शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

खा गालियाँ गिन नाले बनते बड़े छोटी होती नालियों से क्या उलझना

 

१९४७ और उससे पहले का देखा नहीं कुछ भी कही
बस कुछ पढ़ा कुछ सुना
किससे सुना ये ही मत पूछ बैठना
दिखा बना बैठा कुछ तुनतुना कुछ भुनभुना

नहीं देखा ना सुना जैसा है आसपास अभी अपने
तू गीत तरन्नुम में गा गुनगुना
लिखे में तेरे दिख रहा है साफ़ साफ़
कहीं तो बटा है और इफरात में झुनझुना

शब्द आते हैं जुबां तक बहुत ही सड़े गले
सारे रोक ले कुछ भी मत सुना
निगल ले गरल बन शिव कर तांडव घर के अन्दर
बस बाहर ना निकलना

कुत्ते को सिखा योग और आसन
खुद सीख ले कुछ काटना कुछ भौंकना
भगवान में ढूंढ थोड़ा सा आदमी और सीख ले
आदमी में भगवान को चेपना

‘उलूक’ हो जो भी दिखा कुछ और ही
सबसे बड़ा है आज का लपेटना
खा गालियाँ गिन नाले बनते बड़े
छोटी होती नालियों से क्या उलझना

चित्र साभार: https://www.alamy.com/

7 टिप्‍पणियां:

  1. खरी-खरी कहती हैं आपकी लेखनी । सादर नमन सर !

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" रविवार 28 अप्रैल 2024 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !

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  3. कुत्ते को सिखा योग और आसन
    खुद सीख ले कुछ काटना कुछ भौंकना
    भगवान में ढूंढ थोड़ा सा आदमी और सीख ले
    आदमी में भगवान को चेपना

    -गजब

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