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शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

विवेकानन्द जी आपसे कहना जरूरी है बधाई हो उस समय जब आपकी सात लाख की मूर्ति हमने अपने खेत में आज ही लगाई हो

अखबार खरीद कर
रोज घर लाने की
आदत पता नहीं
किस दिन तक
यूँ ही आदत
में शामिल रहेगी
पहले दिन से ही
पता रहती है जबकि
कल किसकी कबर
की खबर और
किस की खबर
की कबर बनेगी
मालूम रहता है
आधा सच हमेशा
आधे पन्ने में
लिख दिया जाता है
वैसे भी पूरी बात
बता देने से
बात में मजा भी
कहाँ रह जाता है
एक पूरी कहानी
होती है
एक मंदिर होता है
और वो किसी
एक देवता के
लिये ही होता है
देवता की खबर
बन चुकी होती है
देवता हनीमून से
नहीं लौटा होता है
मंदिर की भव्यता
के चर्चे से भरें होंगे
अखबार ये बात
अखबार खरीदने
वाले को पता होता है
मंदिर बनने की जगह
टाट से घिरी होती है
और एक पुराना
कैलैण्डर वहाँ
जरूर टंका होता है
वक्तव्य दर वक्तव्य
मंदिर के बारे में भी
और देवता
के बारे में भी
उनके होते हैं
जिनका देवताओं
पर विश्वास कभी
भी नहीं होता है
रसीदें अखबार में
नहीं होती हैं
भुगतान किस को
किया गया है
बताना नहीं होता है
किस की
निविदा होती है
किस को
भुगतान होता है
किस का
कमीशन होता है
किस ने
देखना होता है
कुत्तों की
जीभें होती हैं
बिल्लियों का
रोना होता है
‘उलूक’
तेरी किस्मत है
तुझे तो हमेशा
ही गलियों में
मुहँ छिपा कर
रोना होता है |

चित्र साभार : http://marialombardic.blogspot.com/

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

कभी कुछ भी नहीं होता है कहने के लिये तब भी कुछ कुछ कह दिया जाता है

महीने के अंतिम साँस
लेने की आवाजें
आनी शुरु होती ही हैं
अंतिम सप्ताह के
अंतिम दिनों में
और मरता भी है
महीना अठाईस
से तीस नहीं
भी तो पक्का
सौ प्रतिशत
इक्तीस दिनों में
लिखने वाले
कई होते हैं
रसोई के खाली
होते जा रहे
डिब्बों पर ध्यान
नहीं देते हैं
भूख मर
भी जाती है
खाली बीड़ी के
बंडल के खोल
रह जाते हैं
बीड़ी धुआँ हो कर
हवा में उड़ जाती है
बंडल की राख
खाली चाय के
टूटे कपों की
तलहटी में
चिपक जाती है
जितनी बड़ती
है बैचेनी
उतनी कलम
पागल होना
शुरु हो जाती है
कलम का पागल
हो जाना सबको
नजर भी
नहीं आता है
ऐसे ऐरे गैरे
लिखने वालों के बीच
पागलों का डाक्टर
भी नहीं जाता है
एक नहीं कई कई हैं
गली गली में हैं
मुहल्ले मुहल्ले में
जिनके हल्ले हैं
अच्छा है चिट्ठों के
बारे में उनको
कोई नहीं बताता है
‘उलूक’ परेशान
मत हो लगा रह
किसी को पता नहीं है
तू यहाँ रोज आता है
रोज जाता है
चिट्ठागिरी है
कोई शेयर बाजार नहीं है
लिखने लिखाने का भाव
ना चढ़ता है ना ही
कोई उतार पाता है
इधर राशन
खत्म होता है
हर महीने महीना
पूरा होने से कुछ दिन
पहले ही हमेशा
उधर लिखने वालों के
बाजार में एक शब्द
के साथ कई शब्दों को
मुफ्त में दिया जाता है
चिट्ठागिरी है कोई
दादागिरी नहीं है
ज्यादा पता भी नहीं है
अभी लोगों को
तब तक जब तक
यहाँ भी निविदाओं
को आमंत्रित नहीं
किया जाता है ।

चित्र साभार: juiceteam.wordpress.com

बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

दो शादी करने के भी होते हैं फायदे कभी कभी छठ पूजा ने इतना तो समझाया

छठ पूजा
पर खबर
चल रही थी
मतलब की बात
कुछ भी नहीं
निकल रही थी
अचानक सूत्रधार
ने कुछ
ऐसा बताया
कान पहले
दायाँ हिला
फिर बायाँ भी
ऐसा लगा कुछ नया
सा हाथ में
फिसल कर
चला आया
इतना कुछ
इधर उधर का
लिखा पढ़ा
कहीं कुछ भी
काम में नहीं आया
तब जाकर कुछ
सोच कर कुछ
नया सीखने
पढ़ने का
मन बनाया
शादी हुऐ
हो गये
इतने बरस
इतनी छोटी सी
बात पर ध्यान
नहीं जा पाया
सूर्य देवता
की भी थी
दो पत्नियाँ
किसी भी पत्नी
ने अपने पति
को इस बात
को पता नहीं
क्यों नहीं बताया
इतनी उर्जा
इतनी शक्ति
कैसे इस सब
के बाद भी
जमा किया
सूरज अपने में
साथ साथ सारी
सृष्टि में भी
बाँट पाया
कभी भी नहीं
हुआ ऐसा
सुबह किसी दिन
थोड़ा देर से हो
निकल कर आया
महान देवता सूर्य
और उनकी
महान पत्नियाँ
ऊषा और प्रत्यूषा
को नमन करते हुऐ
छठ पूजा के
मौके पर
उलूक
ने भी सम्मान में
हाथ जोड़ कर
अपना सर झुकाया
शायद आ जाती हो
शक्ति बहुत
एक के बाद
दूसरी करने पर
ये बात जरूर
इस बात से
समझ पाया
बस केवल
दूसरी करने की
शक्ति और हिम्मत
ही नहीं जुटा पाया
हर पर्व कुछ ना
कुछ समझाता है
कौन बताता है
किसकी समझ में
क्या है आया।

चित्र साभार:
www.royalty-free-clip-art-of.com

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

आये आये देर से भी आये तो भी दुरुस्त ही आये आये तो सही चाहे कुछ भी ना कह जाये


अभी भी देर
नहीं हुई
देर कभी भी
नहीं होती
जब भी समझ
में आ जाये
तभी सुबह
हो जाये
पर रुका कहाँ
कहाँ जाये
किसके लिये
रुका जाये
कहाँ जरूरी है
चलते चलना
कहाँ जरूरी है
कुछ कुछ रुकना
कुछ देर के
लिये ही सही
बस बिना बात
यूँ ही ठहर
लिया जाये
पूछा भी
किससे जाये
कौन सही बताये
कई पीढ़ियाँ
सामने ही  अपने
गुजरती चली जायें
रुकी हुई कहीं भी
कोई भी नहीं दिखाये
सब कुछ चलता
ही चला जाये
चलना ही सही
रुकना है नहीं
किताब में भी
लिखा नजर आये
गिरता भी है
कहीं कोई
किसी रास्ते
पर कहीं
कोई नहीं बताये
फलसफा जिंदगी का
एक खोटा सिक्का
कभी सीधा गिरे
कभी उल्टा हो जाये
गलतफहमियाँ
बनी रहें
जिसका जैसा
मन कर वैसा
समझ ले जाये
कोई उधर जा कर
उसका पढ़े
कोई इधर आ कर
इधर का पढ़ ले जाये
क्या फर्क पढ़ना है
किसी की समझ में
अगर कुछ भी
ना आ पाये
आना जाना बना रहे
रोज ना भी सही
दो चार दिन बाद
ही आ जाये
रुकना मना है
आ जाये अगर
तो याद करके
बिना भूले भटके
चला भी जाये ।

चित्र साभार: www.instantfundas.com

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

दिमाग का भार याद रख और दिल का हलका फूल मत भूल

अपने भारी हो गये
सिर को हलका
करने के लिये
अच्छा रास्ता है
रास्ते पर ला
कर रख देना
बेकार पड़े हुऐ
पत्थर की तरह
आने जाने वालों
के देखने समझने
के लिये और
कुछ के ठोकर
खाने के लिये भी
सब करते हैं
अपने अपने
हिसाब से
कुछ के छोटे
मोटे कंकड़
कुछ के थोड़े बड़े
कुछ के तेरे
जैसे अझेल
अब किया
क्या जाये
माना कि
जरूरी होता है
बोझ कम कर लेना
थोड़ा थोड़ा ही सही
पूरा का पूरा नहीं भी
पर कभी कभी
दूसरों के बारे में भी
सोच लेना इंसानियत
का एक नियम
तो होता ही है
माना कि गंगा
साफ कर लेने
की सोच लेना
सबके बस में
नहीं होता है
फिर भी अपने
घर की नालियाँ
और उसके बहाव
को बाधित करते
कचरे के टुकड़े मुकड़े
उठा कर किनारे
रख लेना भी नियम
में ही आता है
छोटा ही सही
च्यूइंगम को
खींच कर लम्बा
कर दिया हो तो
वापस मुँह की
ओर भी ले जा लेना
कभी कभी सही
होता है यानि कि
सिर पर भार लेना
भी ठीक और उसे
कभी अपनी जगह
पर रहने देकर
दिल की भी
एक छोटी सी बात
कर लेने में भी
कोई हर्ज नहीं है
है ना ।

चित्र साभार: http://www.shutterstock.com

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

कहीं कोई किसी को नहीं रोकता है चाँद भी क्या पता कुछ ऐसा ही सोचता है

भाई अब चाँद
तेरे कहने से
अपना रास्ता
तो बदलेगा नहीं
वहीं से निकलेगा
जहाँ से निकलता है
वहीं जा कर डूबेगा
जहाँ रोज जा
कर डूबता है
और वैसे भी
तू इस तरह से
सोचता भी क्यों है
जैसा कहीं भी
नहीं होता है
रोज देखता है
आसमान के
तारों को
उसी तरह
टिमटिमातें हैं
फिर भी तुझे
चैन नहीं
दूसरी रात
फिर आ जाता है
छत पर ये सोच कर
कि तारे आज
आसमान के
किनारे पर कहीं होंगे
कहीं किनारे किनारे
और पूरा आसमान
खाली हो गया होगा
साफ साफ दिख
रहा होगा जैसे
तैयार किया गया हो
एक मैदान कबड्डी
के खेल के लिये
फिर भी सोचना
अपने हिसाब से
बुरा नहीं होता है
ऐसा कुछ
होने की सोच लेना
जिसका होना
बहुत मुश्किल भी
अगर होता है
सोचा कर
क्या पता किसी दिन
हो जाये ऐसा ही कुछ
चाँद आसमान का
उतर आये जमीन पर
तारों के साथ
और मिलाये कहीं
भीड़ के बीच से
तुझे ढूँढ कर
तुझसे हाथ
और मजाक मजाक
में कह ले जाये
चल आज से तू
चाँद बन जा
जा आसमान में
तारों के साथ
कहीं दूर जा
कर निकल जा
आज से उजाला
जमीन का जमीन
के लिये काम आयेगा
आसमान का मूड
भी कुछ बदला
हुआ देख कर
हलका हो जायेगा ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

आशा का एक दिया जलाना है जरूरी सोच में ही जलायेंगे

एक ही सच
से हट कर
कभी सोचें
कुछ देर के
लिये ही सही
जरूरी है
सोचना
एक दिया
और उससे
बिखरती रोशनी
अपने ही
अंदर कहीं
पालना और
बचाना भी
सोच की ही
हवा के थपेड़ों से
बहुत सारे हों
बहुत रोशनी हो
जरूरी नहीं है
एक ही हो
छोटा सा ही हो
मिट्टी से बना
ना भी हो
तेल भी नहीं
और बाती
भी नहीं हो
बस जलता
हुआ हो
सोच की
ही लौ से
सोच की ही
रोशनी हो
जरूरी है
झूठ से भरे
बाहर के दिये
बेचते हुऐ
रोशनी हर जगह
दीपावली आयेगी
दीपावली जायेगी
बाजार दीपों
के जलेंगे
रोशनी के लिये
रोशनी में ही
रोशनी से बिकेंगे
समेट कर रोशनी
के धन को कुछ
रोशनी से
चमक उठेंगे
रोशनी सिमट जायेगी
रोशनी में ही कहीं
कुछ देर में ही
दिये भी समेटे जायेंगे
बहुत जरूरी है
दिया अंतर्मन का
जला रहना
अगले साल की
दीपावली में
नहीं तो शायद
दिये जलाना भी
क्या पता
भूल जायेंगे
दिया एक
सोच का
सोच में जला
रहना जरूरी है बहुत
जलायेंगे तो ही
समझ पायेंगे ।

चित्र साभार: www.canstockphoto.com

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

दीपावली हो गई उस पर कुछ शब्द लिखने को कहा गया ‘उलूक’ से आदतन ऐसा वैसा ही कुछ कहा गया

कान फोड़ शोर
ऐसा क्या हो गया
एक दिन अगर
रात भर रोता
भी रहा मोर
 तेज रोशनी में
शर्माते रहे गरीब
कुछ मिट्टी के दिये
 किसने कहा था
पहुँच जायें
बिन बुलाये मेहमान
की तरह एक बड़े शहर
बिना कुछ पिये
नींद नहीं आई रात भर
बहुत देर में हुई जैसे भोर
मगर सपने दिखे
बहुत दिखे और
दिखे घनघोर
 घमासान युद्ध
का आभास हुआ
हर तरफ था
दम घोंटता हुआ धुआँ
बंद होती लगी
एक बूढ़े बीमार
को अपनी साँस
पता भी नहीं चला
किसी को रात भर
रहा है कोई बगल
के मकान में खाँस
गायब हो चुकी
नींद रात भर
के लिये खुद ही
खोज रही हो जैसे
कहीं शांत दो चार आँख
सोने के लिये
पल भर के लिये
डरे हुऐ पक्षी
और जानवर
देर से उठा सूरज
भी जैसे पूछ रहा हो
ठीक ठाक तो
हो ना आप
मान्यवर
लक्ष्मी बम पर
चिपके हुऐ
लक्ष्मी के चित्र
फूटते रहे रातभर
उड़ती रही लक्ष्मी
भी टुकड़े टुकड़े होकर
दीपावली मंगलमयी
रही हमेशा रहती है
अखबार में रहती है
हमेशा कुछ
अच्छी खबर और
दूरदर्शन पर
अच्छी बात की
अच्छी रिपोर्टिंग
भी होती है
‘उलूक’ की आदत है
अच्छी बात की
जेब में भी
कुछ ना कुछ बुरा
संभालना
उससे पूछ्ते
ही क्यों हैं
पता होता है जब
उसको आता ही है
बस कुछ में से
कुछ नहीं हमेशा
निकालना ।

चित्र सभार गूगल




गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

जलते हुऐ दिये को पड़ गये कुछ सोच देख कर बहुत सारी अपने आस पास एक दिन रोशनियाँ

एक किनारे में
खड़ा एक भीड़ के
देखता हुआ
अपनी ही जैसे
एक नहीं कई
प्रतिलिपियाँ
और आस पास ही
उसी क्षण कहीं
खुल रही हों कई
सालों से बंद
पड़ी कुछ
खिड़कियाँ
कुछ कुछ सपने
जैसे ही कुछ
कुछ सामने
से ही उड़ती
हुई रंगबिरंगी
तितलियाँ
रोज तो दिखते
नहीं कभी
इस तरह के
दृश्य सामने से
एक सच की तरह
चिकोटी काट कर
हाथ में ही अपने
खुद के देख
रही थी उंगलिया
इसी तरह खड़ा
सोच में पड़ा
बहुत देर से
समझने के लिये
आखिर क्यों
हूँ यहाँ
किसलिये
किसके लिये
पूछ बैठा यूँ ही
बगल के ही
किसी से
अपने ही जैसे से
मुस्कुराहट
चेहरे पर लिये
बिखरते हुऐ
हँसी जैसे मोती
बिखर रहे हों
कहीं से कहीं
अरे सच में नहीं
जानते क्या
खुद को भी नहीं
पहचानते क्या
हम ही तो दिये हैं
 रोशनी के लिये हैं
आओ चले साथ
साथ एक ही दिन
यूँ ही जलें साथ
साथ एक ही दिन
रोशन करें
सारे जहाँ को
बाँटते चलें
जरूरत की सबको
सबके लिये
कुछ रोशनियाँ
कहाँ खुलती हैं रोज
खुली हैं आज
चारों ही तरफ
कुछ बंद खिड़कियाँ
दिये हैं हम
दिये हो तुम
दिये के खुद के लिये
जरूरी भी नहीं
होती हैं रोशनियाँ ।

चित्र साभार: www.dreamstime.com

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

दीप जलायें सोच में आशा की रोशनी के परेशानियों को उड़ायें मौज में हजूर इस बार

रोशनी का
त्यौहार
विज्ञापनों से
पटे हुऐ अखबार
दुकाने सजी हुई
भरा हुआ बाजार
सब कुछ पहुँच में
खाली जेबों
के बावजूद
खरीदने में लगा
सब कुछ
खरीददार
मोबाइल में
संदेशों की
भरमार
गली गली
खुले बैंक
पैदल चलने
में लगे कुछ
बेवकूफ
सड़कें पटी
गाड़ियों से
आसानी से
मिले घर
पर ही उधार
दुकान और
बाजार से अलग
आकर्षक सुंदर
और खीँचता
अपनी तरफ
डॉट काम का
कारोबार
मँगा लीजिये
कुछ भी कहीं भी
घर बैठे बैठे
जरूरत नहीं
भेज दीजिये
बटुऐ को
तड़ी पार
तेज रोशनी
सस्ते दीप
विज्ञान का
चमत्कार
मेड इन चाईना
प्रयोग कीजिये
फिर फेंक दीजिये
कूड़े की चिंता
दिमाग से कर
दीजिये बाहर
झाडू‌ लेकर
टाई कोट वाले
भी खड़े हैं
नहीं होते शर्मसार
मेक इन इँडिया
आँदोलन करने
के लिये रहें तैयार
स्वदेशी खरीदने
का हल्ला मचायें
जलूस निकाले
हर जगह बार बार
रोशनी सरसों के
तेल से भरे दीपों
की सोच में लायें
शाँति और सुख
की आशा से
रहें सरोबार
कथनी और करनी
के अंतर को
आत्मसात
कर लेने के
जतन करें
एक हजार
दीपावली मौज
में मनायें सरकार
शुभकामनाऐं
सभी को
ढेर सारी
मित्रों सहित
सपरिवार ।
चित्र साभार: http://www.shutterstock.com

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

ये सब चंद्रमा सुना है कराता है एक ही चीज को दिखा कर एक को कवि एक को पागल बनाता है

आदरणीय देवेंद्र पाण्डेय जी ने कहा,

“आप के लेखन की निरंतरता प्रभावित करती है”

और ठीक उसी समय कहीं लिखा देखा आदरणीय ज्योतिष सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी जी कह रहे हैं :-

“एक होता है साहित्‍यकार और एक होती है साहित्‍य की दुकान। अब चूंकि मैं ज्‍योतिषी हूं तो ज्‍योतिष की बात भी कर लेते हैं। साहित्‍यकारों में एक होते हैं कवि, मैंने आमतौर पर कवियों का चंद्रमा खराब ही देखा है। बारहवें भाव में चंद्रमा हो तो जातक एक कॉपी छिपाकर रखता है, जिसमें कविताएं भी लिखता है”।

मुझे भी महसूस हुआ
कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है ?
आप का चंद्रमा कहाँ है
आपने कभी देखा है ?
*******************
कोशिश बहुत होती है
हाथ रोकने की
कि ना लिखा जाये
इस तरह
रोज का रोज
सब कुछ
और कुछ भी
पर चंद्रमा का
मुझको कुछ
पता नहीं था
किसी ने समझाया
भी नहीं था कभी
ना ही मेरे
चंद्रमा को ही
वो तो अच्छा रहा
जब देख बैठा
मैं भी भाव उसका
बारहवें भाव पर
तो नहीं था
ना ही नजर थी
उसकी उस भाव पर
जहाँ होने से ही
कोई कवि हो
बैठता था
वैसे होता भी कैसे
मेरे खानदान
में तक जब कोई
कवि कभी भी
पैदा नहीं हुआ था
छिपा कर रखी हो
कहीं कोई कापी
किसी ने कभी भी
ऐसा भी नहीं था
हाँ दुकान एक
जरूर पता नहीं
कब और कैसे
किस जुनून में
खोल बैठा था
वैसे किसी ने
बेचने के लिये भी
कभी कुछ
नहीं कहा था
बेच भी नहीं पाया
कुछ भी किसी को
ग्राहक कोई भी
कहीं भी कभी भी
मिला ही नहीं था
अच्छा हुआ
चंद्रमा बाराहवाँ
जो नहीं था
उसे भी पता था
मुझे कभी भी
कवि होना नहीं था
पागल होने ना होने
का पता नहीं था
ज्योतिष ने
सब कुछ भी तो
कह देना नहीं था ।

चित्र साभार: http://www.picturesof.net

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

जलायें दिये पर रहे ध्यान इतना कूड़ा धरा का कहीं बच ना पाये

दीपावली का
त्योहार
शुरु हो चुका है
चिंताऐं अब
उतनी नहीं हैं
जगह जगह
पहले से ही
रोशनी है
आतिशबाजी
हो चुकी है
कहीं कोई
धुआँ नहीं है
पर्यावरण
अपनी हिफाजत
खुद कर रहा है
उसको भी
पहले से ही
सब कुछ पता है
लक्ष्मी नारायण
भी बहुत व्यस्त
नजर आ रहे हैं
धन के रंग को
बदलने का
इंतजाम कुछ
करवा रहे हैं
सफेद सारे
एक जगह पर
और काले को
दूसरी जगह पर
धुलवा रहे हैं
काले और सफेद
पैसे का भेद भाव
भी अब नहीं
रह गया है
इस दीपावली पर
एक नया संशोधन
ऊपर से ही
बनवा कर
भिजवा रहे हैं
मुद्दों की बात
करना भी बेमानी
होने जा रहा है
समस्याओं को
समस्याओं का
ही जल्लाद
अपनी ही रस्सी से
फाँसी लगा रहा है
श्रीमती जी
बहुत खुश हैं
उनकी राशन की
दुकान की पर्ची
‘उलूक’
भिजवा रहा है
खाने पीने के
सामान कम लिखे
नजर आ रहे हैं
दर्जन भर झाड़ू
थोक में मंगवा रहा है
दीये इस बार
लेने की जरूरत
नहीं पड़ेगी
एक झाड़ू के साथ
बाराह दीये
कम्पनी का आदमी
अपनी ओर से
भिजवा रहा है ।

चित्र साभार: गूगल क्लिप आर्ट ।

रविवार, 19 अक्तूबर 2014

अंधेरा ही उजाले का फायदा अब उठाता है

अंधेरा बहुत
खुश है
पहचानता है
रोशनी के
त्यौहार
की कदमों
की आहट को
समय के साथ
बदल लेनी
चाहिये सोच
ऐसा कहा
जाता है
और सोचने
वाला
सोचता ही
रह जाता है
अपनी सोच को
समय की सोच से
आगे पीछे करने
के फेर में
सब कुछ वहीं
रह जाता है
जहाँ होता है
इस सब के बीच
अंधेरा बदल
लेता है खुद
को भी और
बदलता चला
जाता है
सोच को भी अपनी
अब अंधेरा
डरता नहीं है
उजाले से
भागता भी
नहीं है
अंधेरे ने
सीख लिया है
जीना और
कर लेना
समझौता
हालात से
अंधेरा अब
खुद दीपावली
मनाता है
दिये जलाता है
रोशनी होती है
चारों तरफ
अंधेरा छुपा
लेता है खुद को
और मदद करती है
रोशनी भी उसको
बचाने के लिये
उजाला नहीं
सीख पाया
टिकना अभी भी
आता है और
चला जाता है
अंधेरा मजबूती से
अपनी जगह को
दिन पर दिन
मजबूत कर
ले जाता है
बदल चुका है
अपनी सोच को
समय के साथ
और आज अंधेरा
सबसे पहले
दिया जलाता है ।

चित्र साभार: http://srilankabrief.blogspot.in

शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

घोड़े घोड़े होते हैं गधे गधे होते हैं मुद्दे तो मुद्दे होते हैं वो ना घोड़े होते हैं ना गधे होते हैं

घोड़ों ‌ के पास
भी दिमाग
होता है या नहीं
ऐसा ही कुछ
सोच में आया
उस समय जब
किसी दिन एक
मुद्दा लिखने के
लिये सोचने
का मन बनाया
अब सोच में
क्या किस
के आता है
कौन सा कोई
जा कर
घोड़ों को बताता है
घोड़े ज्यादातर
बहुत शांत स्वभाव
के समझे जाते हैं
शायद इसी कारण
बहुत से लोग
घोड़ों पर चढ़ते
चले जाते हैं
घोड़े भी प्रतिकार
नहीं करते हैं
सवार को उस के
मनमाफिक
सवारी कराते हैं
घोड़ों का जिक्र
हमेशा सम्मान
से किया जाता है
घोड़ा है कहते ही
सामने वाला
कुछ नजर कुछ
गर्दन अपनी
झुकाता है
घोड़े कभी भी
किसी भी मुद्दे पर
कुछ भी नहीं
कहना चाहते हैं
घोड़ों के बीच के
गधे हमेशा
इस बात का
फायदा उठाते हैं
घोड़े ज्यादा
भी होते हैं
फिर भी कुछ
नहीं होता है
दो चार गधे
के बीच में
घोड़ागिरी
सीख जाते हैं
घोड़ों के अस्तबल
के समाचार रोज
ही अखबार वाले
फोटो के साथ
लेकर जाते हैं
अखबार में फोटो
छपती है
गधे ही गधे
नजर आते हैं
वक्तव्य घोड़ों की
सेहत के बारे
में छपता है
गधों के हाथ में
आले नजर आते हैं
घोड़ों के बारे में
सोच कर लिखने
की सोच बैठता है
जिस दिन भी ‘उलूक’
गधे पता नहीं
कैसे मुद्दा
चोर ले जाते हैं
घोड़ों के पास
दिमाग होता है
या नहीं
महत्वपूर्ण बात
नहीं हो पाती है
जब हर जगह
घोड़ों की सरकारें
दो चार गधे
मिल कर चलाते हैं ।

चित्र साभार: http://vecto.rs

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

जब नहीं दिखता है एक ‘ब्लागर’ कभी दूसरे ‘ब्लागर’ को बहुत दिनों तक

होता कुछ नहीं है वैसे
जब नहीं दिखता है
एक ब्लागर को
एक दूसरा ब्लागर यहाँ
जो दिखा करता था
कभी रोज ही
आता और जाता हुआ
यहाँ से वहाँ
और वहाँ से यहाँ
आना और जाना
तो चलता रहता है
इसका और उसके
शब्दों का वहाँ से यहाँ
और यहाँ से वहाँ
एक रोज आता जाता है
एक कभी आता है
एक कभी जाता है
रोज आने जाने
वाले को रोज
आने जाने वालों से
कोई परेशानी
नहीं होती है
परेशानी तब होती है
जब एक रोज
आने जाने वाला
अपने अगल बगल से
रोज आते जाते हुऐ को
बहुत दिनों से
आता हुआ नहीं
देख पाता है
दिन गुजरते हैं
रास्ते में कहीं पर
एक पुराना दिखता है
कहीं एक पुराने
के साथ एक
नया बिकता है
कहीं दो नयों के संग
एक पुराना दिखता है
ढूँढना चाहने वाले
ढूँढते भी हैं
एक का निशान
दूसरे के घर मिलता है
दूसरा किसी तीसरे
के घर कुछ ना कुछ
छोड़ कर चलता बनता है
अब लिखने लिखाने
की दुनियाँ है
यहाँ रोज एक नया
रिवाज कोई ना कोई
कहीं ना कहीं सिलता है
बहुत से नये दरवाजे
बंद होने से शुरु होते हैं
कहीं बहुत पुराना
दरवाजा भी
बहुत दिनों के
बाद खुलता है
याद आती है कभी
किसी की
दिखा करता था
अपने ही आस पास
रोज ही कहीं ना कहीं
बहुत दिनों से
कोई खबर ना कोई
पता मिलता है
देखिये और
ढूँढिये तो कहीं
कहाँ हैं जनाब
आजकल आप
आप ही को
ढूँढने के लिये
‘उलूक’ संदेश
एक लेकर कुछ यूँ
शब्दों के बियाबान
में निकलता है
होता कुछ नहीं है
वैसे जब कई कई
दिनों तक भी
एक ब्लागर को
एक दूसरे ब्लागर
का पता नहीं
भी चलता है ।

चित्र साभार: http://dlisted.com/

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

खुद को खुद बहुत साफ नजर आ रहा होता है लिखा फिर भी कुछ नहीं जा रहा होता है

सब को पता होता है
आसान नहीं होता है
खुद ही लिख लेना
खुद को और दे देना
पढ़ने के लिये किसी
दूसरे या तीसरे को
सब लिखना जानते हैं
लिखते भी हैं
कुछ कम लिखते हैं
कुछ ज्यादा लिखते है
कुछ इसको लिखते हैं
कुछ उसको लिखते हैं
खुद को लिखने की
कितने सोचते हैं
पता नहीं पर
कहीं पर खुद को
लिखते हुऐ
नहीं दिखते हैं
लिखा हुआ
बहुत कुछ होता है
दिखता है
कहा हुआ भी
कम नहीं होता है
सुनाई पड़ता है
खुद पर खुद का
उसमें कितना
कितना होता है
उसे निकाल कर
मापने का कोई
मीटर नहीं होता है
कोई सोचता है
या नहीं पता नहीं
पर कई बार
मन करता है
लिख दिया जाये
सब कुछ
फिर सोच में आता है
कौन पढ़ेगा वो सब
जो किसी के भी
पढ़ने के मतलब
का नहीं होता है
अच्छा होता है
सबका अपना
खाना अपना
पीना होता है
क्या कम नहीं
होता है इस सब
के बावजूद
इसका और
उसका पढ़
लेने का समय
कोई निकाल लेता है
खुद का खुद ही
पढ़ा लिखा जाये
वही सबसे अच्छा
रास्ता होता है
खुदी को कर
बुलंद इतना
खुदा ने यूँ ही
बेकार में नहीं
कहा होता है
खुद पर लिखे पर
खुद से वाह वाह
भी कोशिशों के
बावजूद जब नहीं
कहा जा रहा होता है
उस समय ये
समझ में बहुत
अच्छी तरह आ
रहा होता है 
खुद को पढ़वाने
का शौक रखने वाला
हमेशा खुद को
किसी और से ही
क्यों लिखवा
रहा होता है ।

चित्र साभार: http://www.clker.com/

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

'मोतिया’ तू जा चुका था देर से पता चला था कल नहीं लिख सका था आज लिख रहा हूँ क्योंकि तुझ पर लिखना तो बहुत ही जरूरी है

ख्वाब देखने
में कोई हर्ज
भी नहीं है
ना ही ख्वाब
अपना किसी
को बताने में
कोई लिहाज है
बहुत पुराना है
आज तेरे जाने
के बाद चूँकि
आ रहा
कुछ याद है
मैंने जब जब
तुझे देखा था
मुझे कुछ हमेशा
ही लगा था
कि जैसे कोई
ख्वाब देखना
चाहिये और
जो बहुत ही
जरूरी भी
होना चाहिये
जरूरी जैसे तू
और तेरा
आना शहर को
और शहर से
वापस अपने
गाँव को रोज
का रोज चला
जाना बिना नागा
हमेशा महसूस
होता था जैसे
तुझे यहाँ नहीं
कहीं और होना
चाहिये था
जैसे कई लोग
पहुँच जाते है
कई ऐसी जगहों पर
जहाँ उन्हें कतई
नहीं होना चाहिये
तू भी तो
इंटर पास था
मंत्री वो भी
उच्च शिक्षा का
सोचने में
क्या जाता है
और सच में
मैंने सच में
कई बार जब
तू सड़क पर बैठा
अखबार पढ़
रहा होता था
बहुत गहराई से
इस पर सोचा था
जो लोग तुझे
जानते थे या
जानने का दावा
करते थे उनकी
बात नहीं
कर रहा हूँ
मैं अपनी बात
कर रहा हूँ
तू भी तो
मेरा जैसा ही था
जैसा मैं रोज
कुछ नहीं करता हूँ
तेरी दिनचर्या
मेरी जैसी ही
तो होती थी
हमेशा से
रोज तेरा कहीं
ना कहीं शहर की
किसी गली
में मिलना
तेरी हंसी तेरा
चलने का अंदाज
सब में कुछ ना
कुछ अनोखा
तू बुद्धिजीवी था
ये मुझे सौ आना
पता था अफसोस
मैं सोच सोच कर
भी नहीं हो पाया
कभी भी और
अभी भी मैं
वहीं रह गया
तू उठा उठा और
उठते उठते
कहाँ से कहाँ
पहुँच गया
तेरे चले जाने की
खबर देर से मिली
जनाजे में
शामिल नहीं हुआ
अच्छा जैसा
नहीं लगा
कोई नहीं
तू जैसा था
सालों पहले
वैसा ही रहा
और वैसा ही
उसी तरह से
इस शहर से
चला गया
हमेशा के लिये
तेरी कमी खलेगी
जब रोज कहीं भी
किसी गली में
तू नहीं मिलेगा
पर याद रहेगा
कुछ लोग सच में
बहुत दिनों तक
याद रह जाते हैं
हम उनकी
श्रद्धाँजलि
सभा नहीं
भी कराते हैं
शहर के संभ्रांत
लोगों की भीड़ में
तब भी ।

चित्र साभार: http://www.amarujala.com/news/states/uttarakhand/almora/Almora-89734-113

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

धीरे से लाईन के अंदर चले जाना बस वहीं का रहता है मौसम आशिकाना

साल भी चौदहवां
दिन भी चौदहवा
दसवीं बार आ गया
फिर इस बार
दो बार और आयेगा
अब चौदहवाँ महीना
तो होता नहीं है जो
चौदाह चौदाह चौदाह
भी हो जायेगा
दिमाग लगाने की
जरूरत नहीं है
इस सब में
ये तो बस बात
शुरु करने को एक
शगूफा छोड़ना है
और जो दिमाग है
बस आज वही कुछ
यहाँ नहीं कहना है
इसलिये ऐसा
कह दिया है
नहीं तो कहने को
वैसे भी बहुत
कुछ होता है
भिखारी की फटी
झोली में तक
फिर भी कौन
नजर डालता है
अंदर कुछ नहीं
भी होता है और
बहुत कुछ
होता भी है
सड़क में लाईन
के पीछे या आगे
या बीच में कहीं भी
रहने की आदत
नहीं होने से
यही सब होता है
सब के लिये
सब कुछ सही
होते हुऐ भी
लाईन से बाहर
सड़क के किनारे से
दूर चलने वाले
की तरह काम की
बातें छूट जाती हैं
बाहर से बहुत सी
चीजें नजर आना
शुरु हो जाती हैं
अभी भी सुधर जा
सब की तरह
किसी भी बात को
बुरा मत बता
वो सब जो
हो रहा होता है
सही हो रहा होता है
क्योंकि वो
हो रहा होता है
चैन से चैन लिखने
की भी सोच
बैचेन आत्मा की
तरह खुद को मत नोच
लाईन में चला जा
कहीं से भी
कभी भी
हाँ में हाँ मिला
गाना गा पर
बस झूम बराबर
झूम तक ही
ये नहीं कि
शराबी भी हो जा
चल अब सुधर जा
सड़क होती है
चलने के लिये
किनारे के मोह से
बाहर निकल आ
लिखने को कोई
 मना नहीं कर रहा है
अंदर जा कर देख
लाईन वाला
हर कोई तेरे से
बहुत अच्छा
लिख रहा है ।

चित्र साभार: http://www.clipartof.com/

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

कोई नहीं कोई गम नहीं तू भी यहीं और मैं भी यहीं

साल के दसवें
महीने का
तेरहवाँ दिन

तेरहवीं नहीं
हो रही है कहीं

हर चीज
चमगादड़
नहीं होती है
और उल्टी
लटकती
हुई 
भी नहीं 

कभी सीधा भी
देख सोच
लिया कर

घर से
निकलता
है सुबह

ऊपर
आसमान में
सूरज नहीं
देख सकता क्या

असीमित उर्जा
का भंडार
सौर उर्जा
घर पर लगवाने
के लिये नहीं
बोल रहा हूँ

सूरज को देखने
भर के लिये ही
तो कह रहा हूँ

क्या पता शाम
होते होते सूरज के
डूबते डूबते
तेरी सोच भी
कुछ ठंडी हो जाये

और घर
लौटते लौटते
शाँत हवा
के झौकों के
छूने से
थोड़ा कुछ
रोमाँस जगे
तेरी सोच का

और लगे तेरे
घर वालों को भी
कहीं कुछ गलत
हो गया है

और गलत होने
की सँभावना
बनी हुई है
अभी भी
जिंदगी के
तीसरे पहर से
चौथे पहर की
तरफ बढ़ते हुऐ
कदमों की

पर होनी तो तेरे
साथ ही होती है
‘उलूक’
जो किसी को
नहीं दिखाई देता
किसी भी कोने से
तेरी आँखे
उसी कोने पर
जा कर रोज
अटकती हैं
फिर भटकती है

और तू
चला आता है
एक और पन्ना
खराब करने यहाँ

इस की
भी किस्मत
देश की तरह
जगी हुई
लगती है ।

चित्र साभार: http://www.gograph.com/

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

******एक पुरानी दीवार के पलस्तर को ढकने वाले हैं पुराने फटे कपड़े के दो टुकड़े कर दो नये करने वाले हैं******* संदर्भ: http://uttarakhandsamachar.navinjoshi.in/2014/10/blog-post.html

खबर हवा में
हो तो खुश्बू
खुश्बू? कहना
ठीक नहीं
गंध कहना
सही रहेगा
सड़ी गली
चीजों के साथ
रहते उठते
बैठते आदत
हो जाती है
और दुर्गंध भी
किसी के लिये
एक सुगँध
हो जाती है
अपनी अपनी
नाक से
अपने अपने
हिसाब से सूँघना
हाँ तो मैं
कहते कहते
गंध पर ही
अटक गया
क्या क्या नहीं
होता है अपने ही
आस पास भी
अटकने के लिये
ध्यान बंट
ही जाता है
खबर की गंध थी
आज आ भी गई
टी वी में अखबार में
जगह जगह के
समाचार में
एक फटे पैबंद से
पट चुके कपड़े के
दिन फिर से
फिरने वाले हैं
सरकार तैयार
हो गई है
दो टुकड़े करके
इधर उधर के
दो चार फटे कपड़ों
के साथ जोड़ जुगाड़
कर फिर से
सिलने वाले हैं
जिसे नया कपड़ा
कह कर उसी
पुराने नंगे बदन
को फिर से
ढकने वाले हैं
जिसके कपड़े
एक बार फिर से
आजादी के साठ
दशकों के बाद
काट छाँट करने
के लिये जल्दी
उतरने वाले हैं
बहुत खुश हैं
खुश होने वाले
लिखने वाले का
काम है लिखना
एक दो पन्ने
‘उलूक’ के
बही खाते में
गीले आटे को
पोत पात कर
चिपकने वाले हैं
चीटीं ने कौन
सा उड़ना है
अगर दिखे भी
सामने सामने से
उसके बदन पर
पर निकलने वाले हैं
जुगाड़ियों का
क्या जुगाड़ है
इस सब के पीछे
क्या सोचना
जुगाड़ियों के
दिन फिरते रहते हैं
जुगाड़ो से एक बार
शायद और भी
फिरने वाले हैं
भौंचक्का क्यों
होता है सुन कर
अच्छे दिन देश के
लिये ही जरूरी नहीं हैं
एक फटे कपड़े के
भी दिन फिरने वाले हैं ।

चित्र साभार: http://www.123rf.com/

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

आठ सौंवा पन्ना ‘उलूक’ का बालिकाओं को समर्पित आज उनके अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर

छोटे छोटे फूल
रंग बिरंगे और
कोमल भी
बिखेरते हुऐ
खुश्बू रंग
और खुशियाँ
चारों तरफ
दिखता है
हर किसी को
अपने आस
एक इंद्रधनुष
पहुँचते ही
इस दुनियाँ में
किसे अच्छा
नहीं लगता
कोमल अहसास
अपने पास
जिंदगी की दौड़
शुरु होते
बिना पैरों के
‘ठुमुक चलत
राम चंद्र बाजत
पैजनियाँ’
फिर यही
अहसास
बन जाते हैं
सतरंगी धागे
कलाई के
चारों ओर फिर
एक और
इंद्रधनुषी
छटा बिखेरते हुऐ
सृष्टि अधूरी
होगी समझ में
भी आता है
अनजाने से
किसी पल में
बचपन से लेकर
घर छोड़ते
नमी के साथ
और लौटते
खुशी के पलों में
हमेशा बहुत जल्दी
बढ़ी होती उँचाई
के साथ झिझक
जरूरी नहीं रही
बदलते समय के
साथ मजबूत
किया है इरादों को
सिक्के के दोनो
पहलू भी जरूरी हैं
और उन दोनो का
बराबर चमकीला
और मजबूत होना भी
आज का दिन
रोज के दिन में
बदले सभी दिन
साल के तुम्हारे
यही दुआ है
अपने लिये
क्योंकि खुद की ही
आने वाली पीढ़ियों
की सीड़ियों का
बहुत मजबूत होना
बहुत जरूरी है ।

 चित्र साभार: http://retroclipart.co

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

दस अक्टूबर है आज पागलों का दिन है पागलों को पता है पता नहीं

पागलों का दिन है
सुबह सुबह आज
डाक्टर मित्र
ने बताया
बहुत कुछ
अपना अपना
जैसा लगा
आज का सारा दिन
कल ही रात सुना था
किसी का सपना
मर गया बुखार से
अब सपने को भी
अगर मरना ही था
तो कैंसर से मरता
ऐड्स से मरता
मरा भी तो बुखार से
वैसे भी मरने वाले
सपने बहुत होते हैं
बहुतों के होते हैं
जिनके नहीं
मरने होते हैं
उन्हें पता होते हैं
सपनों को जिंदा
रखना आता है जिन्हें
वहाँ भी साँठ
गाँठ चलती है
बहुत तंदुरुस्त
सपने होते हैं
उन लोगों के और
आज ज्यादातर
लोग यही होते हैं
जिसे बहुमत का
नाम दिया जाता है
अब रोटी के सपने
देखने की कोशिश
करने वाला
कहाँ जानता है ये सब
पेट के सपने ही
मरते सपने होते हैं
उँचे सपने दिमाग
से देखे जाते हैं
और सपनों को
जिंदा रखने के लिये
ही सपने मारे जाते हैं
मरते सपने देखने
वाले पागल होते हैं
और पागलों को
आज के दिन
प्यार देने की
हिदायत दी जाती है
और अच्छा खाना भी
पागलों के दिन की
मुबारकबाद देनी
ही चहिये और वो
आज दी जाती है
सुबह सुबह अखबार
में पूरे पन्ने के
विज्ञापन में भी
बहुत सी बातें
नजर आज ही आती हैं
और पागलों को भी
सभी बातें बताई जाती हैं ।

चित्र साभार: http://www.fotosearch.com

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

क्या किया जाये ऐसे में अगर कोई कहीं और भी मिल जाये

रिश्ते शब्दों के
शब्दों से भी
हुआ करते हैं
जरूरी नहीं
सारे रिश्तेदार
एक ही पन्ने में
कहीं एक साथ
मिल बैठ कर
आपस में बातें
करते हुऐ
नजर आ जायें
आदमी और
उसकी सोच की
पहुँच से दूर
भी पहुँच जाते हैं
एक पन्ने के
शब्दों के रिश्ते
किसी दूसरे के
दूसरे पन्ने की
तीसरी या चौथी
लाईन के बीच में
कहीं कुछ असहज
सा भी लगता है
कुछ शब्दों का
किसी और की
बातों के बीच
मुस्कुराना
कई बार पढ़ने
के बाद बात
समझ में आती
हुई सी भी
लगती है
बस पचता
नहीं है शब्द का
उस जगह होना
जैसे किसी के
सोने के समय
के कपड़े कुछ
देर के लिये
कोई और पहन
बैठा हो
उस समय एक
अजीब सी इच्छा
अंदर से बैचेन
करना शुरु
कर देती है
जैसे वापस
माँगने लगे कोई
अचानक पहने
हुऐ वस्त्र
आँखे कई बार
गुजरती हैं
शब्दों से इसी तरह
कई लाईनों के
बीच बीच में
बैठे हुऐ रिश्तेदारों
के वहाँ होने की
असहजता के बीच
मन करता है
खुरच कर क्यों ना
देख लिया जाये
क्या पता
नीचे पन्ने पर
कुछ और लिखा हुआ
समझ में आसानी
से आ जाये
‘उलूक’ तेरे चश्में में
किस दिन किस
तरह की खराबी
आ जाये
तेरे रिश्तेदार
कौन कौन से
शब्द है और
कहाँ कहाँ है
शायद किसी
की समझ में
कभी गलती
से आ ही जाये।

चित्र साभार: http://www.clipartpanda.com

बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

तालाब में क्यों कूदा नदी में जा कर क्यों नहीं नहा आया

इस पर कुछ
लिख कर जब
उसको पढ़ाया
बत्तीस लाईन
पढ़ने में उसने
बस एक डेढ़
मिनट लगाया
थोड़ा सिर हिलाया
थोड़ा इधर थोड़ा
उधर घुमाया
कुछ देर लगा
जैसे कुछ सोचा
फिर आँखों
को मींचा
दायें हाथ
की अंगुलियों से
अपने बायें कान
को भी खीँचा
ऐनक उतार कर
रुमाल से पोंछा
कंधे पर हाथ
रख कर कुछ
अपनी ओर खींचा
बहुत अपनेपन से
मुँह के पास
मुँह ले आया
फुसफुसा कर
हौले से बस
इतना ही पूछा
बरखुर्दार !
ये सब करना
तुमको किसने
सिखाया
कब से शुरु किया
और ये सब
करने का विचार
तुम्हें कैसे आया
अच्छा किया मैंने
जो मैं इधर को
जल्दी चला आया
बहुत से लोगों ने
बहुत सी चीजों में
बहुत कुछ कमाया
लिखना ही था
तूने ‘उलूक’
तो फिर मुझे
पहले क्यों नहीं
कुछ बताया
इस पर तो सबने
सब कुछ कब से
लिख लिखा दिया
उस पर कुछ
लिखने का तू
कभी क्यों नहीं
सोच पाया ।

चित्र साभार: http://www.clipartguide.com

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

किसी दिन सोचा कुछ और लिखा कुछ और ही दिया जाता है

सब कुछ तो नहीं
पर कुछ तो पता
चल जाता है
ऐसा जरूरी तो नहीं
फिर भी कभी
महसूस होता है
सामने से लिखा हुआ
लिखा हुआ ही नहीं
बहुत कुछ और
भी होता है
अजीब सी बात
नहीं लगती है
लिखने वाला
भी अजीब
हो सकता है
पढ़ने वाला भी
अजीब हो सकता है
जैसे एक ही बात
जब बार बार
पढ़ी जाती है
याद हो जाती है
एक दो दिन के लिये
ही नहीं पूरी जिंदगी
के लिये कहीं
सोच के किसी
कोने में जैसे
अपनी एक पक्की
झोपड़ी ही बना
ले जाती है
अब आप कहेंगे
झोपड़ी क्यों
मकान क्यों नहीं
महल क्यों नहीं
कोई बात नहीं
आप अपनी सोच
से ही सोच लीजिये
एक महल ही
बना लीजिये
ये झोपड़ी और महल
एक ही चीज
को देख कर
अलग अलग
कर देना
अलग अलग
पढ़ने वाला
ही कर पाता है
सामने लिखे हुऐ
को पढ़ते पढ़ते
किसी को आईना
नजर आ जाता है
उसका लिखा
इसके पढ़े से
मेल खा जाता है
ये भी अजीब बात है
सच में
इसी तरह के आईने
अलग अलग लिखे
अलग अलग पन्नों में
अलग अलग चेहरे
दिखाने लग जाते है
कहीं पर लिखे हुऐ से
किसी की चाल ढाल
दिखने लग जाती है
कहीं किसी के उठने
बैठने का सलीका
नजर आ जाता है
किसी का लिखा हुआ
विशाल हिमालय
सामने ले आता है
कोई नीला आसमान
दिखाते दिखाते
उसी में पता नहीं कैसे
विलीन हो जाता है
पता कहाँ चल पाता है
कोई पढ़ने के बाद की
बात सही सही कहाँ
बता पाता है
आज तक किसी ने
भी नहीं कहा
उसे पढ़ते पढ़ते
सामने से अंधेरे में
एक उल्लू
फड़फड़ाता हुआ
नजर आता है
किसने लिखा है
सामने से लिखा 
हुआ कुछ कभी 
पता ही नहीं 
लग पाता है 
ऐसे लिखे हुऐ 
को पढ़ कर 
शेर या भेड़िया 
सोच लेने में
किसी का
क्या जाता है ।
http://www.easyvectors.com

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

बंद करके आँखों को कभी उजाले को अंंधेरे में भी देखा जाये

आँखें बंद कर
कुछ दिनों
कुछ कह
लिया जाये
अंंधेरे में अंंधेरा
जला कर भी
कुछ कर
लिया जाये
रोज दिखती है
बिना चश्मे
उजाले की
करामातें
कुछ नया करें
किसी दिन और
कुछ भी नहीं
कहीं देखा जाये
रातों में होती है
रोशनी और
बहुत होती है
चाँद तारों को भी
अवकाश दे
के देखा जाये
एक तुम आते
हो खयालों में
एक वो आते जाते हैं
किसी और के
आने जाने का भी
कभी सोचा जाये
मुद्दतें हो गई हैं
पता चल भी
नहीं पाया यूँ भी
अपने होने ना होने
का ही कभी कुछ
पता कर लिया जाये
‘उलूक’
अंधेरे से रखनी
भी है दोस्ती तुझे
तेरी किस्मत भी है
कुछ शर्म
और लिहाज
उसका ही सही
कभी कर
लिया जाये
आने जाने
से रोका
नहीं है तुझे
भी किसी
ने कभी
उजाले में अंंधेरे
के उसूलों को
अंंधेरे में आजमा
कर कहीं अंंधेरे में
ही कभी देखा जाये
खुली आँखो से
देखती है दुनियाँ
सभी कुछ हमेशा ही
बंद कर के भी
आँखों से देखा
जाता है कुछ कभी
बस यही और यही
देखने के लिये
ही सही कभी
ये भी देखा जाये ।

चित्र साभार: http://www.prwatch.org

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

अभी अपनी अपनी बातें है बहुत हैं तेरी मेरी बातें कभी मिल आ वो भी करते हैं

कभी मिलेगी फुरसत
इन सब बातों से
तो तेरी कुछ बात भी
लिख के कहीं रख लूंंगा
अभी तो समेटने में
लगा हूँ अपने आस पास
के फैल चुके रेगिस्तानी
कांंटो की फसल को
जो जाने अन्जाने
में खु
द ही बोता
चला जा रहा हूँ
देख कर उगे हुऐ
बहुत ही खूबसूरत
फूल कैक्टस के
बहुत से रेगिस्तानों में
बिना पानी और
मिट्टी के भी
कई कई तो उगते हैं
कई कई सालों में
बस एक बार ही
और हमेशा इंतजार
रहता है उनके
किसी सुबह मुँह अंधेरे
खिल उठने का
चुभने वाली चीजें
वैसे तो वास्तु
के अनुसार
घर के सामने से
नहीं रखी जाती हैं
लेकिन बैचेनियाँ
कोई बेचे या ना बेचे
अपने लिये अपने आप
ही खरीदी जाती हैं
धुंंऐ और कोहरे में
वैसे भी दूर से कोई
फर्क नजर नहीं आता है
एक कहीं कुछ
जलने से बनता है
और दूसरा कहीं
कुछ बुझाने के बाद ही
राख के ऊपर से मडराता है
अब कैसे कहे कोई
कि इतना कुछ है
उलझा हुआ आस पास
एक दूसरे से
सुलझाने की कौन सोचे
बस लिख कर रख देने
से ही काम चल जाता है
तुझ पर है और
बहुत कुछ है
लिखने के लिये
लिखूंंगा भी किसी दिन
अभी तो अपने
बही खाते के
हिसाब किताब को ही
कुछ लिख लिखा
कर रख लूँ कहीं
किसी पन्ने पर
तब तक तेरे पास भी
बहुत मौके हैं
अपने हिसाब किताब
निबटाने के लिये
मिलते हैं किसी दिन
कभी बैठ कर
अपने अपने
बही खातों के साथ
कुछ सवालों के हल
हर किताब में
एक जैसे ही
मिला करते हैं ।

चित्र साभार: http://www.clipartillustration.com

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

क्यों नहीं लिखूँगा गंदगी हो जाने से अच्छा गंदगी बताना भी जरूरी है

घर को सुन्दर
बनाना भी
जरूरी है
घर की खिड़कियों
के शीशों को
चमकाना भी
जरूरी है
बाहर का खोल
ना खोल दे
कहीं पोल
तेज धूप और
बारिश के पानी
से बचाना भी
जरूरी है
बढ़िया कम्पनी
का महँगा पेंट
चढ़ाना भी
जरूरी है
रोशनी तेज रहे
बाहर की
दीवारों पर
देख ना पाये
कोई नाम
किसी का
इश्तहारों पर
आँखों को
थोड़ा सा
चौधियाँना
भी जरूरी है
शीशों के बाहर
से ही लौट लें
प्रश्न सभी के
अंदर के दृश्यों को
पर्दों के पीछे
छिपाना भी
जरूरी है
बुराई पर
अच्छाई की जीत
दिखानी भी जरूरी है
अच्छाई को बुराई
के साथ मिल बैठ
कर समझौता
कराना भी जरूरी है
रावण का खानदान है
अभी भी कूटने पीटने
के लिये भगवान
राम का आना और जाना
दिखाना भी जरूरी है
फिर कोई नाराज
हो जायेगा और
कहेगा कह रहा है
क्या किया जाये
आदत से मजबूर है
नकारात्मक सोच
की नालियों में
पल रहा ‘उलूक’ भी
उसे भी मालूम है
घर के अंदर चड्डी
चल जाती है
बाहर तो गांंधी कुर्ते
और टोपी में आना
भी जरूरी है
नहीं कहना चाहिये
होता कुछ नहीं है
पता होता है
फिर भी उनकी
सकारात्मक
झूठ की आंंधियों
में उड़ जाना
भी जरूरी है ।

चित्र साभार: http://www.beautiful-vegan.com

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

सत्य पर प्रयोग जारी है बंद कमरों में किया जा रहा है

सत्य क्या है बापू
जो तूने समझाया वो
या जो लोग आज
समझा रहे हैं
सत्य कहने की
कोशिश करने वाले
पर बौखला कर
कभी आँख तो कभी
दाँत भींच कर
अपने दिखला रहे हैं
मीठा होना चाहिये
सभी कुछ
बता बता कर
हर कड़वी चीज को
मिट्टी के नीचे
दबाते जा रहे हैं
पर सत्य भी
बेशरम जैसा
बाज नहीं आ रहा है
पौलीथीन की नहीं
गलने वाली थैलियों
जैसा हो जा रहा है
जरा सा पानी
गिरा नहीं
मिट्टी के ऊपर
थैली का एक
छोटा कोना
निकल कर
बाहर आ
जा रहा है
तालियाँ पहले
बजवा कर
मदारी बंदर को
नचवा रहा है
जमूरा जम्हाई
ले रहा है
सो भी नहीं
पा रहा है
तमाशा करने
की आदत है
तमाशबीन को
कल तक सड़क पर
किया करता था
आज पेड़ की फुन्गी
के ऊपर बैठा
कठफोड़वा बना
नजर आ रहा है
अब बन ही गया तो
फिर अपना लकड़ी में
छेद कर कीड़े निकाल
कर खाने की कला
क्यों नहीं दिखा रहा है
बापू रोना सत्य को
बस इसी बात पर
ही तो आ रहा है
जो काम करने को
दिया जा रहा है
उसी से ध्यान हटाने
के लिये आज हर कोई
कोई दूसरे काम की
झंडी हिला हिला कर
सबका ध्यान हटा रहा है
जिसकी समझ में
आ रहा है वो कह दे रहा है
और पढ़ने वालों की
जम के गालियाँ खा रहा है
‘उलूक’ सत्य क्या है
सोचने पर अभी क्यों
जोर लगा रहा है
सत्य पर प्रयोग जारी है
जब तक कुछ निकल कर
बाहर नहीं आ रहा है
अभी तो बस इतना
समझ में आ रहा है
भैंस के चारों तरफ
शोर हो रहा है
किस की है पता नहीं
चल पा रहा है
क्योंकि
हर कोई एक लाठी
लेकर हवा में
जोर जोर से
घुमा रहा है ।

चित्र साभार: http://pratikdas1989.blogspot.in/2011/04/my-experiments-with-social-service.html

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

बापू आजा झाड़ू लगाने जन्मदिन के दिन बहुत सा कूड़ा कूड़ा हो गया

बापू तेरा भी था
आज जन्मदिन
और मेरा भी
हर साल होता था
इस साल भी हो गया
पिछले सालों में
कभी भी नहीं
हो पाया वैसा
जैसा आज
कुछ कुछ ही नहीं
बहुत कुछ होना
जैसा हो गया
बापू तेरा हुआ
होगा कभी या
नहीं भी हुआ होगा
पर मेरा दिल तो
आज क्या बताऊँ तुझे
झिझक रहा हूँ बताने में
झाड़ू झाड़ू होते होते
पूरा का पूरा बस
झाड़ूमय हो गया
झाडू‌ लगाती थी
कामवाली घर पर
रोज ही लगाती थी
मेरे घर का कूड़ा
बगल के घर की  

गली में सँभाल कर

भी जरूर आती थी
झाड़ू देने वाली
नगरपालिका की
दिहाड़ी मजदूर
अपने वेतन से बस
झाड़ू ही तो एक
खरीद पाती थी
झाड़ू क्राँति के
आ जाने से उसका
भी लगता है कुछ
जीने का मकसद
कम से कम आज
तो हो ही गया
झाड़ू उसके हाथ का
तेरे नाम पर आज
लगता है जैसे एक
स्वतंत्रता की जंग
करता हुआ यहाँ
तक पहुँच कर
शहीद हो गया
केजरीवाल नहीं
भुना पाया झाड़ू को
झाड़ू सोच सोचकर
भी कई सालों तक
गलती कहाँ हुई थी
उससे आज बहुत
बारीकी से देखने से
उसे भी लगता है
कुछ ना कुछ
महसूस हो गया
छाती पीट रहा होगा
आज नोचते हुऐ
अपने सिर के बालों को
झाड़ू नीचे करने के
बदले हाथ में लेकर
ऊपर को करके
क्यों खड़ा हो गया
चिंतन करना ये तो
अब वाकई बहुत ही
जरूरी जैसा हो गया
बहुत सी चीजें काम
की हैं कुछ ही के लिये
और बेकाम की
हैं सबके लिये
ये सोचना अब
सही बिल्कुल भी
नहीं रह गया
इस साल दायें
हाथ में झाड़ू ने
दिखाया है कमाल
अगले साल देख लेना
बापू तेरा लोटा भी
लोगों के शौचालय
से निकल कर
बेपेंदी लुढ़कना छोड़
बायें हाथ में आकर
आदमी के
झाड़ू की तरह
झाड़ू के साथ
कंधे से कंधा मिला
कर आदमी का
एक नेता हो गया
जो भी हुआ है
अच्छा हुआ है
बाहर की सफाई
धुलाई के लिये
‘उलूक’ तेरे लिये
अपने अंदर की
गंदगी को सफाई से
अपने अंदर ही
छुपा के रख लेने का
एक और अच्छा
जुगाड़ जरूर हो गया
बापू तू अपने चश्में
और लाठी का रखना
सावधानी से
अब खयाल
और मत कह बैठना
अगले ही साल
चुरा लिया किसी
बहुत बड़े ने
बड़ी होशियार से
और तू चोर चोर
चिल्लाने के लायक
भी नहीं रह गया ।

चित्र साभार: http://vedvyazz.blogspot.in/2011/01/of-service-and-servitude_17.html

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