बुधवार, 25 जनवरी 2017

बधाई है बधाई है बधाई है बधाई है



गण हैं तंत्र है सिपाही हैं
झंडा है एक है तिरंगा है

आजाद हैं आजादी है
शहनाई हैं देश है जज्बा है सेवा है
मिठाई है मलाई है मेवा है

चुनाव हैं जरूरी हैं लड़ना है मजबूरी है

दल है बल है
कोयला है कोठरी हैं
काजल है धुलाई है
निरमा है सफेद है जल है सफाई है

दावेदारी है दावेदार हैं
कई हैं प्रबल हैं
इधर हैं उधर हैं
इधर से उधर हैं उधर से इधर हैं

खुश हैं खुशी है
शोर है आवाजाही है

चश्मा है लाठी है धोती है
काली है सूची है
नाम लेने की भी मनाही है

सिल्क है अंगूठी है
कलफ है कोठी है
वाह है वाहवाही है

छब्बीस है जनवरी है
सालों से आई है

आती है जाती है
आज फिर से चली आई है

शरम की बात नहीं
बेशर्मी नहीं बेहयाई नहीं
‘उलूक’ की चमड़ी
खुजली वाली है खुजलाई है

कबूतरों की बारात है
देखी कहीं एसी कभी
कौओं की अगुआई है
कौओं ने सजाई है

गण हैं तंत्र है सिपाही हैं
झंडा है बधाई है
बधाई है बधाई है बधाई है ।


चित्र साभार: www.fotosearch.com

1 टिप्पणी:

  1. छब्बीस जनवरी है
    सालों से आती आई है
    सालों तक आती आयेगी
    कुछ न कुछ बदलाव लायेगी
    हमारे अधिकार हैं
    हमारे कर्तव्य है
    समय-समय पर याद दिलाती रहेगी।
    -----
    प्रणाम सर।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २६ जनवरी २०२४ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं