प्रतीक्षा में हूँ
उन सर्द हवाओं की
जो मेरी
अन्तरज्वाला को शांत करें ।
प्रतीक्षा में हूँ
उन गरम फिजाओं की
जो मेरे ठंडेपन को
कुछ गरम करें ।
सदियों से मेरी गर्मी
मेरी सर्दी से राजनीति कर रही है ।
सर्द हवाऎं
मेरी सर्दी को अपना लेती हैं ।
गरम फिजाऎं
मेरी ज्वाला को उतप्त बना देती हैं
आज भी मैं वहीं हूँ
जहाँ मैं जल रहा था
आज भी मैं वहीं हूँ
जहाँ मैं जम रहा था
अब पचास वर्षों के बाद
मुझे इंतजार है
न सर्द हवाओं का
न इंतजार है
गरम फिजाओं का
शायद यही रास्ता है
कभी
मेरी गर्मी मेरी सर्दी से मिले
और यूं ही भटकते हुवे
मुझे स्थिरता मिले ।
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 1 पृ 15
'सरगोशीयों के स्वर' में मुद्रित 1 पृ 15