गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

बापू आ ही जाना याद कल भी चलो



रास्ते अब दूर दूर तक कहीं भी
आसपास अपने नजर नहीं आते हैं
किसी ने अभी याद दिलाया मगर
हम तो कहीं भी आते जाते नहीं हैं

छोड़ ही दिए तेरे बताए सारे रास्ते
रास्तों में ही कहीं नहीं बताते हैं
किसने चलना है अब कहीं
तेरा नाम आते ही रास्ते बदल जाते हैं

परछाइयां ढक दी गई हैं मूर्तियों की
बुत के चित्र से आग जलाते हैं
कैसे करे कोई तर्पण कोई अर्पण
यहाँ खंजर बेबात पर निकल जाते हैं

तू मानुष ही रहा ताजिंदगी जहाँ
वहां आदमी के मंदिर बनाए जाते हैं
तेरे बारे में बातें करें भी करें कैसे
सत्य ही अहिंसा को अधर्म बताते हैं

‘उलूक’ कैसे बचेगा कब तक बचेगा
रोशनी सारे अंधे अब अंधेरे में ही पढ़ाते हैं
बापू आ ही जाना याद कल भी चलो
जब तक लाठी चश्मे धोती हम नहीं बेच खाते हैं |

चित्र साभार: https://www.google.com/

16 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय सर,आधुनिक समाज की नैतिक गिरावट, दिखावे और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों के प्रति बढ़ती बेरुखी पर एक तीखा व्यंग्य। बापू के आदर्शों के प्रति समाज की झूठी निष्ठा को उजागर करते हुए आत्मचिंतन की प्रेरणा देती आपकी अभिव्यक्ति बेहद बहुमूल्य है।
    सादर प्रणाम सर
    बहुत आभार आपका।
    ------

    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. पियारे बापू,
    आप आए आए तो आए
    संग शास्त्री जी को भी लेआए
    अब आ ही गए हो तो
    बधाइया भी लेते जाइए
    वंदन

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  3. राष्ट्रनायकों को नमन
    और
    आपको जन्मदिन 🎁 की बधाई

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  4. भावपूर्ण भावाभिव्यक्ति ।जन्मदिन की हार्दिक बधाई सर!

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  5. सामाजिक संदर्भ और आदर्श बदल गये हैं. सार्थक रचना
    जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाए

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