गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

पता नहीं कैसे कम बोला इस साल बमबोला बदजुबान

मेहरबान कद्रदान
बनी रहे
आन बान और शान

खुदा
मुआफ करे
किसी तरह छूटे
छूटे तो सही
गधे सी हो चुकी
ये लम्बी जुबान

काम की ना काज की
दुश्मन कलम दवात की

किसलिये
फिर फिर खोल बैठती है
पाँच दस दिन छोड़ कर
बन्द होती होती नजर आ रही
कबाड़ से भर चुकी
एक दशक पुरानी
फटे हाल बिन किताब की
पुस्तकालय का घूँघट ओढ़ी हुई
ये दुकान

राम नाम सत्य है
मुर्दा मगर मस्त है
जैसी बन चुकी हो जिसकी
शहर दर शहर श्मशान दर श्मशान
भूत प्रेतों के बीच
एक जबरदस्त पहचान

देखते हुऐ

जाते हुऐ
साल दो हजार बीस के
बनाये गये मुर्गों का
भूलना बाँग देना
और
दिखाई देना उनका
सपनों में भी
टाँग के नीचे से चोंच डालकर
कहते चले जाना
खींचो जरा जोर से खींचो
दो गज की दूरी बनाकर
अपने ना सही
पड़ोसी के ही कान

समझ में
आ ही गयी
ढोल पीटती अपनी बड़बड़ाहट
खींचती हुई नाक को
समझ कर झंडा देश का

मान कर फुसफुसाती हवा
कान में डालती जैसे मंत्र

अब तो बोल ‘उलूक’
जोर लगा कर
जय जवान जय किसान

अर्ध शतक पूरा हुआ
घबड़ाहट का ही मान लो
हड़बड़ाहट के साथ
बड़ी मुश्किल से

पता नहीं
कैसे
कम बोला इस साल
बमबोला बदजुबान ।

चित्र साभार: https://memegenerator.net/

19 टिप्‍पणियां:

  1. लॉकडाउन में घर बैठे भी उलूक कम क्यों बोला? उसे तो पहले से भी ज़्यादा बोलना चाहिए था. हम उसके मन की हर बात सुनने को, पढ़ने को, तैयार थे.

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 11 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१२-१२-२०२०) को 'मौन के अँधेरे कोने' (चर्चा अंक- ३९१३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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  4. राम नाम सत्य है
    मुर्दा मगर मस्त है
    जैसी बन चुकी हो जिसकी
    शहर दर शहर श्मशान दर श्मशान
    भूत प्रेतों के बीच
    एक जबरदस्त पहचान..। सारगर्भित अभिव्यक्ति..।

    जवाब देंहटाएं
  5. बेहद गहरी
    ....और हक़ीक़त की उम्दा बयानगी
    वाह

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  6. अभिव्यक्ति का निराला पन और वक्र-कथन.

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  7. बहुत पैना व्यंग्य, कम बोला पर जोरदार बोला !

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  8. खुदा
    मुआफ करे
    किसी तरह छूटे
    छूटे तो सही
    गधे सी हो चुकी
    ये लम्बी जुबान
    वाह क्या सटीक बात कही आपने..

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  10. वाह ... २०२० की पोल ढोल कर दी अपने ...
    ये साल पता नहीं क्या क्या कर चुका है ... सब से करवा चुका है ...

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  11. जाते हुऐ
    साल दो हजार बीस के
    बनाये गये मुर्गों का
    भूलना बाँग देना
    और
    दिखाई देना उनका
    सपनों में भी
    टाँग के नीचे से चोंच डालकर
    कहते चले जाना
    खींचो जरा जोर से खींचो
    दो गज की दूरी बनाकर
    अपने ना सही
    पड़ोसी के ही कान
    वाह!!
    क्या बात...।
    बहुत ही लाजवाब कान खिंचाई...

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