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गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

स्वागत: चलें बिना कुछ गिने बुने सपने एक बार फिर से उसी तरह

पिछली बार
वो गया था
इसी तरह से
जब सुनी थी
उसने इसके
आने की खबर
ये आया था
नये सपने
अपने ले कर
अपने साथ ही
वो गया अपने
पुराने हो चुके
सपनों को
साथ ले कर
इसके सपने
इसके साथ रहे
रहते ही हैं
किसे फुर्सत है
अपने सपनों
को छोड़
सोचने की किसी
और के सपनों की
अब ये जा रहा है
किसी तीसरे के आने
के समाचार के साथ
सपने इसके भी हैं
इसके ही साथ में हैं
उतने ही हैं जितने
वो ले कर आया था
कोई किसी को कहाँ
सौंप कर जाता है
अपने सपने
खुद ही देखने
खुद ही सीँचने
खुद ही उकेरने
खुद ही समेटने
पड़ते हैं
खुद के सपने
कोई नहीं खोलना
चाहता है अपने
सपनों के पिटारों को
दूसरे के सामने
कभी डर से
सपनों के
सपनों में मिल
कर खो जाने के
कभी डर से
सपनों के
पराये हो जाने के
कभी डर से
सपनों के
सच हो खुले आम
दिन दोपहर मैदान
दर मैदान
बहक जाने के
इसी उधेड़बुन में
सपने कुछ भटकते
चेहरे के पीछे
निकल कर
झाँकते हुऐ
सपनों की ओट से
बयाँ करते सपनों के
आगे पीछे के सपनों
की परत दर परत
पीछे के सपने
खींचते झिंझोड़ते
सपनों की भीड़ के
बहुत अकेले
अकेले पड़े सपने
सपनों की इसी
भगदड़ में समेटना
सपनों को किसी
जाते हुऐ का
गिनते हुऐ
अंतिम क्षणों को
किसी का समेरना
उसी समय सपनों को
इंतजार में शुरु करने की
अपने सपनों के कारवाँ
अपने साथ ही
बस वहीं तक जहाँ से
लौटना होता है
हर किसी को
एक ही तरीके से
अपने सपनों को लेकर
वापिस अपने साथ ही
कहाँ के लिये क्यों
किस लिये
किसी को नहीं
सोचना होता है
सोचने सोचने तक
भोर हो जाती है हमेशा
लग जाती हैं कतारें
सभी की इसके साथ ही
अपने अपने सपने
अपने अपने साथ लिये
समेटने समेरने
बिछाने औढ़ने
लपेटने के साथ
लौटाने के लिये भी
नियति यही है
आईये
फिर से शुरु करते हैं
आगे बढ़ते हैं
अपने अपने सपने
अपने अपने
साथ लिये
कुछ दिनों के
लिये ही सही
बिना सोचे
लौट जाने
की बातों को
शुभ हो
मंगलमय हो
जो भी जहाँ भी हो
जैसा भी हो
सभी के लिये
सब मिल कर
बस दुआ और
दुआ करते हैं  ।

 चित्र साभार: www.clipartsheep.com

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

बहकता तो बहुत कुछ है बहुत लोगों का बताते कितने हैं ज्यादा जरूरी है

परेशानी तो है
आँख नाक दिमाग
सब खोल के
चलने में
आजकल के
जमाने के
हिसाब से
किस समय
क्या खोलना है
कितना खोलना है
किस के लिये
खोलना है
अगर नहीं जानता
है कोई तो
पागल तो
होना ही होना है
पागल हो जाना
भी एक कलाकारी है
समय के हिसाब से
बिना डाक्टर को
कुछ भी बताये
कुछ भी दिखाये
बिना दवाई खाये
बने रहना पागल
सीख लेने के बाद
फिर कहाँ कुछ
किसी के लिये बचता है
सारा सभी कुछ
पैंट की नहीं तो
कमीज की ही
किसी दायीं या
बायीं जेब में
खुद बा खुद
जा घुसता है
घुसता ही नहीं है
घुसने के बाद भी
जरा जरा सा
थोड़े थोड़े से
समय के बाद
सिर निकाल
निकाल कर
सूंघता है खुश्बू के
मजे लेता है
पता भी नहीं
चलता है
एक तरह के
सारे पागल
एक साथ ही
पता नहीं क्यों
हमेशा एक साथ
ही नजर आते हैं
समय के हिसाब से
समय भी बदलता है
पागल बदल लेते हैं
साथ अपना अपना भी
नजर आते हैं फिर भी
कोई इधर इसके साथ
कोई उसके साथ उधर
बस एक ऊपर वाला
नोचता है एक
गाय की पूँछ या
सूँअर की मूँछ कहीं
गुनगुनाते हुऐ
राम नाम सत्य है
हार्मोनियम और
तबले की थाप के साथ
‘उलूक’ पागल होना
नहीं होता है कभी भी
पागल होना दिखाना
होता है दुनियाँ को
चलाने के लिये
बहुत सारे नाटक
जरूरी हैं
अभी भी समझ ले
कुछ साल बचे हैं
पागल हो जाने वालों
के लिये अभी भी
पागल पागल खेलने
वालों से कुछ तो सीख
लिया कर कभी पागल ।

चित्र साभार: dir.coolclips.com

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

आती ठंड के साथ सिकुड़ती सोच ने सिकुड़न को दूर तक फैलाया पता नहीं चल पाया

दिसम्बर
शुरु हो चुका
ठंड के
बढ़ते पैरों ने
शुरु कर दिया
घेरना
अंदर की
थोड़ी बहुत
बची हुई
गरमी को

नरमी भी
जरूर हुआ
करती होगी
साथ में
उसके कभी
निश्चित
तौर पर
सौ आने
उसका
बहक जाना
गायब
हो जाना
भी हुआ
होगा कभी
पता नहीं
चल पाया

जिंदगी की
सिकुड़ती
फटती
चादर
कभी
ऊपर से
खिसक कर
सिर से
उतरती रही

कभी
आँखों के
ऊपर अंधेरा
करते हुऐ
नीचे से
नंगा
करती रही

पता
चला भी
तब भी
कुछ नहीं
हो पाया

जो
समझाया गया
उसके भी
समझ में
आते आते
 ये भी
मालूम नहीं
चल पाया
दिमाग
कब अपनी
जगह को
छोड़ कर
कहीं किसी
और जगह
ठौर ठिकाना
ढूँढने को
निकल गया
फिर लौट
कर भी
नहीं आ पाया

अपनापन
अपनों का
दिखने
में आता
अच्छी
तरह से
जब तक

साफ सुथरे
पानी के
नीचे तली
पर कहीं
पास में
ही बहती
हुई नदी में
तालाब में
बहुत सारी
आटे की
गोलियों
के पीछे
भागती
मछलियों
के झुंड
की तरह

पत्थर
मार कर
पानी में
लहरेंं
उठाता
हुआ
एक बच्चा
बगल से
खिलखिलाता
हुआ
निकल भागा
धुँधलाता हुआ
सब कुछ
उतरता
चढ़ता
पानी जैसा
ही कुछ
हो आया

चिढ़ना चाह
कर भी
चिढ़
नहीं पाया

हमेशा
की तरह
कुछ झल्लाया
कुछ खिसियाया

जिंदगी
ने समझा
कुछ
‘उलूक’ के
उल्लूपन को
कुछ
उल्लूपने ने
जिंदगी के
बनते
बिगड़ते
सूत्रों का राज
जिंदगी को
बेवकूफी
से ही सही
बहुत अच्छी
तरह से
समझाया

जो है सो है
कुछ उसने
उसमें
इसका
जोड़ कर
उसे
ऊपर किया
कुछ इसने
इसमें से
उसका
घटा कर
कुछ
नीचे गिराया

ठंड का
बढ़ना
जारी रहा
बहुत कुछ
सिकुड़ा
सिकुड़ता रहा

सिकुड़ती
सोच ने
सिकुड़ते हुऐ
सब कुछ को
कुछ
भारी शब्दों
से बेशरमी
से दबाया

बहुत
कुछ दिखा
नजर आया
महसूस हुआ

सिकुड़न ने
पूरी फैल कर
हर कोने
हर जर्रे
पर जा
अपना जाल
फैलाया

जरा
सा भी
पता नहीं
चल पाया
अंदाज
आया भी
अंदाज नहीं
भी आ पाया ।

चित्र साभार: www.toonvectors.com

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

क्या कुछ कौन से शब्द चाहिये कुछ या बहुत कुछ व्यक्त करने के लिये कोई है जो चल रहा हो साथ में लेकर शब्दकोष शब्दों को गिनने के लिये

कुछ लिखने
का
दिल किया
कई दिनों
के बाद
कुछ कुछ
होना शुरु
होते होते
कुछ नया
कुछ अलग
लिखने की
सोच कर

पुराने सारे
लिखे लिखाये
को
कुछ देखना
शुरु किया
मतलब
शुरू से
शुरु किया

कुछ गिनना
कुछ जोड़ना
कुछ घटाना
जब
सारे लिखे
लिखाये पर
आरंभ से
अंत तक
सही में

सही सही
कहा जाये तो
शुरु किये गये
कुछ से
आज और
अभी तक
लिखे गये
कुछ कुछ तक

कितना खोजा
बहुत टटोला
बस मिला
बार बार
कई बार
किया गया
शब्द
जो प्रयोग
उनमें
बहुत कुछ
के प्रयोग से
बहुत कुछ
लिखा लिखाया
नहीं मिला

बस मिला
लिखा हुआ
अधिकतर में
ज्यादातर
कहीं कुछ
अखबार
कुछ आदमी
कुछ कुत्ता
कुछ खबर
कहीं कुछ गधा
कुछ गाँधी
कुछ चोर
कुछ उलूक
कुछ देश
कुछ बंदर
कहीं कहीं
कुछ बात
कुछ हवा
कुछ सोच
और
कहीं
थोड़े से
थोड़े
कुछ लोग

समझते
समझते
बस इतना
ही समझ
में आया

शब्दकोश
कितना बड़ा
समेटे हुऐ
खुद अपने में
कितने कितने
समझे बूझे हुऐ
अनगिनत शब्द
पर
कहने के लिये
अपनी
इसकी उसकी
आसपास की
व्यथा कथा
चाहिये
बहुत थोड़े
कुछ कुछ
छोटे छोटे
बेकार के
रोज रोज के
साग सब्जी
रोटी दाल
कपड़े बरतन
जैसे
शब्दों के
बीच में
गिरते लुड़कते
शब्दों को
जोड़ते तोड़ते
मरोड़ते शब्द

कोशिश में
समझाने की
बताने की
कुछ व्यक्त
कुछ अव्यक्त
व्यर्थ में
असमर्थ
समर्थ शब्द ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

शनिवार, 28 नवंबर 2015

नहीं आया समझ में कहेगा फिर से पता है भाई पागलों का बैंक अलग और खाता अलग इसीलिये बनाया जाता है

बहुत अच्छा
खूबसूरत सा
लिखने वाले
भी होते हैं
एक नहीं कई
कई होते है
सोचता क्यों
नहीं है कभी
तेरे से भी कुछ
अच्छा क्यों नहीं
लिखा जाता है
लिखना तो
लगभग सब
में से सभी
को आता है
सोचता हूँ
हमेशा सोचता हूँ
जब भी लिखने की
कोशिश करता हूँ
सोचने की भी बहुत
कोशिश करता हूँ
सोचना सच में
मुश्किल हो जाता है
सोचा ही नहीं जाता है
निकल रहा होता है
इधर का उधर का
यहाँ का वहाँ का
निकला हुआ
अपने आप
अपने आप ही
लिखा जाता है
समझाने समझने
की नौबत ही
नहीं आती है
सारा लिखना
लिखाना
पाखाना हो जाता है
किस से कहा जाये
शब्दकोष
होने की बात
किस को
समझाई जाये
भाषा की औकात
कटता हुआ बकरा
गर्दन से बहती
खून की धार
खाता और पीता
मानुष बनमानुष
सब एक हो जाता है
लिखना जरूरी है
खासकर पागलों
के लिये
‘उलूक’ जानता है
भविष्य में पढ़ने
लिखने के विभागों
में उसी तरह
का पाठ्यक्रम
चलाया जाता है
जिसमें आता और
जाता पैसा माल
सुरंगों के रास्ते
निकाला और
संभाला जाता है
कितना बेवकूफ
ड्राईवर निकला
ते
ईस करोड़ लेकर
दिन दोपहर
भागने के बाद
पकड़ा जाता है
इसीलिये बार बार
कहा जाता है
अच्छा खासा
पढ़ा पढ़ाया होना
एक फनकार
होने के लिये
बहुत ही जरूरी
हो जाता है ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

बुधवार, 25 नवंबर 2015

अपनों के किये कराये पर लिखा गया ना नजर आता है ना पढ़ा जाता है ना समझ आता है

भाई ‘उलूक’
लिखना लिखाना है
ठीक है लिखा करो
खूब लिखा करो
मस्त लिखा करो
रोज लिखा करो
जितना मन में आये
जो चाहे लिखा करो
बस इतना और
कर दिया करो
क्या लिखा है
किस पर लिखा है
क्यों लिखा है
वो भी कहीं ऊपर
या कहीं नीचे
दो चार पंक्तियों में
हिंदी में या उर्दू में
लिख कर भी
कुछ कुछ
बता दिया करो
बहुत दिमाग लगाने
के बाद भी तुम्हारे
लिखे लिखाये में से
कुछ भी निकलकर
कभी भी नहीं आता है
जितना दिमाग के अंदर
पहले से होता है वो भी
गजबजा कर पता नहीं
कहाँ को चला जाता है
अब कहोगे जिसे समझ
में नहीं आता है तो वो
फिर पढ़ने के लिये
किस लिये रोज यहाँ
चला आता है
लोगों के आने जाने
की बात आने जाने
वालों की संख्या बताने
वाला गैजेट बता जाता है
लिखने लिखाने वाला
उसी पर लिखता है
जो लिखने वाले के
साथ पढ़ने वाले को
साफ साफ सामने
सामने से दिखता है
और नजर आता है
लिखने वाला आदतन
लिखता है सब कुछ
उसे पता होता है
पढ़ने वाला
कहीं साफ साफ सब
लिख तो नहीं दिया गया है
देखने के लिये चला आता है
पढ़ता है सब कुछ
साफ साफ समझता है
लिख दिये पर खिसियाता है
और फिर इसका लिखा
समझ में नहीं आता है
की डुगडुगी बजाता हुआ
गली मोहल्ले बाजार से
होते हुऐ शहर की ओर
निकल कर चला जाता है ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

सोमवार, 23 नवंबर 2015

गजब है सोचा भी नहीं कभी कभी ये सब भी यहीं पर होना है

उसे मालूम है
किसी के कुछ
भी कहने देने से
कहीं भी कुछ भी
नहीं होना है

उसी के सारे
कहने वालों
ने मिलकर
सब कुछ
उसी का कहना
उसी के शब्दों
उसी की भाषा
उसी की आवाज
में ही कहना है

बड़ा बैनर है
बड़ी बातें को
बड़े बड़े खम्भों
के बीच में बड़ी
शान से रहना है

खड़े हैं चाहे बड़े हैं
खम्भों का बोझ
कौन सा किसी
को अपने कंधों
पर ही सहना है

छोटे छोटे
छोटे नारों के
छोटे विचारों के
छोटे करतब बाजों
को एक खम्भे से
दूसरे खम्भे तक
दौड़ते कूदते रहना है

बहस होनी है
देश के लिये
देशवासियों
के सिवा
इसने उसने
सभी ने
उसमें रहना है
भाग लेना है

कहना क्या है
क्या नहीं है
ना सोचना
इसने है
ना उसने है
समझने
की बात है
समझने
वालों के लिये
नासमझ होने से
दिखाने से इसका
उसका सबका
ही भला होना है

अपनी
बातों को
अपनी सोच
के साथ
बस चाँद तारों
की दुनियाँ
के लिये
छोड़ देना है

मत कर
‘उलूक’
इतनी हिम्मत
सब कुछ
कह देने
की अपनी

अपनी अपनी
कह देने वाले
को सुना है
अब यहाँ
नहीं कहीं
और जा
कर के
रहना है ।

चित्र साभार: es.dreamstime.com

शनिवार, 21 नवंबर 2015

कौन कहता है कुत्ता सोचना और कुत्ता हो जाने में कुछ अजीब होता है हर कुत्ते का अपना नसीब होता है

भौंकना सीखना
चाहता हूँ
इसलिये
कुत्तों के
बीच रहता हूँ
कुत्ता नहीं हूँ
कुत्तों से कभी
नहीं कहता हूँ
कुत्ते भी कहाँ मुझे
एक कुत्ता मानते हैं
भौंकता हूँ तो भी
आदमी की तरह
बस आँखें तानते हैं
कुत्ता कुत्ते पर
कभी भी नहीं
भौंकना चाहता है
कुत्तों को पता होता है
कुत्ता कौन कौन है
हर कुत्ता जानता है
अब इतना कुत्ता
हो जाना भी
अच्छा कहाँ होता है
कुत्तों के नियम
कानून हर कुत्ता
अच्छी तरह जानता है
कुत्तों में से कुछ कुत्ते
कुत्तेपने के लिये
ही जाने जाते हैं
हर गली कूँचे के
कुत्तों में पहचाने जाते हैं
कुत्ता हो जाना इतना
बुरा भी नहीं होता है
कुत्तों के लिये कुत्ता तो
एक कुत्ता ही होता है
‘उलूक’
कुत्ता होने और
दिखाने में बहुत
बड़ा फर्क होता है
किसलिये करते हो
कलाबाजी कुत्तों के
बीच में रहकर
कुत्तों के लिये
भौंकना
कुत्तों का एक
जरायम
पेशा होता है ।
चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

झूठ सारे सोने से मढ़ कर सच की किताबों पर लिख दिये जायें

रोज का
ना लिखना
जैसा
लिखना छोड़
कभी
कुछ लिखना
जैसा
लिख दिया जाये

कतरा कतरा
खून
अँधेरे का
अँधेरे में
ही बहने
दिया जाये

पहना कर
कंकाल
की हड्डियों
को माँस
किसी के
बदन से
नोचा
उतारा हुआ
शनील के
कपड़े से
ढक ढका
कर जिंदा
होने की
मुनादी
की जाये

देखने वालों
के आँखों
के बहुत
नजदीक से
फुलझड़ियाँ
झूठ की
जला जला
कर कई
आधा अंधा
कर दिया जाये

जमाने से
सड़ गल गये
बदबू मारते
कुछ
कूड़े कबाड़
पर अपने
इत्र
विदेशी महंगी
खरीद कर
छिड़की जाये

मैय्यत निकलनी
चाहिये थी
जिसकी जमाने
पहले कभी
इस जमाने
में ढक कर
पाँच सितारों
से सजा
शाबाशी दी जाये

बहुत हो गया
जलते सुलगते
धुआँ देते दिल
‘उलूक’ के
तुझे झेलते हुऐ
अब थोड़ी सी
राख डाल
कर बुझा
लेने की
कोशिश भी
कर ली जाये ।

चित्र साभार: www.theemotionalinvestor.org

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

अपनी समझ से जो जैसा समझ ले जाये पर दीपावली जरूर मनाये

रोशनी
ही रोशनी
इतनी रोशनी
आँखें चुधिया जायें
शोर ही शोर
इतना शोर
सुनना सुनाना
कौन किस से कहे
कान के पर्दे
फटने से कैसे
बचाये जायें
घुआँ धुआँ
आसमान
रात के तारे
और चाँद
की बात
करना बेकार

जब लगे
सुबह का
सूरज
धीमा धीमा
शरमाता सा
जाड़ों में
जैसे
खुद ही
ठिठुरता
कंंपकपाता
शाम होने
से पहले ही
निढाल हो
ढल जाये

बूढ़ा साँस
लेने के
लिये तड़पे
निढाल हो जाये
चिड़िया कबूतर
डर कर प्राण
ही छोड़ जायें
घर के निरीह
जानवर
भयभीत से
दबाये हुऐ
पूँछें अपनी
इस चारपाई
के नीचे से
निकल कर
दूसरी चारपाई
किसी कोठरी के
अंधेरे कोने में
शरण लेते
हुऐ नजर आयें

लक्ष्मी घर की
करे इंतजार
बाहर की
लक्ष्मी के
आने का
नारायण
और आदमी
दोनो एक दिन
के आम
आदमी हो जायें

खुशी होनी
ही चाहिये
बाँटने के
लिये पास में
किसी को
जरूरत है
या नहीं
एक अलग
ही मुद्दा
हो जाये

दो रास्तों
के बीच के
पेड़ की सूखी
टहनी पर
बैठा ‘उलूक’
दूर शहर
में कहीं लगी
हुई आग
और रोशनी
के फर्क
को समझने
के लिये
दीपासन
लगाया हुआ
नजर आये

जैसा भी है
मनाना है
आईये दीप
जलायें
दीप पर्व
धूम धड़ाके
धूऐं से ही
सही मनायें ।

www.clipartsheep.com

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ग्यारहवें महीने में भेड़ों के भीड़तंत्र की ग्यारह सौ ग्यारहवीं ‘नाककथा’

बाध
की कथा
राग बेराग
की कथा
साग
की कथा

बहुत कुछ
सुना सुनाया
लगता है

नाक
की कथा
नाककथा
कोई
नये जमाने
का नाटक
किसी
नौटंकी का
नचाया
लगता है

नाक
बहुत काम
की चीज
होती है

सभी
जानते है
पहचानते हैं

नाक
के बिना
बनाया हुआ
पुतला भी
एक नकटा
कहलाया
करता है

नाक
लक्ष्मण ने
काट दी
सूर्पनखा
की उस
जमाने में
क्या
गजब हुआ
राम रावण
के बीच

सभी ने सुना
आज भी नहीं
बचता है रावण

घासफूस का
बना सजा कर
आग में
जलता हुआ
काला सफेद
धुआँ बस
फैलाया करता है

नाक
से सूँघना
नाक
नीची और
नाक
ऊँची हो जाना
नाक से
पहचाना जाना
नाक
बहना
सरदी जुखाम
का हो जाना
नाक
की खातिर
दुनियाँ से
टकरा जाना
नाक
के लिये
करना मरना
ही पड़ता है
नाक
और भी
महत्वपूर्ण
हो जाती है
जब कोई
नाक
वाला किसी
नाक
वाले की
नाक
को नापने
के लिये
बाजे गाजे
के साथ
दूर से
निकल पड़ता है

डुगडुगी
बजती है
समाचार
छपता है
माहौल पूरा
नाकमय
हो
निकलता है

‘उलूक’
ढूँढता है
लकड़ी का
पैमाना
और
नापता है
नाक
जब आईने
के सामने
से खुद
 की ही
उसे पता
चलता है
उसकी
नाक
का बौनापन
उसी को
चिढ़ाता हुआ
सारे जमाने
की भीड़ की
नाक
के सामने से
कैसे अपनी
नाक
बचाता हुआ
बेशर्मी
से छुप कर
भाग निकलता है ।

‘NAAC’ साभार: www.clipartsheep.com

सोमवार, 9 नवंबर 2015

जब पकाना ही हो तो पूरा पकाना चाहिये बातों की बातों में बात को मिलाना आना चाहिये

अब
चोर होना
अलग बात है

ईमानदार होना
अलग बात है

चोर का
ईमानदार होना
अलग बात है

चोरी करने
के लिये
कुछ सामने
से होना
अलग बात है

बिना कुछ
उठाये
छिपाये भी
चोरी हो जाना
अलग बात है

कहने का
मतलब
ऐसे तो कुछ
भी नहीं है
पर
वैसे कहो
तो कुछ है
और
नहीं भी है

बात कहने में
क्या जाता है
बातें बताना
अलग बात है
बातें बनाना
अलग बात है

जैसे बात
दिशा बताने
की हो तो भी
बिल्कुल
जरूरी नहीं है
दिशा का ज्ञान हो

बच्चे का
चेहरा हो
शरीर
जवान हो
अधेड़ की
सोच हो
बुढ़ापे की
झुर्रियों
के पहले
से ही छिपे
हुऐ निशान हो

इसकी जीत में
उसकी हार हो
किसी के लिये
हार और जीत
दोनो बेकार हों

समय के
निशानों पर
छिपाये
निशान हों

जन्मदिन हो
जश्न हो
शहर हो
प्रदेश हो
ईमानदार
का ईमान हो
झूठ बस
बे‌ईमान हो

ईमानदारी
पर भाषण हो
झूठ का
सच हो
सच का
झूठ हो
शासन का
राशन हो
योगा का
आसन हो
बात का
बात से
बात पर
प्रहार हो
मुस्कुराता

अंदर
ही अंदर
अंदर का
व्यभिचार हो

पर्दा खुला
रहने रहने
तक तो
कम से कम
नाटक हो
और
जोरदार हो ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शनिवार, 7 नवंबर 2015

किसी के पढ़ने या समझने के लिये नहीं होता है लक्ष्मण के प्रश्न का जवाब होता है बस राम ही कहीं नहीं होता है

क्या जवाब दूँ
मैं तुझे लक्ष्मण
मैं राम होना भी
नहीं चाहता हूँ
आज मेरे अंदर
का रावण बहुत
विकराल भी
हो  गया है
और मुझे राम से
डर लगने लगा है
राम आज मुझे
पल पल हर पल
नोच रहा है
किस से कहूँ
नहीं कह सकता
राम राम है
जय श्री राम है
मेरा ही राम है
लक्ष्मण तुम को
शक्ति लगी थी
और तुम्हारे पास
प्रश्न तब नहीं थे
अब हैं बहुत हैं
लक्ष्मण तुम और
तुम्हारे जैसे और
कई अनगिनत
अभिमन्यू हैं
जो तीर नहीं हैं
पर चढ़ाया गया है
जिन्हे कई बार
गाँडीव पर अर्जुन ने
तुम्हें समझा बुझा कर
तुम बने भी हो तीर
चले भी हो तीर
की तरह कई बार
इतना बहुत है कि
आज के जमाने में
कोई ना मरता है
ना घायल होता है
तुम्हारे जैसे तीरों से
कायरों के टायरों पर
सड़क के निशान
नहीं पड़ते हैं लक्ष्मण
रोज बहुत लोगों के
अंदर कई राम मरते हैं
कोई नहीं बताता है
किसी से कुछ नहीं
कह पाता है
बहुत बैचेनी होती है 

और तुम भी पूछ बैठे
ऐसे में ऐसा ही कुछ
और पता चला
आजकल राम
तुम्हारे साथ भी
वही करता है जो
सभी के साथ
उसने हमेशा से किया है
सभी को राम से प्रेम है
सभी को जय श्री राम
कहना अच्छा लगता है
कोई खेद नहीं होता है
राम राम होता है लक्ष्मण
प्रश्न करना हमेशा
दर्दमय होता है
उत्तर देना उस से भी
ज्यादा दर्द देता है
जब प्रश्न अलग होता है
राम अलग होता है
और पूछने वाला
लक्ष्मण होता है ।

 चित्र साभार: forefugees.com

नहीं दिखा कुछ दिन कहाँ गया पता चला खुजलाने गया है

कब किस चीज
से कहाँ खुजली
मचना शुरु हो जाये
कौन जानता है
कौन किसे
जा कर बताये
कौन किसे
क्या समझाये
देखने से खुजली
छूने से खुजली
सुनने से खुजली

इन सब पचड़ों
को छोड़ो भी

कुछ दिनों से
कुछ अजीब सी
खुजली हो रही है

कुछ तार बेतार के
खुजली के खुजली से
भी तो जोड़ो जी


हो रही है तो हो रही है
खुजला रहे हैं बैठ कर
कहाँ हो रही है
क्यों हो रही है
सोचने समझने में
लग गये कलम ही
छूट गई हाथ से
क्यों छूटी कुछ सोचो
मनन करो हर बात
पर शेखचिल्ली का
चिल्ला तो मत फोड़ो जी

अंदाज आया पता चला
कुछ नहीं लौटा पाने
की खुजली है
अब भिखारी लौटाये
भी तो क्या
कुछ चिल्लर
और किसे
कौन लेगा और
लौटाया भी जाये
तो किसे लौटाया जाये

ध्यान सारा एक ही
जगह पर लगना
शुरु हो गया और
इसी में गजब हो गया
गजब क्या हुआ
बाबा रामदेव की
मैगी का भोग हो गया
मत समझ बैठियेगा
पर हुआ कुछ ऐसा ही
जैसे योग हो गया

पहले क्यों नहीं
आया होगा ये
लौटाने पलटाने
वाला खेल
अब देखिये जिसे भी
उसी ने बना ली है
अपनी पटरी और
ले जोर शोर से छाती
पीट पीट कर चलाना
शुरु कर चुका है
उसके ऊपर अपनी रेल

जो भी है अब तो
खुजलाने में बहुत
मजा आने लगा है
जिसे देखो वो कुछ
ना कुछ लौटाने
में लगा है

‘उलूक’ तू वैसे भी
हमेशा उल्टे बाँस
बरेली जाने के जुगाड़
में लगा ही रहता है
लगा रह मजे से
खुजलाने में
साथ में बजाता
भी चल एक कनिस्तर
गाता हुआ कुछ गीत
ऐसा महसूस करें तेरी
उस खुजली को सभी
जिसे खुजलाते खुजलाते
तुझे भी खुजली खुजली
खेलने में अब बहुत
ज्यादा मजा आने लगा है ।

चित्र साभार: www.shutterstock.com

सोमवार, 2 नवंबर 2015

खाली सफेद पन्ना अखबार का कुछ ज्यादा ही पढ़ा जा रहा था

कुछ ज्यादा
ही हलचल
दिखाई
दे रही थी
अखबार के
अपने पन्ने पर

संदेश भी
मिल रहे थे
एक नहीं
ढेर सारे
और
बहुत सारे
क्या
हुआ होगा
समझ में
नहीं आ
पा रहा था

पृष्ठ पर
आने जाने
वालों पर
नजर रखने
वाला
सूचकाँक
भी ऊपर
बहुत ऊपर
को चढ़ता
हुआ नजर
आ रहा था

और
ये सब
शुरु हुआ था
जिस दिन से
खबरें छपना
थोड़ा कम होते
कुछ दिन के
लिये बंद
हुआ था

ऐसा नहीं था
कि खबरें नहीं
बन रही थी

लूट मार हमेशा
की तरह धड़ल्ले
से चल रही थी
शरीफ लुटेरे
शराफत से रोज
की तरफ काम
पर आ जा रहे थे

लूटना नहीं
सीख पाये
बेवकूफ
रोज मर्रा
की तरह
तिरछी
नजर से
घृणा के
साथ देखे
जा रहे थे

गुण्डों की
शिक्षा दीक्षा
जोर शोर से
औने पौने
कोने काने
में चलाई
जा रही थी

पढ़ाई लिखाई
की चारपाई
टूटने के
कगार पर
चर्र मर्र
करती हुई
चरमरा रही थी

‘उलूक’
काँणी आँख से
रोज की तरह
बदबूदार
हवा को
पचा रहा था
देख रहा था
देखना ही था
आने जाने के
रास्तों पर
काले फूल
गिरा रहा था

कहूँ ना कहूँ
बहुत कह
चुका हूँ
सभी
कुछ कहा
एक ही
तरह का
कब तक
कहा जाये
सोच सोच
कर कलम
कभी
सफेद पानी में
कभी
काली स्याही में
डुबा रहा था

एक दिन
दो दिन
तीन दिन
छोड़ कर
कुछ नहीं
लिखकर
अच्छा कुछ
देखने
अच्छा कुछ
लिखने
का सपना
बना रहा था

कुछ नहीं
होना था
सब कुछ
वही रहना था
फिर लिखना
शुरु
किया भी
दिखा भी
अपनी सूरत
का जैसा ही
जमाने से
लिखा गया
आज भी
वैसा ही कुछ
कूड़ा कूड़ा
सा ही
लिखा जा
रहा था

जो है सो है
बस यही पहेली
बनी रही थी
देखने पढ़ने
वाला खाली
सफेद पन्ने को
इतने दिन
बीच में
किसलिये
देखने के लिये
आ रहा था ।

चित्र साभार: www.clker.com

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

बंदरों के नाटक में जरूरी है हनुमान जी और राम जी का भी कुछ घसीटा

बंदर ने बंदर
को नोचा और
हनुमान जी ने
कुछ नहीं सोचा
तुझे ही क्यों
नजर आने
लगा इस सब
में कोई लोचा
भगवान राम जी
के सारे लोगों
ने सारा कुछ देखा
राम जी को भेजा
भी होगा जरूर
चुपचाप कोई
ना कोई संदेशा
समाचार अखबार
में आता ही है हमेशा
बंदर हो हनुमान हो
चाहे राम हो
आस्था के नाम पर
कौन रुका कभी
और किसने है
किसी को रोका
मौहल्ला हो शहर हो
राज्य हो देश हो
तेरे जैसे लोगों
ने ही
हमेशा ही
विकास के पहिये
को ऐसे ही रोका
काम तेरा है देखना
फूटी आँखों से
रात के चूहों के
तमाशों को
किसने बताया
और किसके कहने
पर तूने दिन का
सारा तमाशा देखा
सुधर जा अभी भी
मत पड़ा कर
मरेगा किसी दिन
पता चलेगा जब
खबर आयेगी
बंदरों ने पीटा
हनुमान ने पीटा
और उसके बाद
बचे खुचे उल्लू

उलूक को राम
ने भी जी भर कर
तबीयत से पीटा ।

चित्र साभार:
www.dailyslave.com

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

आ जाओ अलीबाबा फिर एक बार खेलने के लिये चोर चोर

रोज जब चोरों से
सामना होता है
अलीबाबा तुम
बहुत याद आते हो
सारे चोर खुश
नजर आते हैं
जब भी चोर चोर
खेल रहे होते हैं
और जोर जोर से
चोर चोर चिल्लाते हैं
चोर अब चालीस
ही नहीं होते हैं
मरजीना अब
नाचती भी नहीं है
अशर्फियाँ तोलने
के तराजू और
अशर्फियाँ भी
अब नहीं होते हैं
खुल जा सिमसिम
अभी भी कह रहे हैं
लोग खड़े हैं चट्टानों
के सामने से
इंतजार में खुलने के
किसी दरवाजे के
अलीबाबा बस एक
तुम हो कि दिखाई
ही नहीं देते हो
आ भी जाओ
इससे पहले हर कोई
निशान लगाने लगे
दरवाजे दरवाजे
इस देश में और
पैदा होना शुरु हों
गलतफहमियाँ
लुटने शुरु हों
घर घर में ही
घर घर के लोग
डर अंदर के फैलने
लगें बाहर की तरफ
मिट्टी घास और पेड़
पानी बादल और
काले सफेद धुऐं में भी
रहम करो ले आओ
कुछ ऐसा जो ले पाये
जगह खुल जा
सिमसिम की
और पिघलना शुरु
हो जायें चट्टाने
बहने लगे वो सब
जो मिटा दे सारे
निशान और पहचान
सारी कायनात
एक हो जाये और
समा जाये सब कुछ
कुछ कुछ ही में
आ भी जाओ
अलीबाबा
इस से पहले की
देर हो जाये और
‘उलूक’ को नींद
आ जाये एक नये
सूरज उगने के समय ।

चित्र साभार: www.bpiindia.com

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

राम ही राम हैं चारों ओर हैं बहुत आम हैं रावण को फिर किसलिये किस बात पर जलाया

विजया दशमी
के जुलूस
में भगदड़
मचने पर
पकड़ कर
थाने लाये
गये दो लोगों
से जब
पूछताछ हुई

एक ने
अपने को
लंका का राजा
रावण बताया
दस सिर
तो नहीं थे
फिर भी
हरकतों से
सिर से पाँव
तक रावण
जैसा ही
नजर आया

और

दूसरे की
पहचान
बहुत
आसानी से
अयोध्या के
भगवान राम
की हुई
जिनको बिना
देखे भी
सारे के सारे
रामनामी
दुपट्टे ओढ़े
भक्तों ने
आँख नाक
कान बंद
कर के
जय श्री राम
का नारा
जोर शोर
से लगाया 


दोनो ने
अपना गाँव
इस लोक
में नहीं
परलोक में
कहीं होना
बताया

मजाक ही
मजाक में
उतर गये
उस लोक से
इस लोक में
इस बार
दशहरा
पृथ्वी लोक
में आकर
खुद ही देखने
का प्लान
उन्होने
खुद नहीं
उनके लिये
ऊपर उनके ही
किसी चाहने
वाले ने बनाया

ऊपर वालों ने
नीचे आने जाने
में अड़ंगा भी
नहीं लगाया

भीड़ से
पल्ला पड़ा जब
राम और
रावण का
नीचे उतर कर
भीड़ में से
किसी ने
अपने आप को
राम का भाई
किसी ने चाचा
किसी ने बहुत ही
नजदीक का
ताऊ बताया

रावण के
बारे में
पूछने पर
किसी ने
कोई जवाब
नहीं दिया
इसने उससे
और उसने
किसी और
से पूछने
की राय दे
कर अपना
मुँह इधर
और
उधर को किया
सभी ने
अपना अपना
पीछा रावण
को देखते
ही छुड़ाया

राम की
बाँछे खिली
सामने खड़ी
सारी जनता
से उनकी
खुद की
रिश्तेदारी मिली

और

रावण बेचारा
सोच में पड़े
खड़ा रह पड़ा
किसलिये
और
किस मुहूर्त में
राम के साथ
रामराज्य
की ओर
ऊपर से नीचे
एक बार
और
अपनी जलालत
देखने
निकल पड़ा ?

चित्र साभार: www.shutterstock.com

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

शव का इंतजार नहीं शमशान का खुला रहना जरूरी होता है

हाँ भाई हाँ
होने होने की
बात होती है
कभी पहले सुबह
और उसके बाद
रात होती है
कभी रात पहले
और सुबह उसके
बाद होती है
फर्क किसी को
नहीं पड़ता है
होने को जमीन से
आसमान की ओर
भी अगर कभी
बरसात होती है
होता है और कई
बार होता है
दुकान का शटर
ऊपर उठा होता है
दुकानदार अपने
पूरे जत्थे के साथ
छुट्टी पर गया होता है
छुट्टी लेना सभी का
अपना अपना
अधिकार होता है
खाली पड़ी दुकानों
से भी बाजार होता है
ग्राहक का भी अपना
एक प्रकार होता है
एक खाली बाजार
देखने के लिये
आता जाता है
एक बस खाली
खरीददार होता है
होना ना होना
होता है नहीं
भी होता है
खाली दुकान को
खोलना ज्यादा
जरूरी होता है
कभी दुकान
खुली होती है और
बेचने के लिये कुछ
भी नहीं होता है
दुकानदार कहीं
दूसरी ओर कुछ
अपने लिये कुछ
और खरीदने
गया होता है
बहुत कुछ होता है
यहाँ होता है या
वहाँ होता है
गन्दी आदत है
बेशरम ‘उलूक’ की
नहीं दिखता है
दिन में उसे
फिर भी देखा और
सुना कह रहा होता है ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

बहुत बार मन गधा गधा हो जाता है गधा ही बस अपना सा लगता है और बहुत याद आता है

कई बार लिखते समय
कई संदर्भ में याद
आये हो गधे भाई
बहुत दिन हो गये
मुलाकात किये हुऐ
याद किये हुऐ
बात किये हुऐ
कोई खबर ना
कोई समाचार
आज तुम्हारी याद
फिर से है आई
जब से सुनी है
जानवर के चक्कर में
आदमी की आदमी से
हुई है खूनी
रक्तरंजित हाथापाई
आये भी कोई
खबर कैसे तुम्हारी
ना किसी खबरची ने
ना ही किसी अखबार ने
तुममें कोई दिलचस्पी
आज तक महसूस
ही नहीं हुआ कि
हो कभी दिखाई
मुलाकात होती तो
होती भी कैसे
ना अरहर की दाल
से ही तुम्हें
कुछ लेना देना
ना मुर्गे से ही
होता है तुम्हारा कभी
कुछ सुनना कहना
गाय और भैंस में से
एक भी नहीं कही
जा सकती तुम्हारी
नजदीक की या
बहुत दूर की बहना
बस तालमेल दिखता है
तुम्हारा अगर कहीं तो
सिर्फ और सिर्फ
अपने धोबी से
कुछ गंदे कुछ मैले कुचैले
कुछ साफ सुथरे धुले हुऐ
कपड़ों के थैले से
अब ऐसा भी होना
क्या होना
देश के किसी भी
काम के नहीं
शरम तुम्हें पता नहीं
कभी आई की नहीं आई
घास खाना हिनहिनाना
और बस खड़े खड़े ही सोना
ना खाने के काम के
ना दिखाने के काम के
चुनाव चिन्ह ही बन जायें
ऐसा जैसा भी
तुमसे नहीं है
कभी भी होना
कितना अच्छा है
ना भाई गधे
ना तुम्हें किसी ने पूछना
ना तुम्हें छेड़ने के कारण
किसी पर किसी को
काली स्याही भी कभी
फेंकने के लिये किसी को
ढकोसला कर कर के रोना
आ भी जाया करो
दिखो ना भी कहीं
याद में ही सही
गर्दभ मयी हो गया हो
जहाँ सब कुछ
बचा हुआ ही ना लगे
कि है कहीं कुछ
तुमसे गले मिल कर
ढाड़े मार मार कर
आज तो ‘उलूक’ को
भी है देश के नाम पर
देशभक्ति दिखाने
और ओढ़ने के लिये रोना ।

चित्र साभार: www.cliparthut.com

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

बातें बनाने तक की बात है चल ही जाती हैं नहीं चलती है तो फौज लगा कर चला दी जाती हैं

बातें
कितनी भी
बना ली जायें
लगता है
अभी कुछ ही
कहा गया है
बहुत कुछ है
जो बचा हुआ
रह गया है

जल की
इतनी बूँदें
होती और
जमा हो
गई होती
जलजला
ला देती
बहा देती
बहुत कुछ
छोड़ दिया
जाता समय
के साथ
बहने के
लिये अगर

फिर लगता है
बातें भी बूँद बूँद
ही जमा होती हैं
जैसी जगह मिले
उसी की जैसी
हो लेती हैं

सामंजस्य हो
बात का
बात के साथ
जरूरी
नहीं होता है
कुछ बातें
खुद ही
तरतीब से
लग जाती हैं
कुछ
अपने ही आप
एक दूसरे पर
चढ़ जाती हैं
निकलना
चाहती हैं 
अंदर से बाहर

बेतरतीबी से
ऊँची नीची
सोच के साथ
उसी सोच
पर चढ़ कर
या उतर कर

आसान भी
नहीं होता है
बाँधें रखना
या फिर यूँ ही
छोड़ देना
बातों की
नकेल को

बातें एक साथ
अगर कह भी
दी जाती हैं
बाढ़ फिर भी
नहीं कभी
आ पाती है
बातें
पानी की तरह
बह तो जाती हैं
पर
दूर तक कहीं भी
नजर नहीं आती हैं
उनके निशान भी
समय की रेत
पर खो जाते हैं

सबके बस में
नहीं होता है
जमा किये
रहना बातों को
कुछ बहा देते हैं
यूँ ही कहीं भी
बातों को
बातों ही
बातों में

बातों के बादल
भी नहीं बनते हैं
बात बात में
फटते भी नहीं हैं

बातें
निचोड़नी
पड़ती हैं
कुछ पीनी
पड़ती हैं
कुछ जीनी
पड़ती हैं

बात तो
तब बनती है
जब कोई बात
बहुत ही
धीरे धीरे
हौले हौले से
बात की बात में
बातों के बीच
छोड़ दी जाती है

कब काट
जाती है
कब फाड़
जाती है
कब कहाँ
किस को
चीर जाती है

उसके बाद
मटकती
उछलती
चल देती है
हर जगह
जा जा कर
नाच दिखाती है

देखते रह जाते हैं
बातें बनाने वाले
उनकी खुद की
कहीं बात उन्हीं को
लपेट ले जाती है

‘उलूक’
जानता है
बहुत अच्छी तरह
सबसे
अच्छी बात
ऐसी ही
एक बात
होती है जो
किसी के भी
समझ में
कभी भी
नहीं आ पाती है

बातें बनाना
वैसे भी
किसी को भी
कहीं भी
नहीं सिखाया
जाता है
बातें तो
बात ही बात में
यूँ ही
चुटकी में
बना दी जाती हैं

मुश्किल
तब होती है
जब बातों
में से ही
एक बात
च्यूइंगम
हो जाती है ।

चित्र साभार:
www.shutterstock.com

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

सावन गुजरा इक्कीस इक्यावन ऐक सौ एक होते होते हो गये ग्यारा सौ हरा था सब कुछ हरा ही रहा

सावन
निकल गया
कुछ नया
नहीं हुआ
पहले भी
सारा
हरा हरा
ही नजर
आया है
अब तो
हरा जो है
और भी
हरा हरा
हो गया है
किससे कहूँ
किसको बताऊँ
हरा कोई
नहीं देखता है
हरे की जरूरत
भी किसी
को नहीं है
ना ही
जरूरत है
सावन की

मेरे शहर में
जमाने गये
बहुत से
लोग हुऐ
हाय
उस समय
सोचा भी नहीं

किसी ने
बहुत
जोर देकर
हरे को
हरा ही कहा
एक दिन नहीं
कई बार कहा
यहाँ तक
कहा हरा
कि
सारे लोगों ने
उसे पागल
कह दिया

होते होते
सारा सब कुछ
हरा हरा हो गया
एक नहीं दो नहीं
पूरा शहर ही
पागलों का हो गया

ऐसा भी
क्या हरा हुआ
हरा भरा शहर
बचपन से हरा
होता हुआ
देखते देखते
सब कुछ
हरा हो गया
लोग हरे
सोच हरी
आत्मा हरी
और
क्या बताऊँ
जो हरा
नहीं भी था
वो सब कुछ
हरा हो गया

इस सारे हरे
के बीच में
जब ढूँढने
की कोशिश
की सावन
के बाद

बस जो
नहीं बचा था
वो ‘उलूक’
का हरा था
हरा नजर
आया ही नहीं
हरे के
बीच में
हरा ही
खो गया ।

चित्र साभार: www.vectors4all.net

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

लिखे पर चेहरा और चेहरे पर लिखा हुआ दिखता

कभी किसी दिन
चेहरे लिखता तो
कहीं कुछ दिखता
बिना चेहरे के लिखा
भी क्या लिखा
गर्दन से कटा
बचा कुचा बाकी
शरीर के नीचे का
बेकार सा हिस्सा
चेहरा लिखने का
मतलब चेहरा
और बस चेहरा
आईने में देखी
हुई शक्ल नहीं
छोटे कान नहीं
ना ही बहुत लम्बी
नाक ना पतली गर्दन
ना काली आँख
ना वैसा ना
वैसे जैसा कुछ
कुछ नहीं तो
पैमाना लिखता
कहीं नपता
पैमाना सुनता
मदहोश होता
कुछ कभी कहीं
किसी के लिये
क्या पता अगर
मयखाना लिखता
लिखना और नहीं
लिखना बारीक
सी रेखा बीच में
लिखने वालों और
नहीं लिखने वालों
के बीच की
लिखे के बीच में से
झाँकना शुरु होता
हुआ चेहरा लिखता
चेहरे के दिखते
पीछे का धुँधलाना
शुरु होता लिखा
और लिखाया दिखता
अच्छा होता पहाड़ी नदी
से उठता हुआ सुबह
सवेरे का कोहरा लिखता
स्याही से शब्द लिखते
लिखते छोड़ देता लकीर
उसके ऊपर लिख कर
देखता चेहरे बस चेहरे
चेहरे पर चेहरे लिखता
देखता लिखा हुआ
किसे दिखता और
किसे नहीं दिखता ।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

आज यानी अभी के अंधे और बटेरें

कोई भी कुछ
नहीं कर सकता
आँखों के परदों
पर पड़ चुके
जालों के लिये
साफ दिखना
या कुछ धुँधला
धुँधला हो जाना
अपना देखना
अपने को पता
पर मुहावरों के
झूठ और सच
मुहावरे जाने
कहने वाले
कह गये
बबाल सारे
जोड़ने तोड़ने
के छोड़ गये
अब अंधे के
हाथ में बटेर
का लग जाना
भी किसी ने
देखा ही होगा
पर कहाँ सिर
फोड़े ‘उलूक’ भी
जब सारी बटेरें
मुहँ चिढ़ाती हुई
दिखाई देने लगें
अंधों के हाथों में
खुद ही जाती हुई
और हर अंधा
लिये हुऐ नजर
आये एक बटेर
नहीं बटेरें ही बटेरें
हाथ में जेब में
और कुछ नाचती
हुई झोलों में भी
कोई नहीं समय
की बलिहारी
किसी दिन कभी
तो करेगा कोई
ना कोई अंधा
अपनी आँख बंद
नोच लेना तू भी
बटेर के एक दो पंख
ठंड पड़ जायेगी
कलेजे में तब ही
फिर बजा लेना
बाँसुरी बेसुरी अपनी ।

चित्र साभार: clipartmountain.com

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

कुछ भी लिख देना लिखना नहीं कहा जाता है

एक बात पूछूँ
पूछ
पर पूछने से पहले
ये बता
किस से पूछ रहा है
पता है
हाँ पता है
किसी से नहीं
पूछ रहा हूँ
आदत है पूछने की
बस यूँ ही ऐसे ही
कुछ भी कहीं भी
पूछ रहा हूँ
तुमको कोई
परेशानी है
तो मत बताना
बताना जरूरी
नहीं होता है
कान में बता
रहा हूँ वैसे भी
कोई नहीं
कुछ बताता है
पूछने से ही
गुस्सा हो जाता है
गुर्राता है
कहना शुरु
हो जाता है
अरे
तू भी पूछने
वालों में
शामिल हो गया
मुँह उठाता है
और पूछने
चला आता है
ये नहीं कि
वैसे ही हर कोई
पूछने में लगा
हुआ होता है
एक दो पूछने
वालों के लिये
कुछ जवाब सवाब
ही कुछ बना कर
क्यों नहीं ले आता है
हमेशा जो दिखे
वही साफ साफ
बताना अच्छा
नहीं माना जाता है
रोटी पका सब्जी देख
दाल बना भर पेट खा
खाली पीली
अपनी थाली अपने पेट
से बाहर किसलिये
फालतू में झाँकने
चला आता है
‘उलूक’
समाज में रहता है
क्यों नहीं
रोज ना भी सही
कुछ देर के लिये
सामाजिक क्यों
नहीं हो जाता है
पूछने गाछने के
चक्कर में किसलिये
प्रश्नों का रायता
इधर उधर फैलाता है ।

चित्र साभार: serengetipest.com

सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

शिव की बूटी के उत्थान का समय भी आ रहा है


तब सही
समझे थे
या अब सही
समझ रहे हैं
बस इतना सा
समझ में नहीं
आ पा रहा है
जो है सो है
मजा तो
आ रहा है
बहुत दिनो के
बाद कुछ कुछ
लगा जैसे
पहाड़ी राज्य
की किस्मत का
दरवाजा ऊपर वाला
अब जाकर जल्दी
खोलने जा रहा है
भाँग की खेती
करने का अधिकार
जल्दी ही सरकार
के द्वारा पहाड़ी
किसानो को
दिया जा रहा है
बहुत अच्छी बात
इसमें जो बताई
समझाई गई है
उससे कोई खतरा
किसी को नहीं होगा
जैसा आभास
पहली बार में ही
आ जा रहा है
जंगलों में इफरात
से उगती है भाँग
जिस जमीन पर
काले सोने के
नाम से आज
भी ओने कोने
में बेचा खरीदा
जा रहा है
खेतों में उगाया
जायेगा अब
काला सोना
ठेका सरकार
और सरकार के
नुमाँइंदों को ही
दिया जा रहा है
सुरा ने किये
बहुत सारे
चमत्कार
इतिहास में लिखा
है बहुत कुछ
अब वही प्रयोग
पुन: एक बार कर
भाँग और भाँग से
बनने वाले शिव
भगवान की बूटी
को पहाड़ के
कोने कोने में
पहुँचाने का
अप्रतिम प्रयास
किया जा रहा है
जय हो देव भूमी
और देवताओं की
मुँह मत बिसूर
खुश हो ले ‘उलूक’
झूठ में ही सही
असुरों के सुरों पर
शोध करने का
सामान बहुत सा
जगह जगह के
लिये जमा
किया जा रहा है ।

चित्र साभार:
www.shrisaibaba.com
legalizethecannabis.tumblr.com

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

अनदेखा ना हो भला मानुष कोई जमाने के हिसाब से जो आता जाता हो

पापों को
अगर अपने
किसी ने
कह
दिया हो
फिर सजा
देने की बात
सोचने की
सोच किसी
की ना हो

हो अगर कुछ
उसके बाद
थोड़ा कुछ
ईनाम
वीनाम हो 
थोड़ा बहुत
नाम वाम हो 

कुछ सम्मान
वम्मान हो
उसका भी हो
तुम्हारा भी हो
हमारा भी हो

झूठ
वैसे भी
बिक नहीं
सकता कभी
अगर
खरीदने वाला
खरीददार
ही ना हो

कुछ
बेचने की
कुछ
खरीदने की
और
कुछ
बाजार की
भी बात हो
चाहे कानो
कान हो

सोच लो
अभी भी
मर ना
पाओगे
मोक्ष पाने
के लिये
कीड़ा
बना कर
लौटा कर
फिर वापस
यहीं कहीं
भेज दिये
जाओगे

जमाने के
साथ चलना
इसलिये भी
सबके लिये
बराबर हो
और
जरूरी हो

सीखना
झूठ बेचना
भी सीखने
सिखाने में हो
बेचना नहीं
भी अगर
सीखना हो
कम से कम
कुछ खरीदना
ही थोड़ा बहुत
समझने
समझाने में हो

खुद भी
चैन से
रहना
और
रहने
देना हो

‘उलूक’
आदत हो
पता हो
आदमी के
अंदर से
आदमी को
निचोड़ कर
ले आना
समझ में
आता हो

अनदेखा
ना
होता हो
भला मानुष
कोई भी
कहीं इस
जमाने में
जो किताबों
से इतर
कुछ मंत्र
जमाने के
हिसाब के
नये
बताता हो
समझाता हो ।

चित्र साभार: sushkrsh.blogspot.com

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

आग लिखना सरल है बाकी फालतू की आग है

आग है
बहुत है
इधर भी है
उधर भी है
जल भी रहा
है बहुत कुछ
राख है और
बहुत है
इधर भी है
उधर भी है
लगा हुआ है
धौंकने में
चिंगारी कोई
इधर भी है
उधर भी है
हो भी रहा है
कुछ नहीं भी
हो रहा है
इधर भी कुछ
उधर भी कुछ
अलग अलग
है आग है
इधर की है अलग
अलग है आग
उधर की है
आग सोच की है
आग मोबाईल की है
आग फैशन की है
आग मोटर
साइकिल की है
आग पढ़ने की है
आग पढ़ाने की है
आग निभाने की है
आग पचाने की है
आग जमा करने की है
 आग जलने की है
आग जलाने की है
आग लकड़ियों की है
आग जंगल और
जंगलियों की है
आग सब्सीडी की है
आग मेहनत की है
आग हराम खोरी की है
‘उलूक’ रुक जा रुक जा
मत बाँट आग को
तो कम से कम
आग आग है
आँख आँख है
परेशान मत हुआ कर
हर आस्तीन में साँप है
जरूरी भी है जो है
काटने वाला नहीं है
बस दिखाने का साँप है ।

चित्र साभार: newyork.cbslocal.com

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

ऊपर जाने के रास्ते समझो जरा नीचे से निकल कर जाने हो रहे हैं

डूबते हुऐ जहाज
में बहुत तेजी
से हो रहे हैं
एक नहीं एक
साथ हो रहे हैं
सारे हो रहे हैं
सारे के सारे
काम ही हो रहे हैं
काम का दिखना
जरूरी नहीं है
जरूरी है देखना
किनारे से
भोंपुओं के सहारे
सहारे से कई
इशारे हो रहे हैं
हो रहें हैं कि
नहीं हो रहे हैं
इतनी गजब की
बातें हो रही है
ये सब कुछ
जल्दी ही गिन कर
गिनीज बुक को
बताने हो रहे हैं
जहाज की सैल्फी
डूबती हुई जनता
खुद ही ले रही है
किस्मत बहुत ही
खराब है कुछ
लोगों की जहाँ
जहाज चलाने वाले
के लोगों के शोर
नगाड़ों के शोर
में खो रहे हैं
किसी के होश
उड़ रहे हैं जहाज
के डूबने की
सोच सोच कर
पैंट के पाँयचे
ना जाने किस डर
से गीले हो रहे हैं
बेवकूफ का बेवकूफ
रह गया ‘उलूक’
उसे तो हमेशा
दिखा है सोचने
समझने के
लाले हो रहे हैं
वादा किया भी है
ऊँचाईयों में ले
जाने का जहाज
वादा निभाने के
लिये ही तो काम
सारे हो रहे हैं
किसने कह दिया
ऊपर को ही जाना
जरूरी है ऊँचाईयाँ
छूने के लिये
मन लगा कर
इच्छा से डूब कर
भी ऊपर को ही
जाने के रास्ते
जब बहुत
आसान और
बहुत सारे हो रहे हैं ।

चित्र साभार: blogs.21rs.
es  

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

ना इसका हूँ ना उसका हूँ क्या करूं इधर भी हूँ उधर भी रहना ही रहना है

मत नाप लिखे
हुऐ वाक्यों की
लम्बाई को
पैमाना हाथ
में लेकर अपने
कुछ भी तो कहीं
भी नहीं होना है
दो इंच बड़ा भी
हो जाये या
तीन इंच आगे
या पीछे से कहीं
कम भी अगर
कहीं किसी बात
को होना है
इधर का इधर
और उधर का उधर
बस बहस के लिये
कैमरे के सामने
बैठ कर दिखाने
सुनाने का रोना है
नहीं समझेगा
फिर भी पता है
तुझे तेरे अपने
फटे में खुद ही
हाथ डाल कर
सोचना अपने
ही खेलने के लिये
कोई खिलौना है
लिख कुछ बोल कुछ
दिखा कुछ बता कुछ
छपा कुछ दे कुछ
दिला कुछ पता
किसी को कुछ
भी नहीं होना है
काले कोयले का
धुआँ सफेद
राख सफेद
बचा कहीं उसके
बाद कहीं कुछ
नहीं होना है
लगा रह देखने में
कुछ कलाबाजी
कुछ कलाकारी
दिखना सब सफेद
है साफ सुथरा
कुछ दिनो के बाद
कौन सा किस को
कहाँ उसी जगह पर
लम्बे समय तक
खसौटे गये को
दिखने दिखाने
के लिये रहना है
‘उलूक’
की आदत है
उसको भी कुछ भी
कभी भी कहीं भी
कहने के लिये
ही बस कुछ कहना है ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

गाय बहुत जरूरी होती है श्राद्ध करने के बाद पता चल रहा था

श्राद्ध पक्ष अष्टमी
पिता जी का श्राद्ध
सुबह सुबह पंडित जी
करवा कर गये आज
साथ में श्राद्ध में
प्रयोग हुऐ व्यँजनों
को किसी भी गाय
को खिलाने का
निर्देश भी दे गये
गलती से भी कौर
खाने का किसी
बैल के मुँह में
गाय से पहले
ना लगे जरा सा
खबरादर भी
कर के गये
श्राद्ध करने कराने
तक तो सब
आसान सा ही
लग रहा था
कोई मुश्किल
नहीं पड़ी थी
सब कुछ ठीक
ठाक चल रहा था
गाय की बात
आते ही समस्या
लेकिन बड़ी एक
खड़ी हो गई थी
रोज कई दिनों से
अखबार टी वी रेडियो
जगह जगह
से गाय गाय
की माला जपना
हर किसी का दिखता
हुआ मिल रहा था
गाय को देखे सुने
कई जमाने हो चुके थे
घर के आस पास
दूर दूर तक गाय
का पता नहीं
मिल रहा था
घर से निकला
हर दुकान में
गाय का प्लास्टिक
का पुतला जरूर
दिख रहा था
पीठ में एक छेद था
पैसा डालने के लिये
आगे कहीं एक
नगरपालिका का
कूड़ेदान दिख रहा था
एक घायल बैल
प्लास्टिक के एक बंद
थेले के अंदर के कचरे
के लिये जीजान से
उस पर पिल रहा था
‘उलूक’ चलता ही
जा रहा था गाय
की खोज में
गाय गाय सोचता
हुआ चल रहा था
खाने से भरा थैला
उसके दायें हाथ से
कभी बायें हाथ में
कभी बायें हाथ से
दायें हाथ में
अपनी जगह को
बार बार
बदल रहा था ।

चित्र साभार: www.allfreevectors.com

रविवार, 4 अक्तूबर 2015

गांंधी बाबा देखें कहाँ कहाँ से भगाये जाते हो और कहाँ तक भाग पाओगे

गांंधी जी मैं
कह ही रहा था
कल परसों की
ही बात थी
कब तक बकरी
की माँ की तरह
खैर मनाओगे
दो अक्टूबर
तुम्हारी बपौती
नहीं है किसी दिन
मलाई में गिरी
मक्खी की तरह
निकाल कर कहीं
फेंक दिये जाओगे
हो गया शुरु
तुम्हारा भी
देश निकाला
आ गई है खबर
सरकार ने सरकारी
आदेश है निकाला
‘गांंधी आश्रम’ के
सूचना पटों से
अभी निकाले जाओगे
‘खादी भारत’ होने
जा रहा है
नया नामकरण
खादी बुनने बुनाने
की किताबों से भी
भगा दिये जाओगे
काम हो रहा है
हर जगह तेजी से
नाम से नाम को
हर जगह मिटता
मिटाता लुटता लुटाता
अब आगे यही
सब देख पाओगे
बहुत कर लिये
मौज बाबा गांंधी
इतिहास की किताबों
से खोद निकाल कर
जल्दी ही खेतों के
गड्ढों में भी
बो दिये जाओगे
देख रहा है ‘उलूक’
बहुत कुछ देखना है
अच्छा होने वाला
अच्छे दिनों में
राष्ट्रपिता की कुर्सी
पर जल्दी ही किसी
नेता जी को ऊपर से
अपने बैठा हुआ पाओगे ।

चित्र साभार: news.statetimes.in

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

लिखना सीख ले अब भी लिखने लिखाने वालों के साथ रहकर कभी खबरें ढूँढने की आदत ही छूट जायेगी

वैसे कभी सोचता
क्यों नहीं कुछ
लिख लेना सीख
लेने के बारे में भी
बहुत सी समस्याँऐं
हल हो जायेंगी
रोज एक ना एक
कहीं नहीं छपने
वाली खबर को
लेकर उसकी कबर
खोदने की आदत
क्या पता इसी
में छूट जायेगी
पढ़ना समझना
तो लगा रहता है
अपनी अपनी
समझ के
हिसाब से ही
समझने ना
समझने वाले
की समझ में
घुसेगी या
बिना घुसे ही
फिसल जायेगी
लिखने लिखाने
वालों की खबरें ही
कही जाती हैं खबरें
लिखना लिखाना
आ जायेगा अगर
खबरों में से एक
खबर तेरी भी शायद
कोई खबर हो जायेगी
समझ में आयेगा
तेरे तब ही शायद
‘उलूक’
पढ़े लिखे खबर वालों
को सुनाना खबर
अनपढ़ की बचकानी
हरकत ही कही जायेगी
खबर अब भी होती
है हवा में लहराती हुई
खबर तब भी होगी
कहीं ना कहीं लहरायेगी
पढ़े लिखे होने के बाद
नजर ही नहीं आयेगी
चैन तेरे लिये भी होगा
कुछ बैचेनी रोज का रोज
बेकार की खबरों को
पढ़ने और झेलने
वालों की भी जायेगी ।

चित्र साभार: www.clipartsheep.com

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

जन्म दिन अभी तक तो तेरा ही हो रहा है आज के दिन कौन जाने कब तक

कुछ देर के लिये
याद आया तिरंगा
उससे अलग कहीं
दिखी तस्वीर संत की
माने बदल गये
यहाँ तक आते आते
उसके भी इसके भी
एक डिजिटल हो गया
दूसरे की याद भी
नहीं बची कहीं
दिखा थोड़ा सा बाकी
अमावस्या के चाँद सा
समय के साथ साथ
कुछ खो गया
सोच सोच में पड़ी
कुछ डरी डरी सी
कहीं किसी को
अंदाज आ गया हो
सोचने का
श्राद्ध पर्व
पर जन्मदिन
के दिन का
दिन भी सूखा
दिन हो गया
याद आया कुछ
सुना सुनाया
कुछ कहानियाँ
तब की सच्ची
अब की झूठी
बापू कुछ नहीं कहना
जरूरतें बदल गई
हमारी वहाँ से
यहाँ तक आते आते
तेरे जमाने का
सच अब झूठ
और झूठ उस
समय का इस
समय का सबसे
बड़ा सच भी
निर्धारित हो गया
जन्मदिन मुबारक
हो फिर भी बहुत बहुत
बापू दो अक्टूबर
का दिन अभी तो
तेरा ही चल रहा है
भरोसा नहीं है
कब कह जाये कोई
अब और आज
से ही इस जमाने के
किसी नौटंकी बाज की
नौटंकी का दिन हो गया ।

चित्र साभार: caricaturez.blogspot.com

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

बेचिये जो भी बिक सकता है और जो तैयार है

पिछले महीने से
निकल रहे हैं
जलूस मेरे
शहर में
क्यों निकल
रहे हैं
कोई पूछने
वाला नहीं है
ना ही कोई
अखबार में
कोई खबर है
जिलाधीश भी
सो रहा है
थानेदार भी
बहुत होशियार है
निमंत्रण मिला है
मुजफ्फर नगर
काण्ड के खलनायकों
पर बहस करने का
बहुत पुरानी बात
हो गई है सुनने को
अभी की बात
को कौन तैयार है
नहीं देखा मंजर
इस तरह का
अभी तक की
जिंदगी में कभी
लोग कह रहे हैं
अच्छे दिन हैं
अच्छी बयार है
बुलाया गया है
निमंत्रण भी है
मुजफ्फर नगर
काण्ड के खलनायक
व उत्तराखण्ड पर
बहस के लिये
बतायें जरा अपने
घर के काण्डों पर
बात करने को
कौन तैयार है
माना कि ‘उलूक’
को अंधों मे
गिना जाता है
फिर भी दिखता है
कोने से कहीं
उसको भी कुछ
कहना ही है
मानकर कि
कहना है और
कहना भी
बेकार है।

चित्र साभार: www.anninvitation.com

बुधवार, 30 सितंबर 2015

निराशा सोख ले जाते हैं कुछ लोग जाते जाते

आयेंगे
उजले दिन
जरुर आएँगे
उदासी दूर
कर खुशी
खींच लायेंगे
कहीं से भी
अभी नहीं
भी सही
कभी भी
अंधेरे समय के
उजली उम्मीदों
के कवि की
उम्मीदें
उसकी अपनी नहीं
निराशाओं से
घिरे हुओं के
लिये आशाओं की
उसकी अपनी
बैचेनी की नहीं
हर बैचेन की
बैचेनी की
निर्वात पैदा
ही नहीं होने
देती हैं
कुछ हवायें
फिजा से
कुछ इस तरह
से चल देती हैं
हौले से जगाते
हुऐ आत्मविश्वास
भरोसा टूटता
नहीं है जरा भी
झूठ के अच्छे
समय के झाँसों
में आकर भी
कलम एक की
बंट जाती है
एक हाथ से
कई सारी
अनगिनत होकर
कई कई हाथों में
साथी होते नहीं
साथी दिखते नहीं
पर समझ में
आती है थोड़ी बहुत
किसी के साथ
चलने की बात
साथी को
पुकारते हुऐ
मशालें बुझते
बुझते जलना
शुरु हो जाती हैं
जिंदगी हार जाती है
जैसा महसूस होने
से पहले लिखने
लगते हैं लोग
थोड़ा थोड़ा उम्मीदें
कागजों के कोने
से कुछ इधर
कुछ उधर
बहुत नजदीक
पर ना सही
दूर कहीं भी ।

चित्र साभार: www.clker.com

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

उतनी ही श्रद्धांजलि जितनी मेरी कमजोर समझ में आती है तुम्हारी बातें वीरेन डंगवाल

बहुत ही कम
कम क्या
नहीं के बराबर
कुछ मकान
बिना जालियाँ
बिना अवरोध
के खुली मतलब
सच में खुली
खिड़कियों वाले
समय के हिसाब से
समय के साथ
समय की जरूरतें
सब कुछ आत्मसात
कर सकनें की क्षमता
किसी के लिये नहीं
कोई रोक टोक
कुछ अजीब
सी बात है पर
बैचेनी अपने
शिखर पर
जिसे लगता है
उसे कुछ समझ
में आती हैं कुछ
आती जाती बयारें
बेरंगी दीवारें
मुर्झाये हुई सी
प्रतीत होती
खिड़कियों के
बगल से
निकलती
चढ़ती बेलें
कभी मुलाकात
नहीं हुई बस
सुनी सुनाई
कुछ कुछ बातें
कुछ इस से
कुछ उस से
पर सच में
आज कुछ
उदास सा है मन
जब से सुना है
तुम जा चुके हो
विरेन डंगवाल
कहीं पर बहुत
मजबूती से
इतिहास के
पन्नों के लिये
गाड़ कर कुछ
मजबूत खूँटे
जो बहुत है
कमजोर समय के
कमजोर शब्दों पर
लटके हुऐ यथार्थ
को दिखाने के लिये
ढेर सारे आईने
विनम्र श्रद्धांजलि
विरेन डंगवाल
'उलूक' की अपनी
समझ के अनुसार।


चित्र साभार: http://currentaffairs.gktoday.in/renowned-hindi-poet-viren-dangwal-passes-09201526962.html

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

पागलों के साथ कौन खड़ा होना चाहता है ?

किसी को कुछ
समझाने के लिये
नहीं कहता है
‘उलूक’ आदतन
बड़बड़ाता है
देखता है अपने
चश्मे से अपना
घर जैसा
है जो भी
सामने से
नजर आता है
बक बका जाता
है कुछ भी
अखबार में जो
कभी भी
नहीं आता है
तेरे घर में नहीं
होता होगा
अच्छी बात है
उसके घर में
बबाल होता है
रोज कुछ ना
कुछ बेवकूफ
रोज आकर
साफ साफ
बता जाता है
रुपिये पैसे का
हिसाब कौन
करता है
सामने आकर
पीछे पीछे
बहुत कुछ
किया जाता है
अभी तैयारियाँ
चल रही है
नाक के लिये
नाक बचाने
के लिये झूठ
पर झूठ
अखबार में दिखे
सच्चों से बोला
जाता है
कौन कह रहा है
झूठ को झूठ
कुछ भी कह
दीजिये हर कोई
झूठ के छाते के
नीचे आकर खड़ा
होना चाहता है
किसी में नहीं है
हिम्मत सच के
लिये खड़े होने
के लिये हर कोई
सच को झूठा
बनाना चाहता है
‘उलूक’ के साथ
कोई भी नहीं है
ना होगा कभी
पागलों के साथ
खड़ा होना भी
कौन चाहता है ।

 चित्रसाभार: www.clipartsheep.com

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

लिंगदोह कौन है ? पता करवाओ

लिंगदोह
कौन है
है अभी
कि
नहीं है

होगा
कितने
होते हैं
ये भी कोई
होता होगा

शासन को
पता नहीं
दुश्शासन
को पता नहीं

अनुशासन
कुशासन
शासन
प्रशासन
रहने दो

आसन करो
योग करो

भोग मत करो

अच्छा सोचो
अच्छा देखो
कुछ गलत हो
रहा हो तो
जब तक होये
तब तक
मत देखो

जब हो जाये
तब सब आ
आ कर देखो

हल्ला गुल्ला
सुनो तो
सो जाओ

शांति होने
के बाद
मुँह धो के
पोछ के
मूँछों को
घुमाओ

अब
हर जगह
थाने हों
और
थानेदार हो

ऐसी सोच
मत बनाओ

कुर्सियाँ
बैठने
के लिये
होती हैं
बैठ जाओ

गुस्सा
दिखाओ
एक दो
अच्छे भले
सीधे साधे
को डंडा
मार के
चूट जाओ

लिंगदोह
कौन है
कोई पूछ
रहा है क्या
किसी से ?

बेकार
की बातें
बेकार
जगह पर
बेकार में
मत फैलाओ

खबर देने
की जरूरत
अभी से
नहीं है
खबरची को

साफ सफाई
रंग चूना
करने के
बाद ही
बुलाओ

उसी को
बुला कर
उसी से
किसी से
पुछवाओ

लिंगदोह
के बारे में
पता कर
उसे नोटिस
भिजवाओ

आओ
मिल बाँट
कर चाय
समोसे खाओ

बिल
थानेदार
के नाम
कटवाओ

शासन के
जासूसों के
आँख में
घोड़ों के
आँख की
पट्टियाँ
दोनो ओर
से लगवाओ

सामने
से हरी
घास
दिखवाओ

सब कुछ
चैन से
है बताओ

बैचेनी की
खबरों को
घास के
नीचे दबवाओ

‘उलूक’
की मानो
और
कोशिश करो

लिंगदोह
के लिये
दो गज
जमीन का
इंतजाम
करवाओ

पर पहले
पता तो
करवाओ
लिंगदोह
कौन है ?

चित्र साभार: www.christianmessenger.in

बुधवार, 23 सितंबर 2015

भगदड़ मच जाती है जब मलाई छीन ली जाती है

चींंटियाँ बहुत कम
अकेली दौड़ती
नजर आती है
चीटियाँ बिना वजह
लाईन बना कर
इधर से उधर
कभी नहीं जाती हैं
छोटी 
चींंटियाँ एक साथ
कुछ बड़ी अलग
कहीं साथ साथ
और बहुत बड़ी
कम देखने वाले
को भी दूर से ही
दिख जाती हैं
लगता नहीं कभी
छोटी चींंटियों के दर्द
और गमो के बारे में
बड़ी चीटियाँ कोई
संवेदना जता पाती हैं
चींंटियों की किताब में
लिखे लेख कविताऐं
भी कोई संकेत सा
नहीं दे पाती हैं
चींंटियों के काम
कभी रुकते नहीं है
बहुत मेहनती
होती हैं चींंटियाँ हमेशा
चाटने पर आ गई
तो मरा हुआ हाथी
भी चाट जाती हैं
छोटी चींटियों के
लिये बड़ी चीटियों
का प्रेम और चिंता
अखबार के समाचार
के ऊपर छपे समाचार
से उजागर हो जाती है
पहले दिन छपती है
चींंटियों से उस गुड़ के
बरतन को छीने
जाने की खबर जिसे
लूट लूट कर चींंटियाँ
लाईन चीटियों की
लाईन में रख पाती हैं
खबर फैलती है
चींंटियों में मची भगदड़ की
दूसरे किस्म की चीटियों के
कान में पहुँच जाती है
दूसरे दिन दूसरी चींंटियाँ
पहली चींंटियों की मदद
के लिये झंडे लहराना
शुरु हो जाती है पूछती हैं
ऐसे कैसे सरकार
अपनी चींंटियों में
भेद कर जाती है
इधर भी तो लूट ही मची है
चींंटियाँ ही लूट रही हैं
उधर की चींंटियों को
गुड़ छीन कर दे देने
का संकेत देकर सरकार
आखिर करना क्या चाहती है
ये सब रोज का रोना है
चलता हुआ खिलौना है
चाबी भरने की याद
आती है तभी भरी जाती है
कुछ समझ में
आये या ना आये
एक बात पक्की
सौ आने समझ में आती है
लाईन में लगी चींंटियों
की मदद करने लाईन
वाली चींंटियाँ ही आती है
लाईन से बाहर दौड़ भाग
कर लाईन को देखते
रहने वाली चींंटियाँ
गुड़ की बस खुश्बू दूर से
ही सूँघती रह जाती हैं ।

चित्र साभार: www.gettyimages.com

सोमवार, 21 सितंबर 2015

दुकान के अंदर एक और दुकान को खोला जाये

जब दुकान
खोल ही
ली जाये
तो फिर क्यों
देखा जाये
इधर उधर
बस बेचने की
सोची जाये

दुकान का
बिक जाये
तो बहुत
ही अच्छा
नहीं बिके
अपना माल
किसी और
का बेचा जाये

रोज उठाया
जाये शटर
एक समय
और
एक समय
आकर गिराया
भी जाये

कहाँ लिखा है
जरूरी है
रोज का रोज
कुछ ना कुछ
बिक बिका
ही जाये

खरीददार
अपनी जरूरत
के हिसाब से
अपनी बाजार की
अपनी दुकान पर
आये और जाये

दुकानदार
धार दे अपनी
दुकानदारी
की तलवार को
अकेला ना
काट सके
अगर बीमार
के ही अनार को
अपने जैसे
लम्बे समय के
ठोके बजाये
साथियों को
साथ में लेकर
किसी खेत
में जा कर
हल जोत
ले जाये

कौन देख रहा है
क्या बिक रहा है
किसे पड़ी है
कहाँ का
बिक रहा है
खरीदने की
आदत से
आदतन
कुछ भी
कहीं भी
खरीदा जाये

माल
अपनी दुकान
का ना बिके
थोड़ा सा
दिमाग लगा कर
पैकिंग का
लिफाफा
बदला जाये

मालिक की
दुकान के
अंदर खोल
कर एक
अपनी दुकान
दुकान के
मालिक का
माल मुफ्त में
एक के साथ एक
बेचा जाये

मालिक से
की जाये
मुस्कुरा कर
मुफ्त के बिके
माल की बात

साथ में
बिके हुऐ
दुकान के
माल से
अपनी और
ठोके पीटे
साथियों की
पीछे की
जेब को
गुनगुने नोटों
की गर्मी से
थोड़ा थोड़ा
रोज का रोज
गुनगुना
सेका जाये ।

चित्र साभार: www.fotosearch.com

रविवार, 20 सितंबर 2015

देखा कुछ ?

देखा कुछ ?
हाँ देखा
दिन में
वैसे भी
मजबूरी में
खुली रह जाती
हैं आँखे
देखना ही पड़ता है
दिखाई दे जाता है
वो बात अलग है
कोई बताता है
कोई चुप
रह जाता है
कोई नजर
जमीन से
घुमाते हुऐ
दिन में ही
रात के तारे
आकाश में
ढूँढना शुरु
हो जाता है
दिन तो दिन
रात को भी
खोल कर
रखता हूँ आँखें
रोज ही
कुछ ना कुछ
अंधेरे का भी
देख लेता हूँ
अच्छा तो
क्या देखा ? बता
क्यों बताऊँ ?
तुम अपने
देखे को देखो
मेरे देखे को देख
कर क्या करोगे
जमाने के साथ
बदलना भी सीखो
सब लोग एक साथ
एक ही चीज को
एक ही नजरिये
से क्यों देखें
बिल्कुल मत देखो
सबसे अच्छा
अपनी अपनी आँख
अपना अपना देखना
जैसे अपने
पानी के लिये
अपना अपना कुआँ
अपने अपने घर के
आँगन में खोदना
अब देखने
की बात में
खोदना कहाँ
से आ गया
ये पूछना शुरु
मत हो जाना
खुद भी देखो
औरों को भी
देखने दो
जो भी देखो
देखने तक रहने दो
ना खुद कुछ कहो
ना किसी और से पूछो
कि देखा कुछ ?

चित्र साभार: clipartzebraz.com

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

भाई कोई खबर नहीं है खबर गई हुई है

सारे के सारे
खबरची
अपनी अपनी
खबरों के साथ
सुना गया है
टहलने चले गये हैं
पक्की खबर नहीं है
क्योंकि किसी को
कोई भी खबर बना
कर नहीं दे गये हैं
खबर दे जाते तब भी
कुछ होने जाने
वाला नहीं था
परेशानी बस
इतनी सी है
कि समझ में
नहीं आ पा रहा है
इस बार ऐसा
कैसे हो गया
खबर दे ही
नहीं गये हैं
खबर अपने
साथ ही ले गये हैं
अब ले गये हैं तो
कैसे पता चले
खबर की खबर
क्या बनाई गई है
कैसे बनाई गई है
किस ने लिखाई है
किस से लिखवाई गई है
किसका नाम
कहाँ पर लिखा है
किस खबरची को
नुकसान हुआ है
और किस खबरची को
फायदा पहुँचा है
बड़ी बैचेनी हो गई है
जैसे एक दुधारू भैंस
दुहने से पहले खो गई है
‘उलूक’ सोच में हैं तब से
खाली दिमाग को
अपने हिला रहा है
समझ में कभी भी
नहीं आ पाया जिसके
सोच रहा है
कुछ आ रहा है
कुछ आ रहा है
बहुत अच्छा हुआ
खबर चली गई है
और खबरची के
साथ ही गई है
खबर आ
भी जाती है
तब भी कहाँ
समझ में
आ पाती है
खबर कैसी
भी हो माहौल तो
वही बनाती है ।

चित्र साभार: www.pinterest.com

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

औरों के जैसे देख कर आँख बंद करना नहीं सीखेगा किसी दिन जरूर पछतायेगा

थोड़ा कुछ सोच कर
थोड़ा कुछ विचार कर
लिखेगा तो शायद
कुछ अच्छा कभी
लिख लिया जायेगा
गद्य हो या पद्य हो
पढ़ने वाले के शायद
कुछ कभी समझ
में आ ही जायेगा
लेखक या कवि
ना भी कहा गया
कुछ लिखता हैं तो
कम से कम कह
ही दिया जायेगा
देखे गये तमाशे
को लिखने पर
कैसे सोच लेता है
कोई तमाशबीन
आ कर अपने ही
तमाशे पर ताली
जोर से बजायेगा
जितना समझने
की कोशिश करेगा
किसी सीधी चीज को
उतना उसका उल्टा
सीधा नजर आयेगा
अपने हिसाब से
दिखता है अपने
सामने का तमाशा
हर किसी को
तेरे चोर चोर
चिल्लाने से कोई
थानेदार दौड़ कर
नहीं चला आयेगा
आ भी गया गलती से
किसी दिन कोई
भूला भटका
चोरों के साथ बैठ
चाय पी जायेगा
बहुत ज्यादा उछल
कूद करेगा ‘उलूक’
इस तरह से हमेशा
लिखना लिखाना
सारा का सारा
धरा का धरा
रह जायेगा
किसी दिन
चोरों की रपट
और गवाही पर
अंदर भी कर
दिया जायेगा
सोच कर लिखेगा
समझ कर लिखेगा
वाह वाह भी होगी
कभी चोरों का
सरदार इनामी
टोपी भी पहनायेगा ।

चित्र साभार: keratoconusgb.com

सोमवार, 14 सितंबर 2015

‘उलूक’ का बुदबुदाना समझे तो बस बुखार में किसी का बड़बड़ाना है

ना किसी को
समझाना है
ना किसी को
बताना है
रोज लिखने
की आदत है
बही खाते में
बस रोज का
हिसाब किताब
रोज दिखाना है
किसी के देखने
के लिये नहीं
किसी के समझने
के लिये नहीं
बस यूँ हीं कुछ
इस तरह से
यहीं का यहीं
छोड़ जाना है
होना तो वही है
जो होना जाना है
करने वाले हैं
कम नहीं हैं
बहुत बहुत हैं
करने कराने
के लिये ही हैं
उनको ही करना है
उनको ही कराना है
कविता कहानी
सुननी सुनानी
लिखनी लिखानी
दिखना दिखाना
बस एक बहाना है
छोटी सी बात
घुमा फिरा कर
टेढ़े मेढ़े पन्ने पर
कलम को भटकाना है
हिंदी का दिन है
हिंदी की बात को
हिंदी की भाषा में
हिंदी के ही कान में
बस फुसफुसाना है
आशा है आशावाद है
कुछ भी नहीं है
जो बरबाद है
सब है बस आबाद है
महामृत्युँजय मंत्र
का जाप करते रहे
हिंदी को समझाना है
‘उलूक’ अच्छा जमाना
अब शर्तिया हिंदी
का हिंदी में ही आना है ।

चित्र साभार: www.cliparthut.com

रविवार, 13 सितंबर 2015

कभी हिसाब लगायें अपने अंदर इंसानियत कितने दिन चलेगी कब तक कितनी बचेगी

अचानक कौंधा
कुछ औंधे लेटे हुऐ
जमीन पर घरेलू
कुत्ते के पास
मन हुआ कुछ
चिंता कर
उपाय खोजा जाये
इंसान की घटती
हुई इंसानियत पर
इस से पहले
कि इंसानियत ही
इतिहास हो जाये
कुछ देर के लिये सही
कुछ बातें खाली यूँ ही
दिल बहलाने के लिये
झूठ मूठ के लिये ही
खुद से कह ली जायें
समझ में आ चुकी
अब तक की सारी
बातें पोटलियों में बधीं
खुद के अंदर गाँठे खोल
कर फिर से देखी जायें
रोज की इधर की उधर
और उधर की इधर
करने की आदत से
थोड़ी देर के लिये ही सही
कुछ तौबा कर ली जाये
इस सब में उलझते
उलझते टटोला गया
खुद के ही अंदर
बहुत कुछ भीतर का
पता ही नहीं चला कैसे
और कब बालों वाला
कुछ जानवर जैसा
आदमी हो चला और
समझ में आने लगा
पास में बैठा हुआ
घरेलू जानवर कितना
कितना इंसान क्यों
और कैसे हो चला
थोड़ा सा धैर्य बंधा
चलो इधर खत्म भी
हो जाती है इंसानियत
तब भी कहीं ना
कहीं तो बची रहेगी
किसी मोहनजोदाडो‌
जैसी खुदाई में ‘उलूक’
की राख में ना सही
कुत्ते की हड्डी में
शर्तिया कुछ ना कुछ
तो पक्का ही मिलेगी ।

चित्र साभार: schools-demo.clipart.com

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