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गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

दिवाला होना किस चीज का अच्छा होता है

महीने के
अंतिम दिन
तक आते
जेब का
दिवाला होना
कुछ समझ
में आता है
सोच से
दिवालिया
होने के लिये
दिन साल
महीने को
कहां गिना
जाता है

बहुत
होते हैं
जेब से
दिवालिये
पर अपनी
सोच का
जनाजा
कभी
निकलने
नहीं
देते हैं

सोच का
दिवाला
खुद ही
निकाल
जेब के
हवाले
करने
वाले
पर
हर जगह
होते हैं
और
कम नहीं
होते हैं
ज्यादा
होते हैं
और
बहुत
होते हैं

सोच के
होने को
आज कौन
भाव देता है
सबकी
नजर में
जेब होती है
और
हर जेब
का भाव
बस वही
जैसे आज
बाजार में
प्याज
होता है

जो भी
होता है
बस एक
बाजार
होता है
चढ़ता है
कुछ कहीं
कहीं कुछ
उतर रहा
होता है

सबकी
अपनी
फितरत है
कहाँ इसका
फर्क पड़
रहा होता है

कहीं सोच
मर रही
होती है
कहीं
जनाजा
सोच का
लेकर सामने
से ही कोई
गुजर रहा
होता है

बहुत कुछ
होता है
किसी के
लिये जो
किसी के
लिये कुछ
भी कहीं
नहीं
होता है ।

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

विनम्र श्रद्धांजलि राजेंद्र जी

एक सदी के अंदर एक
ज्यादा से ज्यादा दो
बहुत हो गया तो तीन
से ज्यादा को कभी भी
नहीं गिना जाता है
राजेंद्र यादव हिंदी साहित्य
का एक ऐसा ही स्तम्भ
जब यूं ही चला जाता है
उसको पढ़ने की कोशिश
करता हुआ एक
छोटा सा आदमी
समझ भी कुछ
कहां पाता है
ऐसे भीषण व्यक्तित्व
का कहा हुआ एक
वाक्य एक किताब के
बराबर हो जाता है
सुबह सवेरे समाचार पत्र में
लिखा हुआ कुछ कुछ
ऐसा जब सामने आता है
“जो तटस्थ हैं समय लिखेगा
उनका भी अपराध”
वाह निकलता है मुंह से
और सारा दिन सोचने में
ही निकल जाता है
जरूर लिखेगा बहुत लिखेगा
तटस्थ ही तो है एक
जिसे बस खुद के बारे
में ही सोचना आता है
लिखा जायेगा बहुत हो जायेगा
पता चलेगा इतिहास का भी
कैसे कैसे कूड़ा बनाया जाता है
एक तटस्थ अपनी
छोटी सोच को लेकर
माफी मांगते हुऐ फिर भी
अपनी विनम्र श्रद्धांजलि
देना ही चाहता है ।

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

बात ही अजीब हो तो कोई कैसे समझ पायेगा

कई बार बहुत सारे
विषय हो जाते हैं
लिखने लिखने तक
सारे के सारे ही
भूले जाते हैं
सोच ही रहा था
आज उनमें से
किस पर अच्छा सा
कुछ लिखा जायेगा
किसे मालूम था
कुत्ता आज ही
कहीं से मार खा
कर चला आयेगा
जानता था विज्ञान को
समझना बहुत मुश्किल
नहीं कभी हो पायेगा
पता नहीं था
आस पास का
मनोविज्ञान ही
हमेशा कुछ
यूं घुमायेगा
और एक अजीब सा
इत्तेफाक ये हो जायेगा
डाकिया जितनी बार
अच्छी खबर का
एक पोस्टकार्ड ला कर
घर पर दे जायेगा
शुभकामनाओं की उम्मीद
किसी से ऐसे में
कोई कैसे कर पायेगा
जब हर अच्छी
खबर के बाद
किसी के घर का
कुत्ता हमेशा ही
मार कहीं से खा
कर चला आयेगा ।

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

पता नहीं समझने में कौन ज्यादा जोर लगाता है

लिखे हुऐ से
लिखने वाले के
बारे में पता चलता है
क्या पता चलता है
जब पढ़ने वाला
स्वीकार करता है
लिखने वाले के
लिखे हुऐ का
कुछ कुछ मतलब
निकलता है
ऐसा कहने में
ऐसा भी लगता है
कहीं कुछ है
सीधा साधा जो
सुलझने के बजाय
बस उलझता है
एक का एक
चीज को सोचना
फिर लिखने के लिये
उसे थोड़ा थोड़ा
करके खोदना
कुछ दिख गया
तो लिख डालना
नहीं दिखा तो
कुछ भी नहीं बोलना
इस सब भाग दौड़ में
शब्द दर शब्द को तोलना
कुछ का भारी हो जाना
कुछ का हल्का पड़ जाना
कहने कहने तक
बात का बतंगड़ हो जाना
है ना परेशानी की बात
सबसे बड़ी मुश्किल है
एक दो अदद
पाठक को ढूंढना
उनका भी नखरों के साथ
परोसे गये को सूंघना
लड्डू की तारीफ कर
हल्दीराम की काजू
नमकीन बोलना
इस सब में बहुत कुछ
निकल के आ जाता है
बिना मथे भी दही से
कैसे मक्खन को
निकाला जाता है
लिखना कोई सीख
पाये या ना पाये
एक होशियार और
समझदार पाठक
लेखक के लिखे का
मतलब निकाल कर
लेखक को जरूर
समझा जाता है ।

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

सबसे बड़ा सच तो झूठ होता है

सच को
बस
छोड़कर
सब कुछ
चलता हुआ
दिखाई
देता है

सच सबके
पास होता है

जेब में कमीज
और पेंट की
हाथ में कापी
और किताब में

एक के सच
से दूसरे को
कोई मतलब
नहीं होता है

अपने अपने
सच होते हैं
सब का
आकार
अलग
होता है
जैसे
किसी के
पैर की
चप्पल या
जूता होता है

एक का सच
दूसरे के
काम का
नहीं होता है

कोई किसी
के सच के
बारे में
किसी से
कुछ नहीं
कहता है

हाँ झूठ
बहुत ही
मजेदार
होता है

सब बात
करते हैं
झूठ की
झूठ का
आकार
नहीं होता है

एक का झूठ
दूसरे के भी
बहुत काम
का होता है

पर किसी
को पता
नहीं होता है
झूठ कहाँ
होता है

सूचना का
अधिकार
झूठ को ही
ढूंढने का
ही हथियार
होता है

सबसे ज्यादा
चलता हुआ
वही पाया
जाता है

सच बेवकूफ
मैं सच हूं
सोच सोच कर
एक जगह ही
बैठा रह जाता है

जहाँ पहुचने
की कोई
सोच भी
नहीं सकता
झूठ जरूर
पहुंच जाता है

झूठ के पैर
नहीं होते है
बहकाने के
लिये ही
शायद कह
दिया जाता है ।

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

कोयलों में हीरा देखने का भी तमीज होता है !

हीरा तो होता ही
है कोयले का
अपररूप
बस दिखने में
कुछ अलग होता है
खूबसूरत होता है
हाथ की अंगूठी में
गले के हार में
जड़ा होता है
वो बात अलग है
रसायन के ज्ञान
के हिसाब से
तत्व सब में
कार्बन ही होता है
आदमी के गणित
के हिसाब से
कहीं भी
कुछ भी
कैसे भी
अगर होता है
तो किसी के भले
के लिये ही होता है
झूठ महाभारत में
युधिष्ठर ने तक
जब बोला होता है
कोयलों में से
एक कोयला
उठा कर
कोई उसे
हीरा कह
देता है
तो भी
कुछ नहीं
कहीं होना
होता है
कहने वाला
इतना भी
बेवकूफ नहीं
होता है
कहने के बाद
कोयले को
हीरे की बाजार
में जो क्या
भेज देता है
कोयले को
कोयलों में ही
रहने दे कर
नाम हीरा
दे देता है
अश्वथामा
मारा गया
किंतु हाथी
कहना भी
जरूरी नहीं
होता है ।

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

हर खाली कुर्सी में बैठा नहीं जाता है

आँख में बहुत मोटा
चश्मा लगाता है
ज्यादा दूर तक
देख नहीं पाता है
लोगों से ही
सुनाई देता है
चाँद देखने के लिये
ही आता जाता है
वैसे किसी ने नहीं
बताया कभी आसमान
की तरफ ताकता हुआ
भी कहीं पाया जाता है
कोई क्यों परेशान
फिर हुआ जाता है
अपने आने जाने
की बात अपनी
घरवाली से कभी
नहीं छुपाता है
अपने अपने ढंग से
हर कोई
जीना चाहता है
कहाँ लिखा है
किसी किताब में
काम करने
की जगह पर
इबादत करने को
मना किया जाता है
छोटी छोटी बातों के
मजे लेना सीख
क्यों जान बूझ कर
मिर्ची लगा सू सू करने
की आदत बनाता है
क्या हुआ अगर कोई
अपनी कुर्सी लेकर ही
कहीं को चला जाता है
अपनी अपनी किस्मत है
जिस जगह बैठता है
वही हो जाता है
तुझे ना तो किसी
चाँद को देखना है
ना चाँद तेरे जैसे को
कभी देखना चाहता है
रात को बैठ लिया कर
घर की छत में
आसमान वाला चाँद
देखने के लिये कोई
कहीं टिकट
नहीं लगाता है
धूनी रमा लिया कर
कुर्सी में बैठना
सबके बस की
बात नहीं होती है
और फिर हर
किसी को कुर्सी पर
बैठने का तमीज
भी कहाँ आ पाता है ।

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

कुछ नहीं होगा अगर एक दिन उधर का इधर नहीं कह पायेगा

बीच बीच में कभी कभी
आराम कर लिया कर
कुछ थोड़ी देर के लिये
आँख मुँह नाक कान
बंद कर लिया कर
बहुत बेचैनी अगर हो
प्रकृति का थोड़ा सा
ध्यान कर लिया कर
सोच लिया कर
सूरज चाँद और तारे
आसपास के जानवर
बच्चों के हाथ से छूट कर
आसमान की ओर उड़ते
भागते रंगबिरंगे गुब्बारे
सोच जरा सब कुछ
आदमी की बनाई घड़ी के
हिसाब से ही होता
चला जाता है
सोच कर ही अच्छा
लगता है ना
कहीं भी बाल भर का
अंतर नहीं देखा जाता है
तूफान भी आता है
अपने पेट के हिसाब से
खा पी कर चला जाता है
घर का कुत्ता तक अपने
निर्धारित समय पर ही
खाना मांगने के लिये
रसोई के आगे आकर
खड़ा हो जाता है
चिड़िया कौऐ बंदर सब
जैसे नियम से उसी
तरह पेश आते हैं
जैसा एक दिन पहले
कलाबाजियां कर
के चले जाते हैं
इस सब पर ध्यान
अगर लगा ले जायेगा
एक ही दिन सही
बेकार की बातों को
लिखने से बच जायेगा
बाकी तो होना वही है
तेरे आस पास हमेशा ही
कोई अपना कूड़ा आदतन
फेंक कर फिर चला जायेगा
लिख लेना बैचेनी को
अपनी उसी तरह
किसी रद्दी कागज पर
सफेद जूते और स्त्री किये
साफ सुथरे कपड़े पहन कर
सड़क पर चलने वाला
कोई सफेदपोश
कभी वैसे भी
उस कूड़े को पढ़ने
यहां नहीं आयेगा !

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

सरकारी खर्चे पर सिखा रहे हैं ताली बजाना क्यों नहीं जाता है !

समय आने
पर ही
सब कुछ
सीखा
जाता है

चिंता नहीं
करनी चाहिये
अगर किसी
चीज को
करना नहीं
आता है

अब कोई
माँ के पेट
से ही सब
कुछ कर
लेना सीख
नहीं पाता है

हर कोई
अभिमन्यु
जैसा ही
 हो जाये
ऐसा भी
हर जगह
देखा नहीं
जाता है

ऐसा कुछ
हुआ था
कभी
बस
महाभारत
की कहानी
में ही सुना
जाता है

आश्चर्य भी
नहीं करना
चाहिये
अगर कोई
हलवाई
कपड़े सिलता
हुआ पाया
जाता है

कौन सा
गुनाह हो
गया इसमें
अगर कोई
डाक्टर मछली
पकड़ने को
चला जाता है

मेरी समझ
में बस इतना
ही नहीं
आ पाता है

थोड़ा सा
धैर्य रखने में
किसी का
क्या चला
जाता है

कोई माना
किसी को
खुश करने
के लिये कहीं
कठपुतली
का नाच
करवाता है

तालियां बजाने
के लिये
तुझे बुलाना
चाहता है

क्यों
सोचता है
तुझे तो
ताली बजाना
ही नहीं
आता है
चले जाना
चाहिये जब
सरकारी
खर्चे पर
बुलाया
जाता है

जब जायेगा
देखेगा
तभी तो
कुछ सीख
पायेगा
फिर मत
कहना कभी
बड़े बड़े
लोगों के
कार्यक्रमों
में तुझे
भाव ही
नहीं दिया
जाता है ।

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

कौन जानता है किस समय गिनती करना बबाल हो जाये

गिनती करना
जरूरी नहीं हैं
सबको ही आ जाये
कबूतर और कौऐ
गिनने को अगर
किसी से कह
ही दिया जाये
कौन सा बड़ा
गुनाह हो गया
अगर एक कौआ
कबूतर हो जाये
या एक कबूतर की
गिनती कौओं
मे हो जाये
कितने ही कबूतर
कितने ही कौऔं को
रोज ही जो देखता
रहता हो आकाश में
इधर से उधर उड़ते हुऐ
उससे कितने आये
कितने गये पूछना ही
एक गुनाह हो जाये
सबको सब कुछ
आना भी तो
जरूरी नहीं
गणित पढ़ने
पढ़ाने वाला भी
हो सकता है कभी
गिनती करना
भूल जाये
अब कोई
किसी और ज्ञान
का ज्ञानी हो
उससे गिनती
करने को कहा
ही क्यों जाये
बस सिर्फ एक बात
समझ में इस सब
में नहीं आ पाये
वेतन की तारीख
और
वेतन के नोटों की
संख्या में गलती
अंधा भी हो चाहे
भूल कर भी
ना कर पाये
ज्ञानी छोड़िये
अनपढ़ तक
का सारा
हिसाब किताब
साफ साफ
नासमझ के
समझ में
भी आ जाये !

सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

तैंतीस करोड़ देवताओं को क्यों गिनने जाता है

तैंतीस करोड़ देवताओं
की बात जब भी होती है
दिमाग घूम जाता है
बारह पंद्रह देवताओं से
घर का मंदिर भर जाता है
कुछ पूजे जाते हैं
कुछ के नाम को भी
याद नहीं रखा जाता है
क्यों होते होंगे
इतने ज्यादा देवता
इस बात में जरूर कोई
गूढ़ रहस्य होता होगा
ऐसा कभी कभी
लगने लग जाता है
पूजा अर्चना का सही
अर्थ भी उस समय
साफ साफ पता
लग जाता है
जब कोई भी देवता
कहीं भी काम करते हुऐ
नजर नहीं आता हैं
ना तो उससे काम करने
को कहा जाता है
ना ही किसी देवता को
कोई कामचोर कहने की
हिम्मत कर पाता है
काम बिगाड़
ना दे कोई देवता
इसीलिये डर के मारे
पूजा जरूर जाता है
अपने आस पास
देवताओं को छोड़
हर किसी के पास
कुछ ना कुछ काम
नजर आता है
खुश्किस्मत
भारत देश में
हर देवता
देवताओं की संख्या
बढ़ाने में जोर शोर से
लगा हुआ नजर आता है
देवता क्यों होते होंगे
करोड़ से भी ज्यादा
अपने आसपास
के देवताओं
को देख कर
अच्छी तरह
समझ में
आ जाता है
देवता होना ही
अपने आप में
सब कुछ हो जाता है
एक देवता
दूसरे को भी
अपना जैसा
ही देवता
बनाना चाहता है
अपने पास ही हैं
सारे तैंतीस
करोड़ देवता
फिर किसलिये
मंदिर मंदिर
भटकते हुऐ गिनती
करना चाहता है ।

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

एक की हो रही पहचान है एक पी रहा कड़वा जाम है !

अगला आदमी भी
कितना परेशान है
अपनी एक पहचान
बनाने की कोशिश में
हो रहा हलकान है
बगल वाला है तो
उसका ही जैसा
कुछ भी नहीं है
थोड़ा सा भी कहीं
कुछ अलग अलग सा
दिखता भी नहीं है
करता हुआ कुछ
अजब गजब सा
समझ में नहीं आता
हर गली हर मौहल्ले में
हो रहा फिर भी
उसका ही नाम है
अखबार रेडियो टी वी
वालों से बनाई अगले
ने बहुत पहचान है
हजार जतन कर
कराने के बाद भी
कोई क्यों नही देता
ऐसे शख्स की तरफ
थोड़ा सा भी ध्यान है
सभी तो सब कुछ
करने में लगे हुऐ हैं
बस अपने लिये
ही तो यहां या वहां
होना है किसी और
के लिये नहीं जब
कुछ इंतजाम है
इसे मिलता है
उसे मिलता है
अगले को ही बस
क्यों नहीं मिलता
कुछ सम्मान है
किसी का नाम होने से
किसी को हो रहा
बहुत नुकसान है
कोई करे कुछ तो
उसके लिये कभी
इसकी और उसकी
हो रही पहचान से
किसी की सांसत में
देखो फंस रही जान है ।

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

किसी दिन तो कह मुझे कुछ नहीं है बताना

वही रोज रोज
का रोना
वही संकरी
सी गली
उसी गली का
अंधेरा कोना
एक दूसरे को
टक्कर मार
कर निकलते
हुऐ लोग
कुछ कुत्ते
कुछ गायें
कुछ बैल
उसी से
सुबह शाम
गुजरना
गोबर में
जूते का
फिसलना
मुंह बनाकर
थूकते हुऐ
पैंट उठा कर
संभलते हुऐ
उचक उचक
कर चलना
कुछ सीधे कुछ
आड़े तिरछे
लोगों का उसी
समय मिलना
इसी सब का
दस के सरल
से पहाड़े की
तरह याद
हो जाना
इसी खिचड़ी
को बिना
नमक तेल
मसाले के
रोज का रोज
बिना पूछे
किसी के
सामने परोसना
एक दो बार
देखने के बाद
सब समझ
में आ जाना
खिचड़ी
खाना तो दूर
उसे देखने
भी नहीं आना
पता ही नहीं
चल पाना
गली का
रोम रोम में
घुस जाना
एक चौड़ी
साफ सुथरी
सड़क की
कल्पना का
सिरा गली
में ही खो जाना
गली के एक
कोने से
दूसरी और
उजाले में
निकलने से
पहले ही
अंधेरा
हो जाना
गली का
व्यक्तित्व में
ही शामिल
हो जाना
समझ में
आने तक
बहुत देर
हो जाना
गली का
गली में
जम जाना
उस दिन
का इंतजार
कयामत का
इंतजार
हो जाना
पता चले
जिस दिन
छोड़ दिया
है तूने
उस गली
से अब
आना जाना ।

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

अपेक्षाऐं कैसी भी किसी से रखने में क्या जाता है !

दो टांगों पर चलता
चला जाऊं अपनी ही
जिंदगी भर ऐसा
सोचना तो समझ में
थोड़ा थोड़ा आता है
सर के बल चल कर
किसी के पास पहुंचने
की किसी की अपेक्षा
को कैसे पूरा
किया जाता है
पता कहां
चल पाती हैं
किसी की अपेक्षाऐं
जब अपेक्षाऐं रखना
अपेक्षाऐं बताना कभी
नहीं हो पाता है
अपने से जो होना
संभव कभी नहीं
हो पाता है वही
सब कुछ किसी से
करवाने की अपेक्षा
रखते हुऐ आदमी
दुनियां से विदा
भी हो जाता है
पर अपेक्षा भी
कितनी कितनी
अजीब से अजीब
कर सकता है
सामने वाला
ऐसा किसी
किताब में
लिखा हुआ
भी नहीं
बताया जाता है
इधर आदमी
तैयार कर रहा
होता है अपने
आप को किसी
का गधा बनाने की
उधर अगला
सोच रहा होता है
आदमी के शरीर में
बाल उगा कर उसे
भालू बनाने की
क्या करे कोई बेचारा
किसी को किसी की
अपेक्षाओं का सपना
जब नहीं आता है
अपेक्षाऐं किसी से रखने
का मोह कभी कोई
त्याग ही नहीं पाता है
अपेक्षाऐं होती
हैं अपेक्षाऐं
रह जाती हैं
हमेशा अपेक्षाऐं
रखने वाला
बस खीजता है
झल्लाता है
खुद पर अपने
ज्यादा से ज्यादा
क्या कर सकता है
कर पाता है
दो घूंट के बाद
दीवारों पर अपने
ही घर की कुछ
गालियां लिख
ले जाता है
सुबह होते
होते उसे भी
मगर भूल जाता है
अपेक्षाओं के पेड़ को
अपने फिर से सींचना
अपेक्षाओं से
शुरु हो जाता है ।

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

आदमी जानवर को लिखना क्यों नहीं सिखाता है !

घोडे‌ बैल या गधे को
अपने आप कहां
कुछ आ पाता है
बोझ उठाना वो ही
उसको सिखाता है
जिसके हाथ मे‌ जा
कर पड़ जाता है
क्या उठाना है
कैसे उठाना है
किसका उठाना है
इस तरह की बात
कोई भी नहीं कहीं
सिखा पाता है
एक मालिक का
एक जानवर जब
दूसरे मालिक का
जानवर हो जाता है
कोशिश करता है
नये माहौल में भी
उसी तरह ढल जाता है
एक घर का एक
दूसरे घर का दूसरा
होने तक तो सब
सामान्य सा ही
नजर आता है
एक मौहल्ले का एक
होने के बाद से ही
बबाल शुरु हो जाता है
एक जान एक काम
बहुत अच्छी तरह से
करना चाहता है
क्या करे अगर कोई
लादना चाहता है
और दूसरा उसी समय
जोतना चाहता है
जानवर इतने के लिये
जानवर ही होता है
आदमी ना जाने
क्यों सोचता है कि
उसके कहने से तो
बैठ जाता है और
मेरे कहने पर सलाम
ठोकने को नहीं आता है
अब ऐसे में तीसरा आदमी
भी कुछ नहीं पाता है
आदमी के बारे में 
सोचने की फुर्सत नहीं
हो जिसके पास
जानवर की समस्या में
टांग अड़ाने की हिम्मत
नही‌ कर पाता है ।

बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

बाअदब बामुलाहिजा होशियार सब्र कर जल्दी ही आ रहे हैं ठेकेदार

सरकार के
एक खेत में
उगी हुई
सरकारी
फसल
उसको
खुले आम
चरते हुऐ
सरकार
के ही
पाले पोसे
गाय बैल
घोड़े भेड़
बकरियां

सरकार से
पेट पालने
के लिये
मिली
घास को
नहीं खा
रहे हैं
अपने अपने
खेतों में
जा कर
रख आ
रहे हैं

क्या करेंगे
उसका
किसी को
कुछ भी
नहीं बता
रहे हैं

बैल बैलों
के साथ
घोड़े घोड़ों
के साथ
नजर
आ रहे हैं

बकरियां
और भेड़ें
मेंमनो को
झुनझुने
थमा कर
बहला रहे हैं

खेत के
मालिक
लोग
सरकार
के पास
पहुंच कर
बड़ी पूजा
करवाने का
कुछ जुगाड़
लगा रहे हैं

सरकार
के दूसरे
खेत के
किसान
लोग जो
अपने खेतों
में नहीं
जा रहे हैं
सरकार को
काले चश्मे
पहुंचाने का
जुगाड़
लगा रहे हैं
उजड़ते हुऐ
खेत के
किसानों
को मेडल
दिलवाने
के लिये
विपक्ष के
लोगों को भी
बहकाने में
सफल होते
नजर आ
रहे हैं

मजबूर
सरकार
क्या
करेगी
जिसको
खुद डी
कम्पनी
के लोग
चला रहे हैं

खेत दर
खेत में
चल पड़ी है
इसीलिये
हवा
एक जैसी
हर जगह
खेत वाले
अपनी अपनी
लहलहाती
फसलों को
खोदते
जा रहे हैं

कोई किसी
से नहीं
डर रहा है
किसी को
ऐ कम्पनी
का भरोसा है
कोई डी
कम्पनी तक
सीधे अपनी
भी पहुंच
बता रहे हैं

‘उलूक’
और
उसके ही
जैसे
कुछ और
बेवकूफ
डाल कर
कान में
अंगुली
आसमान
को ताकते
नजर
आ रहे हैं ।

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

देखता है फिर भी समझना चाहता है

एक शक्ल एक सूरत
एक बनावट एक अक्ल
एक आदमी के लिये एक
दूसरे के लिये अलग
खेलते कूदते फांदते
बच्चे पर अलग अलग
एक गुब्बारे का झुंड
कहां होते है किसके होते हैं
कोई परवाह नहीं करता है
सब कुछ अलग अलग
होकर भी एक होता है
एक ही झुंड की
रंग बिरंगी तितलियां
उड़ते उड़ते कब
ओझल हो जाती हैं
अंदाज नहीं आता
पेड़ पौंधें हो जाती हैं
कौन परवाह करता है
सब परवाह करते हैं
आदमी और उसके झुंड की
आदमी कैसा भी हो
झुंड के साथ हो तो
खुद झुंड हो जाता है
अलग अलग होते हुऐ भी
हर कोई देखने में तक
एक सा नजर आना
शुरू हो जाता है
एक तजुर्बेकार
इसी बात को लेकर
एक उदाहरण अपने ही
घर का दे जाता है
गौर करियेगा एक लम्बे
समय के साथ के बाद
पति भी पत्नी का भाई
नजर आने लग जाता है
जैसे जोकर जोकर के
लिये मरा जाता है
या इक्का इक्के पै
चढ़ता चला जाता है
इतनी सी बात समझने में
कोई क्यों फालतू का
दिमाग लगाता है
एक बेवकूफ बेवकूफों के
साथ ही जाकर पंजा लड़ाता है
गधों के बीच रहकर तो
देखिये कभी कुछ दिन
अच्छा लगेगा देख कर
जब देखोगे कुछ समय बाद
हर गधे में एक
आदमी नजर आता है ।

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

राम का नहीं पता रावण को जिंदा रखना चाहते हैं

हर साल ही तो हम
बुराई पर अच्छाई की
विजय का पर्व मनाते हैं
ऐक दिन के खेल के लिये
तेरा ही नहीं तेरे पूरे
खानदान के पुतले
हम बनाते हैं
साल दर साल
मैंदानो और सड़को पर
तेरा मजमा हम लगाते हैं
राम के हाथों आज के
दिन मारे गये रावण
विजया दशमी के दिन
हमें खुद पता नहीं होता है
कि हम क्या जलाते हैं
कितनी बार जल चुका है
अभी तक नहीं जल सका है
जिंदा रखने के लिये ही
उस चीज को हम
एक बार फिर जलाते हैं
आज के दिन को एक
यादगार दिन बनाते हैं
राम के हाथों हुआ था
खत्म रावण या रावणत्व
इतनी समझ आने में
तो युग बीत जाते हैं
शिव के लिये रावण की
अगाध श्रद्धा और उसके
लिखे शिव तांडव स्त्रोत्र की
बात किसी को कहाँ बताते हैं
किस्से कहाँनियों तक
रहती हैं बातें जब तक
सभी लुफ्त उठाने से
बाज नहीं आते हैं
पुतले जलाने वाले ही
पुतले जलाने के बाद
खुद पुतले हो जाते हैं
रावण की सेना होती है
उसी के हथियार होते हैं
सेनापति की जगह पर
राम की फोटो लगा कर
अपना काम चलाते हैं
बहुत कर लेते हैं जब
कत्लेआम उल्टे काम
माहौल बदलने के लिये
एक दिन पुतले जलाते हैं
रावण तेरी अच्छाईयां
कहीं समझ ना आ जायें
किसी को कभी यहां पर
आज भी राम को
आगे कर हम खुद
पीछे से तीर चलाते हैं ।

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

दुकान नहीं थी फिर भी दुकानदार कह कर बुलाया

अगला बहुत गुस्से में
मुझे आज नजर आया
इस बात पर कि फंला
ने उसको दुकानदार
कह कर बुलाया
पूछने का तमीज जैसे
पूछने वाला अपने
घर छोड़ के हो आया
धंधा कैसा चल रहा है
जैसे प्रश्न एक शरीफ के
सामने दागने की हिम्मत
पता नहीं कैसे कर पाया
ये भी नहीं सोच पाया
इतनी सारी उपाधियां
जमा करने के कारण ही
तो कोई नीचे से ऊपर
तक है पहुंच पाया
बड़बड़ करते हुऐ
उसके निकलते ही
सामने से मुझे
अपने अंदर से
निकलता हुआ एक
दुकानदार नजर आया
मौका मिलते ही कुछ
बेच डालने के हुनरमंद
लोगों का खयाल आया
थोड़ा ईमान थोड़ा जमीर
बेचने का मौका आज के
समय पर थोड़ा थोड़ा तो
हर किसी ने कभी
ना कभी है पाया
ये बात अलग है
एक पक्की दुकान
बनाने की हिम्मत
कोई नहीं कर पाया
क्योंकि रोज के धंधे की
ईमानदारी के बुर्के की
आड़ को छोड़ने का
रिस्क लेने का थोड़ा सा
साहस बस नहीं कर पाया ।

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

मुआ आईना कुछ नहीं कर पा रहा था

हाथ में
आईना
उठाये हुऐ
बाजार
की तरफ
निकलते हुऐ
मैंने जब
उसे देखा
तो बस
यूं ही
पूछ बैठा

भाई
क्या बात है
कहाँ को
जा रहे हो

क्या आईने को
फ्रेम पहनाना
चाह रहे हो

थोड़ा सा
झेंपते हुऐ
उसने आईने
को पीठ की
तरफ पहुँचाया

आगे आकर
कुछ
फुसफुसाते
हुऐ ये बताया

अब क्या
करूं जनाब
समझ में नहीं
आ रहा था

मैं तो रोज
सुबह सुबह
उठ कर
साबुन से मुंह
धोता ही
जा रहा था

बीच बीच में
बाजार से
फेशियल भी
कभी कभी
करवा रहा था

आईने
को भी हमेशा
कोलिन से
चमका रहा था

आईने
की बेशर्मी
तो देखिये जरा

जैसा दिखता
था मैं सालों
साल पहले
आज भी मुझे
वैसा ही दिखाये
जा रहा था

हीरो बनने
की तमन्ना
कभी
रही नहीं
पर मैं तो
हीरो के
अर्दली का
रोल भी
नहीं पा
पा रहा था

और
जिसने
जिंदगी में
आईना नहीं
देखा कभी

साहब उस
मोहतरमा की
फिलम
बनाने के लिये
पैसे लगाने
को तैयार
नजर आ
रहा था

इसीलिये
आज मैं
इस बेकार
आईने को
बेच कर
एक नया
आईना
खरीदने
को बाजार
तक जा
रहा था ।

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

बता देना तूने क्या कुछ अलग ही देखा है

बचपन से
आज तक
देखता
आ रहा हूँ
दौड़ बच्चों की
दौड़ जवानों की
दौड़ अधेड़ों की
और
बूढ़ों की दौड़
हर दौर में
दौड़ को
बदलते देखा है
हौले हौले
मुस्कुराते हुऐ
एक दूसरे को
पछाड़ते हुऐ
गले मिलते
खुश होते
और
रोते हुओं
को देखा है
दौर बदले हैं
दौड़ें भी बदली हैं
मैदान बदले हैं
दौड़ने के
तरीके बदले हैं
नंगे पैर दौड़ते हुऐ
बच्चे के पैरों से
खून के साथ
आँख से खुशी
को छलकते
हुऐ देखा है
सोच में
आ रही है
एक छोटी
सी बात
आज की दौड़ों
के दौर में
क्या ये सब
अकेले मैंने ही
और
बस मैंने ही
यहाँ देखा है
कुछ मौसम
का मिजाज
ही है ऐसा
या तेरे यहाँ भी
यही सब कुछ
तून भी
कभी देखा है
साथ साथ
कदमताल
पर चल कर
दौड़ने पहुंचने
वाले को
दौड़ के
शुरु होते ही
बदलते हुऐ
देखा है
दौड़े होती है
आज भी
उसी तरह से
जैसे हमेशा
होती रही है
मैदान दर मैदान
लेकिन किसी
गिरते हुऐ
के ऊपर से
किसी को
दौड़ते हुऐ
तो मैंने इसी
दौर में
और
बस यहीं
और
यहीं देखा है ।

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

राम तुलसी को कोस रहा होता अगर वो सब तब नहीं आज हो रहा होता

हुआ तो
बहुत कुछ था
एक मोटी
किताब में
सब कुछ
लिखा गया है
कुछ समझ में
आ जाता है
जो नहीं आता है
सब समझ चुके
विद्वानो से पूछ
लिया जाता है
मान लिया
जाता है
पढ़ा लिखा
आदमी कभी भी
किसी को बेवकूफ
नहीं बनाता है
वही सब
अगर आज
हो रहा होता
तो राम
तुलसी को
बहुत कोस
रहा होता
क्या कर
रहा है
पता नहीं
इतने दिनो से
अभी तक
तो पूरी
रामचरित मानस
को छ्पने को
दे चुका होता
प्रोजेक्ट
इस पर भी
भेजने के
लिये बोला था
आवेदन तो
कम से कम
कर ही
दिया होता
आपदा के
फंड से
दीर्घकालीन
अध्ययन के
नाम पर कुछ
किसी से
कहलवा कर
अब तक
दे दिलवा
भी दिया होता
हनुमान जी
आये थे
खोद कर
ले गये थे
संजीवनी
का पहाड़
केदारनाथ
में जो हुआ
उसी के
कारण हुआ
इतना ही तो
लिखना होता
लिख ही
दिया होता
पर ये सब
आज के
दिन कैसे
हो रहा होता
थोड़ा सा भी
समझदार होता
तो तुलसीदास
नहीं कुछ और
हो रहा होता
बिना कुछ
लिये दिये एक
कालजयी ग्रंथ
लिख लिखा
कर ऐसे ही
बिना कोई
अ‍ॅवार्ड लिये
दुनिया से
थोड़ा विदा
हो गया होता ।

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

राम का भरोसा रख बहुत कुछ होने वाला है

सुनाई
दे रहा है
बहुत बड़ा
परिवर्तन
जल्दी ही
होने वाला है

चुनाव
की जगह
सरकार के
नुमाइंदो
और
अध्यक्षों के
पदों के लिये
समाचार पत्रों
में विज्ञापन
आने वाला है

ना भी
हो रहा हो
ऐसा मान लिया
सोचने में
ऐसी बात को
किसी का क्या
जाने वाला है

इस सब
के लिये
सबसे पहले
कुछ बीच के
लोगों का
चुनाव किया
जाने वाला है

उसके लिये
सबसे पहले
देख लिया
जाने वाला है
कि कौन है
ऐसा जो
इधर भी
और
उधर भी
आने जाने
वाला है

पूजा पाठ
मंदिर
आने जाने से
कुछ नहीं
कहीं होने
वाला है

अगर डंडे
पर लगे हुऐ
झंडे को
अपने घर
और
अपने सर
पर नहीं
लगाने वाला है

मंदिर की
घंटियों को
बेचने वाले को
पुजारी
छांटने के लिये
बुलाया
जाने वाला है

जमाना
बदल रहा है
बहुत तेजी से
देखता रह

कपड़े पहने
हुऐ दिखेगा
जो भी शहर
की गलियों में
अंदर कर दिया
जाने वाला है

समय की
बलिहारी है
छुप छुपा
के हो रहा है
जो भी जहां भी
खुले आम होते हुऐ
जल्दी ही दिखाई
देने वाला है ।

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

लो मित्र तुम्हारे प्रश्न का उत्तर हम यूं लेकर आते हैं

सुनो मित्र
तुम्हारे सुबह
किये गये
प्रश्न का उत्तर
देने जा रहा हूँ
पूछ रहे थे तुम
कौन सी कहानी
ले कर आज शाम
को आ रहा हूँ
कहानी और कविता
लेखक और कवि
लिखा करते
हैं जनाब
मैं तो बस
रोज की तरह
वही कुछ
बताने जा रहा हूँ
जो देख सुन
कर आ रहा हूँ
कहानियां
बनाने वाले
कहानियां
रोज ही बनाते हैं
उनका काम
ही होता है
कहानियां बनाना
वो कहानियां बना
कर इधर उधर
फैलाते हैं
कुछ फालतू लोग
जो उन कहांनियों को
समझ नहीं पाते हैं
उठा के यहां
ले आते हैं
कहानियां
बनाने वाले को
चलानी होती है
कोई ना कोई कार या
सरकार कहीं ना कहीं
उनके पास होते हैं
अपने काम को छोड़
कर काम कई
वो काम करते हैं
बकवास करने से
हमेशा कतराते हैं
सारे के सारे कर्मयोगी
इसीलिये हमेशा
एक साथ
एक जगह
पर नजर आते हैं
कहांनिया बनाने
वाले जन्म देत हैं
एक ही नहीं
कई कहानियों को
त्याग देखिये उनका
कभी किसी
कहानी को
खुद पढ़ने के लिये
कहीं नहीं जाते हैं
काम के ना काज के
दुश्मन अनाज के
कुछ लोग कहांनियां
बताने वाले
बन जाते हैं
पूरा देश ही
चल रहा है
कहानी बनाने
वालों से
आप और हम
तो बस
एक कहानी को
पीटने के लिये
रोज यहां
चले आते हैं ।

सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

तू आये निकले दिवाला वो आये होये दिवाली

एक तू है
कभी कहीं
जाता है
किसी को
कुछ भी
पता नहीं
चल पाता है
क्यों आता है
क्यों चला जाता है
ना कोई
आवाज आती है
ना कोई
बाजा बजाता है
क्या फर्क पड़ता है
अगर तुझे कुछ या
बहुत कुछ आता है
पढ़ाई लिखाई की
बात करने वाले
के पास पैसे का
टोटा हो जाता है
चंदे की बात करता है
जगह जगह
गाली खाता है
नेता से सीखने में
काहे शरमाता है
कुछ ना भी बताये
किसी को कभी भी
अखबार में आ जाता है
शहर में लम्बी चौड़ी
गाड़ियों का मेला
लग जाता है
ट्रेफिक का सिपाही
कुछ कहना छोड़ कर
बस अपना सिर
खुजलाता है
चुनाव की बात
करने के लिये
किसी भी गरीब
को कष्ट नहीं
दिया जाता है
राजनैतिक
सम्मेलनों से
साफ नजर आता है
देश में गरीबों का
बहुत खयाल
रखा जाता है
दूर ही से नहीं
बहुत दूर से भी
सिखा दिया जाता है
क्यों परेशान होता है
काहे चुनावों में खड़ा
होना चाहता है
सूचना या समझने के
आधिकार से किसी भी
गरीब का नहीं
कोई नाता है
वोट देने का अधिकार
दिया तो है तुझे
खुश रह मौज कर
अगले साल
आने के लिये
अभी से बता
दिया जाता है
हम पे नजर
रखना छोड़
आधार कार्ड
बनाने के लिये
भीड़ में घुसने
का जुगाड़
क्यों नहीं
लगाता है
समझा कर
गरीबी की
रेखा का सम्मान
इस देश में हमेशा
ही किया जाता है
सेहत के लिये जो
अच्छा नहीं होता
ऐसा कोई भी ठेका
उनको नहीं
दिया जाता है ।

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

मान लीजिये नया है दुबारा नहीं चिपकाया है

हर दिन का
लिखा हुआ
कुछ अलग
हो जाता है
दिन के ही
दूसरे पहर
में लिखे हुऐ
का तक मतलब
बदल जाता है
सुबह की कलम
जहां उठाती सी
लगती है सोच को
शाम होते होते
जैसे कलम के
साथ कागज
भी सो जाता है
लिखने पढ़ने और
बोलने चालने को
हर कोई एक सुंदर
चुनरी ओढ़ाता है
अंदर घुमड़
रहे होते हैं
घनघोर बादल
बाहर सूखा पड़ता
हुआ दिखाता है
झूठ के साथ
जीने की इतनी
आदत हो जाती है
सच की बात
करते ही खुद
सच ही
बिफर जाता है
कैसे कह देता है
कोई ऐसे में
बेबाक अपने आप
आज की लिखी
एक नई चिट्ठी
का मौजू उतारा
हुआ कहीं से
नजर आता है
जीवन के शीशे
में जब साफ
नजर आता है
एक पहर से
दूसरे पहर
तक पहुंचने
से पहले ही
आदमी का
आदमी ही
जब एक
आदमी तक
नहीं रह पाता है
हो सकता है
मान भी लिया
वही लिखा
गया हो दुबारा
लेकिन बदलते
मौसम के साथ
पढ़ने वाले के लिये
मतलब भी तो
बदल जाता है ।

शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

कहानी की भी होती है किस्मत ऐसा भी देखा जाता है

कहानियां बनती हैं
एक नहीं बहुत
हर जगह पर
अलग अलग
पर हर कहानी
एक जगह नहीं
बना पाती है
कुछ छपती हैं
कुछ पढ़ी जाती हैं
अपनी अपनी
किस्मत होती है
हर कहानी की
उस किस्मत के
हिसाब से ही
एक लेखक और
एक लेखनी
पा जाती हैं
एक बुरी कहानी
को एक अच्छी
लेखनी ही
मशहूर बनाती है
एक अच्छी कहानी
का बैंड भी एक
लेखनी ही बजाती है
पाठक अपनी सोच के
अनुसार ही कहानी का
चुनाव कर पाता है
इस मामले में बहुत
मुश्किल से ही अपनी
सोच में कोई
लोच ला पाता है
मीठे का शौकीन मीठी
खट्टे का दीवाना खट्टी
कहानी ही लेना चाहता है
अब कूड़ा बीनने वाला
भी अपने हिसाब से ही
कूड़े की तरफ ही
अपना झुकाव दिखाता है
पहलू होते हैं ये भी
सब जीवन के ही
फ्रेम देख कर पर्दे के
अंदर रखे चित्र का
आभास हो जाता है
इसी सब में बहुत सी
अनकही कहानियों की
तरफ किसी का
ध्यान नहीं जाता है
क्या किया जाये
ये भी होता है
और बहुत होता है
एक सर्वगुण संपन्न
भी जिंदगी भर
कुवांरा रह जाता है ।

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

'मोतिया' कहीं लिखता नहीं पर मेरा जैसा कैसे हो जाता है !

बहुत सालों से
सड़क पर
कहीं ना कहीं
रोज टकराता है
एक आदमी
जैसा था
तीस साल पहले
अभी भी वैसा ही
नजर आता है
बस थोड़ा सा
पके हुऐ बाल
अस्त व्यस्त कपड़े
चाल में थोड़ा सा
सुस्ती सी बस
दिखाई देती है
लेकिन सोचने का
ढंग वही पुराना
अब तक वैसा ही
नजर आता है
उसी मुद्रा में
आज भी
अखबारों की
कतरनों को
बगल में दबाता है
अभी भी जरूरत
होती है उसे
बस एक रुपिये
के सिक्के की
जिसका साईज अब
अठन्नी से चवन्नी
का होने को आता है
वो आज भी
किसी से कुछ नहीं
कहने जाता है
अपनी ही धुन
में रहता है
कहीं कुछ नहीं
बोलते हुऐ भी
बहुत कुछ यूं ही
कह जाता है
सामने से उसके
आने वाला
समझ जाता है
समझ गया है
बस ये ही नहीं
कभी बताता है
उसके हाव भाव
इशारों से आज भी
ऐसा महसूस
कुछ हो जाता है
जैसे रोज का रोज
कुछ ना कुछ
दीवार पर लिखने
कोई यहां बेकार में
चला आता है
बहुत से लोगों का
उसको जानने से
कुछ भी नहीं
हो जाता है
एक शख्स
मेरे शहर की
एक ऐसी ही
पहचान हो जाता है
जिस के सामने से
हर कोई उसी तरह
से निकल जाता है
जिस तरह से
यहां की भीड़ में
कभी कभी अपने
आप को ही
ढूढ ले जाना
एक टेढ़ी खीर
हो जाता है !

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

जरूरी नहीं सब सबकुछ समझ ले जायें

विचारधाराऐं
नदी के दो
किनारों
की धाराऐं
किसी एक
को अपनायें
सोचें कुछ
नहीं बस
आत्मसात करें
और फैलायें
लोगों को
अनुयायी बनायें
सबको बतायें
किनारे कभी
मिलते नहीं
किनारे
किनारे तैरें
तो कभी
डूबते नहीं
संभव नहीं
इस किनारे वाले
उस किनारे
पर चले जायें
अवसर होती हैं
नदी के बीच
बह रही धाराऐं
जब भी कभी
नजर आयें
किसी को
ना बतायें
खुद डुबकी
लगायें
बस ध्यान
रहे इतना
किसी भी
अनुयायी को
इसकी भनक
ना हो पाये
संगम होता
दिखे
किनारे किनारे
चलते चलते
कभी दो
नदियों का
रुक जायें
मनन करें
खोज करने से
पहले परहेज
करना होता
है बेहतर के
फलसफे
को अपनायें
इससे पहले
अनुयायिओं
को दिखे
दो किनारों
का जुड़ना
और
विचारधाराओं
का मिलना
सबका
ध्यान बटायें
एक महाकुंभ
करवाने का
जुगाड़ लगवायें
अवसरों के संगम
को जाने ना दें
भुनायें
खुद किनारे
को छोड़ कर
संगम करती
नदियों के
बीच में
डुबकियां लगायें
विचारधारायें
नदी के
दो किनारों
की धारायें
संभव नहीं
होता है मिलन
जिनका कभी
अनुयायियों
को समझाते
यही बस
चले जायें
आ ही गया
किसी के
समझ में
थोड़ा बहुत
कभी ना
घबरायें
किनारे पर
ना रहने दें
अपने साथ
डुबकी लगाने
नदी के बीच
उसे भी लेते
चले जायें ।

बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

हैप्पी बर्थ डे गांधी जी हैप्पी बर्थ डे शास्त्री जी खुश रहिये जी !

कुछ किताबें पुरानी
अपने खुद के वजूद
के लिये संघर्षरत
पुस्तकालय में
कुछ पुराने चित्र
सरकारी संग्रहालय में
कुछ मूर्तियां खड़ी
कुछ बैठी कुछ खंडित
कुछ उदघाटन के
इंतजार में
गोदामों में पड़ी
कुछ पार्क कुछ मैदान
कुछ सड़कों कुछ गलियों
कुछ सरकारी संस्थानो
के रखे गये नाम
बापू और लाल बहादुर
के जन्मदिन दो अक्टूबर
की पहचान राष्ट्रीय अवकाश
काम का आराम
सत्य अहिंसा सादगी
बेरोजगार बेकाम
कताई बुनाई देशी श्रम
दाम में छूट कुछ दिन
खादी का फैशन
एक दुकान गांधी आश्रम
सफेद कुर्ते पायजामे
लूट झूठ की फोटोकापी
भ्रष्टाचार व्यभिचार को
ऊपर से ढकती हुई
सर पर गांधी टोपी
एक नया शब्द
एक नयी खोज
मुन्नाभाई शरीफ
की गांधीगिरी
गांधी की दादागिरी
सत्य अहिंसा और
धर्म की फाईलें
न्यायालय में लम्बित
सब कुछ सबके
व्यव्हार में साफ
साफ प्रतिबिम्बित
एक फूटा हुआ बरतन
लाभ का नहीं
मतलब का नहीं
आज के समय में
नई पीढ़ी को कहां
फुरसत ऐसी वैसी
बातों के लिये
जिसमें नहीं हो
कोई आकर्षण
वैसे भी होता होगा
कभी कहीं गांधी
और गांधी दर्शन ।

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

बुजुर्गों के लिये दिन चलो एक दिन ही सही !

फिर याद आया
बनाया हुआ
आदमी के खुद
का एक दिन
खुद के लिये ही
जब शुरु होता है
उसका भूलना
सब कुछ
यहाँ तक
खुद को भी
उम्र का
चौथा पड़ाव
और उसके
अनुभव
कुछ के
लिये कड़वे
कुछ के लिये
खट्टे और मीठे
बचपन से ही
शुरु हो जाती है
एक पाठशाला
घर के अंदर ही
तैयार करते हुऐ
दिखाई दे जाते हैं
कई किसान
कई तरह के
खेतों को
बोते हुऐ
किस्म किस्म
के पौंधे
पता नहीं
चल पाता है
कौन आम का है
कौन बबूल का
और जब तक
इस सब को
समझने लायक
होने लगता है
एक आदमी
उसके सामने
भी होते हैं
कई तरह खेत
बुवाई के
लिये तैयार
उसकी खुद की
अगली पीढ़ी के
उसको दिये
अनुभव यहीं
पर काम आना
शुरु हो जाते हैं
किसी को फल वाले
पेड़ पसंद आते हैं
किसी की सोच में
कांटे उलझना
शुरु हो जाते हैं
घर से लेकर
ओल्ड ऐज होम्स
तक एक मोमबत्ती
दिखाने को ही सही
प्यार से फिर भी
आज के दिन अब
सब जलाना चाहते हैं
खुशकिस्मत होते हैं
कुछ लोग जो
चौथी पीड़ी के साथ
एक लम्बे समय
तक रह पाते हैं
भाग्यहीन लोग
खुद ही अपने लिये
एक ऐसे रास्ते
को बनाते हैं
जिस रास्ते
चौथी पीढ़ी को
छोड़ कर आते हैं
उसी रास्ते से
जाने को मजबूर
किये जाते हैं
एक परंपरा को
भूल कर हमेशा
हम क्यों साल
का एक दिन
उसके लिये
निर्धारित
करना
चाहते हैं
अंतर्राष्ट्रीय
बुजुर्ग दिवस
पर आज बस
इतना ही तो
समझना
चाहते हैं ।

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