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रविवार, 31 मई 2015

कहे बिना कैसे रहा जाये एक दिन की छुट्टी मना कर फिर शुरु हो जा रहा हूँ

महीना बीत रहा है
कल कुछ कहा नहीं
क्या आज भी कुछ
नहीं कह रहा है
कहते हुऐ तो आ रहा हूँ
आज से नहीं एक
जमाने से गा रहा हूँ
मेंढको के सामने
रेंक रहा हूँ
गधों के पास जा जा
कर टर्रा रहा हूँ
इसकी सुन के आ रहा हूँ
उसकी बात बता रहा हूँ
पन्ना पन्ना जोड़ रहा हूँ
एक मोटी सी
किताब बना रहा हूँ
रोज ही दिखता है कुछ
रोज ही बिकता है कुछ
शब्दों से उठा रहा हूँ
समझने की कोशिश
करता रहा हूँ
तुझको कुछ तब भी
नहीं समझा पा रहा हूँ
कल का दिन बहुत
अच्छा दिन था
कल की बात
आज बता रहा हूँ
एक दिन की दफ्तर
से छुट्टी लिया था
घर में बैठे बैठे
मक्खियाँ गिन रहा था
अखबार लेने ही
नहीं गया था
टी वी रेडियो भी
नहीं खुला था
वहाँ की रियासत का
वो नहीं दिखा था
यहाँ की रियासत का
ये नहीं मिला था
छोटे छोटे राजाओं की
राजाज्ञाओं से
कुछ देर ही सही
लगा बच जा रहा हूँ
बहुत मजा आ रहा था
महसूस हो रहा था
रोम में लगी है
लगती रहे आग
एक दिन का ही सही
नीरो बन कर बाँसुरी
चैन की बजा रहा हूँ ।



चित्र साभार : www.pinstopin.com

शुक्रवार, 29 मई 2015

कुछ नहीं कहना है कह कर क्या कुछ होना है पढ़ लेना बस मानकर इतना कि ये रोज का ही इसका रोना है

किसी दिन बहुत
हो जाता है जमा
कहने के लिये यहाँ
क्या कहा जाये
क्या नहीं
आग लिखी जाये
या लिखी जाये चिंगारी
या बस कुछ धुऐं में से
थोड़ा सा कुछ धुआँ
अरे गुस्सा थूक
क्यों नहीं देता है
खोद लेता है क्यों नहीं
कहीं भी एक नया कुआँ
उसकी तरह कभी
नहीं था तू
ना कभी हो पायेगा
उसको खेलना आता है
बहुत अच्छी तरह
रोज एक नया जुआँ
झूठ की पोटली है
बहुत मजबूत है
ओढ़ना आता है उसे
सच और दिखाना
सच्चाई और झौंकना
आँखों में धूल मिलाकर
अपनी मक्कारी का धुआँ
सब पहचानते हैं उसे
रहते हैं साथ उसके
पूछो कभी कुछ उसके
बारे में यूँ ही तो
कहते कुछ नहीं
उठा के पूँछ कर
देते हैं बस हुआँ हुआँ ।



चित्र साभार: imgkid.com

गुरुवार, 28 मई 2015

लिख लेना कुछ भी पता है बिना लिखे तुझ से भी नहीं रहा जायेगा

कल भी लिखा था
आज भी लिखना है
कल भी शायद कुछ
लिखा ही जायेगा
लिखना इसलिये
नहीं कि लिखना
जरूरी होता है
लिखना इसलिये
नहीं कि किसी को
पढ़ना भी होता है
लिखना
इसलिये नहीं
कि किसी को
पढ़ाना होता है
किसी को
समझाना होता है
किसी को
दिखाना होता है
किसी को
बताना होता है
ऐसा भी नहीं कि
आज नहीं
लिखा जायेगा
तो कोई
मातम मनायेगा
या कल फिर
लिखने नहीं
दिया जायेगा
वैसे भी कौन
लिखने वाला
बताता है कि
किसलिये
लिख रहा है
कौन समझाता
है कि क्या
लिख रहा है
ऊपर वाला
जानता है
क्या लिखा जायेगा
लिखा जायेगा या
नहीं लिखा जायेगा
उसका करना कराना
नियत होता है
उसे ये भी
पता होता है कि
लिखना लिखाना
नीचे वाले के
करने कराने
से होता है
करने कराने
पर होता है
नीचे वाले की
नीयत में
क्या होता है
बस उस का ही
ऊपर वाले को
जरा भी पता
नहीं होता है
इसलिये आज
का लिखा
लिख दिया
कल का लिखा
कल लिखा जायेगा
जब करने कराने
वाला कुछ
अपना करेगा
या कुछ ‘उलूक’ पर
चढ़ कर उससे
कुछ करायेगा ।

चित्र साभार: www.illustrationsof.com

बुधवार, 27 मई 2015

परेशान हो जाना सवाल देख कर सवाल का जवाब नहीं होता है

हमाम के
अंदर रहता है
अपने खुद के
पहने हुऐ
कपड़ों को
देख कर
परेशान होता है
दो चार जानवरों
के बारे में बात
कर पाता है
जिसमें एक गधा
एक लोमड़ी या
एक कुत्ता होता है
सब होते हैं जहाँ
वहाँ खुद मौजूद
नहीं होता है
इंसानों के बीच
एक गधे को
और गधों के बीच
एक इंसान का रहना
एक अकेले के लिये
अच्छा नहीं होता है
ढू‌ढ लेते हैं अपनी
शक्ल से मिलती
शक्लें लोग हमेशा ही
इस सब के लिये
आईना किसी के
पास होना जरूरी
नहीं होता है
इज्जत उतारने
के लिये कुछ
कह दिया जाये
किसी से
किसी किताब में
कहीं कुछ ऐसा
लिखा भी
नहीं होता है
अपने कपड़े तेरे
खुद के ही हैं
‘उलूक’
नंगों के
बीच जाता है
जिस समय
कुछ देर के लिये
उतार क्यों
नहीं देता है ?

चित्र साभार: imageenvision.com

मंगलवार, 26 मई 2015

शतक इस साल का कमाल आस पास की हवा के उछाल का

फिर से हो गया
एक शतक और
वो भी पुराने
किसी का नहीं
इसी का और
इसी साल का
जनाब क्रिकेट
नहीं खेल रहा है
यहाँ कोई ये सब
हिसाब है लिखने
लिखाने के फितूर
के बबाल का
करते नहीं अब
शेर कुछ करने
दिया जाता भी
नहीं कुछ कहीं
जो भी होता है
लोमड़ियों का
होता है हर
इंतजाम
दिखता भी है
बाहर ही बाहर
से बहुत ही और
बहुत ही कमाल का
हाथियों की होती
है लाईन लगी हुई
चीटिंयों के इशारे
पर देखने लायक
होता है सुबह से
लेकर शाम तक
माहौल उनके
भारी भरकम
कदमताल का
मन ही मन
नचाता है मोर
भी ‘उलूक’
सोच सोच कर
मुस्कुराते हुऐ
जब मिलता नहीं
जवाब कहीं भी
देखकर अपने
आस पास सभी
के पिटे पिटाये
से चेहरों के साथ
बंद आँख और
कान करके
चुप हो जाने
के सवाल का ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

सोमवार, 25 मई 2015

‘दैनिक हिन्दुस्तान’ सबसे पुरानी दोस्ती की खोज कर के लाता है ऐसा जैसा ही उसपर कुछ लिखा जाता है

सुबह कुछ
लिखना चाहो
मजा नहीं
आता है
रात को वैसे
भी कुछ नहीं
होता है कहीं
सपना भी कभी कभी
कोई भूला भटका
सा आ जाता है
शाम होते होते
पूरा दिन ही
लिखने को
मिल जाता है
कुछ तो करता
ही है कोई कहीं
उसी पर खींच
तान कर कुछ
कह लिया जाता है
इस सब से इतर
अखबार कभी कुछ
मन माफिक
चीज ले आता है
संपादकीय पन्ने
पर अपना सब से
प्रिय विषय कुत्ता
सुबह सुबह नजर
जब आ जाता है
आदमी और कुत्ते
की दोस्ती पुरानी
से भी पुरानी होना
बताया जाता है
तीस से चालीस
हजार साल का
इतिहास है बताता है
आदमी ने क्या सीखा
कुत्ते से दिखता है
उस समय जब
आदमी ही आदमी
को काट खाता है
विशेषज्ञों का मानना
मानने में भलाई है
जिसमें किसी का
कुछ नहीं जाता है
आदमी के सीखने
के दिन बहुत हैं अभी
कई कई सालों तक
खुश होता है
बहुत ही ‘उलूक’
चलो आदमी नहीं
कुत्ता ही सही
जिसे कुछ सीखना
भी आता है
दिखता है घर से
लेकर शहर की
गलियों के कुत्तों
को भी देखकर
कुत्ता सच में
आदमी से बहुत कुछ
सीखा हुआ सच में
नजर आता है  ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

रविवार, 24 मई 2015

लिखते लिखते लिखने वाले की बीमारी पर भी लिख

दवा पर लिख
कुछ कभी
दारू पर लिख
दर्द पर लिख
रही है सारी दुनियाँ
तू भी लिख
कोई नहीं
रोक रहा है
पर कहीं कुछ
कभी कँगारू पर लिख
चाँद पर लिख
कुछ सितारों पर लिख
लिखने पर रोक लगे
तब तक कुछ
बेसहारों पर लिख
लिखने लिखाने पर
पूछना शुरु
करती है जनता
कभी कुछ समाधान
पर लिख कभी
आसमान पर लिख
करने वाले मिल जुल
कर निपटाते हैं
काम अपने हिसाब से
सिर के बाल
नोच ले अपने
उसके बाद चाहे
बाल उगाने की
कलाकारी पर लिख
हर कोई बेच
कर आता है
सड़क पर खुले
आम सब कुछ
तू भी तो बेच
कुछ कभी और
फिर बेचने वालों की
मक्कारी पर भी लिख
लिखना लिखाना ही
एक दवा है मरीजों
की तेरी तरह के
डर मत पूछने वालों से
कभी पूछने वालों की
रिश्तेदारी पर लिख
हरामखोरों की जमात
के साथ रहने का
मतलब ये नहीं
होता है जानम
लिखते लिखते कभी
कुछ अपनी भी
हरामखोरी पर लिख ।

चित्र साभार: www.colinsclipart.com

शनिवार, 23 मई 2015

जरूरी कितना जरूरी और कितनी मजबूरी

दुविधाऐं
अपनी अपनी
देखना सुनना
अपना अपना
लिखना लिखाना
अपना अपना
पर होनी भी
उतनी ही जरूरी
जितनी अनहोनी
दुख: सुख: अहसास
खुद के आस पास
बताना भी उतना
ही जरूरी जितना
जरूरी छिपाना
खुद से ही खुद
को कभी कभी
खुद के लिये ही
समझाना भी
बहुत जरूरी
समझ में आ जाने
के बाद की मजबूरी
परेशानी का आना
स्वागत करना भी
उतना ही जरूरी
जितना करना
उसके नहीं आने
की कल्पना के साथ
कुछ कुछ कहीं
कभी जी हजूरी
भावनाऐं अच्छी भी
उतनी ही जरूरी
जितनी बुरी कुछ
बुरे को समझने
बूझने के लिये
निभाने के लिये
अच्छाई के
साथ बुराई
बुराई के
साथ अच्छाई
बनाते हुऐ कुछ
नजदीकियाँ
साथ लिये हुऐ
बहुत ज्यादा नहीं
बस थोड़ी सी दूरी
सौ बातों की एक बात
समय के मलहम
से भर पायें घाव
समय के साथ
समय की आरी से
कहीं कुछ कटना
कुछ फटना भी
उतना ही जरूरी ।

चित्र साभार: chronicyouth.com

शुक्रवार, 22 मई 2015

समय समय के साथ किताबों के जिल्द बदलता रहा

गुरु लोगों ने
कोशिश की
और सिखाया भी
किताबों में
लिखा हुआ काला
चौक से काले
श्यामपट पर
श्वेत चमकते
अक्षरों को उकेरते
हुऐ धैर्य के साथ
कच्चा दिमाग भी
उतारता चला गया
समय के साथ
शब्द दर शब्द
चलचित्र की भांति
मन के कोमल
परदे पर सभी कुछ
कुछ भरा कुछ छलका
जैसे अमृत क्षीरसागर
में लेता हुआ हिलोरें
देखता हुआ विष्णु
की नागशैय्या पर
होले होले डोलती काया
ये शुरुआत थी
कालचक्र घूमा और
सीखने वाला खुद
गुरु हो चला
श्यामपट बदल कर
श्वेत हो चले
अक्षर रंगीन
इंद्रधनुषी सतरंगी
हवा में तरंगों में
जैसे तैरते उतराते
तस्वीरों में बैठ
उड़ उड़ कर आते
समझाने सिखाने का
सामान बदल गया
विष्णु क्षीरसागर
अमृत सब अपनी
जगह पर सब
उसी तरह से रहा
कुछ कहीं नहीं गया
सीखने वाला भी
पता नहीं कितना कुछ
सीखता चला गया
उम्र गुजरी समझ में
जो आना शुरु हुआ
वो कहीं भी कभी भी
किसी ने नहीं कहा
‘उलूक’ खून चूसने
वाले कीड़े की दोस्ती
दूध देने वाली एक
गाय के बीच
साथ  रहते रहते
एक ही बर्तन में
हरी घास खाने
खिलाने का सपना
सोच में पता नहीं
कब कहाँ और
कैसे घुस गया
लफड़ा हो गया
सुलझने के बजाय
उलझता ही रहा
प्रात: स्कूल भी
उसी प्रकार खुला
स्कूल की घंटी
सुबह बजी और
शाम को छुट्टी
के बाद स्कूल बंद
भी रोज की भांति
उसी तरह से ही
आज के दिन
भी होता रहा ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

गुरुवार, 21 मई 2015

होती है बहुत होती है अंदर ही अंदर किसी को बहुत ही परेशानी होती है

सार्थक लेखन
की खोज में
निरर्थक भटकने
चले जाना भी
शायद बुद्धिमानी
होती है
बकवास कर
रहा होता है
बेवकूफ कोई कहीं
पीछा करते हुऐ
आदतन खोजना
अर्थ उसमें भी
फिर भी कई
सूरमाओं की
कहानी होती है
टटोलते हुऐ
बिना देखे
खाली फटे
टाट के झोले
में हाथ डालकर
हाथ में आई
हवा को बाहर
निकाल कर
देखने की आदत
बहुत पुरानी
होती है
पता होता है
खिसियाने की
जगह समझाने
की कलाकारी
उसके बाद ही
दिखानी होती है
लिख रहा होता
है बकवास
कह रहा होता
है है बकवास
अपने दिन के
हिसाब किताब
को शाम होते
डायरी में छिपाने
की बेताबी ‘उलूक’
को इसी तरह
बतानी होती है
बैचेनी का आलम
इधर हो ना हो
पता चल जाता है
किसी के लिखने
की आदत से
उस पर ऊपर से
अपना दर्द
होती है
अंदर ही अंदर
किसी को
बहुत ही
परेशानी होती है ।

 चित्र साभार: etc.usf.edu

बुधवार, 20 मई 2015

रहम कर अक्षरों पर

बस भी कर
रहने दे
परेशान
हो गये हैं
अक्षर
शायद सभी

तेरी बातों
में आकर
तेरे लिये
तेरी बातें
बनाते बनाते

बख्स भी दे
अच्छा नहीं है 

उछल कूद
कराना
इतना ज्यादा

दुखने लगे
हैं जोड़
ऊपर से लेकर
नीचे तक

अक्षरों को
हो सके तो
इतना
मत तोड़
अक्षर भी
जुड़ते हैं
मेहनत से
खुद ही
हर जगह
सबके साथ
सीधे सीधे

सीधे रास्ते के
होते हैं आदी
सीधे अक्षर
सभी जोड़ते हैं
अपने अपने
हिसाब से
कहीं कोई
कष्ट नहीं
होता है

ज्यादातर का
जोड़ घटाना
गुणा भाग
एक सा
होता है
आदत हो
जाती है
अक्षरों
को भी
जोड़ घटाना
गुणा भाग
करने वालों
को भी
एक दूसरे की

तेरा जैसा भी
बहुत सारों
के बीच में
कोई एक
होता है
तोड़ता है
मरोड़ता है
सीधे रास्तों
को छोड़ता है
पकड़ लेता है
कोई ना कोई
खूंटा कहीं

दीवार का
छोड़ कर
पेड़ पर जैसे
टाँक कर
अक्षरों को
छोड़ देता है

कब तक
सहे कोई
होता है
विद्रोही
सीधे साधे
चलने का
आदी अक्षर
जब कभी
बहुत ज्यादा
उन्हे टेढ़ा मेढ़ा
बना कर
टेढ़े मेढ़े
रास्ते में
मजबूरन
चलने के लिये
घुसेड़ देता है

पढ़ने वाला भी
रोज रोज के
टेढ़े मेढ़े को
देख कर
आना ही
छोढ़ देता है

इसीलिये
फिर से सुन
बस भी कर
रहने दे
परेशान
हो गये हैं
अक्षर
शायद सभी
तेरी बातों
में आकर
तेरे लिये
तेरी बातें
बनाते बनाते
किसी दिन
एक दिन
के लिये
ही सही
अक्षरों को
तोड़ना
मरोड़ना
और
निचोड़ना
छोड़ कर
उन्हे भी
कुछ
सीधे रास्ते
का
सीधा साधा
विराम
क्यों नहीं
कुछ दे
देता है ।

चित्र सभार: www.shutterstock.com

मंगलवार, 19 मई 2015

शब्दों की श्रद्धांजलि मदन राम

चपरासी मदन राम
मर गया
उसने बताया मुझे
मैंने किसी
और को बता दिया
मरते रहते हैं लोग
इस दुनियाँ में
जो आता है
वो जाता भी है
गीता में भी
कहा गया है
मदन राम भी
मर गया
मदन राम
चाय पिलाता था
जब भी उसके
विभाग में
कोई जाता था
अब चाय पिलाना
कोई बड़ी बात
थोड़ी होती है
मदन राम जैसे
बहुत से लोग हैं
काम करते हैं
मदन राम
शराब पीता था
सभी पीते हैं
कुछ को छोड़ कर
मदन राम को
किसी ने कभी
सम्मानित
नहीं किया कभी
अजीब बात
कह रहे हो
चपरासी कोई
कुलपति या
प्रोफेसर जो
क्या होता है
मदन राम मरा
पर मरा जहर पी कर
ऐसा सुना गया
थोड़ा थोड़ा रोज
पी रहा था
सब कुछ ठीक
चल रहा था
क्यों मर गया
एक बार में ही पीकर
शायद शिव
समझ बैठा होगा
अपने आप को
शोक सभा हुई
या नहीं पता नहीं
परीक्षा और वो भी
विश्वविद्यालय की
बड़ा काम बड़े लोगों का
देश के कर्णधार
बनाने की टकसाल
एक मदन राम के
मर जाने से
नहीं रुकती है
सीमा पार भी तो
रोज मर रहे हैं लोग
कोरिया ने अरबों
डालर दे तो दिये हैं
कुछ तो कभी
मौज करना
सीखो ‘उलूक’
श्रद्धांजलि
मदन राम ।

चित्र साभार: www.gograph.com

सोमवार, 18 मई 2015

सच होता है जिंदा रहने के लिये ही उसे रहने दिया जाता है

एक आदमी
पकड़ता है
दौड़ते हुऐ
शब्दों में से
कुछ शब्द
जानबूझ कर
छोड़ते हुऐ
नंगे शब्दों को
जिनमें छुपा
होता है उसके
खुद का सच
रंगीन और काले
सफेद कपड़ों में
लिपटे हुऐ शब्द
हर जगह
नजर आते हैं
हर कोई उठाते
समय उन्ही
को उठाता है
भूखे नंगे गरीब
चिढ़चिढ़े शब्दों
को अच्छा भी
नहीं लगता है
खुले आम
शराफत से
अपने को एक
शरीफ दिखाने
वाले शब्द पकड़ने
वाले शब्दमार
की सोच के
जाल से पकड़ा जाना
फिर भी कभी कभी
लगने लगता है
शायद किसी दिन
दौड़ते दौड़ाते
कुछ हिम्मत
आ जायेगी
शब्द पकड़ने की
रोज की कोशिश
कुछ रंग लायेगी
और सजाये जा
सकेंगे अपने ही
चेहरे के नकाब
को उतार देने
वाले शब्द
‘उलूक’ सोचने में
क्या जाता है
नंगापन होता है
रहेगा भी
किसी से कहाँ
कुछ उसपर
कभी लिखा
भी जाता है
दौड़ भी होती
रहती है
पकड़ने वाला
पकड़ता भी
कहाँ है
बस दिखाता है
पकड़ में उसके
कुछ कभी भी
नहीं आ पाता है ।

चित्र साभार: technostories.wordpress.com

रविवार, 17 मई 2015

शिव की तीसरी आँख और उसके खुलने का भय अब नहीं होता है

शिव की
तीसरी आँख
और उसके
खुलने का भय
अब नहीं होता है
जब से महसूस
होने लगा है
खुद को छोड़
हर दूसरा शख्स
अपने सामने का
एक शिव ही होता है
और
नहीं होता है
अर्थ
लिखी हुई
दो पंक्तियों का
वही सब जो
लिखा होता है
शिव तो
पढ़ रहा होता है
बीच में
उन दोनो
पंक्तियों के
वही सब
जो कहीं भी
नहीं लिखा
हुआ होता है
उम्र बढ़ने
या आँखें
कमजोर होने
का असर भी
नहीं होता है
जो दिखता
है तुझे
तुझे लगता
है बस
कि वो
वही होता है
तू पढ़ रहा
होता है
लिखी इबारत
पंक्तियों में
शब्द दर शब्द
पंक्तियों के बीच
में नहीं लिखे
हुऐ का पता
पता चलता है
तुझे छोड़ कर
हर किसी
को होता है
भूल तेरी ही है
अब भी समझ ले
दो आँखे एक जैसी
होने से हर कोई
तेरे जैसा
नहीं होता है
हर कोई
तुझे छोड़ कर
शिव होता है
तीसरा नेत्र
जिसका
हर समय ही
खुला होता है
तू पढ़
रहा होता है
लिखे हुऐ को
शिव उधर
पंक्तियों के
बीच में
नहीं लिखे
हुऐ को
गढ़ रहा
होता है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 16 मई 2015

बात होती है तभी बात पर बात की जाती है

धन्यवाद आभार
एक नहीं
कई कई बार
बात करने से
ही कुछ आप के
बात बन पाती
है सरकार
अटल सत्य है
बात होने पर
ही तो कोई बात
बना पाता है
बिना बात के
बात हो जाना
कहीं भी देखने
में नहीं आता है
बातें बनाने में
माहिर ही बातों से
आगे निकल पाता है
बात नहीं करने
वाले को इसीलिये
हाथ जोड़ कर जाने
के लिये कहा जाता है
बात निकलती है
तभी दूर तलक
भी जा पाती है
बातों पर लिखी
जाती हैं गजलें
बातें ही गीत
और कविताऐं
हो जाती हैं
बातें ही सुर में
ताल में बाँध कर
संगीत के साथ
सुनाई जाती हैं
आइये सीखते हैं
बातें बनाना
बातें फैलाना
बातें उठाना
और बातों
ही बातों में
बातों के ऊपर
से छा जाना
कल्पना कीजिये
सपनों में देख
कर तो देखिये
बातें करते हुऐ
करोड़ों जबानें
किस तरह
बातों ही बातों में
बातों के कल
कारखानों में
बदल जाती हैं
बातें अच्छे समय
के आने की
बातें सपनों में भी
सपने दिखाने की
बातों ही बातों में
बातों से भूख और
प्यास मिटाने की
बातें बिना कुछ
किये कराये यूँ ही
कहीं भी कभी भी
कुछ भी बातों बातों
में ही हो जाने की
बात होती है तभी
बात पर बात
भी की जाती है
बिना बात किये
बात पर बात
करने की बात
‘उलूक’ तक के
समझ से बाहर
की बात हो जाती है ।

चित्र साभार: www.clipartoday.com

शुक्रवार, 15 मई 2015

समझदारी समझने में ही होती है अच्छा है समय पर समझ लिया जाये

छलकने तक
आ जायें कभी
कोई बात नहीं
आने दिया जाये
छलकें नहीं ,
जरा सा भी
बस इतना
ध्यान दिया जाये
होता है और
कई बार
होता है
अपने हाथ
में ही नहीं
होता है
निकल पड़ते हैं
चल पड़ते हैं
महसूस होने
होने तक
भर देते हैं
जैसे थोड़े से
में गागर से
लेकर सागर
रोक दिया जाये
बेशकीमती
होते हैं
बूँद बूँद
सहेज लिया जाये
इससे पहले
कोशिश करें
गिर जायें
मिल जायें
धूल में मिट्टी में
लौटा लिया जाये
समझ में
आती नहीं
कुछ धारायें
मिलकर बनाती
भी नहीं
नदियाँ कहीं
ऐसी कि सागर
में जाकर
ही मिल जायें ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

गुरुवार, 14 मई 2015

समझदार एक जगह टिक कर अपनी दुकान नहीं लगा रहा है

किसलिये
हुआ जाये
एक अखबार

 क्यों सुनाई
जाये खबरें
रोज वही
जमी जमाई दो चार

क्यों बताई
जाये शहर
की बातें
शहर वालों को हर बार

क्यों ना
कुछ दिन
शहर से
हो लिया जाये फरार

वो भी यही
करता है
करता आ
रहा है

यहाँ जब
कुछ कहीं
नहीं कर
पा रहा है

कभी इस शहर
तो कभी उस शहर
चला जा रहा है

घर की खबर
घर वाले सुन
और सुना रहे हैं

वो अपनी खबरों
को इधर उधर
फैला रहा है

सीखना चाहिये
इस सब में भी
बहुत कुछ है
सीखने के लिये ‘उलूक’

बस एक तुझी से
कुछ नहीं
हो पा रहा है

यहाँ बहुत
हो गया है
अब तेरी
खबरों का ढेर

कभी तू भी
उसकी तरह
अपनी खबरों
को लेकर

कुछ दिन
देशाटन
करने को
क्यों नहीं
चला जा रहा है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

सोमवार, 11 मई 2015

बकरी और शेर भेड़िया और भेड़

भेड़िये ने खोल ली है
आढ़त बीमे कराने की
भेड़ें बहुत खुश हैं अब
मरेंगी भी तो मेमने
सड़क पर नहीं आयेंगे
खा पी सकेंगे
बढ़ा सकेंगे खून
तब तक जब तक
शरीर के बाल उनके
बड़े नहीं हो जायेंगे
वैसे भी भेड़िये
को कुछ नहीं
करना होता है
समझदार भेड़िये का
एक इशारा ही
बहुत होता है
भेड़े पढ़ लिख
कर भी
अनपढ़ बनी रहें
इसका पूरा इंतजाम
उनके पाठ्यक्रम में
ही दिया होता है
बेवकूफी भेड़ों की
नस नस में
बसी होती है
भेड़िये का आम
मुख्तार होने की
हौड़ में भेड़ें ही
भेड़ों से भिड़
रही होती हैं
इन सब में ‘उलूक’
बस इतना ही
सोच रहा होता है
काटने के बाद
गर्दन भेड़ की
किस जगह
दुनियाँ में
दूसरा कौन
ऐसा और है
जो पैसे बीमे के
गिन रहा होता है ।
चित्र साभार: www.canstockphoto.com

शनिवार, 9 मई 2015

लिखने लिखाने वालों का लिखना लिखना तेरा लिखना लिखाना लिखने जैसा ही नहीं

लिखने लिखाने
की बातें वैसे बहुत
कम की जाती हैं
कभी कभी
गलतियाँ
भी मगर हो
ही जाती हैं
बातों बातों में
पूछ बैठा कोई कहीं
लिखने वाले से ही
लिखने लिखाने
के बावत यूँ ही
क्यों लिखते हो
कहाँ लिखते हो
क्या लिखते हो
ज्यादा कुछ नहीं
कुछ ही बताओ
मगर बताओ तो सही
हम तो बताते भी हैं
लिखते लिखाते भी हैं
छपते छपाते भी हैं
किताबों में कहीं
अखबारों में कहीं
तुम तो दिखते नहीं
लिखते हुऐ भी कहीं
पढ़े तो क्या पढ़े
कैसे पढ़े कुछ कोई
लिखने वाले के
लिये ऐसा नहीं
किसी ने पूछी हो
नई बात अब कोई
उसे मालूम है
वो भी लिखता है कुछ
कुछ भी कभी भी
कहीं भी बस यूँ ही
लिखता है
जिनके कामों को
जिनकी बातों को
उनको करने
कराने से ही
फुरसत नहीं
पढ़ने आते हैं मगर
कुछ भटकते हुऐ
जो पढ़ते तो हैं
लिखे हुऐ को यहीं
पल्ले पढ़ता है कुछ
या कुछ भी नहीं
पढ़ने वाला ही तो
कुछ कहीं लिखता नहीं ।

चित्र साभार: fashions-cloud.com

शुक्रवार, 8 मई 2015

एक सीधे साधे को किनारे से ही कहीं को निकल लेना होता है

धुरी से खिसकना
एक घूमते
हुऐ लट्टू का
नजर आता है
बहुत साफ
उसके लड़खड़ाना
शुरु करते ही
घूमते घूमते
एक पन्ने पर
लिखी एक इबारत
लट्टू नहीं होती है
ना ही बता सकती है
खिसकना किसी का
उसका अपनी धुरी से
दिशा देने के लिये
किसी को दिशा हीन
होना बहुत
जरूरी होता है
बिना खोये खुद को
कैसे ढूँढ लेना है
बहुत अच्छी तरह से
तभी पता होता है
शब्द अपने आप में
भटके हुऐ नहीं होते हैं
भटकते भटकते ही
इस बात को
समझना होता है
भटक जाता है
मुसाफिर सीधे
रास्ते में
एक दिशा में ही
चलते रहने वाला
सबसे अच्छा
भटकने के लिये
खुद को भटकाने
वालों के भटकाने
के लिये छोड़
देना होता है
लिखा हुआ किसी
का कहीं कोई
लट्टू नहीं होता है
घूमता हुआ भी
लगता है तो भी
उसकी धुरी को
बिल्कुल भी नहीं
देखना होता है
सीधे सीधे एक
सीधी बात को
सीधे रास्ते से
किसी को समझाने
के दिन लद
गये है ‘उलूक’
भटकाने वाली
गहरी तेज बहाव
की बातों की लहरों
को दिखाने वाले
को ही आज के
जमाने को दिशायें
दिखाने के लिये
कहना होता है ।

चित्र साभार: forbarewalls.com

गुरुवार, 7 मई 2015

रोज होता है होता चला आ रहा है बस मतलब रोज का रोज बदलता चला जाता है

अर्जुन और कृष्ण
के बीच का वार्तालाप
अभी भी होता है
उसी तरह जैसा
हुआ करता था
तब जब अर्जुन
और कृष्ण थे
युद्ध के मैदान
के बीच में
जो नहीं होता है
वो ये है कि
व्यास जी ने
लिखने लिखाने से
तौबा कर ली है
वैसे भी उन्हे अब
कोई ना कुछ बताता है
ना ही उन्हे कुछ
पता चल पाता है
अर्जुन और कृष्ण के
बीच बहुत कुछ था
और अभी भी है
अर्जुन के पास अब
गाँडीव नहीं होता है
ना ही कृष्ण जी को
शंखनाद करने की
जरूरत होती है
दिन भर अर्जुन अपने
कामों में व्यस्त रहता है
कृष्ण जी को भी
फुरसत नहीं मिलती है
दिन डूबने के बाद
युद्ध शुरु होता है
अर्जुन अपने घर पर
कृष्ण अपने घर पर
गीता के पन्ने गिनता है
दोनो दूरभाष पर ही
अपनी अपनी गिनतियाँ
को मिला लेते है
सुबह सवेरे दूसरे दिन
संजय को खबर
भी पहुँचा देते है
संजय भी
शुरु हो जाता है
अंधे धृतराष्ट्रों को
हाल सुनाता है
सजा होना फिर
बेल हो जाना
संवेदनशील सूचकाँक
का लुढ़ककर
नीचे घुरक जाना
शौचालयों के अच्छे
दिनों का आ जाना
जैसी एक नहीं कई
नई नई बात बताता है
अर्जुन अपने काम
पर लग जाता है
कृष्ण अपने आफिस
में चला जाता है
‘उलूक’ अर्जुन और
कृष्ण के बीच हुऐ
वार्तालाप की खुश्बू
पाने की आशा और
निराशा में गोते
लगाता रह जाता है ।

चित्र साभार: vector-images.com

बुधवार, 6 मई 2015

क्यों कभी कोई कहीं आग से ही आग को गरम कर रहा होता है

आग होती है
थोड़ी सी कहीं
कहीं थोड़ी सी
बस राख होती है
कहीं धीमा सा
सुलगता हुआ
नरम एक
कोयला होता है
कहीं थोड़ा सा धुआँ
और बस कुछ
धुआँ होता है
कहीं जलता है
खुद का ही
कुछ खुद ही
के अंदर कहीं
जलने वाले को
पता होता है
कहीं कुछ कुछ
जल रहा होता है
कहीं दिखती है लपट
कहीं दिखता नहीं है
कुछ भी कहीं पर
कहीं कुछ बातों में
निकल बूँद बूँद
टपक रहा होता है
‘उलूक’ अपनी आग
लेकर साथ में अपने
इसकी आग से
उसकी आग में
आग लगने की
चिंता कर रहा होता है ।

चित्र साभार: www.clipartof.com

मंगलवार, 5 मई 2015

क्यों होता है कौन जानता है लेकिन होता है

भावुक होना
गुण नहीं है प्यारे
एक अवगुण है
समझा कर
अरे कहीं लिखा
हुआ नहीं है तो क्या
किसने कह दिया
हर बात को लिख देना
भी जरूरी होता है
ये भी जरूरी नहीं है
लिखा गया ही
सच ही होता है
भाई जमीन के
नींचे ही कुआँ होता है
अब कुआँ तो
सब ही खोदते हैं
कैसे खोदा गया
क्यों खोदा गया
ये सब पूछना
जरूरी नहीं होता है
सब को दिखता है
अपने अपने
हिसाब का पानी
सब को पता होता है
उसका पानी
कितना पानी
और कहाँ होता है
भावुकता कहाँ
काम आती है
हर किसी को
पता होता है
हर कोई जानता है
भाव भावुकता का
अब लिखे हुऐ की
बात की बात सुन
कहीं कुछ लिख देने से
कुछ नहीं होता है
सरकारी आदेशों को
पढ़ने समझने का
अलग अलग
अंदाज होता है
सरकारी आदेश
लिखा ही इस तरह
से जाता है जैसे
किसी पानी भरने के
बर्तन में नीचे से
एक बहुत बड़ा
छेद होता है
इस देश में
इन छेदो को
बनाने और काम में
लाने वालों की
कमी नहीं होती है
हर छेद माफिया के
खून का रंग भी
सफेद होता है
सारे सफेद रंगी खून
वालों की ना जात होती है
ना ही कोई मजहब होता है
ना ही कोई देश होता है
ऐसे सारे लोगों को
भावुक हो जाने वाली
किसी भी चीज से
परहेज होता है
‘उलूक’ कभी तो समझ
लिया कर अपने आस पास
के माहौल को देखकर
तुझे देखते ही सबके
चेहरे पर छपा क्यों
हमेशा एक
औरंगजेब होता है ।

चित्र साभार: printablecolouringpages.co.uk

सोमवार, 4 मई 2015

बावरे लिखने से पहले कलम पत्थर पर घिसने चले जाते हैं

बावरे की कलम
बेजान जरूर होती है
पर लिखने पर आती है
तो बावरे की तरह ही
बावरी हो जाती है
बावरों की दुनियाँ
के बावरेपन को
बावरे ही समझ पाते हैं
जो बावरे नहीं होते हैं
उनको कलम से
कुछ लेना देना
नहीं होता है
जो भी लिखवाते हैं
दिमाग से लिखवाते हैं
दिमाग वाले ही उसे
पढ़ना भी चाहते हैं
बावरों का लिखना
और दिमाग का चलना
दोनों एक समय में
एक साथ एक जगह
पर नहीं पाये जाते हैं
बावरा होकर
बावरी कलम से
जब लिखना शुरु
करता है एक बावरा
कलम के पर भी
बावरे हो कर
निकल जाते हैं
उड़ना शुरु होता है
लिखना भी बावरा सा
क्या लिखा है
क्यों लिखा है
किस पर लिखा है
पढ़ने वाले बावरे
बिना पढ़े भी
मजमून को
भाँप जाते हैं
‘उलूक’ घिसा
करता है कलम को
रोज पत्थर पर
पैना कुछ लिख
ले जाने के आसार
फिर भी कहीं
नजर नहीं आते हैं ।

चित्र साभार: www.clipartpanda.com

शनिवार, 2 मई 2015

सोच बदलेगी वहाँ से यहाँ आकर होती ही हैं ऐसी भी बहुत सारी गलतफहमियाँ

अब क्या
करे कोई
जिसकी कुछ
इस तरह की
ही होती हो
रोज की ही
आराधना
पूजा अर्चना
दिया बाती
फूल बताशे
छोड़ कर
करता हो
जो बस
मन ही मन में
कुछ कुछ
बुद्बुदा कर
कोशिश बनाने
की एक अनकही
कहानी और
करता हो उसी
अनहोनी
अकल्पनीय
कल्पना की
साधना
बिना किसी
हनुमान की
हनुमान चालीसा
के साथ होती हो
कुछ चैन कुछ
बैचेनी की कामना
छपने छपाने की
बात पर कर देता
हो मोहल्ले का
अखबार तक मना
कागज किताबें
डायरियां बिक
गई हों कबाड़ में
कबाड़ी को भी
रहता हो कुछ
ना कुछ कबाड़
मिलने की
आशा हर महीने
देखते ही लिखने
लिखाने वालों को
देता हो दुआ
जब भी होता
हो सामना
'उलूक' दिन में
उड़े आँख बंद कर
और रात में
कुछ खोलकर
नया कुछ ऐसा
या वैसा नहीं है
कहीं भी होना
एक ही बात है
मोहल्ले में हो
शहर में हो शोर
या फिर कुछ
चुपचाप लिख
लेना हो कुछ
कुछ यहाँ
कुछ वहाँ
किस लिये
होना है
अनमना ।


चित्र साभार: www.disneyclips.com

     

शुक्रवार, 1 मई 2015

मजबूत मजबूर मशहूर में से कौन सा और किस का दिवस ?

आज पहली बार
सुना हो ऐसा
भी नहीं है
हर वर्ष इसी दिन
सुनाई दिया है
मजबूती से
सुनाई दिया है
एक मजबूत
दिवस है आज
मजदूर दिवस है
मेहनत कशों
का दिवस है
उर्जा होती ही
है दिवस में
समझ में मजदूर
लेकिन आज तक
नहीं आ पाया है
मजबूरियाँ मगर
नजर आई हैं
समझ में भी आई हैं
कुछ करने के लिये
सच में चाहिये होता है
एक बहुत बड़ा
विशाल कलेजा
वो कभी ना
हो पाया है
ना ही लगता है
कभी हो पायेगा
जो कर पाये अपने
आसपास के झूठों से
सच में प्रतिकार
उठा सके ज्यादा नहीं
बस एक ही आवाज
जोर शोर से नहीं
कुछ हल्की सी ही सही
ना जा पाये दूर तलक
ना लौटे टकरा कर
कहीं दीवार से
कोई बात नहीं
सुनकर मजदूर
मजबूर जैसा
ना महसूस हो
मजदूर ही हो
सुनाई देने में भी
मजबूत हो
मशहूर ना हो पाये
जरूरी भी नहीं है ।

चित्र साभार: www.thewandererscarclub.com

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