मंगलवार, 30 सितंबर 2014

तोते के बारे में तोता कुछ बताता है जो तोते को ही समझ में आता है


तोते कई तरह के पाये जाते है
कई रंगों में कई प्रकार के
कुछ छोटे कुछ बहुत ही बड़े

तोतों का कहा हुआ तोते ही समझ पाते हैं

हरे तोते पीले तोते की बात समझते हैं
या पीले पीले की बातों पर अपना ध्यान लगाते हैं

तोतों को समझने वाले ही
इस सब पर अपनी राय बनाते हैं

किसी किसी को शौक होता है तोते पालने का
और किसी को खाली पालने का शौक दिखाने का

कोई मेहनत कर के
तोतों को बोलना सिखा ले जाता है
उसकी अपनी सोच के साथ
तोता भी अपनी सोच को मिला ले जाता है

किसी घर से सुबह सवेरे
राम राम सुनाई दे जाता है
किसी घर का तोता चोर चोर चिल्लाता है

कोई सालों साल
उल्टा सीधा करने के बाद भी
अपने तोते के मुँह से
कोई आवाज नहीं निकलवा पाता है

‘उलूक’ को क्या करना इस सबसे

वो जब उल्लुओं के बारे में ही कुछ
नहीं कह पाता है

तो हरों के हरे
और पीलों के पीले
तोतों के बारे में कुछ पूछने पर

अपनी पूँछ को अपनी चोंच पर चिपका कर
चुप रहने का संकेत जरूर दे जाता है

पर तोते तो तोते होते हैं
और तोतों को तोतों का कुछ भी कर लेना
बहुत अच्छी तरह से समझ में आ जाता है ।

चित्र साभार: http://www.www2.free-clipart.net/

सोमवार, 29 सितंबर 2014

सोच तो सोच है सोचने में क्या जाता है और क्या होता है अगर कोई सोच कर बौखलाता है


अपने कुछ भी सोचे हुऐ पर
कुछ नहीं कह रहा हूँ

मेरे सोचे गये कुछ पर 

कुछ उसके अपने नजरिये से
सोच दिये गये पर 
कुछ सोच कर कहने की कोशिश कर ले रहा हूँ

बड़ी अजीब सी पहेली है

एक 
एक का अपना खुद का सोचना है

और दूसरा 
एक के कुछ सोचे हुऐ पर 
किसी दूसरे का कुछ भी सोच लेना है

अब कुछ सोच कर ही कुछ लिखा जाता है

बिना सोचे कुछ लिख लेने वाला होता भी है 
ऐसा सोचा भी कहाँ जाता है

कहने को तो 
अपनी सोच के हिसाब से
किसी पर भी कोई भी कुछ भी कह जाता है

दूसरा
उस हिसाब पर सोचने लायक भी हो
ये भी जरूरी नहीं हो जाता है

इसलिये
सोचने पर किसी के 
रोक कहीं लगाई भी नहीं जाती है 
सोच सोच होती है समझाई भी नहीं जाती है

अपनी अपनी सोच में 
सब अपने हिसाब से सोच ही ले जाते हैं

दूसरे की सोच से
सोचने वाले भी होते हैंं थोड़े कुछ
अजूबे होते भी हैं
और इसी दुनियाँ में पाये भी जाते हैं

‘उलूक’
तेरे सोच दिये गये कुछ पर
अगर कोई अपने हिसाब से कुछ सोच लेना चाहता है

तो वो जाने उसकी सोच जाने 
उसके सोचने पर
तू क्यों अपनी सोच की टाँग
घुसाना चाहता है

बिना सोचे ही कह ले जो कुछ कहना चाहता है

होना कुछ भी नहीं है कहीं भी
किसी की सोच में कुछ आता है या नहीं आता है ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com

रविवार, 28 सितंबर 2014

इसकी उसकी करने का आज यहाँ मौसम नहीं हो रहा है


किसी
छुट्टी के दिन 

सोचने की भी
छुट्टी कर लेने
की सोच लेने में
क्या बुरा हो रहा है 

सोच के
मौन हो जाने का
सपना देख लेने से 
किसी को कौन कहाँ रोक रहा है 

अपने
अंदर की बात 
अपने अंदर ही
दफन कर लेने से 
कफन की बचत भी हो जाती है 

दिल
अपनी जगह से
चेहरा अपनी जगह से 
अपने अपने हिसाब का 
हिसाब किताब
खुद ही अगर कर ले रहा है 

रोज ही
मर जाती हैं कई बातें सोच की
भगदड़ में दब दबा कर 

बच बचा कर
बाहर भी आ जाने से भी 
कौन सा उनके लिये
कहीं जलसा
स्वागत का कोई हो रहा है 

कई बार पढ़ दी गई 
किताबों के कपड़े
ढीले होना शुरु हो ही जाते हैं 

दिखता है
बिना पढ़े
सँभाल के रख दी गई 

एक किताब
का
एक एक पन्ना 

चिपके हुऐ एक दूसरे को
बहुत प्यार से छू रहा है 

जलने
क्यों नहीं देता
किसी दिन दिल को
कुछ देर के लिये यूँ ही ‘उलूक’ 

भरोसा रखकर
तो देख किसी दिन
राख
हमेशा नहीं बनती हर चीज 

सोचने में क्या जाता है
जलता हुआ दिल है
और पानी
बहुत जोर से कहीं से चू रहा है 

सोचने की छुट्टी
किसी एक छुट्टी के दिन 
सोच लेने से

कौन सा क्या 
इसका उसका कहीं हो रहा है । 

चित्र साभार: http://www.gograph.com

शनिवार, 27 सितंबर 2014

छोटी चोरी करने के फायदों का पता आज जरूर हो रहा है

                               

चोर होने की औकात है नहीं डाकू होने की सोच रहा है 
तू जैसा है वैसा ही ठीक है 
तेरे कुछ भी हो जाने से 
यहाँ कुछ
नया जैसा नहीं हो रहा है 

थाना खोल ले
घर के किसी भी कोने में 
और सोच ले
कुर्सी पर बैठा एक थानेदार 
मेज पर अपना सिर टिका कर सो रहा है 

देख नहीं रहा है दूरदर्शन आज का 
कुछ अनहोनी सी खबर कह रहा है 

चार साल के लिये अंदर हो जाने वाली है 
और ऊपर से
सौ करोड़ जमा करने का आदेश भी
न्यायालय
उसको साथ में दे रहा है 

बेचारी को
बहुत महँगा पड़ रहा है 
दोस्त देश के बाहर गया हुआ भी 
दो शब्द साँत्वना के नहीं कह रहा है 

समझ में
ये नहीं आ पा रहा है कि 
पुराना घास खा गया घाघ अभी तक अंदर है 
या बाहर कहीं किसी जगह अब मौज में सो रहा है 
खबर ही नहीं आती है उसकी कुछ भी मालूम नहीं हो रहा है 

आज कुछ कुछ
कोहरे के पीछे का मंजर
थोड़ा सा कुछ साफ जैसा हो रहा है 

बहुत समझदार है
मध्यम वर्गीय चोर मेरे आस पास का 
ये आज ही सालों साल सोचने के बाद भी बिना सोचे 
बस आज और आज ही पता हो रहा है 

हाथ लम्बे
होने के बाद भी 
लम्बे हाथ मारने का खतरा कोई फिर भी 
क्यों नहीं ले रहा है 

बस थोड़ा थोड़ा
खुरच कर दीवार का रंग रोगन 
अपने आने वाले भविष्य की संतानों के लिये
बनने वाले सपने के ताजमहल की पुताई का 
मजबूत जुगाड़ ही तो हो रहा है 

‘उलूक’ बैचेन है 
आज जो भी हो रहा है किसी के साथ 
इस तरह का बहुत अच्छा जैसा तो नहीं हो रहा है 

थोड़ी थोड़ी करती
रोज कुछ करती हमारी तरह करती 
तो पकड़ी भी नहीं जाती 
शाबाशियाँ भी कई सारी मिलती 
जनता रोज का रोज ताली भी साथ में बजाती 
सबकी नहीं भी होती
तो भी 
दो चार शातिरों की फोटो
खबर के साथ अखबार में 
रोज ही किसी कालम में नजर आ ही जाती 

दूध छोड़ कर
बस मलाई चोर कर खाने का 
बिल्कुल भी अफसोस 
आज जरा सा भी नहीं हो रहा है । 

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

करेगा कोई करे कुछ भी बता देगा वो उसी को एक साँस में और एक ही बार में

है कुछ भी
अगर पास तेरे
बताने को
क्यों रखता है
छिपा कर अपने
भेजे में संभाल के
देख ले क्या पता
कुछ हो ही जाये
कोशिश तो कर
छोटी सी ही सही
हिम्मत कर के
तबीयत से हवा में
ही ज्यादा नहीं तो
थोड़ा सा ही
ऊपर को उछाल के
तैरता भी रहेगा
माना कुछ कुछ
कुछ समय तक
समय की धार में
नहीं भी पकड़ेगा
कोई समझ कर
कबूतर का पंख
जैसा कुछ भी
अगर मान के
आकार में मिट्टी
या धूल का
एक गोला जैसा
ही कुछ देखेगा
कुछ देर के लिये
सामने अपनी
किसी दीवार के
खुश ही हो ले
दीवाना कोई
फुटबॉल ही समझ
लात मार कर
कहीं किसी गोल
में ले जा कर
ही डाल के
दो चार छ: आठ
बार में कुछ
करते करते
कई दिनों तक
कुछ हो ही जाये
यूँ ही कुछ कहीं
भी कभी एक दिन
किसी मंगलवार के
एक कहने वाला
कर जाये दो मिनट
में आकर बात फोड़
उस कमाल पर
करके धमाल
अपने जीभ की
तलवार की
तीखी धार के
तेरे कहने को
ना कहने से भी
होने जा रहा
कुछ नहीं है
निकलना है जब
तस्वीर का
उसके ही बोल
देने का
सब कुछ
पन्ने में
उसके ही किसी
अखबारों के
अखबार के
सोच ले ‘उलूक’
जमा करने पर
नहीं होना है
कुछ भी को
जमा कर लेने पर
कौड़ियों की सोच
का कोई खरीददार
नहीं मिलता है
इस जमाने की
दुकानों में
किसी भी
बाजार के ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

लिखा होता है कुछ और ही और इशारे कुछ और जैसे दे रहा होता है


कारवाँ कुछ ऐसे जिनके शुरु होने के बारे में
पता नही होता है
ना ही पता होता है उनकी मंजिल का
बस यूँ ही होते होते महसूस होता है
शामिल हुआ होना किसी एक ऐसी यात्रा में
जहाँ कहीं कुछ नहीं होता है

आसपास क्या 
कहीं दूर दूर बहुत दूर तक
घने जंगल के बीच
पेड़ों के बीच से आती रोशनी की
किरणों से बनते कोन या फिर
सरसराती हवाओं का शोर
गिरते पानी की छलछलाहट
या फिर झिंगुरों की आवाज
सबका अलग अलग अपना अस्तित्व
समझने की जरूरत कुछ भी नहीं होती है

फिर भी अच्छा सा महसूस होता है
कभी कभी गुजर लेना कुछ दूर तक
बहुत सारे चलते कारवाओं के बीच से चुपचाप बिना कुछ कहे सुने 
लिखते लिखते बन चुके शब्दों के कारवाओं के बीच

निशब्द कुछ शब्द भी यही करते हैं
मौन रहकर कुछ कहते भी हैं और नहीं भी कहते हैं
समझने की कोशिश करना हमेशा जरूरी भी नहीं होता है

कभी कभी किसी का लिखा
कुछ नहीं भी कह रहा होता है
पढ़ने वाला बस
एक नजर कुछ देर बिना पढ़े
लिखे लिखाये को बस देख रहा होता है

समझ में कुछ नहीं भी आये
फिर भी एक सुकून जैसा कहीं
अंदर की ओर कहीं से कहीं को बह रहा होता है
महसूस भी कुछ हो रहा होता है ।

चित्र साभार: http://www.clipartpanda.com

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 47 पृ112 

बुधवार, 24 सितंबर 2014

बहुत कुछ है तेरे पास सिखाने के लिये पुराना पड़ा हुआ कुछ नई बाते नये जमाने की सिखाना भी सीख


सीख क्यों नहीं लेता 
बहुत कुछ है सीखने के लिये सीखे सिखाये से इतर भी 
कुछ इधर उधर का भी सीख 

ज्यादा लिखी लिखाई पर
भरोसा करना ठीक नहीं होता 
जिसे सीख कर
ज्यादा से ज्यादा 
माँगना शुरु कर सकता है भीख 

भीख भी
सबके नसीब में नहीं होती मिलनी 
पहले कुछ इधर भी होना सीख 

इधर आकर सीखा जायेगा बहुत कुछ इधर का 
उसके बाद इधर से उधर होना भी कुछ सीख 

बेनामी आदमी हो लेना उपलब्धि नहीं मानी जाती 
किसी नामी आदमी का खास आदमी होना भी सीख 

लाल हरी नीली गेरुयी पट्टियाँ ही अब होती हैं पहचान 
कुछ ना कुछ होने की सतरंगी सोच से निकल 
किसी एक रंग में खुद को रंगने रंगाने की सीख 

रोज गिरता है अपनी नजरों से 
लुटेरों की सफलता की दावतें देख कर 
कभी सब कुछ अनदेखा कर
अपनी चोर नजर उठाना भी सीख 

जो सब सीख रहे हैं सिखा रहे हैं 
कभी कभी उन की शरण में जाना भी सीख 

अपना भला हो नहीं सकता तुझसे 
तेरे सीखे हुऐ से किसी और का भला 
उनकी सीख को सीख कर ही कर ले जाना सीख 

कितना लिखेगा
कब तक लिखेगा इस तरह से ‘उलूक’ 
कभी किसी दिन खाली सफेद पन्नों को
थोड़ी सी साँस लेने के लिये भी
छोड़ जाना भी सीख । 

चित्र साभार: http://www.clipartpal.com/

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

सब कुछ सब की समझ में आना जरूरी नहीं पर एक भोगा हुआ छाँछ को फूँकने के लिये हवा जरूर बनाता है


मकड़ी की फितरत है क्या करे
पेट भरने के लिये खून चूस लेती है
उतना ही खून जितनी उसकी भूख होती है

मकड़ियाँ मिल कर जाल नहीं बुनती हैं
ना ही शिकार को घेरने के लिये
कोई षडयंत्र करने की
उनको कोई जरूरत होती है

हर आदमी मकड़ी नहीं होता है
ना ही कभी होने की ही सोचता है
कुछ आदमी जरूर मकड़ी हो जाते हैं
खून चूसते नहीं है खून सुखाते हैं
शायद ये सब उन्हे 
उनके पूर्वजों के खून से ही मिल जाता है
विज्ञान का सूत्र भी कुछ ऐसा ही समझाता है

खून सुखाने के लिये 
कहीं कोई यंत्र नहीं पाया जाता है
एक खून सुखाने वाला 
दूसरे खून सुखाने वाले की हरकतों से
उसे पहचान जाता है
सारे खून सुखाने वाले
एक दूसरे के साथ मिल जुल कर
भाई चारा निभाते हैं
हजारों की भीड़ भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता है
अपने बिछुड़े हुऐ 
खून की गंध बहुत दूर से ही पा जाते हैं

अकेले काम करना 
इनकी फितरत में नहीं होता है
किसी साफ खून वाले को सूँघते ही
जागरूक हो कर शुरु हो जाते हैं
यंत्र उनका एक षडयंत्र होता है
पता ही नहीं चलता है खून सूखता चलता है

क्या ये एक गजब की बात नहीं है
‘उलूक’ भी ये सब
देख सुन कर सोचना शुरु करता है
ऐसा कारनामा 
जिसमें ना जाल होता है
ना मक्खी फंसती है ना खून निकलता है

मकड़ी और मक्खी आमने सामने होते हैं
मकड़ी मुस्कुराती है 
मक्खी के साथ बैठी भी नजर आती है
खून बस सूख जाता है
किसी को कुछ भी पता नहीं चल पाता है

मकड़ियाँ कब से पकड़ रही हैं मक्खियों को
और इससे ज्यादा उनसे कई जमानों तक
और कुछ नया जैसा नहीं हो पाता है

पर उनका सिखाया पाठ आदमी के लिये
वरदान हो जाता है
होता हुआ कहीं कुछ नजर नहीं आता है
लाठी भी नहीं टूटती है और साँप भी मर जाता है ।

चित्र साभार: http://faredlisovzmesy.blogspot.in

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 49 पृ116

सोमवार, 22 सितंबर 2014

सब कुछ नीचे का ही क्यों कहा जाये जब कभी ऊपर का भी होना होता है

ऊपर
पहुँचने पर

अब
ऊपर
कहने पर

पूछ
मत बैठना

कौन सा ऊपर

वही ऊपर
जहाँ से ऊपर

सुना है
कुछ भी
नहीं होता है

बचा कुचा
बाकी जो
भी होता है

सब
उस ऊपर
के नीचे
ही होता है

हाँ
तो उस ऊपर

अब
मुझे ही
कुछ संशय
यहाँ होना
यहीं से
शुरु होता है

ऊपर
अगर पहुँच
भी गया तो

कहाँ
भेजा जायेगा

दो जगह

यहाँ
नीचे वालों को
समझाई
गई होती हैंं 

जिंदा
रहते रहते

एक
ऊँची जगह
पर स्वर्ग

और
एक
नीची जगह
पर नरक
होता है

अब
ऐसी बात
पूछी भी
किससे जाये

पता नहीं
किस किस को
उस ऊपर
के बारे में

क्या क्या
पता होता है

यहाँ के
हिसाब से
इस जमाने में
सही ही
सही होता है

और
सही का ही
बहुमत होता है

अल्पमत वाला
हमेशा ही
गलत होता है

सही को
देख देख कर
खुंदक में
कुछ ना कुछ
कहता रहता है

उसी को
कहना होता है
उसी कहने को
उसी को
सुनना भी होता है

याद
ना रह जाये कहीं
बहुत दिनों तक

इसलिये
लिख लिखा के
कहीं पर
रख देना होता है

इस सब
लिखे लिखाये
के
हिसाब किताब
पर ही

ऊपर
जा कर के
कर देना होता है

‘उलूक’
नीचे के सारे
स्वर्गवासियों के साथ

जिसे
नहीं रहना होता है

उसे
ऊपर जाकर भी

ऊपर के
नीचे वाले में
ही रहना होता है ।

चित्र साभार: http://theologyclipart.com/

रविवार, 21 सितंबर 2014

बीमार सोच हो जाये तो एक मजबूत शब्द भी बीमार हो जाता है

शब्दों का
भी सूखता
है खून
कम हो
जाता है
हीमोग्लोबिन

शब्द भी
हमेशा
नहीं रह
पाते हैं
ताकतवर

झुकना शुरु
हो जाते हैं
कभी
लड़खड़ाते हैं
कई बार
गिर भी
जाते हैं

बात इस
तरह की
कुछ पचती
नहीं है
अजीब सी
ही नहीं
बहुत ही
अजीब सी
लगती है

पर क्या
किया जाये
कई बार
सामने वाले
के मुँह से
निकलते
मजबूत
शब्द भी
मजबूर
कर देते हैं
विवश
कर देते हैं
सोचने के लिये
कि
बोलने वाला
बहुत ही
खूबसूरत
होता है
सभ्य भी
दिखता है
उम्र पक
गई होती है
और
सलीका
इतना कि
जूते की
सतह में
सामने
वाले का
अक्स
दिखता है

फिर भी
बोलना
शुरु करता
है तो
गिरना
शुरु हो
जाते हैं
वो शब्द भी
जो बहुत
मजबूत
शब्द माने
जाते हैं

इतिहास
गवाह
होता है
किसी एक
खाली धोती
पहनने वाले
शख्स के
द्वारा
मजबूती से
पूरी देश
की जनता
से बोले
जाते हैं

सुनने वाले
को देते
हैं उर्जा
बीमार
से बीमार
को खड़े
होने की
ताकत
दे जाते हैं
और
 वही शब्द
निकलते
ही किसी
के मुँह से
खुद ही
बीमार
हो जाते हैं
लड़खड़ाने
लगते हैं
और
कभी कभी
गिरना
भी शुरु
हो जाते हैं

एक
शब्द ही
जैसे खुद
अपनी ऊर्जा
को पचा
जाता है
अर्थी के
साथ चल
रहे लोगों के
मुँह से
निकलता
 ‘राम नाम सत्य है’
जैसा हो
जाता है ।

चित्र साभार: http://expresslyspeaking.wordpress.com/

शनिवार, 20 सितंबर 2014

खाना पीना और सोना ही बस जरूरी होता है

रजिस्टर में
जैसे करने हों
उपस्थिति
के हस्ताक्षर

और डालना हो
समय और दिँनाक भी

लिखने का
मतलब
बस इतना ही
नहीं होता है

हाँ
कभी कभी
अवकाश
सरकारी
भी होता है

सरकारी
ना सही
गैर सरकारी
भी होता है

बहुत से
कारण
भी होते हैं

बहुत से लोग
कभी भी कुछ भी
नहीं लिखते हैं

किसने कह दिया
लिखना बहुत ही
जरूरी होता है

दवाईयाँ भी होती हैं
मरीज भी होता है
मर्ज भी होता है
मौत भी होती है

जिंदा
दिखता भी है
और मरा हुआ
भी होता है

सोच में
रोक टोक
नहीं होती है
सोचने वाला ही
घोड़ा होता है

उसके
हाथ में ही
चाबुक होता है
लगाम भी वही
लगाता है

किसी और को
कुछ भी पता
नहीं होता है

किसी के
सोच का
यही सरपट
दौड़ने वाला घोड़ा

किसी के लिये
बस एक धोबी का
लद्दू गधा होता है

और
गधे को कैसे
पाला जाता है

उस पर
बहुत कुछ
बताने के लिये
उसके पास
बहुत कुछ होता है

ऐसे सभी
घुड़सवारों का
अपना एक
गिरोह होता है

जिनके पास
ना तो घोड़ा होता है
ना कोई गधा होता है

इन सब का काम
सोच के घोड़े
दौड़ाने वालों के
घोड़ों को

उनकी
सोच में ही
दौड़ा दौड़ा कर
बेदम कर
गिरा देना होता है

और इस
सब के लिये
उनके पास
सोच में
दौड़ते घोड़ों
को गिराने का
हथौड़ा होता है

‘उलूक’ तू जाने
तेरी सोच जाने
पता नहीं
किस डाक्टर ने
कह दिया
है तुझसे

कि
ऊल जलूल
भी हो सोच में
कुछ भी

तब भी
लिखना
जरूरी होता है ।

चित्र साभार: http://www.briskpost.com/

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

कुर्सियों में बैठ लेने का मतलब बातें करना ही नहीं होता है हमेशा

एक तरफ
रोज ही
आकर
बैठ जाना
कुछ लोगों का
एक दूसरे के
अगल बगल
की कुर्सियों में


और सेंकना
दोपहर की
तेज धूप में
सीमेंट के खम्बों
की छाँव को

वो इसलिये नहीं
कि कुर्सियाँ
खाली हैं
और कहीं
बैठने की जगह
भी नहीं है 
उनके लिये 

या फिर वो
सब मित्र हैं
एक दूसरे के

उनकी
मजबूरी है
एक दूसरे के
साथ बैठना

और करना
देश और
देशभक्ति
की बातें

या बताना
अपनी अपनी
ईमानदारी की
परी कथाऐं
एक दूसरे को

कोई नहीं
सुनता है
किसी की

सबको
कुछ ना कुछ
कहना होता है
कहते रहना होता है

और
सबके कान
लगे होते हैं
एक दूसरे के
मुँह से निकलती
हुई बातों में

जैसे पता नहीं
किसी एक क्षण
किसी की जबान
फिसल जाये

और
उसके अपने
मतलब का
कुछ
निकल कर
हाथ में आ जाये

और दूसरी ओर
कुछ लोग
और होते हैं

जिनको
कहीं बैठना
नहीं होता है

बस
देखना होता है
कुर्सियों को

पहले खाली
फिर कुछ बैठे
हुऐ लोगों के साथ
रोज ही

जैसे उनके
भविष्य की चिंता
का बोझ लिये हुऐ
कुर्सियाँ लगी होती हैं

बहुत सी खाली
जगहों पर
या इसी तरह
कई और दूसरी
जगहों पर भी

जो रोज रख
दी जाती हैं
सुबह सुबह बाहर

और संभाल
दी जाती है
शाम को
आने वाले कल
के दिन के लिये
फिर से बाहर
निकाल कर
रखने के लिये ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

“जीवन कैसा होता है” अभी कुछ भी नहीं पता है सोचते ही ऐसा कुछ आभास हो जाता है


बिना सोचे समझे
कुछ पर कुछ भी लिख देने की आदत
लिख भी दिया जाता है कुछ भी
बात अलग है

कुछ दिनों बाद
फिर से बार बार कई बार
पढ़ने पर उस कुछ को
खुद को भी 
कुछ भी समझ में नहीं आता है

किसी को लगने लगता है शायद
सरल नहीं कुछ गूढ़ कहा जाता है
कौऐ पर मोर पंख लगा दिया जाये
तो ऐसा ही कुछ हो जाता है

और ऐसे में अनजाने में
उससे पूछ लिया जाता है ऐसा प्रश्न
जिसे समझने समझने तक
अलविदा कहने का वक्त हो जाता है
और प्रश्न प्रश्न वाचक चिन्ह
का पहरा करते हुऐ जैसे कहीं खड़ा रह जाता है

“जीवन कैसा होता है ?”
कुछ कहीं सुना हुआ जैसा कुछ ऐसा नजर आता है

जिसपर सोचना शुरु करते ही
सब कुछ उल्टा पुल्टा होने लग जाता है
कुछ दिमाग में जरूर आता है
थोड़ी सी रोशनी भी कर जाता है
फिर सब वही धुँधला सा धूल भरा
नीला आसमान भूरा भूरा हो जाता है

बताया भी नहीं जाता है
कि सामने से कभी 
एक परत दर परत खुलता हुआ प्याज आ जाता है
कभी एक साबुन का हवा में
फूटता हुआ बुलबुला हो जाता है

कभी भरे हुऐ पेटों के द्वारा
जमा किया हुआ अनाज की बोरियों का
जखीरा हो जाता है

क्या क्या नहीं दिखने लगता है सामने सामने
एक मरे शेर का 
माँस नोचते कुत्तों पर लगा सियारों का
पहरा हो जाता है

अरे 
नहीं पता चल पाया होता है
कुछ भी ‘उलूक’ को
एक चौथाई जिंदगी गुजारने के बाद भी

एक तेरे प्रश्न से जूझते जूझते रात पूरी की पूरी
अंधेरा ही अंधेरे पर सवार होकर
जैसे सवेरा हो जाता है

फिर कभी देखेंगे पूछ कर
किसी ज्ञानी से “जीवन कैसा होता है”
सभी प्रश्नों का उत्तर देना
किस ने कह दिया 
हर बार बहुत ही जरूरी हो जाता है

पास होना ठीक है
पर कभी कभी फेल हो जाना भी
किसी की एक बड़ी मजबूरी हो जाता है ।

चित्र साभार: http://ado4ever.overblog.com/page/2

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 50 पृ119 

बुधवार, 17 सितंबर 2014

सात सौ सतत्तरवीं बकवास नहीं कही जा सकती है बिना कुछ भी देखे सुने अपने आसपास

आप बीती
कह लीजिये
या जग बीती

जब
देखी सुनी
महसूस की
जाती हैं

तभी कही
और लिखी
भी जाती है

कहानियाँ
राजा रानी
राजकुमारी की
कह लीजिये
या परियों की
ऐसे वैसे भी
बुनी जाती हैं

सबको ही
दिखाई देता है
कुछ ना कुछ
अपने आस पास
देखने वाले की
नजर पर होता है

होने ना होने
में से कौन सी
चीज उसको
उसके काम की
नजर आती है

सभी पढ़ते हैं
एक ही किताब
से एक ही नज्म
हर किसी के
लिये नहीं होता
बन जाना
उसका एक गीत
किसी किसी को
दूर दूर तक
वही एक काली
भैंस की सींग
नजर आती है

‘उलूक’
सभी एक मत से
कह रहे होते हैं
जहाँ कुछ नहीं है
तेरी फितरत का
क्या किया जाये

समझ में
नहीं आता है
तुझे वहाँ पर भी
कुछ लिख लिखा
देने के लिये
एक तस्वीर
नजर आती है

हर कोई बजा
रहा है तालियाँ
हवा में उनके
हवा महल की
हवा में हो रही
हवा बाजी पर

कह क्यों नहीं
पाता उन सब की
हवा की तारीफ
करने में तेरी
खुद की हवा
निकल जाती है ।

चित्र साभार: http://blogs.msdn.com/

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

बात करने का सलीका बातें करते करते ही आ पाता है

अपने
मतलब
की बातें
करने के
लिये ही
हर कोई
बात करने
के लिये
आता है

नहीं भी
करना चाहो
अगर बात
कोई अपनी
तरफ से
अपनी बात
को घुमा
फिरा कर
उसी तरह
की बातों
की तरफ
खींच तान
कर सारी
बातों का
रास्ता
बनाता है

सब को
आती है
होशियारी
अपने अपने
हिसाब की
दूसरे के
हिसाब के
घाटे के
बारे में
कौन जानना
चाहता है

पता रहता है
उबल रही है
कोई चाय
दिमाग के अंदर

पत्तियों को
छानने के
लिये छलनी
अपनी
अपने घर
से ही ले
आता है

खुदगर्ज
जितना
होता है बड़ा
खुद उतनी
ही बड़ी
बातों में उसे
सामने वाले
को उलझाना
आता है

उसकी
इसकी
बातों की
बातें ही
बस बातें
होती है
अपनी बात
करने में
बात ही
बात में
बातों से
कन्नी काट
जाता है

बातों ही
बातों में
बातों से
बातों को
खोदना भी
बात करने
वालों से
ही सीखा
जाता है

और
कोई ऐसा
भी होता
है कहीं
करता है
खुद की
बातें खुद
से ही
पर क्यों

‘उलूक’
देखता है
किसी के
बुदबुदाने
को बरसों
से अपने
सामने से
पर समझ ही
नहीं पाता है

खुद से
खुद की
बातें
करने वाला
उसे बात
ही नहीं
मानता है
कवि की
कविता
कहने पर
कुछ दाँत
दिखाता है।

चित्र साभार : http://galleryhip.com/kids-conversation-clipart.html

सोमवार, 15 सितंबर 2014

बात एक नहीं है अलग है वो इधर से उधर जाता है और ये उधर से इधर आता है


कितना कुछ ही नहीं
बहुत कुछ बहुत अच्छा लिखा हुआ
बहुत सी जगहों पर नजर आता है

सोच में पढ़ जाती है खुद की सोच ही
वैसा ही सब कुछ मुझसे भी क्यों नहीं लिखा जाता है

लिखना शुरु करो नहीं कि
दिन भर का देखा सुना सामने से आ जाता है
दूरदर्शन रेडियो अखबार में भी आता है बहुत कुछ
मगर हमेशा और ही और कुछ आता है

उन सबकी होती है अपनी अपनी सोच पर पकड़
फिसलती हुई सोच को 
पकड़ कर जकड़ना भी जिनको अच्छी तरह आता है
कोशिश हमेशा ही होती है चलने की सीधे सीधे ही
पता ही नहीं चलता 
कौन सा मोड़ सोच में मोच ले आता है

कहीं भी किसी भी पन्ने में वो सब नहीं लिखा दिखता है
जो लगभग हर चेहरे के
पारदर्शी मुखौटे के पीछे नजर आता है
लगने लगता है ऐसे ही समय में
जैसे बस ‘उलूक’ ही 
दिवास्वपनों का खोमचा जानबूझ कर लगाता है

अपनी अपनी प्रायिकता होती है होनी भी चाहिये
कोई खाने पीने और कोई पीने खाने को अच्छा बताता है
किसी को आदत हो जाती है नशा करने की
किसी पीने की या खाने की चीज से
किसी को लिखने लिखाने से ही नशा हो जाता है
नशा होना ही इस तरह का
कलम को कहाँ से कहाँ बहका ले जाता है

फूल की सोचता है सोच में
मगर कलम तक आते आते गाजर का हलुआ हो जाता है
समझ में आ ही गया होगा
उससे अच्छा कुछ मुझसे कभी क्यों नहीं लिखा जाता है ।

चित्र साभार: http://wecort.com/

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 48 पृ114  

रविवार, 14 सितंबर 2014

इस पर लिख उस पर लिख कह देने से ही कहाँ दिल की बात लिखी जाती है



डबलरोटी
और
केक 
की
लड़ाई
लड़ने वालों 
की
सोचते सोचते 

तेरी
खुद की सोच 
क्यों
घूम जाती है 

रोटी
मिल तो 
रही है तुझको 
क्या
वो भी तुझसे 
नहीं
खाई जाती है 

कल
लिखवा गया 
कुछ
उस्तादों के 
उस्ताद
और
उसके 
धूर्त शागिर्दों पर 

आज
बाबाओं और 
भक्तों पर
कुछ 
लिखने की
तेरी 
फरमाईश
सामने 
से आ जाती है 

बदल रही है 
दुनियाँ
बड़ी तेजी से 

घर घर में
खुलती 
बाजार पर
तेरी 
नजर
क्यों
फिर 
भी नहीं जाती है 

आदमी
बेच रहा है 
आज आदमी को 

इंसानियत
सबसे 
आसानी से 
जगह जगह 
बेची जाती है 

बाबा चेले गुरु शिष्य 
हुआ करते होंगे 
किसी जमाने 
की
परम्पराऐं 

आज
हर किसी की 
नजर
हजारों करोड़ों 
की
सम्पति होने 
पर ही
भक्तिभाव
और 
चमक दिखाती है 

ग्रंथ
श्रद्धा के प्रतीक 
हुआ करेंगे
सोच कर 
लिख गये योगी 

देखते
आज सामने 
से ही अपने 
मनन चिंतन
की 
सीमाओं को तोड़कर 

कैसे पाठकगण 
उपभोक्ता

और 
कल्पनाऐं
उपभोग 
की
वस्तु हो जाती हैं 

अच्छी सोच की 
कोपलें भी हैं 
बहुत सी डालों पर 
जैसे एक तेरी 

हर जगह अलग अलग 
रोज ही खिलती हैं
और 
रोज के रोज ही 
मुरझा भी जाती हैं 

‘उलूक’ देखता है 
सब कुछ अंधेरे में 

रोज का रोज 
लिखना लिखाना 
उसके लिये

बस एक 
आवारगी
हो जाती है ।
  
चित्र साभार: http://www.illustrationsof.com/

शनिवार, 13 सितंबर 2014

मित्र “अविनाश विद्रोही” आपके आदेश पर इतना ही कुछ मुझ से आज कहा जायेगा

मित्र आपने
आदेश दिया है

उस पर
और उसके
चित्र के पाँव
सड़क पर
दिखा दिखा कर
धो कर पीने
वालों पर
कुछ लिखने
को कहा है

आपके
आदेश का
पालन करने
जा रहा हूँ

मैं आपके
उस सबसे
बड़े महान
के ऊपर
आज कुछ
लिखने ही
जा रहा हूँ

नाम
इसलिये नहीं
ले पा रहा हूँ

कहीं
इस बदनामी
का फायदा भी वो
उठा ले जायेगा

बहुत दिन
पोस्टरों में
रहा है गली गली
इस देश की

आने वाले
समय के
मंदिरों की
मूर्ति हो जायेगा

आज
साईं बाबा
को बाहर
फेंका जा रहा है

कल
हर उस
खाली जगह
पर वो
खुद ही जाकर
अपना बैठ जायेगा

उसके
चमचों की
बात कर के क्यों
अपना दिमाग
खराब करते हो

अभी
बहुत सालों तक
हर गली हर पेड़ पर
वो ही लटका हुआ
नजर आयेगा

इस देश
की किस्मत
अच्छी कही जाये
या बुरी

तेरी मेरी
किस्मत में
फुल स्टोप
उसके चमचे
का कोई चमचा
ही लगायेगा

सोच कर
आया था
‘उलूक’

पाँच साल
पूरे हो चुके
ब्लाग पर

अब शायद
गली की
बातों को छोड़
घर की रोशनी पर
कुछ लिखा जायेगा

किसे
मालूम था
फेस बुक के
संदेश बक्से में

तेरा संदेश
उस पर
और
उसके चमचों पर
कुछ ना कुछ
लिख ले जाने
को उकसायेगा

उसके
पाँच सालों पर है
तेरी काली नजर

पर
अगले पाँच साल भी
उसका कोई ना कोई

चमचा
तुझे जरूर
कहीं ना कहीं रुलायेगा

क्या पता

उसकी
हजार फीट
की प्रतिमा
बनाने के
नाम पर
कुछ लोहा
माँगने ही
तेरे घर ही
आ जायेगा ।

चित्र साभार: http://www.canstockphoto.com/

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

आज ही पाँच साल पहले शुरु किया था यहाँ आ कर कबूतर उड़ाना


च्यूइंगम को चबा चबा कर
मुँह के अंदर ही अंदर
लम्बा खींच कर बाहर ले आना

फिर लपेटते हुऐ उसे फिर से
मुँह के अंदर कर ले जाना फिर चबाना

कुछ इसी तरह का
लिखने लिखाने के साथ हो जाना

छोटी सी बात का
बतंगड़ बनाते बनाते
बातें बनाने की आदत हो जाना

कुछ ऐसी ही बीमारी का
एक छोटा सा कीटाणु
अंदर ही कहीं सोया हुआ किसी के
किसी को नजर आ जाना

मौका मिलते ही 
उसे काँटा चुभा कर चम्पत हो जाना

एक खतरनाक लेखक का
एक नासमझ के हाथ में
लिखने लिखाने की पिचकारी थमा जाना

एक अनाड़ी का
खिलाड़ियों के खेल पर कमेंटरी
रोज का रोज देकर जाना शुरु हो जाना

खेल का मैदान पर चलते रहना
मैदान की पुरानी घास का
नई हो कर उग जाना

खिलाड़ियों का अनाड़ियों को
रोज पागल बना ले जाना

शुरु होना 
एक भड़ास का कागज पर उतरना

शरम छोड़ कर
भड़ास का ही खुद बेशरम हो जाना

बेबस ‘उलूक’ के हाथ से
बात का निकल जाना

पांंच साल की हर बात का
अपनी जगह पर चले जाना

फिर से एक पुराने उधड़ चुके
कफन का झंडा डंडे पर लगा
अगले पाँच साल की सोचना शुरु हो जाना

ज्यादा नहीं भी 
दो चार के रोज का रास्ता
चलता रहेगा आना जाना

बस यही सोच कर कब्र के ऊपर
दो चार फूलों के बीज छिड़क कर
वापस यहीं आ जाना

च्यूइंगम चबाना
कुछ लम्बा खींच लेना
कुछ गोले मुँह से बनाना ।

चित्र साभार: http://www.illustrationsof.com/