गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बीमार था आदतन भरे पेट रोटियों पर झपट रहा था


कई सालों से
जिसे 
एक चिराग मान कर 
उसके कुछ फैलाने को रोशनी समझ रहा था 

पता नहीं क्या क्या था 
और क्या क्या नहीं था
किस को क्या और किस को क्या
कोई 
क्यों समझ रहा था 

चिराग है वो एक 
उसने ही कहा था 
सभी से और मुझ से भी 

एक बड़े झूठ को 
उसके कहने पर
जैसे 
सच मुच का सच मैं समझ रहा था 

रुई की लम्बी बाती 
बस एक ही नहीं थी
और बहुत सारी अगल और बगल में भी रख रहा था 
सिरा उसके पास ही था सभी का
और 
पूँछ से जिनकी कई और चिरागों से 
कुछ ना कुछ चख रहा था 

अपने तेल के स्तर 
को बराबर
उसी 
स्तर पर बनाये भी रख रहा था 
भूखे चिरागों के लड़ने की ताकत को
उनके तेल के 
स्तर के घटने से परख रहा था 

रोशनी की बातों को 
रोशनी में
बहुत जोर 
दे दे कर सामने से 
जनता के रख रहा था 

एक खोखला चिराग 
रोशन चिराग का पता
अपनी छाती 
पर चिपकाये 
पता नहीं कब से कितनों को ठग रहा था 

अंधा ‘उलूक’ 
अंधेरे में बैठा दोनों आँख मूँदे 
ना जाने कब से रोशनी ही रोशनी 
बस बक रहा था । 


चित्र साभर: http://www.shutterstock.com/

'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 51 पृ122 

15 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आभारी हूँ आपके हौसला बढ़ाने का पर कविता कहाँ है शास्त्री जी ? और कला के पुजारी तो आप हैं हमारी तो बस कुछ भड़ास है ।

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  2. आपकी लिखी रचना शनिवार 13 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. बहुत सुन्दर !आप ने सिद्ध किया कि छंद की मोहताज़ नहीं ही कविता !

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ प्रसून जी पर कविता तो कविता होती है और जो लिखा जाता है यहाँ वो कुछ भी होती हो कविता नहीं होती है ।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (13-09-2014) को "सपनों में जी कर क्या होगा " (चर्चा मंच 1735) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. पर आँखें तो उसी की हि खुली थी
    बेहतरीन रचना


    मेरे ब्लॉग तक भी पधारिये मुझे अच्छा लगेगारंगरूट

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  6. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 17 अगस्त 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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