शनिवार, 14 जुलाई 2012

बहुत कम होते हैं

अपने ही बनाये
पोस्टर का
दीवाना हो जाना
बिना रंग भरे भी
क्योंकि पोस्टर अपना
कूची अपनी रंग अपने
और सोच भी अपनी
कभी भी उतारे
जा सकते हैं
अपनी इच्छा के सांचे में
जिस तरह चाहो
बस मूड अच्छा
होना चाहिये
उसके चश्में की
जरूरत होती है
उसके कैनवास पर
आड़ी तिरछी रेखाओं
से बने हुऎ चित्र को
देखने के लिये
हर कोई रख देता है
अपना कैनवास
समझने के लिये
किसी के भी सामने
पर उसे देखने के लिये
अपना चश्मा देने वाले
बहुत ही कम
लोग होते हैं
और ऎसे लोगों के
कैनवास भी
उनकी सोच ही के
बराबर उतने ही
बडे़ भी होते हैं

लेकिन ऎसे भी
कुछ लोग होते हैं।

7 टिप्‍पणियां:

  1. चश्मे का पड़ता फरक, दरक जाएगा चित्र ।

    हरे रंग का है अगर, भागे भगवा मित्र ।



    भागे भगवा मित्र, छीन कर कागज़-कूँची ।

    हालत बड़ी विचित्र, सोंच दोनों की ऊंची ।



    किन्तु संकुचित दृष्टि, दिखाए खूब करिश्मा ।

    कितना भी बदरंग, बदल पाते ना चश्मा ।।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    जवाब देंहटाएं
  4. बना रहे है पोस्टर, बिना भरे ही रंग
    बिन चश्मे के देखते,लगते है बदरंग,,,,,,,,

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही बेहतरीन रचना है...
    अपनी सोच को समझने वाले चाहिए बस
    सुन्दर प्रस्तुति:-)

    जवाब देंहटाएं
  6. ’अपना चश्मा देने वाले
    बहुत ही कम लोग होते हैं’
    भावोंका संयोजन सुंदर बन पडा है.

    जवाब देंहटाएं