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बुधवार, 24 मई 2017

कोशिश करें लिखें भेड़िये अपने अपने अन्दर के थोड़े थोड़े लिखना आता है सब को सब आता है

कुछ
कहने का
कुछ
लिखने का
कुछ
दिखने का
मन किसका
नहीं होता है

सब चाहते हैं
अपनी बात
को कहना
सब चाहते हैं
अपनी
बात को
कह कर
प्रसिद्धि के
शिखर तक
पहुँच कर
उसे छूना

लिखना
सब को
आता है
कहना
सब को
आता है

लिखने
के लिये
हर कोई
आता है
अपनी बात
हर कोई
चाहता है
शुरु करने
से पहले ही
सब कुछ
सारा बस

मन की बात
जैसा कुछ
हो जाता है

ऐसा हो जाना
कुछ अजूबा
नहीं होता है

नंगा हो जाना
हर किसी को
आसानी से
कहाँ आ
पाता है

सालों
निकल
जाते हैं
कई सालों
के बाद
जाकर
कहीं से
कोई निकल
कर सामने
आता है

कविता
किस्सागोई
भाषा की
सीमाओं
को बांधना
भाषाविधों
को आता है

कौन रोक
सकता है
पागलों को
उनको
नियमों
में बाँधना
किसी को
कहाँ
आता है

पागल
होते हैं
ज्यादातर
कहने वाले

मौका
किसको
कितना
मिलता है
किस
पागल को
कौन पागल
लाईन में
आगे ले
जाता है

‘उलूक’
लाईन मत
गिना कर
पागल मत
गिना कर

बस हिंदी
देखा कर
विद्वान
देख कर
लाईन में
लगा
ले जाना
बातों की
बात में
हमेशा ही
देखा
जाता है ।

चित्र साभार:

शनिवार, 20 मई 2017

खाली पन्ने और मीनोपोज

लोग
खुद के
बारे में
खुद को
बता रहे
हों कहीं

जोर जोर से
बोलकर
लिखकर
बड़े बड़े
वाक्यों में
बड़े से
श्याम पट पर
सफेद चौक
की बहुत लम्बी
लम्बी सीकों से

लोग
देख रहे हों
बड़े लोगों के
बड़े बड़े
लिखे हुऐ को
श्याम पट
की लम्बाई
चौड़ाई को
चौक की
सफेदी के
उजलेपन को भी

बड़ी बात
होती है
बड़ा
हो जाना
इतना बड़ा
हो जाना
समझ में
ना आना
समझ
में भी
आता है
आना
भी चाहिये
जरूरी है

कुछ लोग
लिखवा
रहे हों
अपना बड़ा
हो जाना
अपने ही
लोगों से
खुद के
बारे में
खुद के
बड़े बड़े
किये धरे
के बारे में
लोगों को
समझाने
के लिये
अपना
बड़ा बड़ा
किया धरा

शब्द वाक्य
लोगों के भी हों
और खुद के भी
समझ में आते हों
लोगों को भी
और खुद को भी

आइने
के सामने
खड़े होकर
खुद का बिम्ब
नजर आता हो
खुद को और
साथ में खड़े
लोगों को
एक जैसा
साफ सुथरा
करीने से
सजाई गयी
छवि जैसा
दिखना
भी चाहिये
ये भी जरूरी है

इन लोग
और
कुछ लोग
से इतर

सामने
से आता
एक आदमी
समझाता हो
किसी
आदमी को

जो वो
समझता है
उस आदमी
के बारे में

समझने वाले के
अन्दर चल रहा हो
पूरा चलचित्र
उसका अपना
उधड़ा हुआ हो
उसको खुद
पानी करता
हुआ हो
बहुत बड़ी
मजबूरी 
है

कुछ भी हो

तुझे क्या
करना है
‘उलूक’

दूर पेड़ पर
बैठ कर
रात भर
जुगाली कर
शब्दों को
निगल
निगल कर
दिन भर

सफेद पन्ने
खाली छोड़ना
भी मीनोपोज
की निशानी होता है

तेरा इसे समझना
सबसे ज्यादा
जरूरी 
है
बहुत जरूरी है ।

चित्र साभार: People Clipart

बुधवार, 10 मई 2017

जमीन पर ना कर अब सारे बबाल सोच को ऊँचा उड़ा सौ फीट पर एक डंडा निकाल

पुराने
जमाने
की सोच
से निकल

बहुत
हो गया
थोड़ा सा
कुछ सम्भल

खाली सफेद
पन्नों को
पलटना छोड़

हवा में
ऊँचा उछल
कर कुछ गोड़

जमीन पर
जो जो
होना था
वो कबका
हो चुका
बहुत हो चुका

चुक गये
करने वाले
करते करते
दिखा कर
खाया पिया
रूखा सूखा

ऊपर की
ओर अब
नजर कर
ऊपर की
ओर देख

नीचे जमीन
के अन्दर
बहुत कुछ
होना है बाकि
ऊपर के बाद
समय मिले
थोड़ा कुछ
तो नीचे
भी फेंक

किसी ने नहीं
देखना है
किसी ने नहीं
सुनना है
किसी ने नहीं
बताना है

अपना
माहौल
खुद अपने
आप ही
बनाना है

सामने की
आँखों से
देखना छोड़

सिर के पीछे
दो चार
अपने लिये
नयी आँखें फोड़

देख खुद को
खुद के लिये
खुद ही

सुना
जमाने को
ऊँचाइयाँ
अपने अन्दर
के बहुत उँचे
सफेद
संगमरमरी
बुत की

आज मिली
खबर का
‘उलूक’
कर कुछ
खयाल

जेब में
रखना छोड़
दे आज से
अपना रुमाल

सौ फीट
का डंडा
रख साथ में
और कर
कमाल

लहरा सोच
को हवा में
कहीं दूर
बहुत दूर
बहुत ऊँचे

खींचता
चल डोर
दूर की
सोच की
बैठ कर
उसी डन्डे
के नीचे
अपनी
आँखें मींचे ।


चित्र साभार: http://www.nationalflag.co.za

बुधवार, 3 मई 2017

समय गवाह है पर

समय गवाह है
पर गवाही
उसकी किसी
काम की
नहीं होती है

समय साक्ष्य
नहीं हो पाता है
बिना बैटरी की
रुकी हुयी
पुरानी पड़
चुकी घड़ियों
की सूईयों का

अब इसे
शरम कहो
या बेशर्मी

कबूलने में
समय के साथ
सीखे हुऐ झूठ
को सच्चाई
के साथ

क्या किया जाये
सर फोड़ा जाये
या फूटे हुऐ
समय के टुकड़े
एकत्रित कर
दिखाने की
कोशिश
की जाये

समझाने को
खुद को
गलती उसकी
जिसने
सिखाया गलत

समय के
हिसाब से
वो सारा
गलत

हस्ताँतरित
भी हुआ
अगली पीढ़ी
के लिये

पीढ़ियाँ आगे
बढ़ती ही हैं
जंजीरे समय
बाँधता है

ज्यादातर
खोल लेते हैं
दिखाई देती है
उनकी
उँचाइयाँ

जहाँ गाँधी
नहीं होता है

गाँधी होना
गाली होता है
बहुत छोटी सी

कोई किसी को
छोटी गालियाँ
नहीं देता है

ऊपर पहुँचने
के लिये बहुत
जरूरी होता है

समय के
साथ चलना
समय के साथ
समय को सीखना
समय के साथ
समय को
पढ़ लेना
और समझ कर
समय को
पढ़ा ले जाना

गुरु मत बनो
‘उलूक’
समय का

अपनी
घड़ी सुधारो
आगे बड़ो
या पीछे लौट लो

किसी को
कोई फर्क
नहीं पड़ता है

समय समय
की कद्र
करने वालों
का साथ देता है

जमीन पर
चलने की
आदत ठीक है

सोच
ठीक नहीं है

जमाना सलाम
उसे ही ठोकता है

जिसकी ना
जमीन होती है

और जिसे
जमीन से
कोई मतलब
भी नहीं होता है ।

चित्र साभार: Can Stock Photo

रविवार, 30 अप्रैल 2017

समझदारी है लपकने में झपटने की कोशिश है बेकार की “मजबूर दिवस की शुभकामनाएं”

पकड़े गये
बेचारे
शिक्षा
अधिकारी
लेते हुऐ
रिश्वत
मात्र पन्द्रह
हजार की

खबर छपी है
एक जैसी है
फोटो के साथ है
मुख्य पृष्ठ पर है
इनके भी है
और
उनके भी है
अखबार की

चर्चा
चल रही है
जारी
रहेगी बैठक

समापन की
तारीख रखी
गयी है अगले
किसी रविवार की

खलबली मची है
गिरोहों गिरोहों
बात कहीं भी
नहीं हो रही है
किसी के भी
सरदार की

सुनने में
आ रहा है
आयी है कमी
शेयर के
दामों में
रिश्वत के
बाजार की

यही हश्र
होता है
बिना
पीएच डी
किये हुओं का

उसूलों को
अन्देखा
करते हैं

फिक्र भी
नहीं
होती है
जरा सा भी
इतने
फैले हुऐ
कारोबार की

अक्ल
के साथ
करते हैं
व्यापार
समझदार
उठाईगीर

उठाते हैं
बहुत थोड़ा
सा रोज
अँगुलियों
के बीच

मुट्ठी नहीं
बंधती है
सुराही के
अन्दर कभी

किसी भी
सदस्य की
चोरों के
मजबूत
परिवार की

सालों से
कर रहे हैं
कई हैं

हजारों
पन्द्रह
भर रहे हैं

गागर भरने
की खबर
पहुँचती नहीं

फुसफुसाती
हुई डर कर
मर जाती है

पीछे के
दरवाजे में
कहीं आफिस
में किसी
समाचार की

उबाऊ ‘उलूक’
फिर ले कर
बैठा है एक
पकाऊ खबर

मजबूर दिवस
की पूर्व संध्या
पर सोचता हुआ

मजबूरों के
आने वाले
निर्दलीय एक
त्यौहार की ।

चित्र साभार: Shutterstock

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

लाश कीड़े और चूहों की दौड़

एक
सड़ रही
लाश को
ठिकाने लगा
रहे कीड़ों में

कुछ कीड़े
ऐसे भी
होते हैं
जो लाश के
बारे में
सोचना
शुरु कर
देते हैं
लाश को
दर्द नहीं
होता है
साले
कामचोर
होते हैं

आदत होती है
ऐसे कीड़ों की
ठेके लेना
अच्छाई के
संदेशों के बैनर
बनाने की

कीड़े
चूहा दौड़
में माहिर
होते हैं

जानते हैं
चूहों की
दौड़ को
दूर से
देखकर
उसपर
टिप्पणी
करने वाले
चूहे को कोई
भाव नहीं देता है

दौड़ में
शामिल होना
जरूरी होता है
चूहा होने
के लिये

अपने
आसपास की
हलचलों को
समझना बूझना
और फिर उसपर
कुछ कहने वाले
कुछ बेवकूफ चूहों
का काम होता है

चूहा दौड़
इसलिये
नहीं होती है
कि किसी को
कुछ जीतना
होता है

चूहा अपने
अगल बगल
आगे पीछे
दौड़ते हुऐ
चूहों को
देख कर
खुश होता है

और फिर
और जोर से
ताकत लगा कर
खुद भी दौड़ता है

रोज निकलते हैं
परीक्षाफल
चूहा दौड़ के

जीतने वाले
चूहे ही होते हैं

चूहे खुश होते हैं
फिर शुरु कर
देते हैं दौड़

क्योंकि चूहे
जीते होते हैं

लाश को नोचते
कीड़े अपना काम
कर रहे होते हैं

कीड़ों के भी
गिरोह होते हैं

‘उलूक’ समझ ले
दूर से बैठकर
तमाशा देखने
वाले कीड़े
कामचोर
कीड़े होते हैं

लाश के बारे में
सोचते हैं
और मातम
करते हैं
बेवकूफ होते  हैं
और रोते हैं । 


चित्र साभार: Kill Clip Art Illustrations.

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

चिकने घड़े चिकने घड़े की करतूत के ऊपर बैठ कर छिपाते हैं

अचानक
हवा चलनी
बन्द हो
जाती है

साँय साँय
की आवाज
सारे जंगल
से गायब
हो जाती है

कितनी भी
सूईंयाँ गिरा
ले जाये कोई
रास्ते रास्ते

आवाज
जरूर होती
होगी इतनी
खामोशी में

पर
कान तक
पहुँचने
पहुँचने तक
पता नहीं
चलता है

कैसे किस
सोख्ते में
सोख ली
जाती है

ढोलचियों
के खुद के
रोजाना
खुद के लिये
अपने हाथों
से ही पीटे
जाने वाले
ढोल सारे
लटके हुऐ
कहीं नजर
आते हैं

मातम मना
रहे हों जैसे
सारे मिल
जुल कर
कुछ इसी
तरह का
अहसास
कराते हैं

शेरों के
मुखौटे भी
नजर आते
हैं गर्दनों से
पीछे की
ओर लटके हुऐ

सारे गधे
गधों के
कान के
पीछे कुछ
फुसफुसाते
हुऐ पाये
जाते हैं

ये बात
कोई नयी
नहीं होती है

ऐसी बात
भी नहीं है
कि हमेशा
ही होती है

बस कभी
हजार दो
हजार
बार की
हरकतों
के बीच
कहीं

कोई एक
दो गिरोह
के साथी
अपने ही
घर की
थालियों
की रोटियाँ
छिपाते
हुऐ पकड़े
जाते हैं

कोई सजा
किसी को
नहीं होती है

अपनी
सरकार
होती है
इन्ही में से
किसी को
पुरुस्कार
बाँटे जाते हैं

खामोशी भी
कुछ दिनों
की होती है

चिकने घड़े
भी कहाँ
किसी के
हाथ में
आते हैं

शोर नहीं
होता है
कुछ देर में
फुसफुसाने
वाले भी
अपने अपने
घरों को
चले जाते हैं

हवा की
मजाल है
की रुक सके
ज्यादा देर तक

पेड़ जल्दी ही
साँय साँय
करना शुरु
हो जाते हैं

‘उलूक’
रोक लेता है
थूक अपना
अपने गले के
बीच में ही कहीं

सारे मुखौटे
पीठ के पीछे
से निकल कर

गधों के चेहरों
पर वापस
फिर से चिपके
हुऐ नजर आते हैं

उत्सव फिर
शुरु होते हैं
जश्न मनाते हुऐ
बेशरम ठहाके
भी साथ
में लगाते हैं।

चित्र साभार: fallout.wikia.com

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

विश्वविद्यालय बोले तो ? तेरे को क्या पड़ी है रे ‘उलूक’

जे एन यू
बनाने
की बात
करते
करते
स्टेशन
आ गया

वो उतरा
और
सवार
हो गया
उल्टी दिशा
में जाती
हुई ट्रैन में

शायद वो
दिशा
आक्स्फोर्ड
की
होती होगी

क्योंकि
अखबार वाला
बता रहा था
कुछ ऐसा ही
बनने वाला है

और
उसे बताया
गया है

जे एन यू
बनाने की
बात कहना
बहुत बड़ी
भूल थी
उनकी

ये अहसास
चुनाव के
पारिणामों के
आते ही
हो गया 
है

तीन साल
के बाद
अखबार के
पन्ने पर
एक नयी
तस्वीर
होती है

एक नये
आदमी की

और
एक नये
सपने की
बात

जिसमें
ताजमहल
जैसा कुछ
होता है

पिछले
तीन साल
पहले
अखबार ने
बताया था

बहुत उँचाइयों
पर ले जाने
वाला कोई
आया है

वही उँचाइयाँ
अब कैम्ब्रिज
बन गई हैं

किसी और
जगह के
किसी गली
के एक
बने बनाये
मकान की

लेकिन आदमी
आक्स्फोर्ड को
आधा बना कर
कैम्ब्रिज पूरा
करने पर
जुट गया है

सरकारें
बदलती हैं

झंडा बदल
कर कुछ भी
बदल सकता
है कोई भी

‘उलूक’
कभी तो
थोड़ा सा
कुछ ऐसी
बात
किया कर

जो किसी के
समझ में आये

सब कुछ
होता है
पाँच साल
में वहाँ

और
तीन साल
में यहाँ

तुझे आदत
है काँव काँव
करने की
करता चल

अभी एक
नया आया है
तीन साल
के लिये

उसे भी
कुछ
बनाना है
वो भी तो
कुछ बनायेगा

या
कौवे की
आवाज वाले
किसी उल्लू
की तरफ
देखता
चला जायेगा?

चित्र साभार: Southern Running Guide

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

बिना डोर की पतंग होता है सच हर कोई लपेटता है अपनी डोर अपने हिसाब से


सोचने
सोचने तक
लिखने
लिखाने तक
बहुत दूर
चल देता है
सोचा हुआ

भूला
जाता है
याद नहीं
रहता है
खुद ने
खुद से
कुछ कहा
तो था

सच के
बजूद पर
चल रही
बहस
जब तक
पकड़ती
है रफ्तार

हिल जाती है
शब्द पकड़ने
वाली बंसी

काँटे पर
चिपका हुआ
कोई एक
हिलता हुआ
कीड़ा

मजाक
उड़ाता है
अट्टहास
करता हुआ

फिर से
लटक
जाता है
चुनौती दे
रहा हो जैसे

फिर से
प्रयास
करने की

पकड़ने की
सच की
मछली को
फिसलते हुऐ
समय की
रेत में से

बिखरे हुऐ हैं
हर तरफ हैं
सच ही सच हैं

झूठ कहीं
भी नहीं हैं

आदत मगर
नहीं छूटती है
ओढ़ने की
मुखौटे सच के

जरूरी भी
होता है
अन्दर का
सच कहीं
कुढ़ रहा
होता है

किसने
कहा होता है
किस से
कहा होता है

जरूरत ही
नहीं होती है
आईने के
अन्दर का
अक्स नहीं
होता है

हिलता है
डुलता है
सजीव
होता है

सामने से
होता है
सब का
अपना अपना
बहुत अपना
होता है

सच पर
शक करना
ठीक नहीं
होता है

‘उलूक’

कोई कुछ
नहीं कर
सकता है
तेरी फटी
हुई
छलनी का

अगर
उसमें
थोड़ा सा
भी सच
दिखाने भर
और
सुनाने भर
का अटक
नहीं रहा
होता है ।

चित्र साभार: SpiderPic

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

फैसले के ऊपर चढ़ गई अधिसूचना एक पैग जरा और खींच ना

उच्च न्यायालय
राष्ट्रीय राज मार्ग
शटर गिराये
शराब की दुकानें
पता नहीं क्यों
अबकि बार

शहर की
बदनाम गली
गली से सटी
स्कूल की
चाहरदीवार


दोनों के बीच
में फालतू में
तनी खड़ी
बेकार
बेचती बाजार

बाजार में
फड़बाजों का शोर

आलू बीस के
ढाई किलो
आलू बीस
के तीन किलो
ले लो जनाब ले लो

मौका हाथ से
निकल जायेगा
कल तक सारा
आलू खत्म
हो जायेगा
फिर भी गरीब
खरीदने को
नहीं तैयार

शराब की
किल्लत की मार

सड़क पर
लड़खड़ाते
शाम के समय
घर को वापस जाते
दिहाड़ी मजदूर

जेब पहले से
ज्यादा हलकी
चौथाई के पैसे
की जगह
पूरे के पैसे
देने को मजबूर

चुनाव में पिया
धीरे धीरे
उतरता हुआ नशा
पहाड़ के जंगलों में
जगह जगह बिखरी
खाली बोतलें
पता नहीं चला
अभी तक
पिलाने वाले
और पीने वाले
में से कौन फंसा

पुरानी सरकार
की पुरानी बोतलों
का पुराना पानी
नयी सरकार की
नयी बोतलों
की चढ़ती जवानी

अभी अभी पैदा
हुये विकास की
दौड़ती
कड़क सड़क
को भड़कते हुऐ
लचीला करती
अधिसूचना

राष्ट्रीय राजमार्गों
के खुद के
रंगीन कपड़ों को
उनका
खुद ही नोचना

जीभ से अपने ही
होंठों को खुद ही
तर करता

शराफत की मेज
में खुली विदेशी
सोचता ‘उलूक’

चार स्तम्भों को
एक दूसरे को
नोचता हुआ
आजकल सपने
में देखता ‘उलूक’

चित्र साभार: The Sanctuary Model

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

खेल भावना से देख चोर सिपाही के खेल

वर्षों से
एक साथ
एक जगह
पर रह
रहे होते हैं

लड़ते दिख
रहे होते हैं
झगड़ते दिख
रहे होते हैं

कोई गुनाह
नहीं होता है
लोग अगर
चोर सिपाही
खेल रहे होते हैं

चोर
खेलने वाले
चोर नहीं हो
रहे होते हैं
और
सिपाही
खेलने वाले भी
सिपाही नहीं
हो रहे होते हैं

देखने वाले
नहीं देख
रहे होते हैं
अपनी आँखें

शुरु से
अंत तक
एक ही लेंस से
उसी चीज को
बार बार

अलग अलग
रोज रोज
सालों साल
पाँच साल

कई बार
अपने ही
एंगल से
देख रहे
होते हैं

खेल खेल में
चोर अगर कभी
सिपाही सिपाही
खेल रहे होते है

ये नहीं समझ
लेना चाहिये
जैसे चोर
सिपाही की
जगह भर्ती
हो रहे होते हैं

खेल में ही
सिपाही चोर
को चोर चोर
कह रहे होते है

खेल में ही
चोर कभी चोर
कभी सिपाही
हो रहे होते हैं

खबर चोरों के
सिपाहियों में
भर्ती हो जाने
की अखबार
में पढ़कर

फिर
किस लिये
‘उलूक’
तेरे कान
लाल और
खड़े हो
रहे होते हैं

खेल भावना
से देख
खेलों को
और समझ
रावणों में ही
असली
रामों के
दर्शन किसे
क्यों और कब
हो रहे होते हैं

ये सब खेलों
की मायाएं
होती हैं

देखने सुनने
पर न जा
खेलने वालों
के बीच और
कुछ नहीं
होता है
खेल ही हो
रहे होते हैं ।

चित्र साभार: bechdo.in

बुधवार, 29 मार्च 2017

चल शुरू हो जा

लिखना
जरूरी है

पढ़ने
वालों
के लिये
मत

रुक ना

लिख
कुछ भी

काम
तमाम

कर ना

चल
शुरू होजा

जाड़े
निकल
चुके हैं
गरमी
शुरु हो
चुकी है

अब
फैल कर

लिख ना

चल
शुरू हो जा

जितना
सिकुड़ना
था जिसको
वो सिकुड़
चुका है

जितना
उखड़ना
था जिसको
वो उखड़
चुका है

मन
करता है
तेरा
उड़ने का
तो किसने
रोका है

उड़ ना

चल
शुरू हो जा

सबके वो
पहुँच चुके
हैं वहाँ
जहाँ
पहुँचना
था उनको

अब
किसका
क्या होगा

खाली पीली
में गिनती

मत गिन ना

सपने उनके
तुझे देखने
हैं किसलिये

दिन में
तारे गिन ना

चल
शुरू हो जा

सबकी
अपनी
ढपली है
सबके
अपने
राग हैं

किसी
को लगती
है मिर्ची
किसी को
लगती आग है

सारे ठंडे
कूल कूलों
को गिन ना

चल
शुरू हो जा

कुछ
कर मत
बस
पूरे दिन
सुबह से
लेकर
शाम तक
जप मंत्र
किसी
मनुष्य के

वीडियो
बना कर
फेस बुक
में डाल कर

लाईक
गिन ना

चल
शुरू हो जा

विद्वानों
को
सलाम कर
मूर्खों का
कत्ले
आम कर

जरूरी
होता है
देखना
प्रमाणपत्र
विद्वता का
किसने दिया
होता है

रहने
दे ना

अपना
काम कर

मूर्ख बनने
का अपना
मजा है

बन ना

चल
शुरू हो जा

बहुत कुछ
समझाते हैं

बहुत कुछ
बहुत
जगह पर
बहुत
सारे लोग

अपनी
अपनी
खुजली
सबको
खुजलानी
होती है

तू भी
अपनी
खुजला

अपना
काम

कर ना 


चल
शुरू हो जा ।

चित्र साभार: http://www.clipartkid.com/owl-writing-clipart-writing-owl-teacher-DiXTNs-clipart/

बुधवार, 22 मार्च 2017

बेशरम होता है इसीलिये बेशर्मी से कह भी रहा होता है

शायद
पता नहीं
होता है
दूर देखने
की आदत
नहीं
डाल रहा
होता है

देख भी
नहीं रहा
होता है


गिद्ध होने
का बहुत
ज्यादा
फायदा
हो रहा
होता है

आस पास
के कूड़े
कचरे को
सूँघता ही
फिर रहा
होता है

खुश्बुओं की
बात कभी
थोड़ी सी भी
नहीं कर
रहा होता है

लाशों के
बारे में
सोचता
फिर रहा
होता है

कहीं भी
कोई भी
मरा भी
नहीं
होता है

हर कोई
जिंदा
होता है
घूम रहा
होता है

सब कह
रहे होते हैं
सब को बता
रहे होते हैं
सब कुछ
ठीक हो
रहा होता है

बेशरम
बस एक
‘उलूक’
ही
हो रहा
होता है

रात को
उठ रहा
होता है
फटी आँखों
से देख
रहा होता है

बेशरम
हो रहा
होता है
बेशर्मी से
कहना
नहीं कहना
सारा
सभी कुछ
कह रहा
होता है ।

चित्र साभार: Tumblr

शनिवार, 18 मार्च 2017

निगल और निकल यही रास्ता सबसे आसान नजर आता है

कभी कभी
सब कुछ
शून्य हो
जाता है
सामने से
खड़ा नजर
आता है


कुछ किया
नहीं जाता है
कुछ समझ
नहीं आता है


कुछ देर
के लिये
समय सो
जाता है


घड़ी की
सूंइयाँ
चल रही
होती है
दीवार पर
सामने की
हमेशा की तरह

जब कभी
डरा जाता है
उस डर से

जो हुआ ही
नहीं होता है
बस आभास
दे जाता है
कुछ देर
के लिये

ऐसे
समय में
बहुत कुछ
समझा
जाता है

समय
समझाता है
समझाता
चला जाता है
समय के साथ
सभी को

कौन याद
रख पाता है
कहाँ याद
रहती हैं
ठोकरें
किसी को
बहुत लम्बे
समय तक

हर किसी
की आदत
नहीं होती है

हर कोई
सड़क पर
पड़े पत्थर को
उठा कर
किनारे
कहाँ
लगाता है

कृष्ण भी
याद ऐसे ही
समय में
आता है

ऐसे ही समय
याद आती है
किताबें

किताबों में
लिखी इबारतें

नहीं समझी
गई कहावतें

जो हो रहा
होता है
सामने सामने
सत्य बस
वही होता है

पचता
नहीं भी है
फिर भी
निगलना
जरूरी
हो जाता है

‘उलूक’
चूहों की दौड़
देखते देखते
कब चूहा हो
लिया जाता है

उसी समय
पता समझ
में आता है

जब टूटती है
नींद अचानक

दौड़
खत्म होने
के शोर से

और कोई
खुद को
अपनी ही
डाल पर

चमगादड़ बना
उल्टा लटका
हुआ पाता है ।

चित्र साभार: www.gitadaily.com

गुरुवार, 16 मार्च 2017

रखा तो है शमशान भी है कब्रगाह भी है और बहुत है दो गज जमीन है सुकून से जाने के लिये

अब
छोड़ भी
दे नापना
इधर
और उधर
अपने
खुद के
पैमाने से
 
कभी पूछ
भी लिया कर
अभी भी
सौ का
ही सैकड़ा है
क्या जमाने से

लगता नहीं है
कल ही तो
कहा था
किसी ने
शराब लाने
के लिये
घर के
अन्दर से

लड़खड़ाता
हुआ कुछ
ही देर पहले
ही शायद
निकल के
आया था वो
मयखाने से

ना पीना
बुरा है
ना पिलाने
में ही कोई
गलत बात है

साकी खुद ही
ढूँढने में लगी
दिख रही है
इस गली और
उस गली में
फिरती हुई

उसे भी
मालूम हो
चुका है
फायदा है
तो बस
बेशर्मी में

नुकसान ही
नुकसान है
हर तरफ
हर जगह
हर बात पर
बस शरमाने से

निकल चल
मोहल्ले से
शहर की ओर
शहर से
जिले की ओर
जिले से छोटी
राजधानी की ओर

 छोटी में होना
और भी बुरा है
निकल ले
देश की
राजधानी
की ओर

किसी
को नहीं
पता है
किसी को
नहीं मालूम है
किसी को
नहीं खबर है

किस की
निविदा
पर लग रही
मुहर है

बात ठेके की है
ठेकेदार बहुत हैं
किस ने कहा है
टिका रह
मतदाता के
आसपास ही

कुछ नहीं
होना है अब
किसी का
दरवाजा बेकार
में खटखटाने से

कोशिश जरुरी हैं
तोड़ने की किसी
भी सीमा को

बत्तियाँ जरूरी हैं
लाल हों
हरी हों नीली हों

देश भक्ति का
प्रमाण बहुत
जरूरी है
झंडे लगाने
का ईनाम
ईनाम नहीं
होता है
खाली बातों
बातों में ही
बताने से

चयन
हो रहा है
दिख रहा है
जातियों से
उसूलों के
दिखावों वालों
के बीच भी

आदमी के
लिये है रखा है
उसने शमशान
और कब्रगाह
बहुत है
दो गज जमीन
सुकून से
जाने के लिये
आभार आदमी
का आदमी को
आदमी के लिये
रहने दे
किस लिये
उलझता है
किसी फसाने से

बहक रहा हो
जमाना जहाँ
किस लिये डरना
बहकने से
कलम के लिखने से
खुद की अच्छा है
‘उलूक’
कहे तो सही
कोई
तुझसे कुछ
यही होता है
छुपाने से
कुछ भी
किसी भी
बनते हुऐ
किसी
अफसाने से ।

चित्र साभार: news.myestatepoint.com

रविवार, 12 मार्च 2017

होली ठैरी होला ठैरा ठैरा तो ठैरा ठैरा ठैरा ठैरी छोड़ ठर्रा ठर्री क्यों कहना ठैरा

अब होली
तो होली ठैरी
सालों साल
से होरी ठैरी

होली पर
ध्यान लगाओ
ठैरा क्या ठैरा
ठैरी क्या ठैरी
से दिमाग हटाओ

हर साल आने
वाली ठैरी
हर बार
चली जाने
वाली ठैरी

रंग उड़ाने
रंग मिलाने
वाली ठैरी

कबूतर कौए
हो जाने
वाले ठैरे
रंग मिलाओ
मिलाकर
इंद्रधनुष बनाओ

ये क्या ठैरा
सब हरा पीला
लाल गुलाबी
काला कर जाओ

ठंड रखो
ठंडाई चढ़ाओ
चढ़ी गरमी
उतार भगाओ

जो हो गया
सो हो गया
आकाश से उतरो
जमीन पर आओ

होली खेलो
गोजे खाओ
रंग लगवाओ
रंग लगाओ

होली ठैरी
शुभ ही होने
वाली ठैरी

शुभकामनाएं
ले जाओ
मंगल होये
शहर होये
जंगल होये
मंगलकामनायें
कुछ दे ही जाओ

जैसी भी ठैरी
होने वाली ठैरी
होने दो रंग
बहने दो
रहने दो
कपड़ों की चिंता

धोबी तो
धोबी ही ठैरा
गधा कभी
इस धोबी का
गधा कभी
उस धोबी का ठैरा

ये सब तो
होने वाला ठैरा
गधा कपड़े
बस ले जाने
वाला ठैरा

गधे का मत
हिसाब लगाओ

धोबी देखो
कपड़े देखो
रंग चढ़ा
उतरवाना ठैरा

गधों से
अब तो
ध्यान हटाओ

होली तो
होली ठैरी
होली होने
वाली ठैरी

रंग चढ़ाओ
भंग चढ़ाओ

ठैरा तो
ठैरा ठैरा
ठैरा ठैरी
पीछे छोड़ो

कहाँ बटा
कहाँ बट रहा
जर्रे में कुछ
पकड़ा ठैरा
जर्रे जर्रे में
बटा ठैरा

उत्सव के
माहौल में
बीती ताही
बिसार दे
कहना  
ठैरा 

बस उस ठर्रे
की कुछ
खबर सुनाओ

बाकि सब
क्या कहना ठैरा
नमन करो
शीश नवाओ

ठैरा ठैरी की
होली ठैरी
आने जाने
वाली ठैरी
मौज मनाओ
ही कहना ठैरा।

चित्र साभार: India Today

बुधवार, 8 मार्च 2017

गीता में कही गयी हैं बातें वही तो हो रही हैं नजर आ रहा है मत कहना ‘उलूक’ पगला रहा है


सीधी बोतल
उल्टी कर
खाली करना
फिर खाली
बोतल में
फूँक मार कर
कुछ भरना


रोज की
आदत हो
गयी है
देखो तो
खाली बोतलें
ही बोतलें
चारों ओर
हो गयी हैं

कुछ बोतलें
सीधी पड़ी
हुई हैं
कुछ उल्टी
सीधी हो
गयी हैं

बहुत कुछ
उल्टा सीधा
हुआ जा
रहा है
बहुत कुछ
सीधा उल्टा
किया जा
रहा है

पूछना
मना है
इस लिये
पूछा ही नहीं
जा रहा है

जो कुछ भी
हो रहा है
स्वत: हो
रहा है
होता चला
जा रहा है

जरूरत ही
नहीं है
किसी को
कुछ
पूछने की

कोई पूछने भी
नहीं आ रहा है

वो उसके लिये
लगा है उधर
गाने बजाने में

इसको इसके
लिये इधर
खुजलाने में
मजा आ रहा है

गधों की दौड़
हो गयी है
सुनाई दे रही है

खबर बहुत
दिनों से
हवा हवा
में है
और
होली भी
आ रही है

गधों में सबसे
अच्छा गधा भी
जल्दी ही
गधों के लिये
भेजा जा रहा है

‘उलूक’
तूने पेड़
पर ही
रहना है
रात गये ही
सुबह की
बात को
कहना है

तुझे
किस बात
का मजा
आ रहा है

खेलता रह
खाली
बोतलों से

गधे
का आना
फिर गधे
का जाना

कृष्ण जी
तक बता
गये हैं
गीता में

गधों के
बीच में
चल रही
उनकी
अपनी
बातें हैं

बोतलों में
फूँकने वाला
क्या फूँक
रहा है
जल्दी ही
होली
से पहले
सबके
सामने से
आ रहा है

किसलिये
छटपटा
रहा है ?

चित्र साभार: Dreamstime.com

सोमवार, 6 मार्च 2017

सुना है फिर से आ गयी है होली

चल बटोरें रंग
बिखरे हुऐ
इधर उधर
यहाँ वहाँ
छोड़ कर
आ रहा है
आदमी आज
ना जाने सब
कहाँ कहाँ

सुना है फिर से
आ गयी है होली
बदलना शुरु
हो गया है मौसम

चल
करें कोशिश
बदलने की
व्यवहार को अपने
ओढ़ कर हंसी
चेहरे पर दिखाकर
झूठी ही सही
थोड़ी सी खुशी
मिलने की
मिलाने की

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
दिखायें रास्ते
शब्दों को
भटके हुऐ
बदलें मतलब
वक्तव्य के
दिये हुए
अपनों के
परायों के
करें काबू
जबानें
लोगों की
सभी जो
आते
हैं नजर
इधर और
उधर सटके हुऐ

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल चढ़ाये भंग
उड़ायें रंग
जगायें ख्वाब
सिमटे हुऐ
सोते हुऐ
यहाँ से
वहाँ तक
के सभी के
जितने भी दिखें
समय के
साथ लटके हुऐ

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
करें दंगा
करें पंगा
लेकिन निकल
बाहर हम्माम से
कुछ ही दिन सही
सभी नंगों के
साथ हो नंगा

सुना है फिर से
आ गयी है होली

चल
उतारें रंग
चेहरे के
मुखौटों के
दिखायें रंग
अपने ही
खुद के होठों के
कहें उसकी नहीं
बस अपनी ही
कहें अपनों से कहें
किसलिये
लुढ़कना
हर समय
है जरूरी
साथ लोटों के

सुना है फिर से
आ गयी है होली
सुना है फिर से
आ गयी है होली ।


चित्र साभार: Happy Holi 2017

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

बोलते ही उठ खड़े होते हैं मिलाने आवाज से आवाज गजब हैं बेतार के तार याद आते हैं बहुत ही सियार

बड़े दिनों के
बाद आज
अचानक फिर
याद आ पड़े
सियार

कि बहुत
अच्छे
उदाहरण
के रूप में
प्रयोग किये
जा सकते हैं
समझाने
के लिये
बेतार के तार

रात के
किसी भी प्रहर
शहर के शहर
हर जगह मिलते
हैं मिलाते हुऐ
सुर में सुर
एक दूसरे के
जैसे हों बहुत
हिले मिले हुऐ
एक दूसरे में
यारों के हो यार

और
आदमी इस
सब की रख
रहा है खबर

हो रहा है
याँत्रिक
यंत्रों के जखीरे
से दबा हुआ
ढूँढता
फिर रहा है
बिना बताये
सब कुछ छुपाये

तारों में
बिजली के
संकेतों में
दौड़ता हुआ
अपने खुद के
लिये प्रेम प्यार
और मनुहार

सियार दिख
नहीं रहे हैं
कई दिन
हो गये हैं
सुनाई नहीं
दे रही हैं आवाजें

नजर नहीं
आ रहे हैं
कहीं भी
सुर में सुर
मिलाते हुऐ

सियारों के सियार
सारे लंगोटिया यार

जरूरत
नहीं है
जरा सा भी
मायूस होने
की सरकार

बन्द कर
रहे हैं लोग
दिमाग
अपने अपने
दिख रहा है
भेजते हुऐ संदेश
बैठा कोई
बहुत दूर
कहीं उस पार

खड़ी हो रही
हैं गर्दने
पंक्तिबद्ध
होकर
उठाये मुँह
आकाश की ओर
मिलाते हुऐ
आवाज से आवाज

याद आ रहा
है एक शहर
भरे हुऐ हर तरफ
सियार ही सियार
जुड़े हुऐ सियार से

और
बेतार का एक तार
बहुत लम्बा मजबूत
जैसे गा रहे हों
हर तरफ
हूँकते हुऐ सियारों
के साथ
मिल कर सियार।

चित्र साभार: http://www.poptechjam.com

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