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शनिवार, 18 नवंबर 2017

टट्टी जिसे गू भी कहा जाता है

अजीब
सी बात है
पर पता नहीं

सुबह से
दिमाग में
एक शब्द
घूम रहा है
टट्टी

तेरी टट्टी
मेरी टट्टी से
खुशबूदार कैसे

या तेरी टट्टी
मेरी टट्टी से
ज्यादा
असरदार कैसे

पाठकों को भी
लग रहा होगा
टट्टी भी
कोई बात करने
का विषय
हो सकता है

सुबह उठता
है आदमी
खाता है
शाम होती है
फिर से खाता है

खाता है
कम या बहुत

लेकिन
रोज सबेरे
कुछ ना कुछ
जरूर हगने
चला जाता है

जो हगता है
उसे ही टट्टी
कहा जाता है

टट्टी बात
करने का
विषय नहीं है

हर कोई
हगने
और टट्टी
जैसे शब्दों के
प्रयोग से
बचना
चाहता है

टट्टी पर या
हगने जैसे
विषय पर
गूगल करने
वाला भी
कोई एक
कविता
लिखा हुआ
नहीं पाता है

कविता
और टट्टी
हद हो गई

कविता
शुद्ध होती है
शुद्ध मानी
जाती है

टट्टी को
अशुद्ध में
गिना जाता है

अपने
आस पास
हो रहा
कुछ भी

आज क्यों
इतना ज्यादा
टट्टी जिसे
गू भी
कहा जाता है
याद दिलाता है

‘उलूक’ को
हर तरफ
हर आदमी
अपने
आसपास का
 टट्टी पाने की
लालसा के साथ
दौड़ता हुआ
नजर आता है

पागल कौन हुआ
‘उलूक’
या दौड़ता
हुआ आदमी
टट्टी के पीछे

समझाने वाला
कोई कहीं
बचा नहीं
रह जाता है ।

चित्र साभार: Weclipart

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

चौदह नवम्बर को क्या होता है आखिर क्यों और किस से क्या छुपा रहा है ?

सुबह से कुछ
याद जैसा
आ रहा है

नवम्बर
का महीना
चौदहवाँ दिन
धीरे धीरे
रोज की तरह
खिसकता
जा रहा है
याद करते
करते भी
जैसे कुछ भूला
जा रहा है

गूगल
का डूडल
एक सौ
इकतीसवीं
साल गिरह
कागज में छेद
करने वाले
उपकरण की
मना रहा है

सब कुछ
छूटता
चला गया
हो जैसे
बचपन अब
बच्चों में भी
जब नजर
नहीं आ
रहा है

अखबार
समाचार
टी वी
पत्रकार
कहीं भी
कोई जल्सा
मनाने की
खबर का
पुतला
जलाता हुआ
नजर नहीं
आ रहा है

‘उलूक’
की समझ में
बड़ी देर से
घुस रही है हवा
धुऐं कोहरे धूल
से तैयार की गयी

अँधेरा दिन में
करने का पूरा तंत्र
मंत्र जाप कर
साँस लेने का
सरकारी आदेश
ध्वनिमत से पास
करवाने का प्रपंच
करवा रहा है

इतना लम्बा
खींच कर
समझाने की
जरूरत वैसे
नहीं होनी चाहिये

सीधे साधे
शब्दों में
जिन्दा ताऊ को
मरे चाचा के
चौदह नवम्बर
के बहाने ताबूत
से जिन्दा निकल
आने का डर
सता रहा है

ट्रम्प का पत्ता
ताश के पत्ते के
डब्बे से बाहर
झाँक कर
जीभ निकाल कर
अपनी ही नाक को
छूने का करतब
दिखा रहा है ।

चित्र साभार: RF clipart

रविवार, 12 नवंबर 2017

बकवास ही कर कभी अच्छी भी कर लिया कर

किसी दिन तो
सब सच्चा
सोचना छोड़
दिया कर

कभी किसी
एक दिन
कुछ अच्छा
भी सोच
लिया कर

रोज की बात
कुछ अलग
बात होती है
मान लेते हैं

छुट्टी के
दिन ही सही
एक दिन
का तो
पुण्य कर
लिया कर

बिना पढ़े
बस देखे देखे
रोज लिख देना
ठीक नहीं

कभी किसी दिन
थोड़ा सा
लिखने के लिये
कुछ पढ़ भी
लिया कर

सभी
लिख रहे हैं
सफेद पर
काले से काला

किसी दिन
कुछ अलग
करने के लिये
अलग सा
कुछ कर
लिया कर

लिखा पढ़ने में
आ जाये बहुत है
समझ में नहीं
आने का जुगाड़
भी साथ में
कर लिया कर

काले को
काले के लिये
छोड़ दिया कर
किसी दिन
सफेद को
सफेद पर ही
लिख लिया कर

‘उलूक’
बकवास
करने
के नियम
जब तक
बना कर
नहीं थोप
देता है
सरदार
सब कुछ
थोपने वाला

तब तक
ही सही
बिना सर पैर
की ही सही
कभी अच्छी भी
कुछ बकवास
कर लिया कर ।

चित्र साभार: BrianSense - WordPress.com

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

शरीफ लिखने नहीं आते हैं काम करते हैं करते चले जाते हैं एक नंगा होता है रोज बस लिखने चला आ रहा होता है

सौ में से
निनानवे
शरीफ
होते हैं

उनको
होना ही
होता है

होता वही है
जो वो चाहते हैं

बचा हुआ बस
एक ही होता है
जो नंगा होता है

उसे नंगा
होना ही
होता है

उसके
बारे में
निनानवे ने
सबको
बताया
होता है
समझाया
होता है
बस वो ही
होता है
जो उनका
जैसा नहीं
होता है

निनानवे
सब कुछ
सम्भाल
रहे होते हैं
सब कुछ
सारा कुछ
उन के
हिसाब से
हो रहा
होता है
शराफत
के साथ

नंगा
देख रहा
होता है
सब कुछ
कोशिश कर
रहा होता है
समझने की

मन्द बुद्धि
होना पाप
नहीं होता है

नहीं समझ
पाता है
होते हुऐ
सब कुछ को
जिसे सौ में
से निनानवे
कर रहे होते हैं

कुछ
कर पाना
नंगे के
बस में
नहीं हो
रहा होता है

नंगा हम्माम
में ही होता है
नहा भी
रहा होता है

निनानवे
को कोई
फर्क नहीं
पड़ रहा
होता है
अगर
एक कहानी
बना कर
उनकी अपने
साथ कहीं
कोई चिपका
रहा होता है

नंगे
‘उलूक’
ने सीखी
होती हैं
बहुत सारी
नंगई
लिखने
लिखाने
को
नंगई पर

एक भी
निनानवे
में से
कहीं भी
नहीं आ
रहा होता है

निनानवे का
‘राम’ भी
कुछ नहीं
कर सक
रहा होता है

उस
“बेवकूफ” का
जो जनता
को छोड़ कर
अपनी
बेवकूफी
के साथ
खुद को
नीरो
मान कर
समझ कर
रोम का

अपने
जलते घर में
बाँसुरी बजा
रहा होता है।

चित्र साभार: Wikipedia

रविवार, 5 नवंबर 2017

अन्दाज नहीं आ पाता है हो जाता है कब्ज दिमागी समझ में देर से आ पाता है पर आ जाता है

कई
दिनों तक
एक रोज
लिखने वाला
अपनी कलम
और किताब को
रोज देखता है
रोज छूता है

बस लिखता
कुछ भी नहीं है

लिखने की
सोचने तक
नींद के आगोश
में चला जाता है
सो जाता है

कब्ज होना
शुरु होता है
होता चला
जाता है

बहुत कुछ
होता है
रोज की
जिन्दगी में

बाजार
नहीं होता है
आसपास
कहीं भी
दूर दूर तलक

बेचने की
सोच कर
साथी एक
कुछ भी
बेच देने वाला
मन बना कर
चला आता है

दुकान तैयार
कर देता हैं
मिनटों में
खरीददार
बुझाये
समझाये
हुऐ कुछ
दो चार
साथ में
पहले से ही
लेकर के
आता है

बिकने को
तैयार नहीं
होने से
कुछ नहीं
होता है

कब
घेरा गया
कब
बोली लगी
कब
बिक गया

जब तक
समझता है
बेच दिया
जाता है

सामान
बना दिया
जाने के बाद
दाम अपने आप
तय हो जाता है

शातिराना
अन्दाज के
नायाब तरीके
सीखना सिखाना
जिस किसी
को आता है

भीड़ का
हर शख्स
थोड़ी देर
के लिये
कुछ ना कुछ
सीखने के लिये
आना चाहता है

किताबें
कापियाँ
कक्षाओं के
श्यामपट के
आसपास रहने
दिखने वालों
के दिन कब
का लद गये

भरे हुऐ भरे में
थोड़ा सा ही सही
और भर देने की
कारीगरी सिखाना
फिर मिल बाँट कर
भर देना गले गले तक
खींच कर गले लगाना
जिसे आता है

आज
वही तैयार
करता है फन्दे
आत्म हत्या
करने का
ख्याल
रोज आता है

‘उलूक’
उल्लू का पट्ठा
समझता सब कुछ है
रोज मरता है मगर
रोज जिन्दा भी
हो जाता है ।

चित्र साभार: Clipart Library

शनिवार, 4 नवंबर 2017

बातों से खुद सुलगी होती हैं बातें कहाँ किसी ने जलाई होती हैं


ठीक बात
नहीं होती है

कह देना
अपनी बात
किसी से भी

कुछ बातें
कह देने की
नहीं होती हैं
छुपायी जाती हैं

बात के
निकलने
और
दूर तक
चले जाने
की बात पर
बहुत सी
बातें कही
और
सुनी जाती हैं
सुनाई जाती हैं

कुछ लोग
अपनी बातें
करना
छोड़ कर

बातों बातों
में ही
बहुत सारी
बात
कर लेते हैं

बातों बातों में
किसी की बातें
बाहर
निकलवाकर

उसी से
कर लेने
की निपुणता
यूँ ही हर
किसी को
नहीं आयी
होती है

एक
दो चार दिन के
खेल खेल में
सीख लेना
नहीं होता है
बातों को
लपेट लेना
सामने वालों की


उसकी
अलग से
कई साल 

सालों साल

बातों बातों में
बातों के स्कूलों में
पढ़ाई लिखाई होती है

‘उलूक’
नतमस्तक
होता है
बातों के ऐसे
शहनशाहों के
चरणों में
ठंड रख कर
खुद हिमालयी 

बर्फ की 

हमेशा अपनी
बातों में जिसने
दूसरे की
दिल की
बातों की
नरम आग
सुलगा
सुलगा कर
पानी में
भी आग
लगाई
होती है ।


चित्र साभार: ClipartFest

बुधवार, 1 नवंबर 2017

आदमी खोदता है आदमी में एक आदमी बोने के लिये एक आदमी

ऊपर
वाला भी
भेज देता
है नीचे

सोच कर
भेज दिया है
उसने
एक आदमी

नीचे
का आदमी
चढ़ लेता है
उस आदमी के
ऊपर से उतरते ही

उसकी
सोच पर
सोचकर
समझकर
समझाकर
सुलझाकर
बनाकर उसको
अपना आदमी

आदमी
समझा लेता है
आदमी को आदमी

खुद
समझ कर
पहले

ये तेरा आदमी
ये मेरा आदमी

बुराई नहीं है
किसी आदमी के
किसी का भी
आदमी हो जाने में

आदमी
बता तो दे
आदमी को
वो बता रहा है
बिना बताये
हर किसी
आदमी को

ये है मेरा आदमी
ये है तेरा आदमी

‘उलूक’

हिलाता है
खाली खोपड़ी
में भरी हवा
को अपनी
हमेशा की तरह

देखता
रहता है

आदमी
खोजता
रहता है
हर समय
हर तरफ
आदमी
खोजता आदमी

बेअक्ल
उलझता
रहता है
उलझाता
रहता है
उलझनों को

अनबूझ
पहेलियों
की तरह
सामने
सामने ही
क्यों नहीं
खेलता है
आदमी का
आदमी
आदमी आदमी

बेखबर
बेवकूफ

अखबार
समझने
के लिये नहीं

पढ़ने
के लिये
चला जाता है

पता ही नहीं
कर पाता है
ऊपर वाला
खुद ही ढूँढता
रह जाता है

आदमी आदमी
खेलते आदमियों में
अपना खुद का
भेजा हुआ आदमी ।

चित्र साभार: Fotosearch

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

कहने दीजिये कुछ कह देने से कहीं कुछ नहीं होता है

कल का
नहीं
खाया है
पता है
आज
फिर से
पकाया है
वो भी
पता है

कल भी
नहीं
खाना था
पता था
आज भी
नहीं
खाना है
पता है

कल भी
पकाया था
कच्चा था
पता था

पूरा पक
नहीं
पाया था
वो भी
पता था

किसी ने
कहाँ कुछ
बताया था
बताना ही
नहीं था

आज भी
पकाया है
पक नहीं
पाया है

कोई नहीं
खायेगा
जैसा था
रह जायेगा

सब को सब
पता होता है
कौन कब
कहाँ कितना
और क्यों
कहता है

सारा हिसाब
बहीखातों में
छोड़ कर
इधर भी
और
उधर भी
एक एक पाई
का सबके
पास होता है

ईश्वर और
कहीं भी
नहीं होता है

जो होता है
बस यहीं कहीं
आस पास
में होता है

दिखता है
मन्दिरों की
घन्टियाँ
बजाना
छोड़ कर

गले में
अपने ही
घन्टी
बाँध कर
यहीं पर
के किसी
एक के लिये

कोई
कितना
जार जार
सर
हिला हिला
कर रोता है

कल नहीं
पता था जिसे
उसे आज भी
पता नहीं होता है

‘उलूक’
इसलिये
कहीं भी
किसी डाल
पर नहीं
होता है

जो होते हैं
वो हर जगह
ही होते हैं

नहीं
होने वाले
नहीं हो पाने
के लिये
ही रोते हैं

पकता रहे
कुछ कुछ
जरूरी है

रसोई
के लिये
रसोईये
का काम
पकाना
और
पकाना
ही होता है

समझ में आने
के लिये नहीं
कहा होता है

जो लिखा
होता है
वो सब
समझ में
नहीं आया
होता है
इसीलिये
लिखा होता है

रोज पकाया
जाता है
कुछ ना कुछ

अधपकों के
बस में बस
इतना ही
तो होता है
जो पकाने
के बाद
भी पका
ही नहीं
होता है।

चित्र साभार: Encyclopedia Dramatica

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

हर सफेद बोलने वाला काला एक साथ चौंच से मिला कर चौंच खोलता है

गरम
होता है
उबलता है
खौलता है

कभी
किसी दिन
अपना ही लहू
खुद की
मर्दानगी
तोलता है

अपना
ही होता है
नजदीक का
घर का आईना
रोज कब कहाँ
कुछ बोलता है

तीखे एक तीर
को टटोलता है
शाम होते ही
चढ़ा लेता
है प्रत्यंचा
सोच के
धनुष की

सुबह सूरज
निकलता है
गुनगुनी धूप में
ढीला कर
पुरानी फटी
खूँटी पर टंगी
एक पायजामे
का इजहार

बह गये शब्दों
को लपेटने
के लिये
खींच कर
खोलता है

नंगों की
मजबूरी
नहीं होती है
मौज होती है

नंगई
तरन्नुम में
बहती है
नसों में
हमखयालों
की एक
पूरी फौज के
कदमतालों
के साथ

नशेमन
हूरों की
कायानात के
कदम चूमता है
हिलोरे ले ले
कर डोलता है

‘उलूक’
फिर से
गिनता है
कौए अपने
आसपास के

खुद के
कभी हल
नहीं होने वाले
गणित की नब्ज

इसी तरह कुछ
फितूर में फिर
से टटोलता है ।

चित्र साभार: Daily Mail

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

कुत्ता हड्डी और इतिहास












कुछ दिन
अच्छा होता है
नहीं देखना
कुछ भी
अपनी
आँखों से

दिख रहे
सब कुछ में

कुछ दिन
अच्छा होता है
देखना
वो सब कुछ


जो सब को
दिखाई

दे रहा होता है
उनके अपने
चारों ओर

उनकी अपनी
आँखों से


रोज
अपने अपने

दिखाई दे रहे को
दिखाने की होड़ में

दौड़ लगा रहे
देखे गये
बहुत कुछ में

आँखें बन्द कर
देख लेने वालों का
देखा हुआ

रायते की
तरह
फैला
देना सबसे

अच्छा होता है

जिसकी
आँख से

सब देखना
शुरु
कर
दिये होते हैं

वो ईश्वर हो
चुका होता है

गाँधी
बहुत बौना

हो चुका
होता है

अपनी लाठी
पकड़े हुऐ


उसको
गाली देता

एक लोफर
गली का

एक झंडा लिये
अपने हाथ में
एक
बेरंगे
हो गये रंग का

समय हो
चुका होता है


‘उलूक’
समय खोद
रहा होता है
समय को
समझने

के लिये

समय
इतिहास

हो गया
होता है


ऐसा
इतिहास

जिसमें
एक

कुत्ते का
गड्ढा खोदना
और उसमें
उसका

एक हड्डी
दबाना
ही
बस इतिहास

रह गया होता है |

चित्र साभार:
 cliparts

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

बस ज्ञानी हिंदू ही पढ़ें समझ में आ जाये तो लाईक भी करें फिर फार्वर्ड भी करें

सारे शिव
डरपोक
हलाहल
गटके हुऐ
गले गले
नीले पड़े
दिखा रहे हैं
साँपों को

समझा रहे हैं
साँपों को
शाँत रहें
साँप बने रहें

सारे साँप
मौज में हैं
शिव के गले में
माला डाले हुए हैं

हर जगह
शिव ही शिव हैं
हर जगह
साँप ही साँप हैं

डस कोई
किसी को
नहीं रहा है

साँप साँप
के साथ है
और
रह रहा है

परेशान मेंढक
और चूहे हैं
इधर के
साँप से
भी डर है
उधर का साँप भी
निगलने को
तैय्यार है

यहाँ का साँप
वहाँ चला जाता है
बस एक खबर में
चला गया है
कोई बताता है

वहाँ का साँप
यहाँ चला आता है
किसी को कोई
फर्क नहीं
पड़ पाता है

साँप चूहे
छुछूँन्दर
के खेल में
कब कौन साँप
कौन चूहा
कौन छुछून्दर
हो जाता है

‘उलूक’
देखता है
समझता है
बस जानवर
जानवर खेल
नहीं पाता है

आदमी हो लेने
के प्रयास में
मायूस हो जाता है

साँप बना आदमी
आदमी को साँपों
की सोच से डराता है ।

चित्र साभार: Best Clip Art Images

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

सारे विश्व में सुना है मना रहे हैं मानसिक स्वास्थ दिवस आज पागल पागल खेलने का दिन है आ जाओ अब बाज

हिदायतें
दे रहें हैं
चिकित्सक
बहुत सारे
मुफ्त में ही
बेहिसाब

और दिन
का लिखना
अलग बात है
बहुत जरूरी है
लिखनी आज
मन की बात

उधर वो बात
दिमागी सेहत
की बता रहे हैं

खाने पीने को
ठीक रखना है
समझा रहे हैं

अकेलेपन से
निपटना है
भीड़ में
घर की ही सही

हिल मिल कर
कुछ इस तरह
से रहना है
बच्चों को भी
देखना है
बुजुर्गों को भी
थोड़ा बहुत
कुछ कहना है

व्यायाम
करना है
नकारात्मक
विचारों को
दिमाग में
नहीं भरना है
आत्मविश्वास
बनाये रखना है

पागल नहीं
हो रहे हैं
सोच कर
मन को
धैर्य दिलाये
रखना है

सोचिये
एक ही
दिन में
कितना
सारा
क्या क्या
करवाने
वो जा रहे हैं

इधर
नासमझ
लोग हैं
ये बात
वो कहाँ
समझ
पा रहे हैं

इतनी सी
छोटी बातों
को समझने
में ही आधी
जिन्दगी काट
कर यहाँ तक
चले आ रहे हैं

मानसिक रोग
को एक अकेला
नहीं समझ
पा रहा है

भीड़ की
हरकतें
देख कर
सामने खड़े
सभी लोगों
को पागल
बता रहा है

रोज
देखता है
सुनता है
कर रही
होती है
भीड़ कुछ
पागलपन

लाचार दूर से
देखता तमाशा
महसूस कर
रहा होता है
कुछ नहीं
कर पा रहा है

बरसों से यही
सब देखता सुनता
समझता रहता है
पागलों के पागलपन
को लिखता जा रहा है

देखने आ
रही है भीड़
लिखे लिखाये को

एक पागल
लिख रहा है
पागलपन अपना

इधर
से लेकर
उधर तक
भीड़ में
बताया जा
रहा है

इलाज
किसका
होना चाहिये

आज के
विश्व मानसिक
स्वास्थ दिवस के दिन

‘उलूक’
बस यही बात
आज भी नहीं
समझ पा रहा है

इस
सब के
बावजूद
लेकिन

विश्व मानसिक
स्वास्थ दिवस
के संदेश
को लेकर
फिर भी
दो शब्द
लम्बे लम्बे
कर करा कर
यहाँ कुछ
आदतन लिख
कर जा रहा है ।

चित्र साभार: Mental Health Concern

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

यूँ ही हो गये पंद्रह लाख पद चिन्ह पन्ने पर आज ‘उलूक’ के हो गया कुछ पास उसके भी बेचने के लिये

यूँ हीं देख
लिया कर
कुछ कभी भी
बस देखने के लिये

जिंदगी
कट जाती है
उसकी भी
जिसने आँखे
ताड़ कर पूरे को
पूरा ही घूरा हो
अपनी आँखे
सेकने के लिये

यूँ हीं कह
दिया कर
कुछ भी कभी भी
बस फेंकने के लिये

पता कर
ही लेता है
पता करने वाला
अन्दर की बातें
सारी सामने
वाले की खुद
समेटने के लिये

यूँ ही झुक
लिया कर
थोड़ा सा
कभी भी
बस लपेटने
के लिये

आती हैं
कलाबाजियाँ जिसे

कर 
ही लेता
है मजबूर
दुश्मन को
घुटने
टेकने के लिये

यूँ ही लिख
लिया कर
कबाड़

कुछ भी
कभी भी
कहीं भी
भेजने के लिये

देखने
आते ही हैं
‘उलूक’
की हरकतें
कुछ लोग
हमेशा ही
देखने के लिये ।

चित्र साभार: Hypergrid Business

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

डाकिया डाकखाना छोड़ कर चिट्ठियाँ खुले आम खुले में खोल कर दिखा रहा है

शेरो शायरी
बहुत हो गयी
मजा उतना
नहीं आ रहा है

सुना है फिर से
चिट्ठियाँ लिखने
का चलन लौट
कर वापस
आ रहा है

कागज
कलम दवात
टिकट लिफाफे
के बारे में
पूछ रहा है कोई

कई दिनों से
इधर और उधर
के डाकखानों के
चक्कर लगा रहा है

चिट्ठियाँ
लिखना भेजना
डाकिये का पता
देख कर किसी
का घर ढूँढना
कितना होम वर्क
किया जा रहा है

बहुत जरूरी था
चिट्ठी लिखना
लिखवाना
समझ में भी
आ रहा है

फेस बुक
व्हाट्स अप
में अच्छी
तरह से
नहीं पीटा
जा रहा है

चिट्ठियाँ लिखी
जा रही हैं
उसके लिये
मुहूरत भी
निकाला
जा रहा है

बहस
नहीं होनी
चाहिये किसी मुद्दे पर
किसी विशेष दिन
समझ में आ रहा है

ध्यान भटकाना है
मुद्दे और दिन से
चिट्ठी लिखने की
सुपारी को

चिट्ठी
लिखवाने वाला
लिखने वाले
को उसी दिन
भिजवा रहा है

प्रेम पत्र नहीं
सरकारी
पत्र नहीं
कुशल क्षेम
पूछने में
शरमा रहा है

चिट्ठी प्यार का
संदेश नहीं
प्रश्नों का पुलिंदा
बनाया जा रहा है

चिट्ठी
लिख रहा है
लिखने वाला
लिफाफे में
बन्द कर
टिकट नहीं
लगा रहा है

डाकखाना
डाकिया की
बात कौन
किस से पूछे
‘उलूक’

लिखवाने वाला
गली मोहल्ले
सड़क की
दीवार पर
चिपका रहा है ।

चित्र साभार: Pinterest

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

ये मिर्च बड़ी है मिर्च मिर्च ये मिर्च बड़ी है मिर्च

शुरुआत में

आओ मिर्च
के कारोबार
को अपनायें

आओ
मिर्ची सोचें
मिर्ची सोचवायें

 आओ
मिर्ची लगायें
मिर्ची लगवायें

आओ
मिर्ची बोयें
मिर्ची उगायें

आओ
मिर्ची दिखायें
मिर्ची बतायें

आओ
मिर्ची समझें
मिर्ची समझायें

बीच में

आओ
मिर्ची तुलवायें
मिर्ची धुलवायें

आओ
मिर्ची तोड़ें
मिर्ची सुखायें

आओ
मिर्ची बटवायें
मिर्ची पकवायें

आओ
मिर्ची खायें
मिर्ची खिलायें

आओ
मिर्ची लायें
मिर्ची फैलायें

और
अन्त में

आओ
मिर्च जलायें
धुआँ उड़ाये

आओ
मिर्च के गुच्छे में
निम्बू बँधवायें

आओ
‘उलूक’ की
राई मन्तर
करवायें ।

 चित्र साभार: 123RF.com

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

प्रेषित जन्मदिन शुभकामनाओं के लिये आभार, आभासी परिवार, शब्द ढूँढना मुश्किल हो जाता है

कहीं भी
नहीं होने
का अहसास
भी होता है
जर्रे जर्रे में
होने का
भ्रम भी
हो जाता है

अपने अपने
पन्नों की दुनियाँ
में अपना अपना
कहा जाता है

पन्नों के ढेर
लग जाते हैं
किताब
हो जाना
नहीं हो पाता है

ढूँढने
की कोशिश
में एक छोर
दूसरा हाथ से
फिसल जाता है

ऐसी
आभासी दुनियाँ
के आभासों में
तैरते उतराते
एक पूरा साल
निकल जाता है

आभासी होना
हमेशा नहीं
अखरता है
किसी दिन
नहीं होने में ही
होने का मतलब भी
यही समझाता है

आभार
आभासी दुनियाँ
आभार कारवाँ
आभार मित्रमण्डली

एक छोटा सा
जन्मदिन
शुभकामना सन्देश
स्नेह शुभाशीष
शुभकामनाओं का

एक ही दिन में
कितने कितने
अहसास
करा जाता है

आल्हादित
होता होता
अपने होने
के एहसास
से ही ‘उलूक’
स्नेह की
बौछारों से
सरोबार
हो जाता है।

 चित्र साभार: My Home Reference ecards

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

हैप्पी बर्थ डे टू यू बापू ‘उलूक’ दिन में मोमबत्तियाँ जलाता है

‘दुकान’ एक ‘दीवार’
जहाँ ‘दुकानदार’
सामान लटकाता है

दुकानों का बाजार
बाजार की दुकाने
जहाँ कुछ भी नहीं
खरीदा जाता है

हर दुकानदार
कुछ ना कुछ बेचना
जरूर चाहता है

कोई अपनी दुकान
सजा कर बैठ जाता है
बैठा ही रह जाता है

कोई अपनी दुकान
खुली छोड़ कर
किसी दूसरे की
दुकान के गिरते
शटर को पकड़ कर
दुकान को बन्द होने से
रोकने चले जाता है

किसी की
उड़ाई हवा को
एक दुकान एक
दुकानदार से लेकर
हजार दुकानदारों
द्वारा हजार दुकानों
में उड़ा कर
फिर जोर लगा कर
फूँका भी जाता है

‘बापू’
इतना सब कुछ
होने के बाद भी
अभी भी तेरा चेहरा
रुपिये में नजर आता है

चश्मा
साफ सफाई
का सन्देश
इधर से उधर
करने में काम में
लगाया जाता है

मूर्तियाँ पुरानी
बची हुई हैं तेरी
अभी तक
कहीं खड़ी की गयी
कहीं बैठाई गयी हुई
एक दिन साल में
उनको धोया पोछा
भी जाता है

छुट्टी अभी भी
दी जाती है स्कूलों में
झंडा रोहण तो
वैसे भी अब रोज
ही कराया जाता है

चश्मा धोती
लाठी चप्पल
सोच में आ जाये
किसी दिन कभी
इस छोटे से जीवन में
जिसे पता है ये मोक्ष
'वैष्ण्व जन तो तैने कहिये'
गाता है गुनगुनाता है

जन्मदिन पर
नमन ‘बापू’
‘महात्मा’ ‘राष्ट्रपिता’
खुशकिस्मत ‘उलूक’
का जन्म दिन भी
तेरे जन्मदिन के दिन
साथ में आ जाता है
'दो अक्टूबर'
विशेष हो जाता है ।

चित्र साभार: india.com

शनिवार, 30 सितंबर 2017

नवाँ महीना दसवीं बात गिनता चल खुद की बकवास आज दशहरा है

राम समझे
हुऐ हैं लोग 
राम समझा
रहे हैं लोग
आज दशहरा है

राम के गणित
का खुद हिसाब
लगा रहे हैं लोग
आज दशहरा है

अज्ञानियों का ज्ञान
बढा‌ रहे हैं लोग
आज दशहरा है

शुद्ध बुद्धि हैं
मंदबुद्धियों की
अशुद्धियों को
हटा रहे हैं लोग
आज दशहरा है

दशहरा है
दशहरा ही
पढ़ा रहे हैं लोग
आज दशहरा है

आँख बन्द रखें
कुछ ना देखें
आसपास का
कहीं दूर एक राम
दिखा रहे हैं लोग
आज दशहरा है

कान बन्द रखें
कुछ ना सुने
विश्वास का
रावण नहीं होते
हैं आसपास कहीं
बता रहे हैं लोग
आज दशहरा है

मुंह बन्द रखें
कुछ ना कहें
अपने हिसाब का
राम ने भेजा हुआ है
बोलने को एक राम
झंडे खुद बन कर
राम समझा रहे हैं लोग
आज दशहरा है

दशहरे की
शुभकामनाएं
राम के लोग
राम के लोगों को
राम के लोगों के लिये
देते हुऐ इधर भी
और उधर भी
‘उलूक’ को
दिन में ही
नजर आ
रहे हैं लोग
आज दशहरा है ।

चित्र साभार: Rama or Ravana- On leadership

शनिवार, 23 सितंबर 2017

घर में सड़क में पार्क में बाजार में स्कूल के खेल के मैदान में बज रहें हैं भीषण तीखे भोंपू भागने वाले है शोर से ही रावण शुँभ निशुंभ इस बार बिना आये दशहरे के त्यौहार में

बस मतलब
की बातें
समझने
वालों को
कैसे
समझाई
जायें
बेमतलब
की बातें


कौन दिखाये
फकीरों के
 साथ फकीरी
 में रमें
फकीरों को
लकीरें 
और बताये
लकीरों की बातें


लेता रहता है
समय का
ऊँट करवटें
खा जातें हैं
पचा जाते हैं
कुछ भी खाने
पचाने वाले
उसकी भी लातें
********
***


तो आईये
‘आठ सौवीं’
'पाँच लिंको
 की हलचल’
के लिये पकाते हैं
आसपास हो रही
हलचल को लेकर
दिमाग के गोबर
के कुछ कंडे
यूँ ही सोच
में लाकर
रंग में सरोबार
कन्हैया भक्त
बरसाने के
डंडे बरसाते

********


इस बार पक्का
उतर कर आयेगें
वो आसमान से
डरकर ही सही
भक्तों के भोंपुओं
के शोर से जब
जमीन के लोगों
की फट रही हैं
अपने ही घर में
सोते बैठते आतें

इतना ज्वार
नहीं देखा
आता भक्ति का
घर की पूजायें
छोड़ कर निकल
रहें हैं पंडाल पंडाल
शहर दर शहर

दिख रहा है
उसने बुलाया है
हर कान में
अलग से
आवाज दे
निकल आये
सब ही
तेजी से
बरसते
पानी की
बौछारों
के बीच
बिना बरसाती
बिना छाते

ऐसे ही
कई बार
पगलाता है
‘उलूक’
बड़बड़ाता हुआ
बुखार में तेज
जैसे असमाजिक
बीमार कोई
समाज के नये
रूप को देख
बौखला कर
निकल पड़ता है
जगाने अपनी
ही सोई हुई
आत्मा को
हाथ में
लेकर
खड़ाऊ
मान कर
राम के पैर
बहुत पुरानी
घर पर ही पड़ी
लकड़ी की
बजाते खड़खड़ाते ।
*********

चित्र साभार: Shutterstock

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