

तमाशा फिर
कभी भी
नहीं होता है

तमाशों
को देखकर
तमाशे के
मजे लेना
तमाशबीनों
से ही
क्यों नहीं
सीख लेता है

शिकार
पर निकले
शिकारियों को
कौन उपदेश देता है

‘उलूक’
पता कर
लेना चाहिये

कानून जंगल का
जो शहर पर लागू
ही नहीं होता है

सुना है
जानवर पैदा कर
खुद के अन्दर

एक आदमी को
मारना गुनाह
नहीं होता है ।

चित्र साभार: shutterstock.com

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

अचानक से सूरज रात को निकल लेता है फिर चाँद का सुबह सवेरे से आना जाना शुरु हो जाता है

जब भी कभी
सैलाब आता है
लिखना भी
चाहो अगर कुछ

नहीं लिखा जाता है

लहरों के ऊपर
से उठती हैं लहरें
सूखी हुई सी कई
बस सोचना सारा
पानी पानी सा
हो जाता है

इसकी बात से
उठती है जरा
सोच
एक नयी
उसकी याद
आते ही सब  
पुराना पुराना
सा हो जाता है

अचानक नींद से
उठी दिखती है
सालों से सोई
हुई कहीं
की एक भीड़


फिर से तमाशा
कठपुतलियों का
जल्दी ही कहीं
होने का आभास
आना शुरू

हो जाता है

जंक लगता नहीं है
धागों में पुराने
से पुराने कभी भी
उलझी हुई गाँठों
को सुलझाने में
मजा लेने वालों
का मजा दिखाना 

शुरु हो जाता है 

पुरानी शराबें
खुद ही चल देती हैं
नयी बोतल के अन्दर
कभी इस तरह भी
‘उलूक’
शराबों के मजमें
लगे हुऐ जब कभी
एक लम्बा जमाना
सा हो जाता है ।

चित्र साभार: recipevintage.blogspot.com

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

असली सब छिपा कर रोज कुछ नकली हाथ में थमा जाता है

सब कुछ
लिख देने
की चाह में
नकली कुछ
लिख दिया
जाता है

बहुत कुछ
असली लिखा
जाने वाला
कहीं भी नजर
नहीं आता है

कहीं नहीं
लिखा जाता
है वो सब जो

लिखने के लिये
लिखना शुरु
करने से पहले
तैयार कर
लिया जाता है

सारा सब कुछ
शुरु में ही कहीं
छूट जाता है
दौड़ने लगता है
उल्टे पाँँव
जैसे लिखने वाले
से ही दूर कहीं
भागना चाहता है

जब तक
समझने की
कोशिश करता है
लिखते लिखते
लिखने वाला

कलम पीछे
छूट जाती है
स्याही जैसे
फैल जाती है

कागज हवा में
फरफराना शुरु
हो जाता है
ना वो पकड़
में आता है ना
दौड़ता हुआ
खयाल कहीं
नजर आता है

कितनी बार
समझाया गया है
सूखने तो दिया कर
स्याही पहले दिन की

दूसरे दिन
गीले पर ही
फिर से लिखना
शुरु हो जाता है

कितना कुछ लिखा
कितना कुछ
लिखना बाकी है
कितना कुछ बिका
कितना बिकेगा
कितना और
बिकना बाकी है

हिसाब
लगाते लगाते
लिखने वाला
लेखक तो नहीं
बन पाता है
बस थोड़ा सा
कुछ शब्दों को
तोलने वाली मशीन
हाथ में लिये एक
बनिया जरूर
हो जाता है

कुछ नहीं किया
जा सकता है ‘उलूक’

देखते हैं एक
नये सच को
खोद कर
निकाल कर
समझने के
चक्कर में

रोज एक नया
झूठ बुनकर
आखिर कब तक
कोई हवा में
उसकी पतंग
बना कर उड़ाता है

पर सलाम है
उसको जो ये
देखने के लिये
हर बार

हर पन्ने में किनारे से
झाँकता हुआ फिर भी
कहीं ना कहीं जरूर
नजर आ जाता है ।

चित्र साभार: www.istockphoto.com

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

पन्ना एक सफेद सामने से आया हुआ सफेद ही छोड़ देना अच्छा नहीं होता है

बकवास का
हिसाब रखने
वाले को
पता होता है

उसने कब
किस समय
कहाँ और
कितना कुछ
कहा होता है

इस जमाने
के हिसाब से
कुछ भी
कहीं भी
कभी भी
कितना भी
कह कर
हवा में
छोड़ देना
अच्छा होता है

पकड़ लेते हैं
उड़ती हवाओं
में से छोड़ी
गयी बातों को
पकड़ लेने वाले

बहुत सारे
धन्धों के
चलने में
इन्ही सारी
हवाओं का
ही कुछ
असर होता है

गिन भी लेना
चाहिये फेंकी
गयी बातों को
उनकी लम्बाई
नापने के साथ

बहुत कुछ होता है
करने के लिये
ऐसी जगह पर
सारा शहर जहाँ
हर घड़ी आँखें
खोल कर खड़े
होकर भी सोता है

सपने बना कर
बेचने वाले भी
 इन्तजार करते हैं
हमेशा अमावस
की रातों का

चाँद भी बेसुध
हो कर कभी
खुद भी सपने
देखने के
लिये सोता है

‘उलूक’
तबियत के
नासाज होने
का कहाँ
किसे अन्दाज
आ पाता है

कब बुखार में
कब नींद में
और
कब नशे में

क्या क्यों और
किसलिये
बड़बड़ाता
हुआ सा कहीं
कुछ जब
लिखा होता है ।

चित्र साभार: Clipart Library

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

समय ही इश्क हो लेता है समय से जब इश्क होता है

ऐसा नहीं है कि
नहीं लिखे गये
कभी कुछ शब्द
इश्क पर भी

ऐसा भी नहीं है
कि इश्क अब
लिखने का मौजू
रहा ही नहीं है

इश्क बुढ़ाता है
कहा जाना भी
ठीक नहीं है

हाँ बदल लेता है
इश्क नजरिया अपना

उम्र ढलने के साथ
कमजोर होती
जाती है जैसे आँख

दिखता नहीं है
चाँद भी
उतना सुन्दर
तारे गिने भी
नहीं जाते हैं जब
बैठे हुऐ छत पर
रात के समय
अन्धेरे से
बातें करते करते

बहुत कुछ होता है
आस पास ही अपने
फैला हुआ
समेटने के लिये

खुद 
अपने लिये
कुछ कौढ़ियाँ
जमा कर
गिनते गिनते
गिनना भूल जाना
भी इश्क होता है

उम्र बदलती है
नजर बदलती है
इश्क भी
बदल लेता है

तितलियों
फूल पत्तियों
इंद्रधनुष
बादल कोहरे
पहाड़ बर्फ
नदी नालों
से होते हुऐ
इश्क
मुड़ जाता है

कब किस समय
पहाड़ी पगडंडियों
से अचानक उतर कर
बियाबान भीड़ में
अपने जैसे कई
मुखौटों से खेलते
चेहरों के बीच

पता चलता है तब
जब कहने लगती हैं
हवायें भी
फुसफुसाती हुई
इश्क इश्क
और
याद आने शुरु होते हैं
फिर से ‘उलूक’ को

जलाये गये
किसी जमाने में
इश्क से भरे
दिवाने से मुढ़े तुढ़े
ढेरी बने कुछ कागज

कुछ डायरियाँ
थोड़े से सूखे हुऐ
कुछ फूल
कुछ पत्तियाँ

और धुँधली सी
नजर आना
शुरु होती है
उसी समय
इश्क के कागज
से बनी एक नाव

तैरते हुऐ
निकल लेती है
जो बरसाती नाले में
और
बचा रह जाता है
गंदला सा
मिट्टी मिट्टी पानी

लिखने के लिये
बहता हुआ
थोड़ा सा
कुछ इश्क
समय के साथ ।

चित्र साभार: business2community.com

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

कुछ भी उलझा हुआ नहीं है ना रहस्यमयी है यूँ ही बहका देते हैं लोगों को कुछ लोग

थोड़े से
कुछ
बेवकूफ
भी होते हैं
कुछ लोग

समझना
चाहिये
नहीं
समझे को
दूसरों के
समझने
के लिये अगर
लिख कर छोड़
भी देते देते हैं
कुछ लोग

सबके घर
अलग अलग
होते हैं
रिवाज अलग
होते हैं
आदते अलग
होती हैं

सब को सब
दिखाई दे
जरूरी नहीं
होता है
चश्में अलग
अलग होते हैं

कुछ देखते
हैं अपने
हिसाब का
कुछ लोग

सब कुछ
देख कर भी
कुछ भी
नहीं देखते हैं
कुछ लोग

कुछ लोग
कुछ बच्चे से
भी होते हैं
कुछ सयाने
से भी होते हैं
कुछ लोग

जो होता है
आसपास
उसपर
गली के
कुत्ते भी
कान खड़े
कर के
भौंकते हैं

ये सब कुछ
भी नहीं देखते
हैं कुछ लोग

कभी लौकी
लिखा दिखता है
कभी कद्दू
लिखा नजर
आता है
लिखने में
कुछ लोगों के
लिखने वाला
कभी सब्जी
बेचने के लिये
नहीं आता है
पता नहीं
इतनी सी
बात किस लिये
नहीं समझ पाते
हैं कुछ लोग

शेरो शायरी करना
किस ने कह दिया
बुरी बात होती है

कुछ लोग
बुरी बात पर
बुरा मान कर
लिखते हैं
कुछ लोगों को
कभी बुरा
नहीं लगता है

ऐसा लगता है
हमेशा अपने
हनुमान की
टाँग पर ही
कुछ लिखते
हैं कुछ लोग

कुछ पढ़ देते हैं
कुछ भी
ऐसे भी होते
हैं कुछ लोग

पढ़ कर
पढ़े पर
फिर कुछ
अपनी बात
कुछ लिख
लिख कर
कह देते हैं
कुछ लोग

लिख देता है
कुछ भी
‘उलूक’
कभी भी
आकर यहाँ

नमन है
उन सबको
अपने सर पर
रख देते हैं
फिर भी उस
कुछ भी को
हमेशा ही
कुछ लोग

सब समझ
आता है
लोगों के
कहाँ जायेगें
कहाँ पढ़ेंगे
कहाँ जा कर
कहेंगे कुछ
पढ़े पर कुछ
पढ़े लिखे
कुछ लोग।

चित्र साभार : Quora


रविवार, 3 दिसंबर 2017

कभी कुछ भैंस पर लिख कभी कुछ लाठी पर भी

कभी सम्भाल
भी लिया कर
फुरसतें

जरूरी नहीं है
लिखना ही
शुरु हो जाना

खाली पन्नों को
खुरच कर इतना
भी कुरेदना
ठीक नहीं

महसूस नहीं
होता क्या
बहुत हो गया
लिखना छोड़
कभी कुछ कर
भी लिया जाये

पन्ने के
ऊपर पन्ना
पन्ने के
नीचे पन्ना
आगे पन्ना
पीछे पन्ना
कोई नहीं
पूछने वाला
कितने
कितने पन्ने

गन्ने के खेत में
कभी गिने हैं
खड़े होकर गन्ने

नहीं गिने
हैं ना
कोई नहीं
गिनता है

गन्ने की
ढेरियाँ होती हैं
उसमें से गुड़
निकलता है

पन्ने गिन
या ना गिन
ढेरियाँ पन्नों की
लग कर गन्ने
नहीं हो
जाने वाले हैं

कुछ भी
नहीं निकलने
वाला पन्नों से
निचोड़ कर भी

किताब जरूर
बना ले जाते हैं
किताबी लोग

किताबों से
दुकान बनती है

इस दुकान से
उस दुकान
किताबों के
ऊपर किताब
किताबों के
नीचे किताब
इधर किताब
उधर किताब
हो जाती हैं

किताबों की
खरीद फरोख्त
की हिसाब
की किताब
कई जगह
पायी जाती है

रोज की
कूड़ेदान से
निकाल धो
पोंछ कर
परोसी गयी
खबरों से
इतिहास नहीं
बनता है बेवकूफ

समझता
क्यों नहीं है
इतिहास
भैंस हो
चुका है
लाठी लिये
हाँकने भी
लगे हैं लोग

अभी भी वक्त है
सुधर जा ‘उलूक’

कुछ भैंस
पर लिख
कुछ लाठी पर
और कुछ
हाकने वालों
पर भी

आने वाले
समय के
इतिहास के
प्रश्न पत्र
उत्तर लिखे हुऐ
सामने से आयेंगे

परीक्षा देने वाले
से कहा जायेगा
दिये गये उत्तरों
के प्रश्न बनाइये
और अपने
घर को जाइये।

चित्र साभार: www.spectator.co.uk

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

एक और साल अपना दिसम्बर लिये सामने से नजर आता है

कितना
कुछ
यूँ ही छूट
जाता है

समय पर
लिखा ही
नहीं जाता है

चलते चलते
सड़क पर
अचानक
कुछ पक
पका जाता है

कहाँ रखो
सम्भाल कर

कलम कापी
रखने का
जमाना
याद आता है

लकीरें खींचना
आने ना आने
का सवाल
कहाँ उठता है

लकीरें खींचने
वाला शिद्दत
के साथ
हर पेड़ की
छाल पर
उसी की
शक्ल खोद
जाता है

किसी के
यहाँ भी होने
और उसी के
वहाँ भी होने
से ही जिसके
होने का मुरीद
जमाना हुआ
जाता है

जानते बूझते
हुऐ उसे
पूजा जाता है
किसी को वो
कहीं भी नजर
नहीं आता है

किसी का यहाँ
भी नहीं होना
और उसी का
वहाँ भी नहीं होना
उसके पूज्य होने
का प्रमाण
हो जाता है

दुर्भाग्य होता
है उसका जो
यहाँ का यहाँ
और
उसका भी
जो वहाँ का वहाँ
रहने की सोच से
बाहर  ही नहीं
निकल पाता है

दुनियाँ ऐसे
आने जाने
वालों के
पद चिन्हों
को ढूँढती है
जिन पर
चल देने वाला
बहुत दूर तक
कहीं पहुँचा
दिया जाता है

इधर से जाने
उधर से आने
उधर से जाने
इधर से आने
वालों को

खड़े खड़े
दूर से
आते जाते हुऐ

देखते रहने
वाले ‘उलूक’
की बक बक
चलती चली
जाती है

फिर से एक
और साल
इसी तरह
इसी सब में
निकलने के लिये
दिसम्बर का
महीना सामने
लिये खड़ा
हो जाता है ।

चित्र साभार: Can Stock Photo

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

आचमन ही सही कभी कर ही लिया कर

कभी तो
छोटा सा
कुछ लिख
लिखा कर

बात खत्म
कर लिया कर


बहुत समझदार
होते हैं
समझने वाले

इतनी सी बात
रोज ना भी सही
कम से कम
किसी एक
मंगलवार के
दिन ही सही
समझ लिया कर

सब समझते हैं
समझने वाले

नहीं समझ में
आती है जो भी
बात समझ में

लिखता है
उसी को खुद
समझने के लिये
लिख लिख कर
एक नहीं बार बार

किसी दिन
कभी कोई
बीच में उलझी
ऐसी ही बातों के

अपनी
एक कोई
खुद की
समझी हुई
बात को भी
बार बार
नहीं भी सही
बस एक बार
ही कभी
लिख लिया कर

व्यंग लेख
आलेख
कविता छंद
बंद खुला तंज
जैसा भी लगे
लिखने के बाद
लिखा हुआ तुझे
खुद ही अपना
लिखे हुऐ के
शीर्षक के ऊपर
नीचे आगे पीछे
बड़े छोटे
आड़े तिरछे
शब्दों में
जड़ दिया कर

कलाकारों को
कलाकारी
कलाकार की
की गयी
अच्छी तरह
से समझ
में आती है

आड़ी तिरछी
छोटी
रेखाओं से
बड़ी बड़ी
कई बातें
हवा हवा में ही
कह दी जाती हैं

तू भी प्रयास
कर लिया कर
ज्यादा नहीं
कुछ दिन
अभ्यास कर
लिया कर

नहीं कर
सकता है
इतना सा
भी अगर

कुछ
आमदेव या
सामदेव का
भोगा अभ्यास
ही सही

का स्मरण ही
कर लिया कर

ये भी बस में
नहीं अगर तेरे
‘उलूक’

अपने
आँख नाख
कान सारे
उन सभी
के समान
कर लिया कर

इंद्रियाँ
बस में कर
अपनी पसन्द
की सारी
सभी चीजें

जिन्हें कूड़ेदान
से तक
उठा उठा कर
जमा कर प्रयोग
करनी आती हैं
दुर्गंध सड़न
खुश्बुऐं
होती होंगी
शायद
लगता है
देखकर
उस समय

जब दो तीन
चार लाईनों में
कृष्ण बन चुके
आदमी के लिये

हर जुबाँ से
एक पूरी गीता
लिखी हुई
हर दीवार
सड़क पेड़ पर
चिपकी हुई
बहुत दूर से
अंधों को तक
नजर आती है

तू भी
आचमन
ही सही
कर ही
लिया कर।

चित्र साभार: blogger

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

दूरबीन सोच वाले कुछ कुछ ना कुछ पा जाते हैं

मजबूरियाँ
'आह' से
लेकर
'आहा'
तक की
होती हैं
कोशिश
करने वाले
भवसागर
पार कर
ही जाते हैं

खबर रोज
का रोज छपे
ताजी छपे
तभी तक
ठीक है
कुछ आदत
से मजबूर
होते हैं ठंडी
भी करते हैं
फिर धूप भी
दिखाते हैं

लिखना
मजबूरी
होती है
पढ़ना नहीं
होती है
रास्ते में
लिखे संदेश
आने जाने
वालों से
ना चाहकर
भी पढ़े जाते हैं

दो चार
कहते ही हैं
'वाह'
देखकर
दीवारों पर
बने चित्रों पर
बहुत होता है
कुछ ही सही
होते तो हैं जो
सब कुछ
समझ जाते हैं

'वाह' की आरजू
होती भी है
लिखने वाले को
समझ गये हैं
या नहीं समझे हैं
भी समझ में
आ जाता है

टिप्प्णियों की भी
नब्ज होती है

लिखने
पढ़ने वाले
चिकित्सक
साहित्यकार
नाप लेते हैं
कलम से ही
अपनी एक
आला बना
ले जाते हैं

लिखे गये की
कुन्जियाँ भी
उपलब्ध होती
हैं बाजार में

पुराने लिखे
लिखाये को
बहुत से लोग
कक्षाओं में
पढ़ते पढ़ाते हैं

कवि कविता
अर्थ प्रश्न और
उत्तर बिकते हैं
बने बनाये
दुकानों में
जिसे पढ़कर
परीक्षा देकर
पास फेल होने
वाले को मिलती
हैं नौकरियाँ
बताने वालों की
मजबूरी होती है
लिखे लिखाये
की ऊँच नीच
कान में चुपचाप
बता कर
चले जाते हैं

नौकरी कविता
नहीं होती है
किताबों में
सिमटे हुऐ
लिखे हुऐ और
लिखने वाले के
इतिहास भी
नहीं होते हैं

दो चार
लिखते ही हैं
सच अपने
आस पास के
जिनके बारे में
कुछ भी नहीं
लिखने वाले
लिख रहा है
लिख दिया है
की हवा
फैलाते हैं

सच ही है
हो तो रहा है
लिखना
है करके
कुछ भी
लिख
लिया जाये
लिखे गये और
हो रहे में
कोई रिश्ता
होना तो चाहिये
चिल्ला चिल्ला
कर बताते हैं

गुड़ गुरु लोग
अपनी अपनी
बनायी गयी
शक्करों को
पीठ थपथपा कर
मंत्र सच्चाई का
पढ़ा ले जाते हैं

दुनियाँ जहाँ
‘वाह’
पर लिख रही है

अपनी मर्जी से
अपनी मर्जी
लिखते चलने वाले
बेवकूफ
‘उलूक’ की
‘आह’
पर लिखने
की आदत
ठीक नहीं है

हर समय
अपनी
और अपने
घर की बातें
गलत बात है
कभी कभी
चाँद या मंगल
की बातें भी तो
लिखी जाती हैं

घर की बात
करने वाले
अपने घर में
रह जाते हैं
दूरबीन सोच
के लोग ही
घर गली
मोहल्ले शहर
रोटी कपड़ा
मकान और
पाखाने की
सोच से बाहर
निकल पाते हैं

कुछ
कुछ ना कुछ
पा जाते हैं
कुछ
तर जाते हैं
कुछ
अमर
हो जाते हैं ।

चित्र साभार : http://www.geoverse.co.uk

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