http://blogsiteslist.com

शनिवार, 30 मार्च 2013

लंगड़ा दौड़ता है दो टाँग वाला कमेंट्री करता है !

मैं दो टांग वाला
हर बार भूल
ही जाता हूँ
कि सिस्टम तो
लंगड़ों ने ही
चलाना है

मुझे याद ही
नहीं रहता
कि सारे
दो टांग वाले
दो टांग वालो
के कहने में
नहीं आते हैं
वो तो
लंगड़ों के घर
रोज ही
आते जाते हैं

 ज्यादातर
दो टांग वाले
बस वेतन ले कर
खुश हो जाते हैं
दौड़ की सोच भी
कहाँ पाते हैं

बहुत सारी दौडे़
होनी हो कहीं
अगर एक साथ
तो लंगडे़ बहुत
ही व्यस्त
हो जाते हैं

वो दौड़ में कहीं
भाग नहीं लगाते हैं
लंगड़ी कहाँ किस को
कैसे लगेगी उसका
हिसाब लगाने में
ही व्यस्त हो जाते हैं

अपने को सबसे
चालाक समझने वाला
लंगड़ा कहीं दिखाई
ही नहीं देता है
पर अपनी हरकतों से
अपने को हर जगह
एक्स्पोज कर जाता है
मजबूरी है उसकी
हर जगह हीरा हूँ
प्रमाणपत्र लेने के
लिये आ जाता है
लेकिन कोयला भी
उसको कहीं भी
मुहँ नहीं लगाता है
ऎसे लोगों से
ही भारत का लेकिन
अंदर की बात है
का नाता है
वो घर से लेकर
दिल्ली तक
नजर आता है
काम करने वाला
मेहनत करता है
लेकिन हर जगह
एक लंगड़ा
दो टाँगो वालो को
जरूर नचाता है ।

बुधवार, 27 मार्च 2013

एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया: होली है

होली
के दिन

बेटा
बाजार से
लौट कर
आ रहा था


मुस्कुराकर
अपनी बुआ
को बता
रहा था


पड़ोस के
एक
चाचा जी
को 
सड़क पर
हिलता डुलता
चलता देख
कर आ
रहा था


एक और 
पड़ोसी चाचा
उनको 
हेल्प
करने के लिये

हाथ बढ़ा रहा था

बुआ
परेशान सी
नजर आई
सोच कर
पूछने पर
उतर आई


उसकी
दुकान पर
क्या अच्छा
काम आजकल
हुऎ जा रहा है


 जो वो
रोज रोज
घूँट लगाने
लगा है
सुना जा
रहा है

बेटे ने
बुआ को
बताया
फिर फंडा
चाचा का
समझाया


बुआ जी
चाचा जी
के पिता जी
का जब से
हुआ है
स्वर्गवास


पेंशन
का पट्टा
उनका
बेवा
 बीबी
के तब से
आ गया
है हाथ


ए टी ऎम
कार्ड
खाते का
उनके
लेकिन
रहने
लगा है
चाचा
के पास

चाचा अब
रोज बस
एक पाव
लगाता है
पेंशन
पा रही
माँ के
पूछने पर
उसको भी
समझाता है


पारिवारिक
पेंशन
मिली है
तुझ बेवा
को
समझा
कर जरा


इस पैसे
से परिवार
के लोगों का
खयाल
रखा जाता है


तुझे क्यों
होती है
इसमें इतनी
परेशानी
अगर
एक पाव
मेरे हाथ भी
आ जाता है ?

शनिवार, 23 मार्च 2013

बेशरम उलूक है तू नहीं !



सबको आता है
बहुत आता है
हवा देना किसी
भी 
बात को
नहीं आता है
लेकिन कह देना
खुद बा खुद
उसी बात को
हर बात पर
ढूँता है वो
एक मुँह
जो कह डाले
खुले आम
उस बात को
उसकी इसी बात
से वो खास
हो जाता है
कल तक
आम होता है
आज बादशाह
हो जाता है
बात उसकी
कहने वाला भी बहुत
खास हो जाता है
वो बहुत सालों से
इसी तरह
कर रहा है
बातों की बातें
बहुत बेशरम है वो
लेकिन कपडे़ शानदार
पहन के आता है
देखने वाले
इज्जत से पेश
आते हैं
सारे के सारे
आस पास वाले
किसी को पता
भी नहीं होता है
घर जाता है
तो तबियत से
जूते खाता है
अब क्या क्या
कहानी सुनाये
‘उलूक’
किस किस को
यहाँ आ के
उसको तो
आदत है
कहने कि जो
किसी से
कहीं नहीं कभी
कहा जाता है ।

शनिवार, 16 मार्च 2013

सब हैं नीरो जा तू भी हो जा

हर शख्स के पास
होती है आँख
हर शख्स अर्जुन
भी होता है
तू बैचेन आत्मा
इधर उधर
देखता है
फिर फिरता
रोता है
किसने कहा
तुझसे ठेका
तेरा ही होता है
जब सारे
अर्जुन लगे हैं
तीर निशाने पर
लगाने के लिये
अपनी अपनी
मछलियों की
आँखों में
तेरे पेट में
किस बात
का दर्द होता है
युधिष्ठिर भी है
भीम भी है
नकुल भी है
सहदेव भी है
कृ्ष्ण कैसे
नहीं होंगे
द्रोपदी भी है
चीर भी है
हरण होना भी
स्वाभाविक है
पर ये सब अब
अर्जुनों के तीर
के निशाने नहीं होते
सारे अर्जुनों की
अपनी अपनी मछलियाँ
अपनी अपनी आँख
धूप में सुखा रही हैं
तीर गुदवा रही हैं
खुश हैं बहुत खुश हैं
और तू तेरे पास कोई
काम कभी नहीं होता है
तू तो बस दूसरों की
खुशी देख देख
कर रोता है
कोशिश कर
मान जा
दुनिया को
भाड़ मे घुसा
अपनी भी
एक मछली बना
उसकी आँख
में तीर घुसा
मछली को
भी कुछ दे
कुछ अपना
भी ले
रोम मे
रह कर रोम
में आग लगा
बाँसुरी बजा
सब कर रहे हैं
तू भी कर
मान जा
मत इतरा ।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

कृपया लोटे ही इसे पढे़

बिन पैंदी के
लोटों के बीच
बहुत बार लुढ़कते
लुढ़कते भी कुछ
नहीं सीख पाता हूँ
लोटों के बीच
रहकर भी क्यों नहीं
लोटों की तरह
व्यवहार कर पाता हूँ
सामने सामने जब
बहुत से लोटों को
एक लोटे के लिये
लोटों के चारों और
लुढ़कता हुआ
देखता जाता हूँ
वैसे समझता भी हूँ
पैंदी का ना होना
वाकई में कई बार
खुदा की नैमत
हो जाती है
लुढ़कते हुऎ लोटों द्वारा
लुढ़कते लुढ़कते
कहाँ जा कर
किस लोटों को कब
कौन सी टोपी
पहना दी जाती है
ये बात लोटों के
समझ में नहीं
कभी आ पाती है
लोटों में से एक
अन्धे लोटे के लिये
रेवड़ी बन के
बहार ले आती है
लोटों की और भी
बहुत सी लोटागिरी
कायल कर घायल
कर ले जाती है
जब कहानी कभी
गलती से समझ
में आ जाती है
बहुत दिन से लोटा
लोटा एक जी के
चारों और लुढ़कने का
कार्यक्रम चला रहा था
सारे लोटों को नजर ये
सब साफ साफ
आ रहा था
उधर लोटा दो अपनी
पोटली कहीं खोल
बाट आ रहा था
अपनी दुकान के
प्याज का भाव
चढ़ गया करके
अखबार में रोज
छपवा रहा था
तुरंत ही लोटा
अपना लुढ़कना
साम्यावस्था बनाने की
तरफ झुका रहा था
सीन बदलने में
समय ही नहीं लगता है
ये बाकी लोटों का
लोटे की ओर
लोटे के पीछे
लुढ़कता हुआ
चला जाना
साफ साफ
दिखा रहा था
बहुत से
अच्छे भले लोग
जो हमेशा हमारे
लोटा हो जाने पर
आँख दिखा रहे थे
इन लुढ़कते हुऎ
लोटों के बीच में
कब लोटे
हो जा रहे थे
उनकी सोच भी
लोटा सोच है करके
जबकि कहीं नहीं
दिखाना चाह रहे थे
पता नहीं क्या
मजबूरी उनकी
हो जा रही थी
जो लोटे के लिये
लोटे के साथ
लोटों की भीड़ में
ताली बजाने वाला
एक लोटा हो कर
रह जा रहे थे । 

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

जैसा करेगा वैसा भरेगा, जब नहीं रहेगा तब क्या करेगा?

क्यों अपने लिये
औखली खुद
ही बनाता है
अपना सिर
फिर उसके अंदर
डाल के आता है
सारे फिट
लोगों के बीच
अपने को मिसफिट
जानते बूझते
क्यों बनाता है
जब देखता है
बिना रीढ़ की
हड्डियों का
चल रहा है राज
तू अपनी जबान
की रेल पर रोक
क्यों नहीं लगाता है
हर नया राजा
इस कलियुग में
पहले वाले राजा से
ताकतवर ही
भेजा जाता है
पहले वाले राजा के
किये गये गड्ढों को
जब वो भी नहीं
पाट पाता है
कोशिश करता है
गड्ढे को और
बडा़ बनाता है
फिर तेरा इस्कूल
एक दिन पूरा
उसके अंदर
कोई ना कोई
जरूर घुसा
ले जाता है
फिर तुझ बेवकूफ
को पता नहीं
क्या हो जाता है
क्यों थोडी़ मिट्टी
लेकर गड्ढे को
पाटने चला जाता है
समय रहते किसी
नटवर लाल को
तू भी गुरू
क्यों नहीं बनाता है
माना कि वेतन तू
अपना खा
ही नहीं पाता है
पर जमाना ऊपर के
पैसे वाले को ही
इज्जत दे पाता है
इस छोटी सी
बात को तू क्यों
नहीं समझ पाता है
देखता नहीं है
तेरे स्कूल में
तेरे को क्यों
कोई मुँह नहीं
कहीं लगाता है
तेरी सबकी पैंट में
छेद दिखाने की
खराब आदत से
हर कोई परेशान
नजर आता है
किसी को देखता
है प्रतिकार
करते हुऎ कभी
जब राजा उल्टी
बाँसुरी बजाता है
तरस आता है
चिंता भी होती है
तेरी आदतों पर
मुझको कई बार
ऊपर वाले की
तरफ मेरा हाथ
तेरे लिये ऎसे में
उठ जाता है
क्यों वो तेरे को
गाँधी के तीन
बंदरों जैसा नहीं
बना ले जाता है
जहाँ निनानवे
लोगों को कोई
मतलब नहीं
कुछ रह जाता है
तू सौंवा क्यों
अपने को ऎसे
माहौल में
उखड़वाता है ।

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...