रविवार, 2 फ़रवरी 2014

कुछ ना इधर कुछ ना उधर कहीं हो रहा था

लिखा हुआ
पत्र एक
हाथ में
कोई लिया
हुआ था

किस समय
और कहाँ पर
बैठ कर
या खड़े होकर
लिखा गया था

शांति थी साथ में
या बहुत से लोगो
की बहस सुनते हुऐ
कुछ अजीब सी
जगह से बिना
सोचे समझे ही
कुछ लिख विख
दिया गया था

कितनी पागल
हो रही थी सोच
किस हाल में 

शरीर बहक
रहा था

नहा धो कर
आया हुआ
था कोई
और खुश्बू से
महक रहा था

बह रही
थी नाक
छींकों
के साथ
जुखाम
बहुत
जोर का
हो रहा था

झगड़ के
आया था
कोई कहीं
आफिस में
बाजार में
या घर की
ही मालकिन से
पंगा हो रहा था

नीरो की
बाँसुरी भी
चुप थी
ना कहीं
रोम ही
जल रहा था

सब कुछ
का आभास
होना इस
आभासी
दुनियाँ में
कौन सा
जरूरी
हो रहा था

अपनी अपनी
खुशी
छान छान
कर कोई
अगर
एक छलनी
को धो रहा था

दुखी और बैचेन
दूसरा कोई कहीं
दहाड़े मार मार
कर रो रहा था

बहुत सी जगह
पर बहुत कुछ
लिखा हुआ पढ़ने
का शायद कुछ
ऐसा वैसा ही
असर हो रहा था

पत्र हाथ में
था उसके
पर पढ़ने का
बिल्कुल भी मन
नहीं हो रहा था

अपने अपने
कर्मो का
मामला होता है

कोई इधर तो
कोई उधर पर
खुद ही
ढो रहा था ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. अपने अपने कर्मो
    का मामला होता है
    कोई इधर तो
    कोई उधर पर
    खुद ही ढो रहा था !

    सत्य !सुन्दर!भावबोध।

    जवाब देंहटाएं

  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन टेलीमार्केटिंग का ब्लैक-होल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    जवाब देंहटाएं
  3. कुछ इधर -कुछ उधर.. ऐसे ही चलता है ...
    ज़िंदगी का चक्का

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :- 04/02/2014 को चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1513 पर.

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर सार्थक सकारात्मक। वाह !

    जवाब देंहटाएं

  6. अपने अपने कर्मो
    का मामला होता है
    कोई इधर तो
    कोई उधर पर
    खुद ही ढो रहा था !
    बढ़िया शब्द चयन और अभिव्यक्ति |

    जवाब देंहटाएं