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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

जो है क्या वो ही है

किसी का
लिखा हुआ
कुछ कहीं
जब कोई
पढ़ता
समझता है

लेखक
का चेहरा
उसका
व्यक्तित्व
भी गढ़ने
की एक
नाकाम
कोशिश
भी साथ
में करता है

सफेदी
दिख रही
हो सामने
से अगर

कागज पर
एक सफेद
सा चेहरा
नजर आता है

काला
सा लिखा
हुआ हो कुछ

चेहरे
पर कालिख
सी पोत
जाता है

रंग
लाल
पीले हों
कभी कभी
कहीं
गडमगड्ड
हो जाते हैं

लिखा हुआ
होता तो है
पर पहचान छुपा
सी कुछ जाते हैं

लिखने पर
आ ही
जाये कोई
तो बहुत
कुछ लिखा
जाता है

पर अंदर
की बात
कहाँ कोई
यहाँ आ
कर बता
जाता है

खुद के
सीने में
जल रही
होती है 
आग
बहुत सारी

जलते
जलते भी
एक ठंडा
सा सागर
सामने ला
कर दिखाता है

किसी
किसी को
कुछ ऎसा
लिखने में
भी मजा
आता है

आँखों
में जलन
और
धुआँ धुआँ
सा हो जाता है

वैसे भी
जब साफ
होता है पानी

तभी तो
चेहरा भी
उसमें साफ
नजर आता है

यहां तो
एक चित्र
ऎसा भी
देखने में
आता है
जो अपनी
फोटो में
भी नजरें
चुराता है

ले दे कर
एक चित्र
एक लेख
एक आदमी

जरूरी
नहीं है जो
दिखता है
वही हो
भी पाता है ।

सोमवार, 30 जुलाई 2012

बेकार तो बेकार होता है

किसी के पास
होती है कार
कोई बिना
कार के होता है
किसी का
आकार होता है
कोई कोई
निराकार होता है
और एक
ऎसा होता है जो
होता तो है
पर बेकार होता है
ये बेकार
होना भी कई
कई प्रकार
का होता है
नौकरी नहीं
मिल पाती
तो बेकार
हो जाता है
छोकरी पाकर
भी कोई कोई
बेकार हो जाता है
कुछ नहीं
आता है और
बेकार कहलाता है
कभी कभी
बहुत कुछ
जानते हुऎ
भी कोई
बेकार हो जाता है
ज्यादातर
एक बेकार
बहुत दिनों
तक बेकार
नहीं रह पाता है
मौका मिलते ही
सरकार
बना ले जाता है
एक बेकार आपको
साकार
पर लिखता
हुआ मिल जाता है
दूसरा
निराकार को
आकार अपनी
कलम से ही
दे जाता है
बहुत सारा
बेकार बेकार
के द्वारा
बेकार पर ही
लिखा हुआ
मिल जाता है
खुद ही देख
लीजिये जा कर 
आप ही अपने आप
ज्यादा कारों
को एक बेकार
बेकार पर ही
खड़ा पाता है
पर जो है
सो है
वो तो है
एक बात सौ
आने पक्की है
कि बेकार
है क्या और
क्या नहीं है
बेकार
एक बेकार
से अच्छा
कोई नहीं
किसी को
कभी बता
पाता है ।

रविवार, 29 जुलाई 2012

एक चाँद बिना दाग

एक चाँद
बिना दाग का

कब से मेरी
सोच में यूँ ही
पता नहीं क्यों
चला आता है

मुझ से
किसी से
इसके बारे में
कुछ भी नहीं
कहा जाता है

चाँद का बिना
किसी दाग के
होना
क्या एक
अजूबा सा नहीं
हो जाता है

वैसे भी
अगर 
चाँद की बातें
हो रही हों
तो दाग की
बात करना
किसको
पसंद 
आता है

हर कोई
देखने
आता है
तो 
बस
चाँद को
देखने
आता है

आज तक
किसी 
ने भी
कहा क्या

वो एक दाग को
देखने के लिये
किसी चाँद को
देखने आता है

आईने के
सामने 
खड़ा
होकर देखने
की कोशिश
कर 
भी लो
तब भी

हर किसी को
कोई एक दाग
कहीं ना कहीं
नजर आता है

अब ये
किस्मत की
बात ही होती है

कोई चाँद की
आड़ लेकर
दाग 
छुपा
ले जाता  है

किस्मत
का मारा
हो कोई
बेचारा चाँद

अपने दाग
को 
छुपाने
में ही 
मारा
जाता है

उस समय
मेरी 
समझ
में कुछ 
नहीं
आता है

जब
एक चाँद
बिना दाग का
मेरी सोच में
यूँ ही चला
आता है ।

शनिवार, 28 जुलाई 2012

हिन्दी कुत्ता अंग्रेजी में भौंका

बहुत सारे कुत्ते अगर
भौंकना शुरु हो जायें
एक साथ क्या कोई
बता सकता है कि
हिंदी में भौंक रहा है
या अंग्रेजी में
लेकिन कभी कभी
ऎसा भी देखने में
आ जाता है
हिंदी भाषी एक कुत्ता
अचानक अंग्रेजी में
भौंकना शुरु हो जाता है
हाँ ऎसा भी बस तभी
देखने में आता है
जब वो हवाई जहाज से
इधर उधर जाता है
अब आप कहेंगे
कुत्ता था ये समझ
में आता है
भौंक रहा था
वो भी समझ में
आता है
हिन्दी में भौंका था
या अंग्रेजी में था
ये आप को कैसे
पता चल पाता है
अब जनाब क्या
सारी की सारी बात
हम ही आपको
बताते चले जायेंगे
कुछ बातें आप
अपने आप भी
पता नहीं लगायेंगे
पता लगाईये और
हमें भी बताइये
कुछ पैसा खर्च
वर्च कर जाइये
हवाई जहाज से
यात्रा कर के आईय़े
आप जरूर किसी
ना किसी ऎसे
कुत्ते से टकरायेंगे
जमीन पर उसे
हिन्दी में भौंकता
हुआ पायेंगे
और हवाई जहाज के
उड़ते ही आसमान मे
आप आश्चर्य चकित
हो जायेंगे
जब उसी कुत्ते को
अंग्रेजी में भाषण
फोड़ता हुआ पायेंगे । 

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

गद्दार डी एन ए

डी एन ए से देखिये
कैसे डी एन ए
मिल गया
बाप को एक बेटा
बेटे को एक
बाप मिल गया
बहुत खुशी
की बात है
बहुत पुरानी
बात का बहुत
दिनों बाद
पता चल गया
क्या फर्क पड़ा
चाहे इसमें एक
पूरा युग लग गया
पर बहुत ही
खतरनाक चीज है
ये डी एन ए
अपना ही होता है
और गद्दारी भी
अपनो से कर लेता है
ढोल बजा देता है
और पोल खोल देता है
देखिये तो कहाँ
से होकर कहाँ
निकल जाता है
कभी किसी को
कुछ भी कहाँ बता
के जाता है
दिखता सूक्ष्मदर्शी
से भी नहीं है
पर रास्ते रास्ते में
अपने निशान छोड़ता
चला जाता है
पता ही नहीं चलता
और एक दिन
यही डी एन ए
गांंधी हो जाता है
आज भी तो
यही हुआ है
डी एन ए ने
सब कुछ
कह दिया है
अब इसे देख देख
कर बहुत से
घबरा रहे हैं
याद कर रहे हैं
कि कहाँ कहाँ
वो डी एन ए छोड़
के आ रहे हैं
कान भी पकड़ते
जा रहे हैं
अगली बार से
बिल्कुल भी
डी एन ए को साथ
नहीं ले जाना है
कसम खा रहे हैं ।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

250 वीं पोस्ट

बात बात पर
कूड़ा फैलाने की
फिर उसको कहीं पर
ला कर सजाने की
आदत बचपन से थी
बचपन में समझ में
जितना आता था
उससे ज्यादा का कूड़ा 
इक्कट्ठा हो जाता था
आसपास परिवार
अपना होता था

वही रोज का रोज
उसे उठा ले जाता था
दूसरे दिन कूड़ा फैलाने
के लिये फिर वही
मैदान दे जाता था
कूडा़ था कहाँ कभी
बच पाता था
जमा ही नहीं
कभी हो पाता था

जवानी आई कूड़े का
स्वरूप बदल गया
सपनों के तारों में
जाकर टंकने लगा
एक तारा उसे आसमान
में ले कर जाता था
एक तारा टूटते हुऎ
फिर से उसे जमीन पर
ले कर आता था
सब उसी तरह से
फिर से बिखरा बिखरा
कूड़ा हो जाता था
कितना भी सवाँरने
की
कोशिश करो
कहीं ना कहीं

कुछ ना कुछ कूड़ा

हो ही जाता था
कूड़ा लेकिन फिर भी
जमा नहीं हो पाता था
अब याद भी नहीं आता
कहाँ कहाँ मैं जाता था
कहाँ का कूड़ा लाता था
कहाँ जा कर उसे
फेंक कर आता था
बचपन से शुरु होकर
अब जब पचपन की
तरफ भागने लगा
हर चीज जमा करने
का मोह जागने लगा
कूड़ा जमा होना
शुरू हो गया

रोज का रोज
अपने घर का 
उसके आसपास का
बाजार का
अपने शहर का

सारे समाज का
कूड़ा देख देख
कर आने लगा
अपने अंदर
के कूडे़ को

उसमें थोड़ा थोड़ा
दूध में पानी
की तरह

मिलाने लगा
गुलदस्ते
बना बना के

यहाँ पर
सजाने लगा

होते होते
बहुत हो गया

एक दो
करते करते

आज कूड़ा
दो सौ पार कर

दो सौ पचासवाँ
भी हो गया ।


बुधवार, 25 जुलाई 2012

अब अलग हो जाओ चूहो

बहुत खुश
नजर
आ रहे थे

आज
लोग बाग
यहाँ वहाँ
और ना जाने
कहाँ कहाँ

चूहों को
अलग अलग
दिशाओं में
जाता हुआ
देखकर
ताली बजा रहे थे

पर ये भूल
जा रहे थे

सब कुछ
कुतरने
के बाद
का दृश्य

भूत में भी
हमेशा से
ऎसा ही हुआ
करता आया है

चूहे बिल
बनाते हैं
कहाँ कहॉं
कुतर रहे हैं
क्या क्या
कुतर रहे हैं
कैसे कुतर रहे हैं
कहाँ किसी को ये
सब कभी बताते है

जिसे
दिखता है
बस
कुतरा हुआ
दिखता है

चूहा
कोई भी
उसके
आसपास
कहीं एक भी
दूर दूर तक
नही किसी
को दिखता है

और ये भी
अगले आक्रमण
की एक सोची
समझी तैयारी है
ये बात किसी
के भी समझ में
कहीं भी तो
नहीं आ रही है

चुहिया
इस समय
सबको
समझा रही है
अलग  हो
जाने का
आदेश देती
जा रही है

जाओ
वीरो जाओ
अपने दांंत
और पंजे
फिर से
घिसने के लिये
तैयार हो जाओ

समय
आ गया है
देश को
फिर से
पाँच
साल के लिये
नये सिरे से
कुतर के
खाना है

जाओ अलग
अलग हो जाओ

सब को
सोने का मौका
दे कर सुलाना है

फिर से
लौट कर
यहीं आ जाना है

नयी ताकत
बटोर कर
फिर एक
हो जाना है

देखने वाले
गदगद
हुऎ जा रहे हैं
सोच रहे हैं
बेवकूफ चूहे
आपस में
लड़ते जा रहे हैं

सारी मलाई
उनके
खाने के लिये
ऎसे ही छोड़
के जा रहे हैं

उनको
कहाँ
मालूम है
चूहे पुराने
बिलों को
छोड़ कर
नये बिलों
को खोदने
के लिये
जा रहे हैं ।

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

कबूतर कबूतर

नर कबूतर ने
मादा कबूतर
को आवाज
देकर घौंसले
से बाहर
को बुलाया

घात लगाकर
बैठी हुई
उकड़ू
एक बिल्ली
को खेत में
सामने
से दिखाया

फिर समझाया
बेवकूफ बिल्ली
पुराने जमाने
की नजर
आ रही है

कबूतर को
पकड़ने के
लिये खुद
ही घात
लगा रही है

जमाना
कहाँ से कहाँ
देखो
पहुँचता जा
रहा है

इस पागल
को अब भी
बिल्ली
को देखकर
आँख बंद
करने वाला
कबूतर याद
आ रहा है

अरे
इसे कोई
समझाये

ठेका किसी
स्टिंग
आपरेशन
करने वाले
को देकर
के आये

किसी भी
ईमानदार
सफेद
कबूतर
पर पहले
काला धब्बा
एक लगवाये

उसके बाद
उसका जलूस
एक निकलवाये

उधर अपने
खुद के घर
पत्रकार
सम्मेलन
एक करवाये

फोटो सोटो
सेशन करवाये

इतना कुछ
जब हो
ही जायेगा

कबूतर खुद
ही शरम
के मारे
मर ही जायेगा

समझदारी
उसके बाद
बिल्ली दिखाये

कबूतर
के घर
फूल लेकर
के जाये

शवयात्रा में
शामिल
होकर
कबूतरों के
दिल में
जगह बनाये

फिर जब भी
मन में आये
कबूतर
के किसी
भी रिश्तेदार
को घर बुलाये

आराम से
खुद भी खाये
बिलौटे को
भी खिलाये ।

सोमवार, 23 जुलाई 2012

आज बस मुर्गियाँ

आज कुछ
मुर्गियाँ लाया हूँ
खाने वाले
खुश ना होईयेगा
चिकन नहीं
बनाया हूँ बस
लिख कर
मुर्गियाँ फैलाया हूँ
सुबह सुबह
मुर्गियों ने मेरी
बहुत कोहराम
मचाया हुआ था
कल देर से
सोया था रात को
सुबह के
शोर से जागा
तो बहुत
झल्लाया था
कल ही नयी
कुछ तमीजदार
मुर्गियाँ खरीद
के लाया था
पुराने दड़बे
में पुरानी
कम पढ़ी
लिखी मुर्गियों में
लाकर उन को
घुसाया था
नयी मुर्गियाँ
पुरानी मुर्गियों से
नाराज नजर
आ रही थी
इसलिये सब के
सब जोर जोर
से चिल्लाये
जा रही थी
मुर्गियों को मुर्गियों
में ही मिलाया था
मुर्गीखाना था उसी में
डाल के आया था
किसी को लग रहा हो
कबूतर खाना मैने तो
कहीं नहीं बनाया था
क्यों कर रही होंगी
मुर्गियाँ ऎसा
समझने की कोशिश
नहीं कर पा रहा था
अपने खाली दिमाग की
हवा को थोड़ा सा बस
हिलाये जा रहा था
थक हार कर सोचा
मुर्गियों से ही
अब पूछा जाये
इस सब बबाल
का कुछ हल तो
ढूँढा ही अब जाये
मुर्गियों ने बताया
कल जब उनको
लाया जा रहा था
तब उनको ये भी
बताया जा रहा था
इधर की मुर्गियाँ
कुछ अलग
मुर्गियाँ होंगी
कुछ नहीं करेंगी
उनको बहुत
आराम से
सैटल होने को
जगह दें देंगी
पर यहाँ तो
अलग माजरा
नजर आ रहा है
हर मुर्गी में
हमारे यहाँ की
जैसी मुर्गियों का
एक डुप्लीकेट
नजर आ रहा है
मैने बहुत
धैर्य से सुना
और प्यार से
मुर्गियों को
थपथपाया
और समझाया
वहाँ भी मुर्गियाँ थी
यहाँ भी मुर्गियाँ है
वहाँ से यहाँ
आने पर मुर्गी
आदमी तो
नहीं हो जायेगी
हो भी जायेगी
तब भी मुर्गी
ही कहलायेगी
चुप रहे तो
शायद कोई
नहीं पहचान पायेगा
मुँह खोलते ही
दही दूध फैलायेगी
अपनी हरकतों से
पकड़ी ही जायेगी
इसलिये ज्यादा मजे
में तो मत ही आओ
दाना मिल तो रहा है
पेट भर के खाते जाओ
फिर कुकुड़ूँ कूं करते रहो
मेरा बैंड बाजा पहले
से ही बजा हुआ है
तुम उसको फिर से
तो ना बजाओ ।

रविवार, 22 जुलाई 2012

लोटा प्रतियोगिता

नीचे लिखे
लम्बे को
सब से छोटा
बनायेगा जो
प्रतियोगिता
में भाग लेगा
सब से बड़ा
लोटा भी
इनाम में ले
जायेगा वो ।


अजीब सा
महसूस होता है
अजीब अजीब
तरह के लोग
अजीब तरह से
पेश आते हैं
अजीब अजीब
सी बातें
पता नहीं
कैसे कैसे
अजीब अजीब
तरीकों से
सामने आ आ
कर गुनगुनाते हैं
अब एक
अजीब सी
शख्सियत
सामने आये
अजीब तरह
की हरकतें करे
और आशा करे
सामने वाला
मुस्कुराये
अजीब होने पर भी
किसी को कुछ भी
अजीब सा
ना लग पाये
ऎसे बहुत से
अजीब लोग
अजीब तरह
से रोज ही
तो टकराते हैं
अजीब लोगों को
कुछ हो या ना हों
हम भी तो सारा
अजीब पी जाते है
वैसे अजीब हो जाना
या अजीब सा कुछ
कर जाना ही
तो ज्यादा से
ज्यादा शोहरत
दिला जाता है
देख लीजिये
दुनिया की
सबसे अजीब
चीजों को ही
सातवें आश्चर्य की
सूची में शामिल
किया जाता है
इसलिये समय रहते
कोशिश करने में
क्या जाता है
अगर कोई अजीब
ना होते हुऎ भी
अजीब हो
जाना चाहता है
इसलिये खोजिये
अपने में भी
कुछ भी
अजीब अगर
आपको नजर
आता है
क्या पता उस
अजीब का होना
आपको भी
दुनिया का
सबसे अजीब
चीज बना
जाता है।

शनिवार, 21 जुलाई 2012

आज कुछ नहीं है

आप कुछ भी
कह के देखो
वो उसपर
कुछ कुछ कह
ही जाते हैं

और ये जनाब
कुछ भी हो जाये
कुछ नहीं कह
कर जाते हैं

कुछ को हमेशा
कुछ ना कुछ
होता रहता है

कुछ ने देखा नहीं
कुछ कहीं कुछ कुछ
उनको शुरु होता है

कुछ हुआ है या नहीं
कुछ को कुछ तो
जरूर पता होता है

जाकर देखना पड़ता है
कुछ इस सब के लिये
कुछ ना कुछ कुछ जगह
पक्का ही लिखा होता है

कुछ नहीं भी हो कहीं
तो भी क्या होता है

कुछ हो जाता है
अगर तब भी कौन
सा कुछ होता है

कुछ होने या ना होने
से कुछ बहुत कुछ
कहने से बच जाते है

कुछ कहूंगा पक्का
सोचते है पर कुछ
कहने से पहले कुछ
कनफ्यूज हो जाते है

कुछ आते हैं
कुछ जाते है
कुछ पढ़ते हैं
कुछ लिखते है

कुछ कुछ भी
नहीं करते हैं
बस कुछ करने
वालों से कुछ
दुखी हो जाते हैं

कुछ दिन कुछ
नहीं करते फिर
कुछ दिन बाद से
कुछ कुछ करना
शुरू हो जाते है | 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

मान भी जाया कर इतना मत पकाया कर

अब
अगर
उल्टी
आती है
तो कैसे
कहें उससे
कम आ

पूरा मत
निकाल
थोड़ा सा
छोटे छोटे
हिस्सों में ला

पूरा निकाल
कर लाने का
कोई जी ओ
आया है क्या

कुछ पेट में भी
छोड़ कर आ

लम्बी कविता
बन कर के क्यों
निकलती है
कुछ क्षणिंका
या हाईगा
जैसी चीज
बन के आ जा

अब अगर
कागज में
लिखकर
नहीं होता हो
किसी से
हिसाब किताब
तो जरूरी
तो नहीं ऎसा
कि यहाँ आ आ
कर बता जा

अरे कुछ
बातों को रहने
भी दिया कर
परदे में
बेशर्मों की
तरह घूँघट
अपना उधाड़
के बात बात
पर मत दिखा
रुक जा

वहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
यहाँ भी कुछ
नहीं होने वाला
नक्कार खाने
में कितनी भी
तूती तू बजाता
हुआ चले जा

इस से
अच्छा है
कुछ अच्छी
सोच अपनी
अभी भी
ले बना

मौन रख
बोल मत
शांत हो

अपना भी
खुश रह
हमको भी
कभी चाँद
तारों सावन
बरसात
की बातों
का रस
भी लेने दे

बहुत
पका लिया
अब जा ।

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

किसी का भी जुर्म हो वो तेरा बहूरानी

स्कूल कालेज
सरकारी हो
या
गैर सरकारी
किसी की
संपत्ति थोड़े
ना हो जाता है
उस पर
अधिकार
होता है
तो
केवल उसका
जिसकी दीवार से
आसानी से कूड़ा
शिक्षाकेन्द्र के
अंदर तक
किसी तरह
फेंका जाता है
फायदे ही
फायदे
गिन लीजिये
अंगुलियों में
उस के लिये
जो ऎसी
जगह पर
मकान एक
बना ही
ले जाता है
घर तक
जाने के लिये
मेटल्ड रोड
स्कूल ही
दरवाजे तक
खुद ही
पहुँचा जाता है
कार रख
सकता है
अपनी और
किराये पर
दूसरे तीसरे
की भी
गैरेज बनाने
के खर्चे से
सीधे सीधे
बच जाता है
बेवकूफ
मैदान इसी के
तो काम
में आता है
फर्नीचर की
जरूरत में
चारपाईयों
की ही हो
सकती है
क्योंकि वो ही
एक फर्नीचर
होता है जो
कालेज में
कम ही
खरीदा
जाता है
कुर्सी मेज
कितनी हैं
कौन गिनने में
लगा रहता है
अगर कोई
अपने घर
को भी
दो चार एक
उठा ले
जाता है
गाय पालन
आसान
और गाय
का दूध
सस्ता मिल
जाता है
घास मैदान
में उगती है
और
गोबर कालेज
का जमादार
जब उठाता है
पानी बिजली
की जरूरत
रात को तो
होती नहीं वहां
इसलिये ये
दोनो रात के
लिये ही बस
ले जाता है
देखो कितना
मितव्ययी होकर
बर्बाद होने से
दोनो महंगी
चीजों को
बचाता है
अब इन
छोटी छोटी
चीजों को
कहने के लिये
किसके पास
फुर्सत है
स्कूल कालेज
किसी का
अपना ही
घर जैसा
थोड़े ना
हो जाता है
ज्यादा ही
परेशानी किसी
को हो
रही होती है
समस्याओं से
इस तरह
की कहीं तो
दिल्ली में
बैठी तो है
इंदिरा की बहू
उसके के
सर में जाकर
इसका भी
ठीकरा
फोड़ने में
क्या जाता है।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

उस समय और इस समय और दिल

पहलू और उसपर
दिल का होना
पता चल जाता है
जिस दिन से
शुरू हो जाती है
कसमसाहट
हमारे पुराने
जमाने में भी
कोई नया जो
क्या होता था
ऎसा ही होता था
पर थोड़ा सा
परदे में होता था
स्टेज एक में
धक धक करने
लगता था
स्टेज दो में
उछलने लगता था
स्टेज तीन में
किसी के कंट्रोल
में चला जाता था
स्टेज चार में
भजन गाना शुरु
हो जाता था
अब तो डरता
भी नहीं है
बस लटक जाता है
बहुत मजबूती से
बाहर से ही दिखाई
देता है कि है
स्टेज वैसे ही
एक से चार
ही हो रही हैं
गजब का स्टेमिना है
चौथे में जाकर
भी बहार हो रही है
इस जमाने के
कर रहे हों तो
अजूबा सा नहीं लगता
हमारे जमाने के
कुछ कुछ में हलचल
लगातार हो रही है
ऎ छोटे से खिलौने
मान जा इतनी सी
शराफत तो दिखा जा
पुराने जमाने के
अपने भाई बहनों
को थोड़ा समझा जा
अभी भी कटेगा तो
कुछ हाथ नहीं
किसी के आयेगा
फिर से उसी बात
को दोहराया जायेगा
कतरा ए खून ही गिरेगा
वो भी किसी के
काम में नहीं आयेगा
दिल है तो क्या
गुण्डा गर्दी पर
उतर जायेगा।

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

सोच दिखती नहीं फैल जाती है

चल रहा था
मुस्कुरा रहा था
हाथ की अंगुलियां
हिलाये जा रहा था
बड़बड़ा रहा था
उसके आस पास
जबकि कोई भी
दूर दूर तक कहीं
नजर नहीं आ रहा था
ये सब मैं उसके
सामने से देखता
हुआ आ रहा था
बगल से जैसे ही
वो निकला
मेरा दिमाग ऎसे चला
जैसे चलने वाली मशीन
का बटन किसी ने हो
तुरंत ही दबा दिया
मुस्कुरा रहा था
पक्का कोई अच्छी
खबर अभी अभी
सुन कर आ रहा था
हाथ हिला रहा था
पक्का क्या करने
जा रहा था
उसका प्लौट
अपने सामने से
देख पा रहा था
बड़बड़ा रहा था
पक्का शादी शुदा
होगा बता रहा था
जो कुछ बीबी से
कह नहीं पा रहा था
कह ले जा रहा था
अरे अरे देखिये
उसको तो जो भी
हुऎ जा रहा था
ये सब मैं काहे
सोच ले जा रहा था
अच्छा हुआ इस सब
के बीच मेरे अपने
सामने से कोई नहीं
दूर दूर तक आ रहा था।

सोमवार, 16 जुलाई 2012

बस इधर और उधर

इधर जा
उधर जा
देखना मत
झांक आ

कहीं रूखा है
कहीं सूखा है
कहीं झरने हैं
कहीं बादल हैं
कोई खुश है
कोई बिदका है
जैसा भी है
कुछ लिखता है

इधर जा
उधर जा
झांक मत
देख आ

किसी का
अपना है
किसी का
सपना है
वो बनाता है
ये ढूँढ लाता है
उसकी आदत है
इधर जाता है
उधर जाता है
इसका लाता है
उसको दिखाता है
अपनी प्रोफाइल पर
कौए उड़ाता है

इधर जा
उधर जा
झाँक मत
देख मत

अपना खाना
अपना पीना
सब कुछ रख
फेंक मत
कैलेण्डर ला
दीवार पर लगा
अपनी तारीख
किसी को
ना बता
जाली चढ़ा
शीशे लगा
कुछ दिखे
बाहर से
काला भूरा
पेंट लगा

इधर जा
उधर जा
रुक जा
चुप हो जा
फालतू
ना सुना ।

रविवार, 15 जुलाई 2012

कविता कमाल या बबाल

अखबार में छपी
मेरी एक कविता
कुछ ने देख कर
कर दी अनदेखी
कुछ ने डाली
सरसरी नजर
कुछ ने की
कोशिश समझने की
और दी प्रतिक्रिया
जैसे कहीं पर
कुछ हो गया
किसी का जवान
लड़का कहीं खो गया
हर किसी के भाव
चेहरे पर नजर
आ जा रहे थे
कुछ बता रहे थे
कुछ बस खाली
मूँछों के पीछे
मुस्कुरा रहे थे
कुछ आ आ कर
फुसफुसा रहे थे
फंला फंला क्या
कह रहा था
बता के भी
मुझे जा रहे थे
ऎसा जता रहे थे
जैसे मुझे मेरा कोई
चुपचाप किया हुआ
गुनाह दिखा रहे थे
श्रीमती जी को मिले
मोहल्ले के एक बुजुर्ग
अरे रुको सुनो तो जरा
क्या तुम्हारा वो
नौकरी वौकरी
छोड़ आया है
अच्छा खासा मास्टर
लगा तो था
किसी स्कूल में
अब क्या किसी
छापेखाने में काम
पर लगवाया है
ऎसे ही आज
जब अखबार में
उसका नाम छपा
हुआ मैने देखा
तुम मिल गयी
रास्ते में तो पूछा
ना खबर थी वो
ना कोई विज्ञापन था
कुछ उल्टा सुल्टा
सा लिखा था
पता नहीं वो क्या था
अंत में उसका
नाम छपा था
मित्र मिल गये
बहुत पुराने
घूमते हुवे उसी दिन
शाम को बाजार में
लपक कर आये
हाथ मिलाये और बोले
पता है अवकाश पर
आ गये हो
आते ही अखबार
में छा गये हो
अच्छा किया
कुछ छप छपा
भी जाया करेगा
जेब खर्चे के लिये
कुछ पैसा भी हाथ
में आया करेगा
घर वापस पहुंचा
तो पड़ोसी की
गुड़िया आवाज
लगा रही थी
जोर जोर से
चिल्ला रही थी
अंकल आप की
कविता आज के
अखबार में आई है
मेरी मम्मी मुझे
आज सुबह दिखाई है
बिल्कुल वैसी ही थी
जैसी मेरी हिन्दी की
किताब में होती है
टीचर कितनी भी
बार समझाये लेकिन
समझ से बाहर होती है
मैं उसे देखते ही
समझ गयी थी कि ये
जरूर कोई कविता है
बहुत ही ज्यादा लिखा है
और उसका मतलब भी
कुछ नहीं निकलता है।

शनिवार, 14 जुलाई 2012

बहुत कम होते हैं

अपने ही बनाये
पोस्टर का
दीवाना हो जाना
बिना रंग भरे भी
क्योंकि पोस्टर अपना
कूची अपनी रंग अपने
और सोच भी अपनी
कभी भी उतारे
जा सकते हैं
अपनी इच्छा के सांचे में
जिस तरह चाहो
बस मूड अच्छा
होना चाहिये
उसके चश्में की
जरूरत होती है
उसके कैनवास पर
आड़ी तिरछी रेखाओं
से बने हुऎ चित्र को
देखने के लिये
हर कोई रख देता है
अपना कैनवास
समझने के लिये
किसी के भी सामने
पर उसे देखने के लिये
अपना चश्मा देने वाले
बहुत ही कम
लोग होते हैं
और ऎसे लोगों के
कैनवास भी
उनकी सोच ही के
बराबर उतने ही
बडे़ भी होते हैं

लेकिन ऎसे भी
कुछ लोग होते हैं।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

निविदा खुलने का समय है आया

दस सालों तक
कुछ ना किया हो
बस घर में बैठ के
वेतन लिया हो
ऎसा अनुभव
नहीं बटोर पाया
निविदा निकली थी
अखबारों में
सर्वोच्च पद के लिये
मुझ पति ने
उस पति के आसन
तक पहुँचने का
हाय बहुत सुंदर मौका
यूँ ही है गँवाया
निविदा के कितने
सील बंद लिफाफे
हो चुके हैं जमा
राज्यपिता के संदूक में
अभी तक राज ये
नहीं है खुल पाया
मुख्यमंत्री अब जब
भारी मतों से है
जीत कर आया
आशा जगी है
'ए' क्लास आवेदकों में
जिसने अपना भाग्य
लिफाफे में है
बंद करवाया
चुनाव जीत कर
मुख्यमंत्री घोषणा
है कर आया
ना जाति का है
ना क्षेत्र का है
बस है इसी राज्य का
जिसने है उन्हें जिताया
नवनिर्माण की निविदा
तो है नहीं यह
पुराने निर्माण को
खोदने की ताकत
लेकर देखना है
अब कौन है आया
पता भी तब चलेगी
यह बात हमको
कि सबसे बडी़
बोली कौन है
दे कर के आया ।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

तितली उड़ तोता उड़ कौआ उड़ पेड़ उड़

तितली उड़
तोता उड़
कौआ उड़
कहते कहते
बीच में
पेड़ उड़
कह जाना
सामने वाले
के पेड़ उड़
कहते ही
तालियाँ बजाना
बेवकूफ
बन गया
पेड़ उड़
कह गया
सोच सोच के
बहुत खुश
हो जाना
ऎसे ही
बचपन के
खेल और तमाशों
का धीरे धीरे
धुंधला पड़ते
चले जाना
समय की बलिहारी
कोहरे का धीरे धीरे
हटते चले जाना
गुणा भाग करते करते
उम्र निकाल ले जाना
पेड़ नहीं
उड़ता है
सबको समझाना
परीक्षा करवाना
परीक्षाफल
का आना
पेड़ उड़
कहने वालों का
बहुत ज्यादा
अंको से
पास हो जाना
तितली तोते
कौऎ उड़
कहने वालों
का ढेर
हो जाना
लोक और
उनका
तंत्र का
उदाहरण
सहित
समझ में
आ जाना ।

बुधवार, 11 जुलाई 2012

हाथी के निकलते अगर पर

चींटी की जगह
हाथी के अगर
पर निकलते
तो क्या होता
क्या होता
वही होता
जो अकसर
हुआ करता है
जिसे सब
आसानी से
मान जाते हैं
और अपना
दिमाग फिर
नहीं लगाते हैं
मतलब मंजूरे
खुदा होता
पर सुना है
जब पर
निकलते हैं
तो चीटीं मर
जाती है
दुबारा कहीं
नजर नहीं
कभी आती है
तो हाथी भी
क्या उड़ते
उड़ते मर जाता
अब हाथी
मरता तो पक्का
नजर आता
ऊपर से गिरता
तो पता नहीं
कितनो को
अपने साथ
ऊपर ले जाता
सुबह सुबह
अखबार के
फ्रंट पेज पर
भी फोटो के
साथ आ जाता
चींटी की खबरे
अखबार छुपा
भी ले जाता
तो किसी को
क्या पता
चल पाता
चींटी को
दफनाना तो
छोटी सी
लकड़ी से
हो जाता
पर हाथी
दफनाने के
लिये उतनी
ही बड़ी मशीन
कोई कहाँ से
ला पाता
खाली पीली
एक्स्पोज
नहीं हो जाता
अच्छा है
चींटी का ही
पर निकलता है
और किसी को
पता भी नहीं
कुछ चलता है ।

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

असली / नकली

अच्छे शहद
की पहचान
कर देती है
बडे़ बड़ों
को हैरान
आजकल
बाजार में
भी नहीं
आ रहा है
मेरा शहद
बेचने वाला
मित्र भी
बहुत नखरे
दिखा रहा है
सोचा घर में
ही क्यों ना
बनाया जाये
घर में आने
वाली
मधुमक्खियों
को ही क्यों
ना पटाया जाये
सच है हवा में
रहकर जमीन
बेचना या
जमीन में
रहकर हवाई
जहाज उड़ाना
सबको बिना पढे़
ही आ जाता है
इसलिये कोशिश
करने में
क्या जाता है
यही सोचकर
असली खेतों में
चला जाता हूँ
असली फूलों को
काट काट कर
असली गुलदस्ते
बना लाता हूँ
बैठे बैठे राह
तकता जाता हूँ
मधुमक्खियों का
आना तो दूर
दिखना भी
बंद हो जाता है
गूगल में देखने
पर भी इसका
कोई समाधान जब
नहीं मिल पाता है
तब मजबूरी में
ये बेवकूफ
सारी बातें
अपने प्रकृति
प्रेमी मित्र
के संग
बांंटने  चला
जाता है
मित्र एक
प्लास्टिक के
फूलों का गुलदस्ता
ले कर आता है
चीनी के घोल में
उसको डुबाता है
कूड़े के ढेर
के बगल में
उसको फेंक
कर चला आता है
तुरंत ही सारा
शांत माहौल
मधुमखियों की
भिनभिनाहट
से गुंजायमान
हो जाता है
असली शहद
बनाने का
असली तरीका
और उस
शहद को
पहचानने वाले
असली लोगों
का पता
देखिये कितनी
आसानी से
मिल जाता है।

सोमवार, 9 जुलाई 2012

सुझाव

पहले खुद ही
पेड़ और पौंधे
घर के आसपास
अपने लगाता है
फिर बंदर आ गये
बंदर आ गये
भी चिल्लाता है
किसने कहा था
इतनी मेहनत कर
अपने लिये खुद
एक गड्ढा तैयार कर
कटवा क्यों नहीं देता
सब को एक साथ
पैसा आ जायेगा बहुत
तेरे दोनो हाथ
जमीन भी खाली
सब हो जायेगी
ये अलग बात
वो अलग से तुझको
नामा दिलवायेगी
फिर सुबह पीना
शाम को पीना
मौज में सारी
जिंदगी तू जीना
पढ़ा लिखा है बहुत
सुना है ऎसा
बताया भी जाता है
फिर क्यों पर्यावरण
वालों के सिखाये
में तू आता है
थोड़ा सा अपनी
बुद्धी क्यों नहीं
कभी लगाता है
बंदर भी औकात में
अपनी आ जायेंगे
जब पेड़ ही
नहीं रहेंगे कहीं
तो क्या खाक
हवा में उड़कर
इधर उधर जायेंगे
कुछ समझा कर
बेवकूफी इतनी
तो ना कर
अभी भी सुधर जा
हमारी जैसी सोच
अपनी भी बना
बहुमत के साथ
अगर आयेगा
तो जीना भी
सीख जायेगा
कम से कम
बंदरों का
मुकाबला कर
ले जायेगा
मौका मिल
गया कभी तो
देश चलाने
वालों में शायद
कहीं से
घुस जायेगा
किस्मत फूट
गयी खुदा
ना खास्ता
कभी तेरी
तो क्या पता
भारत रत्न
ही तू कहीं से
झपट लायेगा।

रविवार, 8 जुलाई 2012

सावन / बादल / बरसात

बादलों में भी
हिस्सा दिखाता है
अपना सावन
अपनी रिमझिम
अपनी बरसात
अपनी तरह से
चाहता है
खाली पेट हो तो
दिलाता है सूखे
खेत की याद
रोटी पेट में जाते ही
जरूर आती है याद
फिर से बरसात
कोई बस देखना भर
चाहता है कुछ बूँदे
छाता खोल ले जाता है
किसी को भीगना होता है
खुले आसमान के
नीचे चला आता है
वो उसकी बारिश
में अपनी बारिश
कहाँ मिलाता है
सब को अपनी
अपनी बारिश
करना आता है
कोई अपने चेहरे में
ही बारिश दिखाता है
किसी का बाद्ल
उसके नयनों में
ही छा जाता है
किसी को आ जाता
है कलम से बरसात
को लिख ले जाना
कोई अपने अंदर ही
बरसात कर ले जाता है
पानी कहीं पर भी
नजर नहीं आता है
और किसी का पेट
इतना भर जाता है
कितना खा गया पता
ही नहीं चल पाता है
बादल ऎसे में गोल
घूमना शुरु हो जाता है
बारिश का नाम भी
तब अच्छा नहीं लगता
लेकिन रोकते रोकते भी
बादल फट जाता है
पानी ही पानी चारों
तरफ हो जाता है
कितने मन और
कितने सावन
किसके हिस्से में
कितने बादल
तब जाके थोड़ा
समझ में आता है ।

शनिवार, 7 जुलाई 2012

अल्विदा भास्कर

डा0 यशवंत भास्कर जोशी, विभागाध्यक्ष, कम्प्यूटर विज्ञान विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, की असमय मृत्यू पर श्रद्धांंजलि

बूढ़ी माँ की
पथराई आँखों
के प्रश्नो को
अनुत्तरित
वहीं कहीं
छोड़ते हुए
किसी को
उठा के
ले जाना
एक रास्ते
ले जाकर
अग्नि को
समर्पित कर
के आना
वापस लौट
कर आना
खाली हाथ
फिर उसी
रास्ते से
सोचते हुऎ
समय से
पहले चल
दिया एक
साथी 'भास्कर'
मिलने शायद
खुद ही
सूर्यदेव से
विधि का
विधान है
हर किसी
के समझ
में ये
आता है
फिर भी
जाने वाला
पता नहीं
कहाँ कहाँ
किसके लिये
कितने कितने
शून्य छोड़
जाता है
और खुद
एक शून्य
होकर के
पता नहीं
किस शून्य
में विलीन
हो जाता है
ये हमें
कहां फिर
पता चल
पाता है।

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

ढूँढ सके तो ढूँढ

सूरज निकलते
ही एक सवेरा
ढूँढता है
चाँद निकलते
ही एक अंधेरा
ढूँढता है
पढ़ लिख कर
सब कुछ 
एक पाठशाला
ढूँढता है
पीता नहीं है
एक  मधुशाला
ढूँढता है
मरने से डरता है
फिर भी हाला
ढूँढता है
कुआँरा है अपना
एक साला
ढूँढता है
मंदिर में जाकर
ऊपर वाला
ढूँढता है
बना कर मकान
एक घर
ढूँढता है
घर घर में
जाकर एक
बेघर ढूँढता है
सब के काम
में एक खता
ढूँढता है
संभाला कहाँ
खुद का पता
ढूँढता है
सोता नहीं है
लेकिन सपने
ढूँढता है
ठोकर लगा कर
सब को अपने
ढूँढता है
सब कुछ है
फिर भी
कुछ कुछ
ढूँढता है
सारी उमर
बेसबर
ढूँढता है
कोई नहीं
कहीं एक
कबर
ढूँढता है।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

बोसोनीश्वर

भगवान के
सुना है
करीब पहुँच
गया है
धरती का
इंसान

उसके एक
सूक्ष्म कण
की खोज
ने बना दिया
यह काम
बहुत आसान

इन कणों के
कारण ही
पदार्थ के
कणों में
वजन आ
जाता है

प्रकृति को
समझने
के लिये
इस तरह
एक नया
रास्ता
सामने नजर
आता है

कण कण में
हैं भगवान
घर में
अपने
बच्चों को
हर इंसान
बताता है

मैं ही ब्रह्म हूँ
का अर्थ
यहीं पर ही
थोड़ा सा
समझ हमारे
भी आ पाता है

हिग्स बोसोन
की खोज में
जब भारत
के वैज्ञानिक
श्री सतेन्द्र नाथ बोस
का नाम भी
जुड़ जाता है

हर भारतीय
के लिये
बहुत गर्व का
एक विषय
यह जरुर
हो जाता है

सोचिये
कोशिश करिये
महसूस इस
कण को
अपने में
कर ले जाइये

अल्लाह ईश्वर
गौड के
एक होने
का सबूत
इस को
मान जाइये

विश्व शाँति
और अमन
के लिये
इस से अच्छा
और कोई
रास्ता क्या
कहीं नजर
आता है

कहीं तो
ईश्वर की
सत्ता
सच में
है मौजूद
एक सूक्ष्म
सा कण
क्या छोटे
से में हमें
ये नहीं
समझा
पाता है।

बुधवार, 4 जुलाई 2012

आदमखोर

ऎसा कहा जाता है
जब शेर के मुँह में
आदमी का खून
लग जाता है
उसके बाद वो
किसी जानवर को
नहीं खाता है
आदमी का शिकार
करने के लिये
शहर की ओर
चला आता है
आदमखोर हो गया है
बताया जाता है
जानवर खाता है
तब भी शेर
कहलाता है
आदमी खाने
के बाद भी
शेर ही रह जाता है
इस बात से
इतना तो पता
चल जाता है
कि आदमी बहुत
शातिर होता है
उसका आदमीपन
उसके खून में
नहीं बहता है
बहता होता तो
शेर से पता
चल ही जाता
आदमी को
खाने के बाद
शेर शर्तिया कुछ
और हो जाता
और आदमी
वाकई में एक
गजब की चीज
ना नाखून लगाता है
ना चीरा लगाता है
खाता पीता भी नजर
कहीं से नहीं आता है
सामने खड़े हुऎ को
बहुत देर में अंदाज
ये आ पाता है
कोई उसका खून
चूस ले जाता है
कोई निशान कोई
सबूत किसी को कहीं
नहीं मिल पाता है
उधर आदमखोर शेर
शिकारियों के द्वारा
जंगल के अंदर
उसके ही घर में
गिरा दिया जाता है।

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

कपडे़ का जूता

आज एक छोटी
सी कहानी है
जो मैने बस
थोडे़ से में ही
यहां पर सुनानी है
ये भी ना समझ
लिया जाये कि
कोई सुनामी है
जैसे सबकी
कहानी होती है
किसी की नयी
तो किसी की बस
थोड़ी सी
पुरानी होती है
इसमें एक मेरा
राजा है
और
दूसरी उसकी
अपनी रानी है
राजा मेरा आज
बहुत अच्छे मूड
में नजर
आ रहा था
अपनी रानी
के लिये
तपती धूप में
एक मोची
के धौरे बैठा
कपड़े के जूते
सिलवा रहा था
मोची पसीना
टपका रहा था
साथ में
कपड़े पर सूईं से
टाँके भी  लगाता
जा रहा था
राजा आसमान के
कौओं को देख कर
सीटी बजा रहा था
मोची कभी जूते
को देख रहा था
कभी राजा को देख
कर चकरा रहा था
लीजिये राजा जी
ये लीजिये तैयार
हो गया ले जाइये
पर चमड़ा छोड़
कपड़े पर
क्यों आ गये
बस ये बता
कर हमें जाइये
इतनी ही
विनती है हमारी
जिज्ञासा हमारी
जाते जाते
मिटा भी जाइये
राजा ने जूता उठाया
मोची के हाथ
में उसके
दाम को टिकाया
अपना दायें गाल को
छूने के लिये मोची
की ओर
गाल को बढ़ाया
मोची भी
अब जोर से
खिलखिलाया
अरे पहले अगर
बता भी देते तो
आपका क्या जाता
कपड़ा जरा तमीज से
मैं भी काट ले जाता
एक कपड़े का जूता
अपनी लुगाई के लिये
भी शाम को ले जाता
आपकी तरह मेरा
गाल भी बजने बजाने
के काम से पीछा
छुड़ा ले जाता
राजा तेरा क्या जाता।

सोमवार, 2 जुलाई 2012

पहचान कौन

कभी समझ
में आता था
किस समय
आनी चाहिये
लेकिन अब
लगने लगा है
उस समय
समझ में नहीं
आ पाया था
किसी ने ठीक से
क्योंकि नहीं
कुछ बताया था
एक समय था
जब सामने से
लड़की को आता
देख कर ही
आ जाती थी
लड़की को
भी आती थी
उसका यूँ
ही सकुचाना
ये बता
कर जाती थी
घर से लेकर
स्कूल तक
स्कूल से
कालेज तक
कालेज से
नौकरी तक
नौकरी से
शादी तक
शादी से
बच्चों तक
टीचर से
होकर मास्टर
प्रोफेसर
और साहब
बीबी के
ऊपर से
निकलकर
बच्चों तक
कहीं ना
कहीं दिख
जाती थी
तेरे आने
ना आने पर
बहुत जगह
हमने डाँठ
खायी थी
बहुत जगह
डाँठ हमने
भी खिलाई थी
अरे तेरे को
क्यों नहीं
बिल्कुल भी
आती है
समय समय
पर ये बात
बहुत जगह
पर समझाई थी
अब जमाना
तो कुछ और
सीन दिखा
रहा है
हर कोई
कुछ भी
कैसे भी
कहीं भी
कर ले
जा रहा है
प्रधानमंत्री
हो या
उसका संत्री
पक्ष हो
या विपक्ष
अन्ना के
साथ हो
या गन्ने के
खेत में हो
अपने घर
में भी किसी
को आते हुए
अब नजर
नहीं आती है
बाहर तो
और भी
अजीब अजीब
से दृश्य
दिखलाती है
बच्चे हों या
उम्रदराज
दफ्तर का
चपरासी हो
या सबसे
बड़ा साहब
अब तेरे
को कोई
नहीं लाना
चाहता है
तेरे को
पहचानते
तक नहीं है
ये भी बताना
नहीं कोई
चाहता है
तेरा जमाना
अब लौट
के कभी
नहीं आ
पायेगा
शरम बहन
तेरे को
हर कोई बस
शब्दकोष का
एक शब्द
भर बनायेगा
कुछ सालों में
तेरी कब्र भी
बना ले जायेगा
फूल चढ़ाने
भी उसमे
शायद ही
कोई कभी
नजर आयेगा।

रविवार, 1 जुलाई 2012

योगी लोग

घर हमारा
आपको
बहुत ही
स्वच्छ
मिलेगा

कूड़ा तरतीब
से संभाल
कर के नीचे
वाले पड़ोसी
की गली में
पौलीथिन में
पैक किया
हुआ मिलेगा

पानी हमारे
घर का
स्वतंत्र रूप
से खिलेगा

वो गंगा
नहीं है कि
सरकार
के इशारों
पर उसका
आना जाना
यहां भी चलेगा

जहाँ उसका
मन चाहेगा
बहता ही
चला जायेगा

किसी की
हिम्मत नहीं है
कि उसपर
कोई बाँध बना
के बिजली
बना ले जायेगा

नालियों में
कभी नहीं बहेगा
जहां भी मन
आये अपनी
उपस्थिति
दर्ज करायेगा

हम ऎसे वैसे
लोग नहीं हैं
अल्मोड़ा शहर
के वासी हैं
गांंधी नेहरू
विवेकानंद
जैसे महापुरुषों
ने भी कभी
इस जगह की
धूल फाँकी है

इतिहास में
बुद्धिजीवियों
के वारिसों
के नाम से
अभी भी
इस जगह को
जाना जाता है

पानी भी
पी ले
कोई मेरे
शहर का
तो बुद्धिजीवी
की सूची में
अपना नाम
दर्ज कराता है

योगा करना
जिम जाना
आर्ट आफ
लिविंग के
कैम्प लगाना
रामदेव और
अन्ना के
नाम पर
कुर्बान होते
चले जाना

क्या क्या
नहीं आता
है यहां के
लोगों को
सीखना
और
सिखाना

सुमित्रानन्दन पंत
के हिमालय
देख देख
कर भावुक
हो जाते हैं

यहाँ की
आबो हवा
से ही लोग
पैदा होते
ही योगी
हो जाते है

छोटी छोटी
चीजें फिर
किसी को
प्रभावित नहीं
करती यहाँ

कैक्टस के
जैसे होकर
पानी लोग
फिर कहाँ
चाहते हैं

अब आप को
नालियों और
कूड़े की पड़ी
है जनाब

तभी कहा
जाता है
ज्यादा पढ़ने
लिखने वाले
लोग बहुत
खुराफाती
हो जाते हैं

अमन चैन
की बात
कभी भी
नहीं करते

फालतू बातों
को लोगो को
सुना सुना
सबका दिमाग
खराब यूँ ही
हमेंशा करने
यहाँ भी
चले आते हैं।

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