Monday, June 4, 2012

"गधा बना दो भगवान"

आज गधों पर
कुछ लिखने का
मन कर रहा है
पर बहन जी का
बहुत डर लग रहा है
उल्लू बिल्ली मुर्गी
पर लिखते हो कहकर
नाराजगी एक दिन
वो जता रही थी
इसीलिये हमारी
हिम्मत यहाँ आकर
बोल ही जा रही थी
गधे वैसे तो बहुत
काम के आदमी
हमेशा से बताये
जाते रहे हैं
इसीलिये धोबी
के खानदान के
साथ अभी तक
चलते आ रहे हैँ
आदमी जब एक
गधा हो जाता है
तो लगता है जैसे
कोई गाली खाता है
क्या करें गधे टाईप
के आदमियों के बीच
में जब कोई फंस
ही कहीं जाता है
तो गधा हूँ
इसीलिये तो यहाँ हूँ
कहता है और
मुस्कुराता है
गधों के किये
गये कामों पर
टल्लियाँ लगाता
चला जाता है
ना कुछ कर पाता है
ना ही कुछ कह पाता है
बस गधों की किस्मत
से खार खाता है
अगले जनम मोहे
गधा ही कीजो
कि बिनती हाथ जोड़
प्रभू के द्वार पर लगाता है।

Sunday, June 3, 2012

"राष्ट्रीय कुप्रबंधन संस्थान"

देश जहाँ निरक्षर
को साक्षर बनाता है
वहीं पर साक्षर
सबसे ज्यादा देश
को चूना लगाता है
प्रबंधन को बहुत
आसानी से कुप्रबंधन
बनाया जाता है
हर कहीं ये
दूर दूर से भी
साफ नजर
आ जाता है
व्यापार में जब
कुछ भी आजमाया
जाता है
तो किसी के
दिमाग में ये क्यों
नहीं आता है
कुप्रबंधन संस्थानों
को रोजगार का
जरिया क्यों
नहीं अभी भी
कोई बनाता है
चहेते कुप्रबंधकों
को भी कहीं
नौकरी में घुसा
ले जाता है
प्रबंधन गुरुओं की
खेप में उसे नहीं
मिलाता है
इस तरह की
सोच से देश
को क्यों नहीं
बचा ले जाता है।

Saturday, June 2, 2012

"गोबर"

गोबर के जब
उपले बनाता है
बहुत सी टेढी़
वस्तुओं को
गलाने की ताकत
उसे जलाने से
पा जाता है
गोबर की खाद
बनाता है
खेत खलिहान
को आबाद
कर ले जाता है
गोबर की चिनाई
करवाये चाहे
गोबर की लिपाई
कीड़े मकोडो़ की
विदाई करवाता है
गोबर के पार्थिव पूजन
से शिव का आशीर्वाद
पा जाता है
शरीर को रोगमुक्त
करवाने का एक
वरदान पा जाता है
गोबर के एक गणेश
की तीव्र इच्छा होना
हर पत्नी की विशलिस्ट
में जरूर पाया जाता है
गोबर का प्रयोग
पर्यावरण को नुकसान
भी नहीं पहुँचाता है
इतने मह्त्वपूर्ण गोबर
को जब मनुष्य अपने
दिमाग में घुसाता है
तो किसी भी वस्तु को
गोबर में बदलने की
महारत हासिल कर
ले जाता है।

Friday, June 1, 2012

"मुर्गी की दाल"

समझदार मुर्गी अपनी सूरत और
सेहत को कभी नहीं बढा़ती है
दुश्मनी होती है जिस मुर्गी से
उसे खूब खिलाती और पिलाती है
वैसे तो हर बाडे़ में मुर्गियाँ ही
मुर्गियाँ हर तरफ फड़फडा़ती हैं
लेकिन हर मुर्गी की तरफ हर
किसी की नजर कहाँ जाती है
ये वाकई समझदारी की बात
सभी के द्वारा बताई जाती है
एक कानी मुर्गी ही मुर्गियों के
द्वारा रानी चुनवायी जाती है
बाड़े की सेहतमंद खूबसूरत मुर्गी
सबकी नजर में लाई जाती है
चाहने वालों के हाथों कहीं
ना कहीं कटवा दी जाती है
मर खप जब जाती है
फिर पकवाई भी जाती है
खाने वालों के नखरे सहती है
और दाल बताई जाती है
कानी मुर्गी इसी बीच कहीं
जंगल में जाकर नाच आती है
जंगल में मोर नाचा की
एक खबर अखबार में आती है
कितने आसान तरीके से
घर की मुर्गी दाल बराबर
सबको समझा जाती है।

Thursday, May 31, 2012

"निठल्ले का सपना "

कौआ अगर नीला
होता तो क्या होता
कबूतर भी पीला
होता तो क्या होता
काले हैं कौए अभी भी
कुछ नया कहाँ
कर पा रहे हैं
कबूतर भी तो
चिट्ठियों को
नहीं ले जा रहे हैं
एक निठल्ला
इनको कबसे
गिनता हुवा
आ रहा है
मन की कूँची से
अलग अलग
रंगों में रंगे
जा रहा है
सुरीली आवाज
में उसकी जैसे
ही एक गीत
बनाता है
कौआ काँव काँव
कर चिल्ला जाता है
निठल्ला कुढ़ता है
थोड़ी देर मायूस
हो जाता है
जैसे किसी को
साँप सूँघ जाता है
दुबारा कोशिश
करने का मन
बनाता है
कौए को छोड़
कबूतर पर
ध्यान अपना
लगाता है
धीरे धीरे तार
से तार जोड़ता
चला जाता है
लगता है जैसे
ही उसे कुछ
बन गयी हो बात
एक सफेद कबूतर
उसके सर के ऊपर
से काँव काँव कर
आसमान में
उड़ जाता है।

Wednesday, May 30, 2012

"झंडा है जरूरी"

ये मत समझ लेना
कि वो बुरा होता है
पर तरक्की पसंद
जो आदमी होता है
किसी ना किसी
पार्टी से जुडा़ होता है
पार्टी से जो जुडा़
हुवा नहीं होता है
उसकी पार्टी तो
खुद खुदा होता है
स्टेटस उसका बहुत
उँचा उठा होता है
जिसके चेहरे पर
एक झंडा लगा होता है
सत्ता होने ना होने
से कुछ नहीं होता है
इनकी रहे तो ये
उनको नहीं छूता है
उनकी रही तो
इनको भी कोई
कुछ नहीं कहता है
इस बार इनका
काम आसान होता है
उनका ये समय तो
आराम का होता है
अगली बार उनका
हर जगह नाम होता है
इनका कुन्बा दिन
हो या रात सोता रहता है
बिना झंडे वाला बकरे
का बार बार काम
तमाम होता है
जिसे देखने के लिये भी
वहाँ ना ये होता है
ना ही वो होता है
भीड़ काबू करने का
दोनो को जैसे कोई
वरदान होता है
भीड़ के एक छोटे
हिस्से पर इनका
दबदबा होता है
बचे हिस्से को
जो काबू में
कर ही लेता है
अपने कामों को
करने के लिये
झंडा मिलन भी
हो रहा होता है
मीटिंग होती है
मंच बनता है
उस समय इनका
झंडा घर में सो
रहा होता है
पर तरक्की पसंद
जो आदमी होता है
किसी ना किसी
झंडे से जुड़ा होता है
जिसका कोई झंडा
नहीं होता है
वो कभी भी ना ये
होता है ना वो होता है।

Tuesday, May 29, 2012

"कुत्ते की पूँछ"

कुत्ते सारे मोहल्ले के
आज देखा हमने
जा रहे थे सब
अपनी अपनी पूँछ
सीधी करके
पूछने पर पता चला
कि नाराज हैं
हड़ताल पर जा रहे हैं
आज रात से
गलियों में भौंकने को
भी नहीं आ रहे हैं
क्या दोष है इसमें
अगर सीधी नहीं हो पाती
पूँछ हमारी अगर
पाईप के अंदर भी
है रख दी जाती
छ: महीने का प्लास्टर
भी अगर लगाओ
फिर से वैसी ही टेढी़ पाओ
जब प्लास्टर को खुलवाओ
अब सभी लोगों का अपना
अपना कुछ सलीका होता है
हर आदमी का अपने काम
को अपनी तरह करने का
भी एक अलग तरीका होता है
अब अगर किसी को उसका
काम पसंद नहीं है आता
तो इसके बीच में कोई
कुत्ते और उसकी पूँछ
को क्यों है ले आता
आदमी की बीमारियों
को उसके अपने नामों
से ही पंजीकृत करवाओ
लोकतंत्र है कुत्तों के
अधिकारों के बारे में
भी कोई सोच तो बनाओ।

Monday, May 28, 2012

"कूडा़"

रोज घर के कूड़े
की एक थैली
बनाता है
मुंह अंधेरे एक
चेहरा खिड़की से
बाहर आता है
ताकत लगा के
थैली दूसरे घर
के आंगन में
पहुँचाता है
इसी तरह
इस आँगन से
उस आँगन तक
होता हुवा थैला
अंतत:कूडे़दान
में समा ही जाता है
बाहरी कूडे़ का
कितना सलीकेदार
प्रबंधन मेरे शहर
के हर पढे़ लिखे
को आता है
जैविक अजैविक
कूडे़ की थैलियाँ
आते जाते कहीं
ना कहीं टकरा
ही जाती हैं
ताज्जुब होता है
दिमाग में भरे हुवे
कूडे़ का निस्तारण
आदमी अपने अंदर से
कौन से थैले में
कराता है
कूड़ा बस फैला
हुवा ही नजर
सामने आता है
पता ही नहीं
चलता उसका
थैला किधर
चला जाता है।

Sunday, May 27, 2012

"एहसानमंद"

एक बूढा़ और
उसकी बुढि़या
के एहसानो के
तले मैंने जब
अपने को गले
गले तक दबा
हुआ पाया
कुछ तो करना
ही चाहिये उनके
लिये मेरे मन
में विचार एक आया
हालत उनकी देख
कर देखा नहीं
जा रहा था
एक चल नहीं
पा रहा था
दूसरे से दाँत टूटने
के कारण खाया ही
नहीं जा रहा था
पैसे बच्चों को देने
से बच्चे बिगड़ जाते हैं
किताबों में लिखा है
आस पास में उदाहरण
भी बहुत मिल जाते हैं
बूढे़ लोग भी उम्र के इस
पडा़व में आकर बच्चे
जैसे ही तो हो जाते हैं
ऎसा करता हूँ
समुद्र के किनारे से
सौ कोस दूर टापू
में एक बडा़ सा
महल बनाता हूँ
दोनो के आने
जाने के लिये
दो दो हाथी
रख के आता हूँ
खाने के लिये
एक जहाज भर के
अखरोट पहुँचाता हूँ
कुछ धन उनके नाम
से अपने खाते में
हर महीने जमा
करवाता हूँ
उपर वाला जैसे
ही उनको बुलाता है
मैं समुद्र किनारे
एक मंदिर बनवाता हूँ
उसमें दोनो की मूर्ति
लगवाकर माला
पहनाता हूँ ।

Saturday, May 26, 2012

"वकील साहब काश होते आज"

मेरे शहर अल्मोड़ा
की लाला बाजार
ऎतिहासिक शहर
बुद्धिजीवियों की
बेतहाशा भरमार
बाजार में लगा
ब्लैक बोर्ड पुराना
नोटिस बोर्ड की
तरह जाता है
अभी तक भी जाना
छोटा शहर था
हर कोई शाम को
बाजार घूमने जरूर
आया करता था
लोहे के शेर से
मिलन चौक तक
कुछ चक्कर जरूर
लगाया करता था
शहर का आदमी
कहीं ना कहीं
दिख ही जाता था
शहर की गतिविधियाँ
यहीं आकर पता
कर ले जाता था
मेरे शहर में मौजूद थे
एक वकील साहब
वकालत करने वो कहीं
भी नहीं जाते थे
हैट टाई लौंग कोट
रोज पहन कर
बाजार में चक्कर
लगाते चले जाते थे
बोलने में तूफान
मेल भी साथ
साथ दौडा़ते थे
लकडी़ की छडी़
भी अपने हाथ
में लेके आते थे
कमप्यूटर उस
समय नहीं था
कुछ ना कुछ
बिना नागा ब्लैक बोर्ड
पर चौक से लिख
ही जाते थे
उस समय हमारी
समझ में उनका
लिखा कुछ भी
नहीं आता था
पर लिखते गजब
का थे उस समय
के बुजुर्ग लोग
हमें बताते थे
बच्चे उनको
पागल कह कर
चिढा़ते थे
आज वकील साहब
ना जाने क्यों याद
आ रहे हैं
भविष्य की कुछ
टिप्पणियां दिमाग
में आज ला रहे हैं
मास्टर साहब एक
कमप्यूटर पर रोज
आया  करते थे
कुछ ना कुछ
स्टेटस पर लिख
ही जाया करते थे।