सोमवार, 16 जुलाई 2012

बस इधर और उधर

इधर जा
उधर जा
देखना मत
झांक आ

कहीं रूखा है
कहीं सूखा है
कहीं झरने हैं
कहीं बादल हैं
कोई खुश है
कोई बिदका है
जैसा भी है
कुछ लिखता है

इधर जा
उधर जा
झांक मत
देख आ

किसी का
अपना है
किसी का
सपना है
वो बनाता है
ये ढूँढ लाता है
उसकी आदत है
इधर जाता है
उधर जाता है
इसका लाता है
उसको दिखाता है
अपनी प्रोफाइल पर
कौए उड़ाता है

इधर जा
उधर जा
झाँक मत
देख मत

अपना खाना
अपना पीना
सब कुछ रख
फेंक मत
कैलेण्डर ला
दीवार पर लगा
अपनी तारीख
किसी को
ना बता
जाली चढ़ा
शीशे लगा
कुछ दिखे
बाहर से
काला भूरा
पेंट लगा

इधर जा
उधर जा
रुक जा
चुप हो जा
फालतू
ना सुना ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (17-07-2012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. आज का दर्शन तो बहुत ऊन्चेस्तर का है-
    बधाई भाई जी ||

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  3. क्या कहने !
    ऐसे ही हो गए हैं लोग आजकल।

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  4. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  5. गहन ...सहजता से कटु सत्य कहा ...!!
    शुभकामनायें.

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  6. ख़ामोशी से जैसे जीना चाहे जीता जा

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  7. गहन भाव लिए उत्‍कृष्‍ट लेखन ...आभार

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