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बुधवार, 22 जनवरी 2014

"बहुत खूब ... बहते हुए शब्द कहीं दूर निकल गए पर अंत में फिर मुकाम पे ले आए आप उन्हें" दिगम्बर नासवा जी ने कहा "उलूक उवाच पर" क्या खूब कहा

'उलूक' की 20/01/2014 की पोस्ट
पर दिगम्बर नसवा जी की 
टिप्पणी
"बहुत खूब ... बहते हुए शब्द कहीं दूर निकल गए पर अंत में फिर मुकाम पे ले आए आप उन्हें ..."
पर निकले उदगार


भोगना
और
भोगे हुऐ को
शब्दों में
जैसे का तैसा
उतार देना
हो ही नहीं
पाता है

लाख कोशिश
करने के
बाद भी
कहीं ना कहीं
थोड़ा सा ही सही
भटका ही जाता है

मनस्थिति
समय के साथ
समय के
अनुसार रूप
बदलने में
बहुत माहिर
होती है

सच कहें तो
बहुत ही
शातिर होती है

अपनी ही
होने से भी
कुछ नहीं
होता है

पता होता है
हर एक को
अपने बारे में

बहुत कुछ
साफ साफ
अपना देखा
अपना लिखा
अपना जैसा
ही होता है

बात तो
तब होती है
जब किसी और
की समझ में
थोड़ा थोड़ा सा
उसमें से निथर
कर आ
जाता है

लिखने और पढ़ने
की आदत
हर कोई तो
डाल नहीं पाता है

बहुत सुखी होता है
जो ना लिखता है
ना पढ़ता है
बस कुछ का कुछ
करता चला जाता है

एक ही शब्द
घूमता हुआ
एक आईना
हो जाता है

एक ही के लिये
हर चक्कर के बाद
एक नया अर्थ
ले आता है

बिरले होते हैं
जिनके लिये
हर रास्ता एक
पहचान हो जाता है

चलते चलते कौन
खो रहा है कहाँ
और कहाँ पहुँच कर
फिर से अपने को
पा जाता है

सागर की
गहराई को
नाप लेना
किसी चीज से
एक बड़ी
बात हो जाने
में नहीं आता है

बात तो तब होती है
जब पानी के रंग को
देख कर कोई
पानी की कहानी
घर बैठे बैठे
सुना जाता है

पढ़ना
फिर समझना
किसी और के
मन को
उसके लिखे
शब्दों से

हर ऐसे वैसे को
कहाँ आ पाता है

पर जो सीख लेता है
करते करते
लिखते पढ़ते

बिना काटे और चखे
कितना मीठा है
एक फल
वही और वही
बता पाता है

भटकना भी
सँभलने का
एक तरीका
हो जाता है
अगर
कोई प्यार
से समझा
ले जाता है ।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

उलूक उवाच अथ चुनाव कथा

दूरदृष्टि पक्के इरादे
के सांथ संभाली है
कमान एक अच्छे
आदमी के चुनाव
की एक कुछ बुरे
लोगों की फौज ने
अच्छे के कंधे
अभी मजबूत किये
जा रहे हैं
चुनाव के बाद
गोलियां इसी कंधे
से चलाने के लिये
कुछ अच्छे लोगों
ने संभाली है बागडोर
एक बुरे आदमी के
चुनाव प्रचार की
इरादे नेक हैं
निशाना एक है
अच्छे के सांथ
भी है एक भीड़
बुरे के सांथ भी
है दूसरी भीड़
एक के बाद एक
रोज निकल के
आ रही हैं भीड़े
सड़क पर लगातार
लोग लगा रहे हैं
गणित चाय के
खोमचों पर हमेशा
की तरह आजकल
अन्ना और उसकी
सफेद टोपियां भी
खो गयी हैं पता
नहीं कहां इन सब
समीकरणों के बीच
मुझे मालूम है मैने
भी देना है एक वोट
इन सभी भ्रमों से
उलझते हुवे कुछ
दिन बाद और
फिर भूल जाना है
कुछ सालों के लिए।

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