सोमवार, 16 अप्रैल 2012

बातें ही बातें

लिख लिख
कर अपनी
बातों को
अपने से ही
बातें करता हूँ

फिर
दिन भर पन्ना
खोल खोल
कई कई बार
पढ़ा करता हूँ

मेरी बातों
को लेकर
वो सब भी
बातेंं करते हैं

मैं बातेंं ही
करता रहता हूँ
बातों बातों
में कहते
रहते हैं

इन सारी
बातों की
बातों से
एक बात
निकल कर
आती है

बातें
करने का
अंदाज किसी का
किसी किसी
की आँखों में
चुभ जाती है

कोई कर भी
क्या सकता है
इन सब बातों का

वो सीधे कुछ
कर जाते हैं
वो बातें कहाँ
बनाते हैं

मैं कुछ भी
नहीं कर
पाता हूँ
बस केवल
बात बनाता हूँ

फिर
अपनी ही
सारी बातों को
मन ही मन
पढ़ पाता हूँ

फिर
लिख पाता हूँ
कुछ बातें

कुछ बातें
लिख लिख
जाता हूँ

कुछ
लिखने में
सकुचाता हूँ

बस अपने से
बातें करता हूँ

बातों की बात
बनाता हूँ

बस बातें ही
कर पाता हूँ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. भैया !!
    खुब बनाते हो -
    विषय भी अच्छे लाते हो-


    बातें ही बातें यहाँ, धनी बात का होय ।
    परहित बातें कर रहा, अपना *आपा खोय ।

    अपना *आपा खोय, हास्य को है अपनाता ।
    हँसने का सन्देश, सभी को सदा सुनाता ।

    कुछ लोगों को किन्तु, नहीं हम दोनों भाते ।
    ग्यानी उल्लू देख, लोग अक्सर मुँह बाते ।

    *विनीत भाव ग्रहण करना

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  2. बहुत सारी बातें हो गई हैं बातों बातों में .......................आभार.

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