सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

पता नहीं समझने में कौन ज्यादा जोर लगाता है




लिखे हुऐ से
लिखने वाले के बारे में पता चलता है 

क्या पता चलता है 

जब पढ़ने वाला 
स्वीकार करता है 
लिखने वाले के लिखे हुऐ का 
कुछ कुछ मतलब निकलता है 

ऐसा कहने में 
ऐसा भी लगता है 
कहीं कुछ है सीधा साधा 
जो सुलझने के बजाय बस उलझता है 

एक का एक चीज को सोचना 
फिर लिखने के लिये 
उसे थोड़ा थोड़ा करके खोदना 

कुछ दिख गया तो लिख डालना 
नहीं दिखा तो कुछ भी नहीं बोलना 
इस सब भाग दौड़ में शब्द दर शब्द को तोलना 
कुछ का भारी हो जाना कुछ का हल्का पड़ जाना 
कहने कहने तक बात का बतंगड़ हो जाना 

है ना परेशानी की बात 

सबसे बड़ी मुश्किल है 
एक दो अदद पाठक को ढूंढना 
उनका भी नखरों के साथ परोसे गये को सूंघना 

लड्डू की तारीफ कर हल्दीराम की काजू नमकीन बोलना 

इस सब में बहुत कुछ निकल के आ जाता है
बिना मथे भी दही से कैसे मक्खन को निकाला जाता है 

लिखना कोई सीख पाये या ना पाये

एक होशियार 
और समझदार पाठक 
लेखक के लिखे का मतलब निकाल कर 
लेखक को 
जरूर समझा जाता है ।

चित्र साभार: https://www.shutterstock.com/

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह पोस्ट आज के (२८ अक्टूबर , २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - कौन निभाता किसका साथ - पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  2. पढनेवाला शायद समझने में ज्यादा जोर लगाता है \
    नई पोस्ट सपना और मैं (नायिका )

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (29-10-2013) "(इन मुखोटों की सच्चाई तुम क्या जानो ..." (मंगलवारीय चर्चा--1413) में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  5. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 09 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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