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सोमवार, 31 मार्च 2014

अपने खेत की खरपतवार को, देखिये जरा, देश से बड़ा बता रहा है

ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग
हैल्लो हैल्लो ये लो 

घर पर ही हो क्या?
क्या कर रहे हो?

कुछ नहीं
बस खेत में
कुछ सब्जी
लगाई है
बहुत सारी
खरपतवार
अगल बगल
पौंधौं के
बिना बोये
उग आई है
उसी को
उखाड़ रहा हूँ
अपनी और
अपने खेत
की किस्मत
सुधार रहा हूँ 


आज तो
वित्तीय वर्ष
पूरा होने
जा रहा है
हिसाब
किताब
उधर का
कौन बना
रहा है?


तुम भी
किस जमाने
में जी रहे
हो भाई
गैर सरकारी
संस्था यानी
एन जी ओ
से आजकल
जो चाहो
करवा लिया
जा रहा है
कमीशन
नियत होता है
उसी का
कोई आदमी
बिना तारीख
पड़ी पर्चियों
पर मार्च की
मुहर लगा
रहा है
अखबार
नहीं पहुँचा
लगता है
स्कूल के
पुस्तकालय
का अभी
तक घर
में आपके
पढ़ लेना
चुनाव की
खबरों में
लिखा भी
आ रहा है
किसका कौन
सा सरकारी
और कौन सा
गैर सरकारी
कहाँ किस
जगह पर
किस के लिये
सेंध लगा रहा है
कहाँ कच्ची हो
रही हैं वोट और
कहाँ धोखा होने
का अंदेशा
नजर आ रहा है 


भाई जी
आप ने भी तो आज
चुनाव कार्यालय की
तरफ दौड़ अभी तक
नहीं लगाई है
लगता है तुम्हारा ही
हिसाब किताब कहीं
कुछ गड़बड़ा रहा है
आजकल जहाँ मास्टर
स्कूल नहीं जा रहा है
डाक्टर अस्पताल से
गोल हो जा रहा है
वकील मुकदमें की
तारीखें बदलवा रहा है
हर किसी के पास
एक ना एक टोपी या
बिल्ला नजर आ रहा है
अवकाश प्राप्त लोगों
के लिये सोने में
सुहागा हो जा रहा है
बीबी की चिक चिक
को घर पर छोड़ कर
लाऊड स्पीकर लिये
बैठा हुआ नजर
यहाँ और वहाँ भी
आ रहा है
जोश सब में है
हर कोई देश के
लिये ही जैसे
आज और अभी
सीमा पर जा रहा है
तन मन धन
कुर्बान करने की
मंसा जता रहा है
वाकई में महसूस
हो रहा है इस बार
बस इस बार
भारतीय राष्ट्रीय चरित्र
का मानकीकरण
होने ही जा रहा है
लेकिन अफसोस
कुछ लोग तेरे
जैसे भी हैं ‘उलूक’
जिंन्हें देश से बड़ा
अपना खेत
नजर आ रहा है
जैसा दिमाग में है
वैसी ही घास को
अपने खेत से
उखाड़ने में एक
स्वर्णिम समय
को गवाँ रहा है ।

रविवार, 30 मार्च 2014

‘स्व. श्रीमति मंजू तिवारी स्मृति व्याख्यान' ‘हृदय रोग–समस्या एवं निदान’ वक्ता- डा ओ. पी. यादव

उसने कही  
दिल वालों
ने समझी
आज थोड़ा सा
दिल की बात
हुई मेरे
शहर में

कुछ दिल वाले
दिल अपना अपना
लिये हुऐ पहुँच गये
आज के निमंत्रण में
दिल की हालत
और हालात पर
हुई कुछ बातें
कुछ बहस
सुनी सभी ने
पूछे प्रश्न भी
थोड़े बहुत पर
बात पूरी होने
के बाद अंत में
दिल की चीर फाड़
और सिलाई में
दक्ष विशेषज्ञ
बातों बातों में
पूरा ही दिल
खोल कर दिखा गया
कहाँ कहाँ है
खतरा दिल के
फेल हो जाने का
तस्वीर पर तस्वीर
दिखा दिखा कर
सब कुछ समझा गया
सिगरेट तम्बाकू
खान पान
लाईफ स्टाईल के
स्टाईल पर
सब कान लगा कर
सुनते हुऐ नजर आये
वाईन व्हिस्की बियर
थोड़ी थोड़ी पी लेने
की बात पर
सहमत होते डाक्टर
के सुझाव पर
बहुत से चेहरे
गुलाबी लाल होते
हुऐ खिल आये
शरीर दिमाग और
आत्मा का दिल से
किस तरह
का है वास्ता
फलसफा आध्यात्म
से भी कहीँ ना कहीं
जोड़ने वाले जोड़ते
से भी नजर आये
घर समाज देश के
दिलों की धमनियों में
भरते हुऐ वसा और
तेल भरने वाली
महान आत्माओं
के चिंतन से
चिंतन की टक्करों
के चक्करों में
पड़ने की बातों को
क्यों फालतू में
यहाँ जोड़ा जाये
इसी बात पर
जोर देता हुआ
धड़कते हुऐ दिल
की धड़कन को
“उलूक” ने सोचा
और काहे को
बढ़ाया जाये
घर शहर मौहल्ले
के दिलों को
टटोलने से कुछ
नहीं होने वाला है
देश के दिल पर
होने वाले अटैक पर
क्यों ना आजकल
विशेष ध्यान देने की
बात को कान में
अब हर किसी के
फूँका जाये ।

शनिवार, 29 मार्च 2014

विषय ‘बदलते समाज के आईने में सिनेमा और सिनेमा के आईने में बदलता समाज’ अवसर ‘पंचम बी. डी. पाण्डे स्मृति व्याख्यान’ स्थान ‘अल्मोड़ा’ वक्ता 'श्री जावेद अख्तर'

कौन छोड़ता स्वर्णिम
अवसर सुनने का
समय से पहले
इसीलिये जा पहुँचा
खाली कुर्सियाँ
बहुत बची हुई थी .
एक पर पैर फैला
कर आराम से बैठा
समय पर शुरु
हुआ व्याख्यान
रोज किसी ना किसी
मँच पर बैठे
दिखने वाले दिखे
सुनने वालों में आज
नजर आये कुछ
असहज हैरान और
थोड़ा सा परेशान
सिनेमा कब देखा
ये तो याद नहीं आया
पर मेरा समाज
सिनेमा के समाज
की बात सुनने
के लिये ही है
यहाँ पर आया
ऐसा ही जैसा कुछ
मेरी समझ में
जरूर आ पाया
बोलने वाला
था वाकपटु
घंटाभर बोलता
ही चला गया
नदी पहाड़ मैदान
से शुरु हुई बात
कुछ इस तरह
समाज को सिनेमा
और सिनेमा को
समाज से
जोड़ता चला गया
कवि गीतकार
पटकथा लेखक
के पास शब्दों
की कमी नहीं थी
बुनता चला गया
सुनने वाला भी
बहुत शांत भाव से
सब कुछ ही
सुनता चला गया
नाई की दुकान के
आमने सामने के
शीशों में एक
को सिनेमा और
एक को समाज
होने का उदाहरण
पेश किया गया
समझने वाले
ने क्या समझा
पर उससे
किस शीशे ने
किस शीशे को
पहले देखा होगा
जरूर पूछा गया
सामाजिक मूल्यों के
बदलने के साथ
सिनेमा के बदलने
की बात को
समाज की सहमति
की तरह देखा गया
कोई सामजिक और
राजनीतिक मुद्दा
अब नहीं झलकता है
इसीलिये अब वहाँ भी
समाज को इस
जिम्मेदारी का ही
तोहफा दिया गया
किताबें कौन सी
खरीद कर अपने
शौक से पढ़ता है
कोई आजकल
इंटीरियर डेकोरेटर
किताबों को परदे
और सौफे के रंग
से मैच करते हुऐ
किताबों के कवर
छाँट कर जब हो
किसी को दे गया
आठ घंटे में एक
सिनेमा  बन रहा
हो जिस देश में
पैसा सिनेमा से
बनाने के लिये तो
बस साबुन तेल
और कारों का ही
विज्ञापन बस
एक रह गया
हर जमाने के
विलेन और हीरो
के क्लास का
बदलना भी एक
इत्तेफाक नहीं रहा
जहाँ कभी एक
गरीब हुआ करता था
अब वो भी पैसे वाला
एक मिडिल क्लास
का आदमी हो गया
कविता भी सुनाई
अंत में चुनाव
की बेला में
किसी सुनने वाले
की माँग पर
शतरंज का उदाहरण
देकर सुनने वालों
को प्यादा और
नेताओं को
राजा कह गया
आईना ले के आया
था दिखाने को
उस समाज को
अपने आईनों में ही
कब से जिससे
खुद का चेहरा
नहीं देखा गया
खुश होना ही था

उलूक को भी
सुन के उसकी
बातों को मजबूरन
बहुत कुछ था
जिसे पूरा कहना
मुश्किल हुआ
थोड़ा उसमें से
जो कहा गया
यहाँ 
आ कर के
वो भी कह गया । 

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

जब तक सोच में कुछ आये इधर उधर हो जाता है

अपने सपने का
सनीमा बना कर
बाजार में
खुले आम
पोस्टर लगा
देने वाले के
बस में नहीं
होती हैं
उँचाईयाँ  

टूटी हुई सीढ़ियों
से गुजरना
और नीचे
देख देख कर
उनसे उलझने
की उसकी मजबूरी
उसकी आदत में
शामिल होती है
झुंड में शामिल
नहीं होने का
फायदा उठाते हैं
कुछ काले सफेद
सपनों को बोकर
रँगीन सपने बनाकर
दिखाने वाले लोग
जिनके लिये बहुत
जरूरी होती हैं
खाइयाँ और कुछ
टूटी हुई सीढ़ियाँ भी
क्योंकि उन सब को
पीछे देखने की
आदत नहीं होती है
और ना ही सीढ़ियों
की टूट फूट ही
रोक पाती है
उनके कदमों को
वो देखते हैं बस
पैर रखने भर
की जगह और
चढ़ते हुऐ झुंड
का एक कंधा
जिनके हाथ
और पैर देखने
में लगी हुई
आँखों को नजर
ही नहीं आ
पाती हैं उनकी
आँखे और
इशारे इशारे में
काम हो जाता है
क्योंकि इशारे
का अधिकार
सूचना के अधिकार
में नहीं आता है
और झुँड में से
कोई एक ऊपर
चला जाता है
बीच में रह जाती है
टूटी हुई सीढ़ियाँ
जिसके आस पास
  

खिसियाया हुआ
सा “उलूक”
एक कागज और
एक कलम लिया हुआ
अपना सिर खुजाता
हुआ नजर आता है । 

गुरुवार, 27 मार्च 2014

आर आई पी डा. जे सी पंत

बहुत बार समझाया
दिखा कर उदाहरण
कई बार बातों बातों
में सब कुछ बताया
अभी समय है
बना ले किसी
सोशियल नेट्वर्किंग
साईट पर अपना
एक प्रोफाईल
नहीं समझ में आया
बिना बनाये कुछ भी
दुनियाँ से ही चल दिया
हाय कितनी बड़ी गलती
तुझे पता नहीं तू कर गया
वर्किंग साईट पर क्या
होना था कुछ अनोखा
वही हुआ जिसके होने का
अब एक फैशन
सा  है हो गया
पता चलते ही
शोक सभा करने का
फैसला लिया गया
किसी को बिना बताये
एक कागज में कुछ
टाईप कर लिया गया
सैकडॉं कामगारों में से
किसी को तंग किये बगैर
इधर उधर जाते कुछ
लोगों को बस एक
इशारा सा किया गया
दस बारह होते ही
कागज से शोक संदेश
पढ़ दिया गया
तेरा तो किसी को
कुछ भी पता नहीं चला
कहाँ से कब किधर के
रास्ते ऊपर को चला गया
समय किसी के पास
कहाँ है अब रह गया
रोज का रोज कभी
एक जाता है कभी
पता चलता है
दो चार दिन बाद भी
ये भी गया और
वो भी गया
अर्थी उठाने और
कंधा लगाने की बात
बहुत पुरानी हो
गई है अब तो
राम नाम सत्य है
कह कर जाता हुआ
एक हुजूम देखना तक
दूभर सा हो गया
यहाँ कहीं लगा होता
तेरा फोटो कहीं भी अगर
नहीं रह जाता कहने
को इतना सा भर
कोई नहीं आया और
नहीं कुछ भी
किसे से कह गया
तुझे पता नहीं चलता
ये तो हमें भी पता
अब चल ही गया
पर कुछ देखने वाले
देख लेते तेरी
फोटो के नीचे से
दो चार ने कम से कम
उसे लाईक कर दिया
कुछ लिख लेते हैं
कुछ कुछ कभी कभी
श्रद्धांजलि या आर आई पी
फोटो के नीचे लिखना
बहुत कामन सा
अब हो ही गया
क्यों नहीं बना गया
फेसबुक में अपना
प्रोफाईल कम से कम
बुरा लग रहा है
ऐसे कैसे तू
इस दुनियाँ से
ही चल दिया । 

बुधवार, 26 मार्च 2014

एक चोला एक देश से ऊपर होता चला जायेगा

परिवार के परिवार
जहाँ बने हैं सेवादार
डेढ़ अरब लोगों का
बना कर एक बाजार
अगर लगाते हैं मेला
करते हैं खरीद फरोख्त
भेड़ बकरियों की तरह
कहीं खोखा होता है
कहीं होता है एक ठेला
ऐसे मैं अगर कोई
बदल भी लेता है
अपना चोला
तो तेरा दिल क्यों
खाता है हिचकोला
कुँभ के समय में ही
कोई डुबकी लगायेगा
गँगा मैय्या को
अपने पापों की
गठरी दे जायेगा
खुद सोच
पाँच साल कैसे
एक चोला चल पायेगा
धुलेगा नहीं अगर
गंदा नहीं हो जायेगा
बिना बदले कैसे
धोबी को दिया जायेगा
अब सब तेरी तरह के
नंगे तो होते नहीं
बिना चोला पहने
चोले वालों की बात
बताने चला आयेगा
समझा कर कभी
कभी क्रिकेट फुटबाल
छोड़ कर ये वाला
खेल भी खेला कर
दिल तो सब के
सुलगते हैं पर
पूरा का पूरा कभी
भी नहीं जलते हैं
एक जगह कुर्सी
पक्की करने के
बाद ही तो कोई
देश के लिये
देश की कुर्सी
की ओर देख कर
लार टपकायेगा
हाथ में पड़ गई
वारा न्यारा हो जायेगा
नहीं भी पड़ती है
क्या होना है
वापस अपनी कुर्सी
पर जा कर बैठ जायेगा
नगद नारायण पहली
तारीख को अपने आप
खाते में आ जायेगा
शरीर तो बेवकूफ है
एक दिन आत्मा को
छोड़ कर चला जायेगा
चोला इस समय
अगर रह गया
भूल से शरीर पर
अगले पाँच सालों तक
दूसरे के चोलों को
देख देख कर
शरीर और आत्मा
दोनो को सुखायेगा
तुझे क्या करना है
चोले से “उलूक”
नंगा क्या निचोड़ेगा
और क्या नहायेगा
बस चोले इधर से
उधर आते जाते
देख देख सुलगते
दिल की आग
को भड़कायेगा
देश हित
सर्वोपरि होगा
नेता भगत राजगुरु
और सुखदेव से
ऊपर हो जायेगा ।   

मंगलवार, 25 मार्च 2014

अब उसे भी क्या समझना जिसे एक बेवकूफ तक समझता है

किसी के कुछ
कहे को समझने
लिये कहीं जाना
और जा कर
समझने की
कोशिश करना
समझ में आ
गया कुछ की
गलतफहमी हो
जाने को समझ कर
समझे हुऐ पर
कुछ कहने की
हिम्मत करना
सब के बस की
बात नहीं होती है
अपनी बात कहने
में ही बहुत जोर
लगाना पड़ता है
कम से कम
किसी एक समझने
वाले को कहे हुए को
समझने के लिये
उसके बाद कहीं से
बुलाना भी पड़ता है
कहने की आदत
हो जाने के बाद
कोई कहाँ कहीं
किसी के लिये
रुकता है
उसे तो बस
कह देना होता है
कोई फर्क किसी को
कहीं भी नहीं पड़ता है
कहता रहे कोई
ये तो इसकी
हमेशा की आदत है
कुछ भी नहीं
कर सकता है
इसलिये कुछ
ना कुछ कहीं भी
जा कर बक देता है
इस तरह के
लोगों से हर कोई
कन्नी काटता है
उसके नजदीक भी
नहीं फटकता है
ये बात तब और
महत्वपूर्ण हो
जाती है जब
किसी 
तरह के
किसी चीज के
मूल्याँकन करने वाले
दल के आने का
पता चलता है
जिसे किसी चीज के
बारे में एक भी सच
नहीं बताना होता है
जितना हो सके
उतना झूठ का
अँबार लगाना होता है
बहुत कुछ जो कहीं
भी नहीं होता है
वही और वही
बस बताना और
समझाना होता है
“उलूक” दूर रखना
होता है तेरे जैसे
समझने समझाने
वालों को हमेशा
जब भी कोई
पंडाल कोई मजमा
तेरे अपने ही
घर पर लगता है
समझ में आ गया
किसी को कुछ अगर
समझा कर
कोई ए कोई ए++ 
कोई बी कोई बी++
सोचने समझने के
बाद ऐसे ही
नहीं रखता है ।


सोमवार, 24 मार्च 2014

उससे ध्यान हटाने के लिये कभी ऐसा भी लिखना पड़ जाता है

कभी सोचा है
लिखे हुए एक
पन्ने में भी
कुछ दिखता है
केवल पढ़ना
आने से ही
नहीं होता है
पन्ने के आर
पार भी देखना
आना चाहिये
घर के दरवाजे
खिड़कियों की तरह
एक पन्ने में भी
होती हैं झिर्रियाँ
रोशनी भीतर की
बाहर छिरकती है
जब शाम होती है
अँधेरा हो जाता है
सुबह का सूरज
निकलता है
थोड़ा सा उजाला
भी कहीं से
चला ही आता है
लिखा हुआ रेत
का टीला कहीं
कहीं एक रेगिस्तान
तक हो जाता है
मरीचिका बनती
दिखती है कहीं

एक जगह सूखा
पड़ जाता है
नमी लिया
हुआ होता है
तो एक बादल
भी हो जाता है
नदी उमड़ती है कहीं
कहीं ठहरा हुआ
एक तालाब सा
हो जाता है
पानी हवा के
झौंको से
लहरें बनाता है
गलतफहमी भी
होती हैं बहुत सारी
कई पन्नों में
सफेद पर काला
नहीं काले पर
सफेद लिखा
नजर आता है
समय के साथ
बहुत सा समझना
ना चाहते हुए
 भी
समझना पड़ जाता है
हर कोई एक
सा नहीं होता है
किसी का पन्ना
बहुत शोर करता है
कहीं एक पन्ना
खामोशी में ही
खो जाता है
किसी का लिखा
खाद होता है
मिट्टी के साथ
मिलकर एक
पौंधा बनाता है
कोई कंकड़ पत्थर
लिखकर जमीन को
बंजर बनाता है
सब तेरे जैसे
बेवकूफ नहीं
होते हैं “उलूक”
जिसका पन्ना
सिर्फ एक पन्ना
नहीं होता है
रद्दी सफेद कपड़े
की छ: मीटर की
एक धोती जैसा
नजर आता है । 

रविवार, 23 मार्च 2014

जिसकी समझ में नहीं आती है वही समझा जाता है

दो चार आठ पास
भी हो जाता है
अ आ क ख
बस पढ़ना कुछ
सीख जाता है
लिखना कोई बहुत
बड़ी बात कभी
नहीं होती है
शुरु करना होता है
चलता चला जाता है
क्या लिखा गया है
इससे किसी को
क्या हो जाता है
एक के लिखने विखने
की बात को दूसरे
लिखने वाले को पता
ऐसे या वैसे
कभी ना कभी
चल ही जाता है
उसे पता नहीं
इस बात को सुन कर
कुछ कुछ जैसा
कहीं पर हो जाता है
एक दिन नहीं कहता है
दूसरे दिन कुछ और
बात की बात
कह ले जाता है
तीसरे दिन जब
नहीं रहा जाता है
कह बैठता है
अब लिखना ही है
तो कविता क्यों
नहीं लिखता है‌‌
उल जलूल लिखने से
किसी को क्या
मिल जाता है
कविता किसी की
कोई बेचना चाह
कर भी नहीं
बेच पाता है
फिर भी एक बिल्ला
लगाने भर के लिये
कभी ना कभी कोई
दे ही जाता है
किताब कविता की
छपवा सका एक दो
कभी कहीं अगर
बेरोजगार होने का
टोकन हट जाता है
आदमी है कहे
ना कहे कोई
कवि है कहना
आसान हो जाता है
अंधे का बताया
अंधा समझता है
बहरे को बहरे का
सुनाई दे जाता है
कवि की कविता से
कवि का लेना देना
कभी नहीं होता है
जब मौका मिलता है
दूसरे को अपनी सुनाने
के लिये चढ़ जाता है
अपनी बात बात होती है
दूसरे की बात सुनना छोड़
देखने तक नहीं जाता है
अब किस किस को
समझाये "उलूक"
लात खाने की बात
को किस किस से
जा कर कहा जाता है
लातें पड़ती रहती है
कभी कम कभी ज्यादा
पड़ ही जाती है तो
सहना ही पड़ जाता है
कुछ को आदत
सी हो जाती है
कुछ मजे लेते हैं
कुछ बेशरम होते हैं
कुछ शरमा शरमी
थोड़ा कुछ कह देते हैं
कविता करने वाले
कवि लोग इन सब से
बहुत उपर के
पायदान में होते हैं
जब भी धरती में
कहीं कोई रो रहा होता है
उनके सामने बादल भी हों
तब भी एक चाँद
कहीं से निकल कर
आ जाता है और
कहना ना कहना
उसी पर हो जाता है
अब इतनी लम्बी
सुनने का समय
उसे कहाँ हो पाता है
वो तो चल दिया
होता है कभी का
बस ये कह कर
तू भी कभी एक
कवि क्यों नहीं
हो जाता है ।

शनिवार, 22 मार्च 2014

शब्दों के कपड़े उतार नहीं पाने की जिम्मेदारी तेरी हो जाती है

हमाम  में आते 
और जाते रहना
बाहर आकर कुछ
और कह देना
आज से नहीं
सालों साल से
चल रहा है
कमजोर कलेजे
पर खुद का
जोर ही नहीं
चल रहा है
थोड़ी सी हिम्मत
रोज बट भी
कभी जाती है
बताने की बारी
आती है तो
गीले हो गये
पठाके की तरह
फुस्स हो जाती है
नंगा होना
हमाम
के अंदर शायद
जरूरी होता है
हर कोई होता है
शरम थोड़ी सी
भी नहीं आती है
 
कपड़े पहन कर
पानी की बौछारें
वैसे भी कुछ
कम कम ही
झेली जाती हैं
बहुत से कर्मो
के लिये शब्द
ही नहीं होते
कभी पास में
शब्द के अर्थ
होने से भी
कोई बात समझ
में आ जानी
जरूरी नहीं
हो जाती है
सभी नहाते हैं
नहाने के लिये
ही 
हमाम बनाने
की जरूरत
हो जाती है
शब्दों को नँगा
कर लेने जैसी
बात किसी से
कभी भी कहीं
भी नहीं कही
जाती है 
हमाम में
नहाने वाले से
इतनी बात जरूर
सीखी जाती है
खुद कपड़े उतार
भी ले कोई
सभी अपने
“उलूक” आ ही
जानी चाहिये
इतने सालों में
  

तेरे
  खाली

दिमाग में
बात को कपड़े
पहना कर बताने
की कला
बिना 
हमाम 
में रहे और
नहाये कभी
भी नहीं किसी
को आ पाती है । 

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

गंंदगी ही गंंदगी को गंंदगी में मिलाती है

होनी तो होनी
ही होती है
होती रहती है
अनहोनी होने
की खबर
कभी कभी
आ जाती है
कुछ देर के
लिये ही सही
कुछ लोगों की
बांंछे खिल कर
कमल जैसी
हो जाती हैं
गंंदगी से भरे
नाले की
कुछ गंंदगी
अपने आप
निकल कर
जब बाहर को
चली आती है
फैलती है खबर
आग की तरह
चारों तरफ
पहाड़ों और
मैदानो तक
नालों से
होते होते
नाले नदियों
तक फैल जाती है
गंंदगी को
गंंदगी खीँचती है
अपनी तरफ
हमेशा से ही
इस नाले से
निकलते निकलते
दूसरे नालों के
द्वारा लपक
ली जाती है
गंंदगी करती है
प्रवचन गीता के
लिपटी रहती है
झक्क सफेद
कपड़ों में हमेशा
फूल मालाओं से
ढक कर बदबू
सारी छुपाती है
आदत हो चुकी
होती है कीड़ों को
इस नाले के हो
या किसी और
नाले के भी
एक गँदगी के
निकलते ही
कमी पूरी करने
के लिये दूसरी
कहीं से बुला
ली जाती है
खेल गंंदगी का
देखने सुनने
वाले समझते हैं
बहुत अच्छी तरह से
हमेशा से ही
नाक में रुमाल
लगाने की भी
किसी को जरूरत
नहीं रह जाती है
बस देखना भर
रह गया है
थोड़ा सा इतना
और कितनी गंंदगी
अपने साथ उधर से
चिपका कर लाती है
और कौन सी
दूसरी नाली है
जो उसको अब
लपकने के लिये
सामने आती है ।

गुरुवार, 20 मार्च 2014

आवारा होगा तभी तो उसने कह दिया होगा

शायद सच कहा होगा 
या गफलत में ही 
कह गया होगा 
उसने कहा और 
मैंने सुना मेरे बारे में 
मुझ से कुछ इस तरह 
आवारा हो जाना सबके 
बस में नहीं होता 
जो हो लेता है बहुत 
बड़ी शख्सियत होता है 
तू अंदर से आवारा 
आवारा हो गया है 
सुनी सुनाई गजल 
तक जैसे दिल 
धीरे से चल दिया 
"ये दिल ये पागल 
दिल मेरा क्यों 
बुझ गया आवारगी"
फिर लगा आवारा का 
मतलब उसका कहीं 
उठाईगीर से तो नहीं होगा 
या कामचोर या आलसी 
या फिर इधर उधर 
घूमने वाला जैसा ही
उसे कहीं कुछ दिखा होगा
वाह क्या उसने 
मुझ में मेरे अंदर 
का ढूँढ निकाला होगा 
सब कुछ सही बस 
सही बता डाला होगा
पहले लगा था बहुत 
मासूमियत में उसने 
कुछ कह दिया होगा 
हुआ थोड़ा सा 
आश्चर्य फिर अपने में 
नहीं पहुँच पाया 
जिस जगह तक 
आज तक भी कभी 
वो कैसे इतनी 
आसानी से 
पहुँच गया होगा 
कुछ भी कभी भी
लिख लेने का 
मतलब शायद
आवारगी हो गया होगा
तुझे नहीं पता होगा
उसे पता हो गया होगा ।

बुधवार, 19 मार्च 2014

लहर दर लहर बहा सके बहा ले अपना घर

ना पानी की
है लहर
ना हवा की
है लहर
बस लहर है
कहीं किसी
चीज की है
कहीं से कहीं
के लिये चल
रही है लहर
चलना शुरु
होती है लहरें
इस तरह की
हमेशा ही नहीं
बस कभी कभी
लहर बनती
नहीं है कहीं
लहर बनाई
जाती है
थोड़ा सा
जोर लगा कर
कहीं से कहीं को
चलाई जाती है
हाँकना शुरु
करती है लहर
पत्ते पेड़ पौंधों
को छोड़ कर
ज्यादातर भेड़
बकरी गधे
कुत्तों पर
आजमाई जाती
है लहर
बहना शुरु
होता है
कुछ कुछ
शुरु में
लहर के
बिना भी
कहीं को
कुछ इधर
कुछ उधर
बाद में कुछ
ले दे कर
लहराई जाती
है लहर
आदत हो चुकी
हो लहर की
हर किस को
जिस जमीन पर
वहाँ बिना लहर
दिन दोपहर
नींद में ले
जाती है लहर
कैसे जगेगा
कब उठेगा
उलूक नींद से
जगाना मुश्किल
ही नहीं
नामुमकिन है तुझे
लहर ना तो
दिखती है कहीं
ना किसी को
कहीं दिखाई
जाती है लहर
सोच बंद रख
कर चल उसी
रास्ते पर तू भी
हमेशा की तरह
आपदा आती
नहीं है कहीं
भी कहीं से
लहर से लहर
मिला कर ही
हमेशा से लहर
में लाई जाती
है लहर
लहर को सोच
लहर को बना
लहर को फैला
डूब सकता है
डूब ही जा
डूबने की इच्छा
हो भी कभी भी
किसी को इस
तरह बताई नहीं
जाती है लहर
हमेशा नहीं चलती
बस जरूरत भर
के लिये ही
चलाई जाती
है लहर ।

मंगलवार, 18 मार्च 2014

देश अपना है शरम छोड़ "उलूक" कोई हर्ज नहीं हाथ आजमाने में

दिखने शुरु हो
गये हैं दलाल
हर शहर गाँव
की गलियों
सड़कों बाजार
की दुकानों में
टोह लेते हुऐ
आदमी की
सूंघते फिरने
लगे हैं पालतू
जानवर जैसे
ढूँढ रहे हो
आत्माऐं अपने
मालिकों के
मकानो की
मकान दर
मकानों में
महसूस कराने
में लग चुके
हैं नस्ल किस्म
और खानदान
की गुणवत्ता
लगा कर
नया कपड़ा
कब्र के पुराने
अपने अपने
शैतानों में
ध्यान हटवाने
में लगे है
लड़ते भिड़ते
खूँखार भेड़ियों की
खूनी जंग से
जैसे हो रहे
हो युद्ध देश
की सीमा पर
जान देने ही
जा रहे हों
सिपाहियों की तरह
नजर लगी हुई है
सब की देश के
सभी मालखानों में
जानता है हर कोई
बटने वाली है
मलाई दूध की
कुछ बिल्लियों को
कुछ दिनों के
मजमें के बाद
आँख मुँह कान
बँद कर तैयार
हो रहा है
घड़ा फोड़ने के
खेल में दिमाग
बंद कर अपना
फिर भी भाग
लगाने में
क्या बुरा है
“उलूक”
सोच भी लिया
कर कभी किसी
एक बिल्ली का
दलाल तेरे भी
हो जाने में ।

सोमवार, 17 मार्च 2014

होली हो ली तशरीफ ले जायें

मौगैम्बो सुबह सुबह 
जब नींद से उठा
बहुत खुश हुआ
उसे जैसे ही
पता चला होली का
होली आज हो रही है
छपा हुआ दिखा

अखबार में
मुख्यपृष्ठ के ऊपर के
दायें कौने में छोटा सा
"होली की शुभकामनाऐं"
जैसे कह रहा हो
रोज ही होती है
आज भी होगी
तैयार हो जायें
हो ली कह जाये
कोई इससे पहले
जुट जायें
पुराने ट्रंक
को खुलवाये
कई सालो से
हर साल पहने
जा रहे होली के
कपडों को आज
एक बार फिर से
बाहर निकलवायें
धूल को झा‌ड़ लें
कहीं उधड़ा हुआ
दिखे कोई कौना
उसे सुई और धागा
सफेद ना भी मिले
सब चलता है
मानकर सुधार लें
इस्त्री करने की
जरूरत नहीं होती है
तुरंत पहने और
सिर पर टोपी
पाँव में चप्पल
एक टूटी डाल लें
कुछ लाल नीले
हरे पाउडर को
फटी हुई दहिनी
जेब में पालिथिन
की पुड़िया में
सम्भाल लें
कुछ मुँह में
ऐसा रंग लगाये
चेहरे के ऊपर ही
एक चेहरा बन जाये
कोई भी मिले उसे
देख कर जबरदस्ती
ही सही मुस्कुरायें 

"होली की बहुत
बहुत बधाई"
बड़बड़ायें
दो चार घंटे सुबह के
किसी तरह काट ले
फिर चैन की साँस लें
पानी गरम करवायें
साबुन से रंग छुड़ाये
होली हो ली सोच कर
होली के कपड़ों
को धुलवायें
धूप में सुखा कर
फिर से पुराने ट्रंक
में डाल आयें
निपट गयी होली
मान कर
आराम फरमायें ।

रविवार, 16 मार्च 2014

रंगों को समझने का स्कूल कहाँ पाया जाता है

होते होते एक
जमाना ही
गुजर जाता है
रंगों को समझने
बूझने में ही
कहाँ से कहाँ
पहुँचा जाता है
पिछले साल ही
तो लाल दिखा
था एक रंग
एक ही साल में
क्या से क्या
हो जाता है
कल ही मिला था
वही रंग होली में
लगा जैसे कुछ
हरा और कुछ
नीला सा कहीं
नजर आता है
पूरा जीवन एक
होली ही तो होती है
होली दर होली
रंग के ऊपर
रंग की परत
चढ़ाना भी सीख
ही लिया जाता है
कई सालों से
साथ रहते रहते भी
नहीं पता चलता है
कोई एक बेरंग
रंग अपना कितनी
खूबी के साथ
छिपा ले जाता है
रंग का रंग रूप
चुराना बहुत ही
आसानी से
किसी से भी
सीखा जाता है
एक सीधा साधा
रंग ही कभी
अपना रंग नहीं
बदल पाता है
रंगो की दुनिया में
ही बनते हैं इंद्रधनुष
रंगो को लेकर
छ्ल कपट
छीना झपट
कर लेने वाला ही
रंगबाज कहलाता है
प्रकृति कभी नहीं
छेड़ती है रंगो को
रंग खेलने का
तरीका किसी को
तो आता है
श्याम का रंग भी
राधा ही जानती थी
“उलूक” ताजिंदगी
रंगो को समझने
की कोशिश में
ही एक उल्लू
बन जाता है ।

शनिवार, 15 मार्च 2014

होली को होना होता है बस एक दिन का सनीमा होता है

मित्रों के
लिये कम
दुश्मनों से
गले मिलने
के लिये
कुछ ज्यादा
होनी होती है
होली कई 
कई सालों
के गिले शिकवे
दूर करने की
एक मीठी सी
गोली होती है
बस एक दिन
के लिये
“आप” होते हैं
एक “हाथ”
में “कमल”
एक हाथ
में “लालटेन”
भी होनी होती है
“हाथी” की सूँड
से रंगों की बरसात
हरे सफेद नारंगी
रंग के “तिरंगे”
को “लाल” रंग
से सलामी
लेनी होती है
सफेद टोपी
किसी की भी हो
रंग भरी हो
आड़ी तिरछी हो
सभी के सिर पर
होनी होती है
“साईकिल” के
सवारों की
मेजबानी “कार”
वालों को
लेनी होती है
कहीं “गैससिलेण्डर”
कहीं “पतंग”
कहीं कहीं
जेब काटने
की “कैंची”
एक होनी
होती है
एक दिन
ही होता है
बिना पिये
जिस दिन
हर किसी
को भाँग
चढ़ी होनी
होती है
नेता कौन
अभिनेता कौन
मतलब ही नहीं
होना होता है
जनता हूँ
जनता को
एसा कुछ भी
कहीं भी नहीं
कहना होता है
बस एक ही दिन
प्यार मनुहार और
गिले शिकवे दूर
करने के लिये
होना होता है
जिसके होने को
हर कोई “होली”
होना कहता है
ना हरा होना
होता है ना
लाल होना होता है
जो होना होता है
बस काला और
सफेद होना होता है
एक दिन के
कन्फ्यूजन से
करोड़ों को
हजारों दिन
आगे के लिये
रोना होता है
होली हो लेती
है हर बार
चढ़े हुए रंगों
को उतरना
ही होता है
बाकी के
पाँच साल
का हर दिन
“उलूक”
देश की
खाल खीँचना
और
निचोड़ना
होता है
बुरा होता
भी है तो
बुरा नहीं
लगना होता है
होली की
शुभकामनाऐं
ले दे कर
सबको सब से
"बुरा ना मानो होली है"
बस कहना
होता है ।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

इस बार भी चढ़ जायेगा रंग कहाँ कुछ नहीं बतायेगा

होली के
रंगो के बीच
भंग की
तरँगो के बीच
रंग में रंग
मत मिला
मान जा
एक ही
रंग में रह
कोशिश कर
तिरंगा रंगों
का मत फहरा
रंगो का भी
होता है ककहरा
हरे को रहने
ही दे हरा
लाल बोल कर
रँग को रंग
से मत लड़ा
जिस रंग
में रंगा है
उसी रंग
से खेल
दो चार दिन
का सब्र कर
सालों साल
की मेहनत
पर ना डाल
मिट्टी या तेल
एक दिन
मुस्कुरायेगा
गले से लगायेगा
आशीर्वाद ढोलक
की थापों के साथ
एक नहीं कई
कई दे जायेगा
हो हो होलक रे
करता हुआ रंग
हवा में उड़ेगा
कुछ ही देर
फिर थोड़ा
मिट्टी में मिलेगा
कुछ पानी की
फुहारों के साथ
बह जायेगा
रंग बदलने वाला
क्या करेगा
बस यही नहीं
किसी के समझ
में आ पायेगा
रेडियो कुछ कहेगा
टी वी कुछ दिखायेगा
रंगों का गणित
बहुत सरल तरीके
से हल किया हुआ
अखबार भी बतायेगा
हर कोई कहेगा
जायेगा तो “आप”
के साथ ही
इस बार जायेगा
रंग रंग में मिलेगा
पता भी नहीं चलेगा
होली हुई नहीं
सब कुछ बदल जायेगा
जिसका चढ़ेगा रंग
वही बस वही
बाप हो जायेगा
रंग को रंग
ही रहने दे
अगर मिलायेगा
समझ ले बाद में
तेरे ही सर
चढ़ के बोलेगा
होली का होला
कब हो गया
“उलूक” तू बस
ऊपर से नीचे
देखता रह जायेगा ।

गुरुवार, 13 मार्च 2014

रंगो का त्यौहार क्या कुछ रंगहीन हो गया है

कहाँ हैं रंग
कहाँ है इंद्रधनुष
कहाँ है पानी
की बौछारें
भीगता बाहर
का ही नहीं
था सब कुछ
अंदर भी छूटती
थी कुछ फुहाँरे
दो चार दिन
का नहीं कोई
खेल होता था
महीने महीने का
जमता था अखाड़ा
सुनाई देती थी
ढोलक की थापें
और मजीरे की
मीठी मीठी आवाजें
रात रात भर
बिना पिये ही
होता था नशा
उतरता कब था
नहीं  होता था
किसी को पता
घर घर से
निकाल निकाल
कर बच्चे जवान
और बूढ़ो का
किया जाता था
गलियों में जमावाड़ा
गालियाँ भी होती थी
गीतों की टोली
भी होती थी
चंदा भी माँगा
जाता था
दे देता था
हर कोई
खुशी खुशी कभी
मुँह भी टेड़ा
नहीं बनाता था
पता नहीं
क्या हो गया है
समय के साथ
जैसे सब कुछ
कहीं खो गया है
कह रहे हैं
सब के सब
रंग भी हैं
फुहारें भी हैं
होली भी है
पर शायद
“उलूक”
तुझे ही
कुछ कुछ
कहीं हो गया हैं
इंद्रधनुष ही नहीं
बनता है कहीं
भी आसपास तेरे
रंगों का सब कुछ
जैसे बस काला
सफेद हो गया है
जाकर अपनी
आँखों का टेस्ट
करवा ले
मुझे पक्का
लगने लगा है
होली अपनी
जगह पर
अपनी जैसी ही
हो रही है
बस एक तू
ही शायद
कलर ब्लाइंड
हो गया है ।

बुधवार, 12 मार्च 2014

तेरा जैसा उल्लू भी तो कोई कहीं नहीं होता

अब भी
समय है
समझ क्यों
नहीं लेता

रोज देखता
रोज सुनता है
तुझे यकीं
क्यों नहीं होता

ये जमाना
निकल गया है
बहुत ही आगे
तुझे ही रहना था
बेशरम इतने पीछे

कहीं पिछली गली
से ही कभी चुपचाप
कहीं को भी
निकल लिया होता

बहुत बबाल करता है
यहाँ भी और वहाँ भी
तरह तरह की

तेरी शिकायतों के
पुलिंदे में भी
कभी कोई छेद
क्यों नहीं होता

सीखने वाले हमेशा
लगे होते हैं
सिखाने वालों
के आगे पीछे

कभी तो सोचा कर
तेरे से सीखने
वाला कोई भी
तेरे आस पास
क्यों नहीं होता

बहुत से अपने को
अब सफेद कबूतर
मानने लगे हैं
सारे कौओं को
पता है ये सब

काले कौओ के
बीच में रहकर
काँव काँव करना
बस एक तुझसे
ही क्यों नहीं होता

पूँछ उठा के देखने
का जमाना ही
नहीं रहा अब तो
एक तू ही पूँछ
की बात हमेशा
पूछता रहता है

पूँछ हिलाना
अब सामने सामने
कहीं नहीं होता

गालियाँ खा रहे हैं
सरे आम सभी कुत्ते
आदमी से बड़ा कुत्ता
कहीं भी नहीं होता

कभी तो सुन
लिया कर दिल
की भी "उलूक"
दिमाग में बहुत कुछ
होने से कुछ नहीं होता ।

मंगलवार, 11 मार्च 2014

झेल सके तो झेल “उलूक” ने छ: सौवीं बक बक दी है आज पेल

काम की बात
करने में ही
होती हैं बस
कठिनाईयाँ
कुछ लोग
बहुत अच्छा
लिखते हैं
पढ़ते ही
बज उठती
है चारों तरफ
शहनाईयाँ
कुछ भी
कह लेने में
किसी का कुछ
नहीं जाता है
एक दो तीन
होते होते
पता कहाँ
चलता है
एक दो नहीं
छ: का सैकड़ा
हो जाता है
ना पेड़ खिसकता
है कहीं कोई
ना ही पहाड़
एक किसी से
सरक पाता है
सब लोग लगे
होते हैं कुछ
ना कुछ ही
करने धरने में
कहीं ना कहीं
कुछ लोगों से
कुछ भी नहीं
कहीं हो पाता है
लिखना सबसे
अच्छा एक काम
ऐसे लोगों को
ही नजर आता है
एक जमाने में
भरे जाते थे
जिनसे कागज
किसी कापी
या डायरी के
साल होते होते
सामने सामने का
नजारा एक कबाड़ी
का कापियों को
खरीद ले जाना
हो जाता है
वो जमाना भी
गया जमाना
हो चुका कभी का
आज के दिन
कापी की जगह
ब्लाग हो जाता है
पहले के लिखे का
भी कोई मतलब
नहीं निकाला
किसी ने कहीं
आज निकलता
भी है तो कोई
कहाँ बताता है
टिप्पणी करने का
चलन भी शुरु हुऐ
कुछ ही दिन तो
हुऐ हैं कुछ
ही समय से
कुछ करते हैं
कुछ ही जगहों पर
कुछ नहीं करते
हैं कहीं भी
कुछ को लिखा
क्या है ये ही
समझ में नहीं
आ पाता है
खुश है “उलूक”
पलट कर
देखता है जब
छ: सौ बेकार
की खराब कारों के
काफिले से
उसका गैरेज
भर जाता है ।

सोमवार, 10 मार्च 2014

आशा और निराशा के युद्ध का फिर एक दौर आ रहा है

जाति धर्म
और समप्रदाय
से ऊपर ही
नहीं उठ
पा रहा है
सोलहवीं लोकसभा
का आगाज
होने को है
आदमी के लिये
बस आदमी ही
एक मुद्दा अभी
तक भी नहीं
हो पा रहा है
कुर्सी है सामने
कुत्ते की हड्डी
की तरह पड़ी जैसे
छूटने के मोह
को ही नहीं
त्याग पा रहा है
टिकट के महा
घमासान में
मूल्यों की
धज्जियाँ भी
कुत्तों की तरह
ही झगडते हुऐ
हवा में उड़ा रहा है
साफ साफ सबको
नजर आ रहा है
वोटर भी कई
बार से यही
सब कुछ
देखता हुआ ही
तो आ रहा है
वोट दे रहा है
एक अंग़ूठा छाप
की तरह हमेशा
पर साक्षर ही
नहीं होना
चाह रहा है
पूँजीवादी समाजवादी
साम्यवादी जनवादी
होने में कोई
बुराई नहीं है
पर देश के लिये
कोई नहीं है ऐसा
जो देश वाद
फैला रहा है
फंसा हुआ है
हर कोई किसी
ना किसी के
जाल में इस तरह
थोड़े से अपने
फायदे के लिये
खुद ही उलझने
का बस एक
जुगाड़ लगा रहा है
देश के लिये सोचने
की सोच खुले में
निकल कर ही
होती है "उल्लूक"
पर कोई कहाँ
खुले आकश में
निकलना चाह रहा है
बर्तन में रखा हुआ
पानी सड़ जाता है
कुछ दिनों में हमेशा
किसी की इच्छा
ही नहीं है थोड़ी
ना ही कोई
आधी सदी के
पुराने पानी को
बदलना चाह रहा है
आदमी का मुद्दा
आदमी के द्वारा
आदमी के लिये
जहाँ अब तक
हो ही जाना चहिये
उसी जगह
हर आदमी
हैवानो के लिये
फिर से एक बार
रेड कार्पेट फूलों भरी
बिछाने जा रहा है ।

रविवार, 9 मार्च 2014

बारी बारी से सबकी ही बारी क्यों नहीं लगा दी जाती है

बंदर बाँट
काट छाँट
साँठ गाँठ
सभी कुछ
काम में जब
लाना ही
पड़ता है
बाद में भी
तो पहले इतने
झंडे वंडे
पोस्टर वोस्टर
टिकट विकट
के झगड़े वगड़े
एक बार के लिये
करना जरूरी
नहीं होना चाहिये
आपस में ही
पक्ष और विपक्ष
को बैठ कर
फैसला एक ठोस
देश के हितार्थ
ले लेना चाहिये
बारी बारी से
हैड और टेल
करते हुऐ
अपनी अपनी
पारियों को खेल
लेना चाहिये
टीमें तो बननी
घर से ही
शुरु हो जाती है
सूक्ष्म रूप में
अगर दूरदृष्टी
किसी के पास
थोड़ी सी भी
पाई जाती है
किसी भी टीम
को बनाने और
बैठाने में
अक्ल ही तो
काम में शायद
लाई जाती है
सामन्जस्य
बिठा कर काले
पीले नीले को
उसके ही रंग की
सारी जिम्मेदारी
सौंप दी जाती है
किसी भी तरह की
मुद्रा कहीं भी
इन कामों के लिये
बरबाद नहीं जब
की जाती है
फिर इतने बड़े
देश के चुनावों
के लिये क्यों
खजाने की
ऐसी तैसी
बार बार
हर बार
की जाती है
जनता के हाथ
में आता कभी
कुछ भी नहीं है
चुनाव के बाद भी
उसकी ही खाल
खींच ली जाती है
संशोधनों पर
विचार कर लेने से
कई परेशानियाँ
चुटकी में ही
हल की जाती हैं
बहुत अच्छा
आईडिया आया है
खाली दिमाग में
“उलूक” के
चुनाव करने की जगह
कुछ लोगों के बीच
बारी बारी से
क्यों नहीं बारी
लगा दी जाती है
पैसा देश का
बचा कर अपने
अपने लिये इंतजाम
कर लेने से
देश के साथ साथ
जनता की जेब
कितनी आसानी से
कटने से ऐसे में
बच जाती है
टीमें हर जगह
बनती आई हैं
अपने अपने
हिसाब से
छोटी हो या
बड़ी संस्था में
जब बिना किसी
लफड़े झगड़े के
तो सबसे बड़ी टीम
भी पहली बार में
आपस में ही
मिल बैठ कर
क्यों नहीं बना
ली जाती हैं ।

शनिवार, 8 मार्च 2014

आचार संहिता है हमेशा नहीं रहती है कुछ दिन के लिये मायके आती है

आचार
संहिता
कुछ दिन
के लिये
ही सही

विकराल
रूप
दिखाती है

बहुत कुछ
कर लेती है
नहीं कहा
जा रहा है
पर
कुछ चीजों
के लिये
जैसे सुरसा
हो जाती है

डर वर
किसी को
होने लगता
है किसी
चीज से
ऐसी बात
कहीं भी
ऊपर से
नजर कहीं
नहीं आती है
 


शहर के
मकानों
गलियों
पेड़ पौंधों
को कुछ
मोहलत
साँस लेने
की जरूर
मिल जाती है

कई सालों
से लगातार
लटकते आ
रहे चेहरों को
गाड़ी भर भर
कर कहीं
फेंकने को
ले जाती हुई
दूर से
जब नजर
आने लग
जाती है

आदमी के
दिमाग में
लटके हुऐ
चेहरों और
पोस्टरों को
छूने और
पकड़ने की
जुगत लगानी
उसे नहीं
आती है

बहुत शाँति
का अहसास
'उलूक'
को होता है
हमेशा ही
ऐसी ही
कुछ बेवजह
हरकतों
पर किसी की

उसकी बाँछे
पता नहीं
क्यों खिल
जाती हैं

आने वाले
एक तूफान
का संदेश
जरूर देते हैं
शहर से
चेहरों के
पोस्टर
और झंडे
जब धीरे धीरे
बेमौसम में
गायब होते हुऐ
नजर आते हैं

पटके गये
होते हैं
इसी तरह
कई बार के
तूफानो में
इस देश
के लोग
आदत हो
जाती है

कुछ नहीं
होने वाला
होता है
आँधियों
को भी
ये पता
होता है

जनता
ही जब
एक
चिकना
घड़ा हो
जाती है ।

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

क्यों खो रहा है चैन अपना पाँच साल के बाद उसके कुँभ के आने में

दिखना
शुरु हो
चुकी हैं
सजने
सवरने
कलगियाँ
मुर्गों की
रंग बिरंगी

मुर्गियाँ
भी
लगी है
बालों में
मेहंदी
लगाने में

आने ही
वाला जो
है त्योहार
अगले महीने
एक बार
फिर से
पाँच साला

चहल पहल
होना शुरु
हो चुकी है
सभी
मयखानो में

आ चुके
हैं वापिस
सुबह
के भूले
लौट कर
शाम को
घर
कहीं दुबारा
कहीं तिबारा
शर्मा शर्मी
बेशर्मी को
त्याग कर

लग गये हैं
जश्न जीत
हार के
मनाने में

कुछ लाये
जा रहे हैं
उधर
से इधर
कुछ भगाये
जा रहे हैं
इधर से
उधर

कुछ
समझदार
हैं बहुत
समझ
चुके हैं
भलाई है
घर छोड़
कर पड़ोसी
के घर को
चले जाने में

तिकड़में
उठा पटक
की हो
रही हैं
अंदर
और बाहर
की बराबर

दिख नहीं
रही हैं
कहीं भी
मगर

मुर्गा
झपट के
उस्ताद
हैं मुर्गे
ही नहीं
मुर्गियाँ भी
अब तो

साथ साथ
आते हैं
दिखते हैंं
डाले हाथ
में हाथ
एक से
बड़कर
एक

माहिर हो
चुके हैं
चूना
लगाने में

करना है
अधिकार
को अपना
प्रयोग
हर हाल में

लगे हैं कुछ
अखबार
नबीस भी
पब्लिक
को बात
समझाने में

डाल
पर बैठा
देखता
रहेगा
“उलूक”
तमाशा
इस बार
का भी
हमेशा
की तरह

उसे
पता है
चूहा
रख कर
खोदा जायेगा
पहाड़ इस
बार भी

निकलेगा
भी वही
क्या
जाता है
एक शेर
निकलने
की बात
तब तक
हवा में
फैलाने में।

गुरुवार, 6 मार्च 2014

एक अरब से ऊपर के उल्लू हों चार पाँच सौ की हर जगह दीवाली हो

कहाँ जायेगा
कहाँ तक जायेगा
वही होना है
यहाँ भी
जिसे छोड़ कर
हमेशा तू
भाग आयेगा
भाग्य है अरब
से ऊपर की
संख्या का
दो तीन चार
पाँच सौ
के फैसलों पर
हमेशा ही
अटक जायेगा
उधर था वहाँ भी
इतने ही थे
इधर आया
यहाँ भी
उतने ही हैं
फर्क बहुत बारीक है
वहाँ सामने दिखते हैं
यहाँ बस कुछ शब्द
फैले हुऐ मिलते हैं
कुर्सी हर जगह है खाली
हर जगह होती है
वहाँ भी बैठ
लेता है कोई भी
यहाँ भी बैठ
लेता है कोई भी
परिक्रमा करने
वाले हर जगह
एक से ही होते हैं
कुर्सी पर बैठे हुऐ
के ही फैसले ही
बस फैसले होते हैं
कुर्सियां बहुत सी
खाली हो गई होती हैं
मामले गँभीर
सारे शुरु होते हैं
कहीं भी कोई अंतर
नहीं होता है
हर जगह एक
भारतीय होता है
अपने देश में
होता है तो ही
कुछ होश खोता है
दूसरे देश में
होने से ही बस
गजब होता है
इसलिये होता है
कि वहाँ का
कुछ कानून
भी होता है
यहाँ होता है तो
कानून उसकी
जेब में होता है
घर हो आफिस हो
बाजार हो लोक सभा हो
विधान सभा हो
कलाकारों का दरबार हो
ब्लागिंग हो ब्लागरों
का कारोबार हो
एक सा होता है
चाहे अखबारों का
कोई समाचार हो
एक अरब की
जनसंख्या पर
कुछ सौ का ही
कुछ एतबार हो
यहीं होता है
कुछ अनोखा
हर नुक्कड़ पर
जश्ने बहार हो
काँग्रेस हो
चप्पा चप्पा वाली हो
केजरीवाल की
बिकवाली हो
एक अरब से
ऊपर के लोगों को
फिर से वही
चार पाँच सौ के
हाथों ही होने
वाली दीवाली हो
कुर्सी भरी रहे
किसने भरी
किससे भरी
मेज को कौन सी
परेशानी कहीं भी
होने वाली हो
हर किसी के
लिखने के अंदाज
का क्या करेगा
“उल्लूक”
तेरी कलम से
निकलने वाली
स्याही ही कुछ
अजीब रंग जब
दिखाने वाली हो ।

बुधवार, 5 मार्च 2014

जरूरी नहीं होती है हर बात की कब्र कहीं खुदी होना

बेरोजगार के दर्द की
दवा नहीं होती है
और रोजगारी में
बेरोजगार होने की
बात किसी से
कभी भी कहनी
नहीं होती है
बहुत तरह के होते हैं
क्या होते हैं
?
रहने दीजिये बेकार है
कुछ भी कहना
कुछ समझेंगे
कुछ नहीं समझेंगे
कुछ से तो कहनी
ही नहीं होती है
इस तरह की बातें कभी
उनके लिये कहने से
अच्छा होता है
कुछ भी नहीं कहना
इसलिये खाली पीली
क्यों बेकार का पंगा
किसी से इस तरह
का ले लेना
अच्छा है रोज की तरह
दस पाँच मिंनट
फाल्तू निकाल कर
बैठे ठाले की किताब का
एक नमूना ही
हल कर लेना
कुछ ऐसा लिख लेना
पड़े नहीं किसी के पल्ले
एक दिन आये देखने
दूसरे दिन से साफ
नजर आये रास्ता
ही बदल लेना
किसी का इस गली से
दुबारा नहीं आने की
तौबा ही कर लेना
वैसे भी अखबार
रेडियो टी वी से
ज्यादा खतरनाक
हो चुका है आज का
सोशियल मीडिया
कुछ लिखने दिखाने
का मतलब कब
निकल आये कुछ और
और मढ़ दिया जाये
कारण सिर पर
दंगों का हो लेना
अच्छा किया
नहीं बताया
पढ़े लिखों को
बन गया था नक्शा
बेलते समय रोटी आज
शाम के खाना
बनाने के समय
पाकिस्तान का
मैंने छुपाया ही छुपाया
हो सके तो तुम भी
किसी से इस बावत
कुछ भी कहीं भी
ना कह सको तो
नहीं कह देना ।

मंगलवार, 4 मार्च 2014

तेरी कहानी का होगा ये फैसला नही था कुछ पता इधर भी और उधर भी

वो जमाना
नहीं रहा
जब उलझ
जाते थे
एक छोटी सी
कहानी में ही
अब तो
कितनी गीताऐं
कितनी सीताऐं
कितने राम
सरे आम
देखते हैं
रोज का रोज
इधर भी
और उधर भी
पर्दा गिरेगा
इतनी जल्दी
सोचा भी नहीं था
अच्छा किया
अपने आप
बोल दिया उसने
अपना ही था
अपना ही है
सिर पर हाथ रख
कर बहुत आसानी से
उधर भी और इधर भी
हर कहाँनी
सिखाती है
कुछ ना कुछ
कहा जाता रहा है
देखने वाले का
नजरिया देखना
ज्यादा जरूरी होता है
सुना जाता है
उधर भी और इधर भी
कितना अच्छा हुआ
मेले में बिछुड़ा हुआ
कोई जैसे बहुत दूर से
आकर बस यूँ ही मिला
दूरबीन लगा कर
देखने वालों को
मगर कुछ भी
ना मिला देखने
को सिलसिला कुछ
इस तरह का
जब चल पड़ा
इधर भी और उधर भी
उसको भी पता था
इसको भी पता था
हमको भी पता था
होने वाला है
यही सब जा कर अंतत:
इधर भी और उधर भी
रह गया तो बस
केवल इतना गिला
देखा तुझे ही क्योंकर
इस तरह सबने
इतनी देर में जाकर
तीरंदाज मेरे घर में
भी थे तेरे जैसे कई
इधर भी और उधर भी
खुल गया सब कुछ
बहुत आसानी से
चलो इस बार
अगली बार रहे
ध्यान इतना
देखना है सब कुछ
सजग होकर तुझे
इधर भी और उधर भी । 

सोमवार, 3 मार्च 2014

आदमी खेलता है आदमी आदमी आदमी के साथ मिलकर

हाड़ माँस और
लाल रक्त
आदमी का जैसा
ही होता है आदमी
कोशिश करता है
घेरने की एक
आदमी को ही
मिलकर एक
आदमी के साथ
आखेट करने वाले
के निशाने पर
होता है उस
समय भी
एक आदमी
बहुत सी मौतें
स्वाभाविक
होती हैं जिनमें
आदमी की
मृत्यू होती है
मरने वाला भी
आदमी होता है
मारने वाला भी
आदमी होता है
मर जाना यानि
मुक्त हो जाना
मोक्ष पा जाना
छुटकारा मिल जाना
आदमी को एक
आदमी से ही
इतना आसान
नहीं होता है
जितना कहने
सुनने और लिखने
में लगता है
आदमी का सबसे
प्रिय खेल भी
यही होता है
जंगल के शेर
के शिकार में
वो नशा कभी
नहीं होता है
जैसा आदमी के
शिकार में आदमी
के साथ मिलकर
एक आदमी ही
आदमी को घेरेते
चले जाता है
आदमी को भी
पता होता है
घेरेने वाला भी
अपना ही होता है
धागे भी बहुत
पक्के होते हैं
जाल कसता
चला जाता है
आदमी बस
कसमसाता है
पकड़ मजबूत
होते चली जाती है
आदमी के पंजे में
एक आदमी
आ जाता है
मरता कहीं भी
कोई नहीं है
पकड़ने वाला
मारना ही
नहीं चाहता है
फाँसी देने से
बेहतर उम्र कैद
को माना जाता है
क्या क्या नहीं
करता है आदमी
आदमी के साथ
बस बचा हुआ
कुछ है तो
आदमी की नींद
का एक सपना
जो उसका अपना
कहलाता है
आदमी का मकसद
होता है जिसे
अपनी मुट्ठी
में करना
बस यहीं पर
आदमी आदमी
से मात
खा जाता है
आदमी आदमी
के साथ मिलकर
आदमी को
कभी मोक्ष
नहीं दे पाता है ।

रविवार, 2 मार्च 2014

ब्लागिंग कर कमप्यूटर में डाल बाकी मत कर फाल्तू कोई बबाल

भाई जी सुनिये जरा
एक बहुत बड़े ने
लिखा है बहुत
ही कुछ बड़ा बड़ा
बिना पढ़े
सोचे समझे
हर कोई होना
चाहता है जहाँ पर
जा कर खड़ा
कुछ छोटों ने
भी लिखा है
लिखे को
तवज्जो ना सही
लिखने वाले को
ही दे दीजिये
आशीर्वाद अपना
अब मत कह देना
कह रहा है
फाल्तू में ये
सब इतना
क्योंकि :)
जब गुलाब के
बाग में एक
जाते समय
काँटे तक नहीं
कोई देखते हो
पत्ते गिरे हुऐ
फूलों की तरफ
भी आशिकों की
तरह ही कुछ
देखते हो
खुश्बू नहीं भी
होती है कहीं भी
नाक बंद होगी
जैसा ही कुछ
बस सोचते हो
कभी तो
थोड़ी सी सही
नजरे इनायत
इधर भी
तो कीजिये 

बीबी रोज के 
खर्चे का पूछती
है हमेशा हिसाब

पान कभी खाते
नहीं देखा इसलिये
समझ में हमारे भी
कुछ कुछ कभी
आता है साहब
पर फिर भी
आप रोज ही
निकलते हो
पान वाली
की गली से
किनारे किनारे
लगा कर जैसे
गालों पर हाथ
पान वाली की तरफ
तिरछी नजर फेंकने
से कभी भी नहीं
देखा कि चूकते हो
सबको सब नजर
आता है जनाब
चश्मा मोटा
जो लगाता है
आँखों पर साहब
सारा आँखों देखा हाल
बताता है अपने आप
आने जाने को
कोई नहीं बोल
रहा है आपसे कभी
बस मेरे मोहल्ले
की तरफ कभी
पीठ करके ही सही
बैठिये तो जनाब
अच्छा लगेगा कुछ
कह भी जायेंगे
बुरा ही सही
लिख गये तो
इससे ज्यादा
अच्छा नहीं
दुआ देगा एक
छोटा लिखने वाला
भी आपको
बड़े के बड़े बड़े
लिखे में सारे बड़े
पहुँचते हैं हमेशा
बहुत अच्छा लगेगा
अगर कोई एक
छोटे के घर आ कर
कह देगा एक बात
लिखना कोई बुरी
बात नहीं है
लिखा करो
अच्छा है
बहुत लिखना
खूब लिखना
कम से कम
अपने से ही
मुँह के अंदर
अंदर कर
लेने से
कोई बात ।

शनिवार, 1 मार्च 2014

बादल भी कुछ नहीं लिखते बादलों को नहीं होती है घुटन

शायद
ज्यादा अच्छे
होते हैं वे लोग
जो कुछ
नहीं लिखते है

वैसे
किसी के
लिखने से ही
लिखने वाले के
बारे में कुछ
पता चलता हो
ऐसा भी जरूरी
नहीं होता है

पर
कुछ नहीं कहना
कुछ नहीं लिखना
नहीं लिखने वाले
की मजबूती का
पता जरूर देता है

लिखने
से ज्यादा
अच्छा होता है
कुछ करना

कहा
भी गया है
गरजते हैं
जो बादल
बरसते नहीं हैं

बादल
भी तो बहुत
चालाकी करते हैं

जहाँ
बनते हैं
वहाँ से
चल देते हैं

और
बरसते हैं
बहुत दूर कहीं
ऐसी जगह पर
जहाँ कोई
नहीं जानता है
बादल कहाँ
कैसे और
क्यों बनते हैं

एक
बहुत बड़े देश
के कोने कोने के
लोग भी तो
पहुँचते हैं हमेशा
एक नई जगह
और वहाँ बरसते
हुऐ दिखते हैं

कहीं भी
कोई जमीन
नम नहीं होती हैं
ना उठती है
थोड़ी सी भी
सोंधी गंध कहीं से
गीली मिट्टी की

बरसना
बादलों का
बादलों पर और
बरसात का नहीं होना

किसी
को कोई
फर्क भी
नहीं पड़ना

बहुत
कुछ यूँ ही
सिखा देता है
और
बादलों के
देश की
पानी की
छोटी बूँदें भी
सीख लेती हैं
नमीं सोख लेना

क्योंकि
जमीन की
हर बूँद को
खुद के लिये बस
बनना होता है
एक बड़ा बादल

बरसने
के लिये नहीं
बस सोखने
के लिये
कुछ नमीं

जो सब
लिखने से
नहीं आता है

बस
सीखा जाता है
उन बादलों से
जो बरसते नहीं
बस गरजते हैं

बहुत
दूर जाकर
जहाँ किसी को
फर्क नहीं पड़ता है

बिजली
की चमक से
या
घड़धड़ाहट से

बादल
भी कहाँ
लिखते हैं कुछ
कभी भी कहीं भी ।

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